Sri Amba Pancharatna Stotram – श्री अम्बा पञ्चरत्न स्तोत्रम् (Shankaracharya Kritam)
Sri Amba Pancharatnam: The Five Gems of Goddess Amba

श्री अम्बा पञ्चरत्न स्तोत्रम् - परिचय (Introduction)
श्री अम्बा पञ्चरत्न स्तोत्रम् (Sri Amba Pancharatna Stotram) जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा रचित पाँच दिव्य श्लोकों का संग्रह है। 'पञ्चरत्न' का अर्थ है पाँच रत्न—प्रत्येक श्लोक एक अनमोल रत्न की भांति देवी अम्बा (त्रिपुरसुंदरी/ललिता) के विभिन्न पहलुओं को उजागर करता है। शंकराचार्य ने अपने जीवन में अनेक पञ्चरत्न स्तोत्रों की रचना की—शिव पञ्चरत्नम्, विष्णु पञ्चरत्नम्, और यह अम्बा पञ्चरत्नम्।
इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि प्रत्येक श्लोक का समापन 'मामम्बापुरवासिनी भगवती हेरम्बमातावतु' से होता है। 'अम्बापुर' को कुछ विद्वान कांचीपुरम (Kanchipuram) से जोड़ते हैं, जहाँ देवी कामाक्षी का प्रसिद्ध मंदिर है और जहाँ शंकराचार्य ने श्री यंत्र स्थापित किया था। 'हेरम्बमाता' का अर्थ है गणेश की माता, जो देवी पार्वती का ममतामय स्वरूप है।
यह स्तोत्र श्री विद्या उपासना से गहराई से जुड़ा है। इसमें 'ह्रींकार', 'कादित्रिपञ्चाक्षरी' (पंचदशी मंत्र), और 'राजराजेश्वरी' जैसे तांत्रिक पद हैं जो इसे साधारण भक्ति काव्य से ऊपर उठाकर मंत्र शास्त्र की श्रेणी में रख देते हैं।
श्लोकों का भावार्थ और रहस्य (Significance)
इन पाँच श्लोकों में देवी के सौंदर्य, शक्ति और ज्ञान का अद्भुत वर्णन है:
सौंदर्य वर्णन (श्लोक 1): देवी को 'श्रीचन्द्रबिम्बानना' (पूर्ण चंद्र सा मुख), 'बिम्बोष्ठी' (लाल बिम्ब फल जैसे ओष्ठ), और 'स्मितभाषिणी' (मधुर मुस्कान से बोलने वाली) कहा गया है। वे कदंब वन में निवास करती हैं और 'ह्रींकाराक्षरमन्त्र' के केंद्र में विराजित हैं।
देवी के नाम (श्लोक 2): इसमें 'क' वर्ण से आरंभ होने वाले नामों की माला है—कल्याणी, कात्यायनी, कालिका, काला, कामाक्षी। 'कलिमलारण्यातिदावानला' का अर्थ है—कलियुग के पापों के वन को जलाने वाली दावानल (जंगल की आग)।
आभूषण और वैभव (श्लोक 3): देवी काँची (करधनी), कंकण, हार, कुंडल और करोड़ों मुकुटों से सुशोभित हैं। 'पीयूषकुम्भस्तना' का अर्थ है—उनका वक्षस्थल अमृत के घड़े समान करुणा से भरा है।
असुर संहार (श्लोक 4): यह देवी माहात्म्य का सार है—शुम्भ-निशुम्भ, रक्तबीज, मधु-कैटभ और महिषासुर का नाश करने वाली। यह देवी के क्रोध स्वरूप (चंडी) को दर्शाता है।
श्री विद्या (श्लोक 5): सबसे महत्वपूर्ण श्लोक—देवी को 'श्रीविद्या परदेवता', 'आदिजननी', 'बाला', 'त्रिपुरेश्वरी', 'राजराजेश्वरी' और 'शृंगारचूडामणि' कहा गया है। ये सभी श्री विद्या परंपरा के मूल नाम हैं।
फलश्रुति लाभ (Benefits)
श्लोक 6 स्वयं में एक विस्तृत फलश्रुति है जो स्पष्ट रूप से लाभ बताती है:
दिव्य ऐश्वर्य (Divine Wealth): 'दिव्यैश्वर्य'—केवल भौतिक संपत्ति नहीं, बल्कि दिव्य गुण जैसे तेज, आकर्षण और प्रभाव।
शत वर्ष आयु (100-Year Lifespan): 'शतायु'—100 वर्ष की स्वस्थ और सक्रिय आयु। यह वैदिक परंपरा में आदर्श आयु मानी जाती है।
उत्तम बुद्धि (Supreme Intellect): 'उत्तममति'—निर्णय लेने की क्षमता, विवेक और समझ में वृद्धि।
विद्या और श्री (Knowledge & Prosperity): 'विद्यां श्रियं शाश्वतम्'—शाश्वत (अक्षय) ज्ञान और समृद्धि।
धर्मनिष्ठ जीवनसाथी: 'स्वधर्मनिरतां श्रीसुन्दरीं भामिनीं'—धर्मपरायण और सुंदर पत्नी की प्राप्ति (विवाहेच्छुओं के लिए)।
स्वर्ग फल / मोक्ष: 'अन्ते स्वर्गफलं लभेत्'—जीवन के अंत में मोक्ष और देवताओं द्वारा प्रशंसा।
पाठ विधि (Ritual Method)
फलश्रुति में 'प्रभातेऽनिशं' (प्रतिदिन प्रभात काल) का उल्लेख है:
दैनिक पाठ विधि:
- समय: प्रातः काल सूर्योदय के समय या ब्रह्म मुहूर्त में। शुक्रवार विशेष शुभ है।
- स्थान: पूर्व या उत्तर मुख करके स्वच्छ लाल आसन पर बैठें।
- पूजन: देवी के चित्र या श्री यंत्र के सामने घी का दीपक जलाएं। कुमकुम, लाल पुष्प (कमल या गुलाब) अर्पित करें।
- संकल्प: अपनी मनोकामना मन में रखकर 'ॐ श्री माते नमः' कहकर प्रारंभ करें।
- पाठ: 1, 3, 5, या 11 बार पाठ करें। उच्चारण स्पष्ट और भावपूर्ण हो।
- समापन: 'इति श्री अम्बा पञ्चरत्न स्तोत्रम्' कहकर क्षमा प्रार्थना करें।
विशेष अनुष्ठान (विवाह/संतान हेतु):
नवरात्रि में 9 दिनों तक प्रतिदिन 21 पाठ करें। अंतिम दिन कन्या पूजन करें और देवी को लाल चुनरी अर्पित करें। कामाक्षी या त्रिपुरसुंदरी मंदिर में जाकर पाठ करना अत्यंत फलदायी है।
FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. इस स्तोत्र के रचयिता कौन हैं?
इस स्तोत्र के रचयिता जगद्गुरु आदि शंकराचार्य माने जाते हैं। शंकराचार्य ने भगवान शिव, विष्णु और देवी पर अनेक पञ्चरत्न स्तोत्रों की रचना की है। यह उनकी श्री विद्या उपासना का प्रमाण भी है।
2. 'अम्बापुरवासिनी' का क्या अर्थ है?
'अम्बापुर' का अर्थ है 'माता का नगर'। कुछ विद्वान इसे कांचीपुरम (Kanchipuram) से जोड़ते हैं, जहाँ देवी कामाक्षी का प्रसिद्ध मंदिर है। अन्य इसे किसी तांत्रिक पीठ या मन के भीतर स्थित दिव्य स्थान मानते हैं जहाँ देवी सदा विराजमान हैं।
3. 'हेरम्बमाता' कौन हैं?
'हेरम्ब' भगवान गणेश का एक नाम है (पंचमुख गणेश को भी हेरम्ब कहा जाता है)। गणेश की माता होने से देवी पार्वती/अम्बा को 'हेरम्बमाता' कहा जाता है। यह नाम देवी के मातृ स्वरूप और गणेश से उनके संबंध को दर्शाता है।
4. फलश्रुति में क्या-क्या लाभ बताए गए हैं?
श्लोक 6 (फलश्रुति) में कहा गया है: जो प्रतिदिन प्रभात काल में इस पञ्चरत्न का पाठ करता है, उसे (1) दिव्य ऐश्वर्य, (2) शत वर्ष आयु, (3) उत्तम बुद्धि, (4) विद्या, (5) शाश्वत श्री (समृद्धि), (6) धर्मनिष्ठ सुंदर पत्नी, और (7) अंत में स्वर्ग फल (मोक्ष) प्राप्त होता है।
5. 'ह्रींकाराक्षरमन्त्रमध्यसुभगा' का क्या अर्थ है?
यह श्री विद्या का संकेत है। 'ह्रीं' माया बीज है जो त्रिपुरसुंदरी का प्रतीक है। 'मन्त्रमध्य' का अर्थ है मंत्र के बीज में, और 'सुभगा' का अर्थ है सौभाग्यवती। अर्थात देवी ह्रीं बीज मंत्र के केंद्र में विराजमान हैं और सौभाग्य प्रदान करती हैं।
6. इसमें देवी के कौन-कौन से नाम आए हैं?
इस स्तोत्र में देवी के अनेक नाम वर्णित हैं: कल्याणी, कात्यायनी, कालिका, काला, श्यामला, कामाक्षी, दुर्गा, जया, चण्डिका, बाला, त्रिपुरेश्वरी, शिवसती, राजराजेश्वरी, राज्ञी, शिवदूतिका। ये सभी नाम श्री विद्या और दश महाविद्या परंपरा के हैं।
7. 'कादित्रिपञ्चाक्षरी' का क्या रहस्य है?
'कादि' का अर्थ है 'क' वर्ण से आरंभ होने वाला। 'त्रिपञ्चाक्षरी' अर्थात 15 अक्षरों वाला—यह 'पंचदशी मंत्र' का संकेत है। पंचदशी मंत्र श्री विद्या का मूल मंत्र है जो 15 बीजाक्षरों से बना है। देवी इस मंत्र की अधिष्ठात्री हैं।
8. श्लोक 4 में किन असुरों का उल्लेख है?
श्लोक 4 में देवी के असुर-संहारक स्वरूप का वर्णन है: 'शुम्भनिशुम्भदैत्यशमनी' (शुम्भ-निशुम्भ का वध करने वाली), 'रक्तबीजाशनी' (रक्तबीज को भक्षण करने वाली), 'मधुकैटभासुररिपु' (मधु-कैटभ की शत्रु), 'माहिषध्वंसिनी' (महिषासुर का नाश करने वाली)। यह देवी माहात्म्य की कथाओं का सार है।
9. इसे कब और कैसे पढ़ना चाहिए?
फलश्रुति के अनुसार 'प्रभाते अनिशं' अर्थात प्रतिदिन प्रभात काल में पाठ करना चाहिए। स्नान करके, पूर्व या उत्तर मुख करके, देवी के चित्र या श्री यंत्र के सामने बैठें। घी का दीपक और कुमकुम अर्पित करें। 1, 5 या 11 बार पाठ करें।
10. क्या यह स्तोत्र श्री विद्या दीक्षित के लिए ही है?
नहीं, यह स्तोत्र सभी भक्तों के लिए है। यद्यपि इसमें श्री विद्या के तत्व (ह्रींकार, पंचदशी, राजराजेश्वरी) हैं, परन्तु शंकराचार्य ने इसे सरल भाषा में रचा है। कोई भी श्रद्धालु इसका पाठ कर सकता है और देवी कृपा प्राप्त कर सकता है।