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Sri Pratyangira Stotram 1 – श्री प्रत्यङ्गिरा स्तोत्रम् (शत्रु विध्वंसक)

Sri Pratyangira Stotram 1 – श्री प्रत्यङ्गिरा स्तोत्रम् (शत्रु विध्वंसक)
॥ विनियोगः ॥ अस्य श्री प्रत्यङ्गिरा स्तोत्रस्य अङ्गिरा ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः श्रीप्रत्यङ्गिरा देवता ओं बीजं ह्रीं शक्तिः हुं कीलकं ममाभीष्टसिद्ध्यर्थे पाठे विनियोगः ॥ ॥ करन्यासः ॥ ओं ह्रां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ओं ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः । ओं ह्रूं मध्यमाभ्यां नमः । ओं ह्रैं अनामिकाभ्यां नमः । ओं ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ओं ह्रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । ॥ हृदयादिन्यासः ॥ ओं ह्रां हृदयाय नमः । ओं ह्रीं शिरसे स्वाहा । ओं ह्रूं शिखायै वषट् । ओं ह्रैं कवचाय हुम् । ओं ह्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् । ओं ह्रः अस्त्राय फट् । ॥ ध्यानम् ॥ कृष्णरूपां बृहद्रूपां रक्तकुञ्चितमूर्धजाम् । शिरः कपालमालां च विकेशीं घूर्णिताननाम् ॥ १ ॥ रक्तनेत्रामतिक्रुद्धां लम्बजिह्वामधोमुखीम् । दंष्ट्राकरालवदनां नेत्रभ्रुकुटिलेक्षणाम् ॥ २ ॥ ऊर्ध्वदक्षिणहस्तेन बिभ्रतीं च परष्यधम् । अधोदक्षिणहस्तेन बिभ्राणां शूलमद्भुतम् ॥ ३ ॥ ततोर्ध्ववामहस्तेन धारयन्तीं महाङ्कुशाम् । अधोवामकरेणाथ बिभ्राणां पाशमेव च ॥ ४ ॥ एवं ध्यात्वा महाकृत्यां स्तोत्रमेतदुदीरयेत् ॥ ५ ॥ ॥ स्तोत्रम् ॥ ॥ ईश्वर उवाच ॥ नमः प्रत्यङ्गिरे देवि प्रतिकूलविधायिनि । नमः सर्वगते शान्ते परचक्रविमर्दिनी ॥ ६ ॥ नमो जगत्रयाधारे परमन्त्रविदारिणी । नमस्ते चण्डिके चण्डी महामहिषवाहिनी ॥ ७ ॥ नमो ब्रह्माणि देवेशि रक्तबीजनिपातिनी । नमः कौमारिके कुण्ठी परदर्पनिषूदिनी ॥ ८ ॥ नमो वाराहि चैन्द्राणि परे निर्वाणदायिनी । नमस्ते देवि चामुण्डे चण्डमुण्डविदारिणी ॥ ९ ॥ नमो मातर्महालक्ष्मी संसारार्णवतारिणी । निशुम्भदैत्यसंहारि कालान्तकि नमोऽस्तु ते ॥ १० ॥ ओं कृष्णाम्बर शोभिते सकल सेवक जनोपद्रवकारक दुष्टग्रह राजघण्टा संहट्‍ट हारिहि कालान्तकि नमोऽस्तु ते ॥ ११ ॥ दुर्गे सहस्रवदने अष्टादशभुजलताभूषिते महाबलपराक्रमे अद्भुते अपराजिते देवि प्रत्यङ्गिरे सर्वार्तिशायिनि परकर्म विध्वंसिनि परयन्त्र मन्त्र तन्त्र चूर्णादि प्रयोगकृत वशीकरण स्तम्भन जृम्भणादि दोषाञ्चयाच्छादिनि सर्वशत्रूच्चाटिनि मारिणि मोहिनि वशीकरणि स्तम्भिनि जृम्भिणि आकर्षिणि सर्वदेवग्रह योगग्रह योगिनिग्रह दानवग्रह दैत्यग्रह राक्षसग्रह सिद्धग्रह यक्षग्रह गुह्यकग्रह विद्याधरग्रह किन्नरग्रह गन्धर्वग्रह अप्सराग्रह भूतग्रह प्रेतग्रह पिशाचग्रह कूष्माण्डग्रह गजादिकग्रह मातृग्रह पितृग्रह वेतालग्रह राजग्रह चौरग्रह गोत्रग्रह अश्वदेवताग्रह गोत्रदेवताग्रह आधिग्रह व्याधिग्रह अपस्मारग्रह नासाग्रह गलग्रह याम्यग्रह डामरिकाग्रहोदकग्रह विद्योरग्रहारातिग्रह छायाग्रह शल्यग्रह सर्वग्रह विशल्यग्रह कालग्रह सर्वदोषग्रह विद्राविणी सर्वदुष्टभक्षिणि सर्वपापनिषूदिनि सर्वयन्त्रस्फोटिनि सर्वशृङ्खलात्रोटिनि सर्वमुद्राद्राविणि ज्वालाजिह्वे करालवक्त्रे रौद्रमूर्ते देवि प्रत्यङ्गिरे सर्वं देहि यशो देहि पुत्रं देहि आरोग्यं देहि भुक्तिमुक्त्यादिकं देहि सर्वसिद्धिं देहि मम सपरिवारं रक्ष रक्ष पूजा जप होम ध्यानार्चनादिकं कृतं न्यूनमधिकं वा परिपूर्णं कुरु कुरु अभिमुखी भव रक्ष रक्ष क्षम सर्वापराधम् ॥ १२ ॥ ॥ फलश्रुतिः ॥ एवं स्तुता महादेवि शिवेन परमात्मनः । उवाचेदं प्रहृष्टाङ्गी शृणुष्व परमेश्वरः ॥ १३ ॥ एतत् प्रत्यङ्गिरा स्तोत्रं ये पठन्ति द्विजोत्तमाः । शृण्वन्तः साधयन्ताश्च तेषां सिद्धिप्रदा भवेत् ॥ १४ ॥ श्रीश्च कुब्जीं महाकुब्जी कालिका गुह्यकालिका । त्रिपुरा त्वरिता नित्या त्रैलोक्यविजया जया ॥ १४ ॥ जितापराजिता देवी जयन्ती भद्रकालिका । सिद्धलक्ष्मी महालक्ष्मीः कालरात्रि नमोऽस्तु ते ॥ १५ ॥ काली करालविक्रान्ते कालिका पापहारिणी । विकरालमुखी देवि ज्वालामुखि नमोऽस्तु ते ॥ १६ ॥ इदं प्रत्यङ्गिरा स्तोत्रं यः पठेन्नियतः शुचिः । तस्य सर्वार्थसिद्धिस्यान्नात्रकार्याविचरणा ॥ १७ ॥ शत्रवो नाशमायान्ति महानैश्वर्यवान्भवेत् । इदं रहस्यं परमं नाख्येयं यस्यकस्यचित् ॥ १८ ॥ सर्वपापहरं पुण्यं सद्यः प्रत्ययकारकम् । गोपनीयं प्रयत्नेन सर्वकामफलप्रदम् ॥ १९ ॥ ॥ इति अथर्वणरहस्ये श्री प्रत्यङ्गिरा स्तोत्रम् संपूर्णम् ॥

श्री प्रत्यङ्गिरा स्तोत्रम् (शत्रु विध्वंसक) - परिचय

श्री प्रत्यङ्गिरा स्तोत्रम् माँ आदिशक्ति का एक ऐसा उग्र और शक्तिशाली कवच है जो विशेष रूप से शत्रुओं, तांत्रिक प्रयोगों और अदृश्य बाधाओं को नष्ट करने के लिए जाना जाता है। इस स्तोत्र के ऋषि 'अंगिरा' हैं और इसका अनुष्टुप् छंद है। यह 'अथर्वण रहस्य' (Atharvana Rahasya) का एक महत्वपूर्ण भाग है।
इस स्तोत्र में देवी को 'परचक्रविमर्दिनी' (दूसरों के षड्यंत्रों को कुचलने वाली) और 'परमन्त्रविदारिणी' (दूसरों के मंत्रों को नष्ट करने वाली) कहा गया है। इसमें एक अत्यंत शक्तिशाली 'माला मंत्र' भी सम्मिलित है जो शरीर के हर अंग की रक्षा करता है और सभी प्रकार के दुष्ट ग्रहों, यक्ष, राक्षस, और पिशाच आदि की शक्तियों को निष्प्रभावी बना देता है।
यह केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि एक 'महाविद्या' है जो साधक को अभय प्रदान करती है। इसका पाठ करने वाला व्यक्ति 'महानैश्वर्यवान्' (महान ऐश्वर्यशाली) बनता है और उसके सभी शत्रु स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं।

स्तोत्र पाठ के लाभ (Benefits)

इस स्तोत्र और माला मंत्र के पाठ से जीवन में अद्भुत रक्षात्मक और सकारात्मक प्रभाव होते हैं:
  • शत्रु और षड्यंत्र नाश: श्लोक 18 के अनुसार, 'शत्रवो नाशमायान्ति' - इसके पाठ से शत्रु स्वयं ही नष्ट हो जाते हैं और उनकी कोई भी चाल सफल नहीं होती।
  • तंत्र-मंत्र काट: यह 'परयन्त्र मन्त्र तन्त्र चूर्णादि प्रयोग' (दूसरों द्वारा किए गए तंत्र, यंत्र और टोटकों) को पूरी तरह नष्ट कर देता है।
  • ग्रह बाधा निवारण: माला मंत्र में सूर्य, चंद्र से लेकर राहु, केतु और अन्य उपग्रहों ('दुष्टग्रह', 'क्रूरग्रह') के दुष्प्रभावों को शांत करने की शक्ति है।
  • प्रेत और अदृश्य बाधा मुक्ति: यह भूत, प्रेत, पिशाच, ब्रह्मराक्षस और शकिनी-डाकिनी जैसी अदृश्य शक्तियों से रक्षा करता है।
  • रोग और कष्ट निवारण: 'सर्वार्तिशायिनि' और 'महाव्याधि' नाशक होने के कारण यह असाध्य रोगों और शारीरिक कष्टों ('गलग्रह', 'आधिग्रह' आदि) को दूर करता है।
  • सर्व कार्य सिद्धि: 'अचिन्तितानि सिद्ध्यन्ति' - इसके प्रभाव से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं और साधक को यश, पुत्र, और आरोग्य की प्राप्ति होती है।

पाठ विधि (Recitation Method)

माँ प्रत्यङ्गिरा की साधना विशेष नियमों के साथ करने से शीघ्र फलदायी होती है:
  • विनियोग और न्यास: पाठ शुरू करने से पहले स्तोत्र के प्रारंभ में दिए गए 'विनियोग' और 'करन्यास/हृदयादि न्यास' अवश्य करें। इससे शरीर में मंत्र शक्ति धारण करने की क्षमता आती है।
  • ध्यान: देवी के उग्र स्वरूप (सिंह मुख, कृष्ण वर्ण) का ध्यान करते हुए पाठ करें।
  • समय: अमावस्या, अष्टमी, या ग्रहण काल की रात्रि सर्वश्रेष्ठ है। सामान्य दिनों में राहुकाल या संध्या बेला में पाठ करें।
  • वस्त्र और आसन: लाल या काले रंग के वस्त्र धारण करें और उसी रंग के ऊनी आसन का प्रयोग करें।
  • भोग: देवी को गुड़हल (जवाकुसुम) के फूल, नींबू, और काली मिर्च या उड़द से बने नैवेद्य अर्पित करें।
  • सावधानी: यह एक उग्र साधना है, इसलिए सात्विक रहते हुए और किसी का अहित न करने की भावना से ही पाठ करें। आत्म-रक्षा इसका मूल उद्देश्य होना चाहिए।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. श्री प्रत्यङ्गिरा स्तोत्रम् का मुख्य उद्देश्य क्या है?

इसका मुख्य उद्देश्य शत्रुओं का नाश ('सर्वशत्रूच्चाटिनि'), काले जादू और तंत्र बाधाओं को काटना ('परयन्त्र मन्त्र तन्त्र चूर्णादि प्रयोगकृत'), और साधक को पूर्ण सुरक्षा प्रदान करना है।

2. माँ प्रत्यङ्गिरा का स्वरूप कैसा है?

ध्यान मंत्र के अनुसार, उनका रूप कृष्ण वर्ण (काला), विशाल शरीर, सिंह मुख, और लाल नेत्रों वाला है। वे अत्यंत उग्र और भयानक स्वरूप वाली हैं जो दुष्टों का संहार करती हैं।

3. क्या इस स्तोत्र से ग्रह दोष दूर होते हैं?

हाँ, माला मंत्र (श्लोक 12) में स्पष्ट उल्लेख है कि यह सूर्य, चंद्र, मंगल, शनि आदि सभी 'दुष्टग्रह' और 'क्रूरग्रहों' की पीड़ा को शांत करता है।

4. पाठ करने की सही विधि क्या है?

इसे विनियोग और करन्यास/हृदयादि न्यास के बाद ही पढ़ना चाहिए। लाल वस्त्र धारण करके, लाल पुष्प अर्पित कर, अमावस या अष्टमी की रात्रि में पाठ करना विशेष फलदायी है।

5. 'प्रत्यङ्गिरा' का अर्थ क्या है?

'प्रति' का अर्थ है उल्टा या वापस, और 'अंगिरा' का संबंध रस/शक्ति से है। वह शक्ति जो दूसरों द्वारा किए गए तांत्रिक हमलों को उल्टा करके उन्हीं पर वापस भेज देती है, उसे प्रत्यङ्गिरा कहते हैं।

6. क्या यह स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है?

जी हाँ, मंत्र में 'आरोग्यं देहि' (श्लोक 12) की प्रार्थना की गई है। यह असाध्य रोगों ('महाव्याधि') और मानसिक कष्टों को दूर करने में सहायक है।

7. क्या स्त्रियां इसका पाठ कर सकती हैं?

शक्ति साधना में लिंग भेद नहीं है। स्त्रियां भी पूर्ण पवित्रता और श्रद्धा के साथ माँ की आराधना कर सकती हैं। मासिक धर्म के समय पाठ न करें।

8. स्तोत्र में 'परचक्रविमर्दिनी' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है 'शत्रुओं के चक्रव्यूह या सेना को कुचलने वाली'। यह देवी की उस शक्ति को दर्शाता है जो विरोधियों की किसी भी योजना को विफल कर देती है।

9. क्या इसे घर में ज़ोर से पढ़ा जा सकता है?

उग्र मंत्रों का मानसिक या उपांशु (धीमे स्वर में) जप करना बेहतर होता है। यदि घर में नकारात्मक ऊर्जा महसूस हो रही हो, तो मध्यम स्वर में पाठ कर सकते हैं।

10. सिद्धि प्राप्त करने के लिए इसे कितनी बार पढ़ना चाहिए?

साधारण लाभ के लिए प्रतिदिन 1 या 3 बार पाठ करें। विशेष कार्य सिद्धि या संकट निवारण के लिए 41 दिनों तक नियमित पाठ या अनुष्ठान करना चाहिए।