Logoपवित्र ग्रंथ

Sri Manasa Devi Stotram (Mahendra Krutam) – श्री मनसा देवी स्तोत्रम् (महेन्द्र कृतम्)

Sri Manasa Devi Stotram: Indra's Hymn to the Serpent Goddess

Sri Manasa Devi Stotram (Mahendra Krutam) – श्री मनसा देवी स्तोत्रम् (महेन्द्र कृतम्)
देवि त्वां स्तोतुमिच्छामि साध्वीनां प्रवरां पराम् । परात्परां च परमां न हि स्तोतुं क्षमोऽधुना ॥ १ ॥ स्तोत्राणां लक्षणं वेदे स्वभावाख्यानतः परम् । न क्षमः प्रकृतिं वक्तुं गुणानां तव सुव्रते ॥ २ ॥ शुद्धसत्त्वस्वरूपा त्वं कोपहिंसाविवर्जिता । न च शप्तो मुनिस्तेन त्यक्तया च त्वया यतः ॥ ३ ॥ त्वं मया पूजिता साध्वी जननी च यथाऽदितिः । दयारूपा च भगिनी क्षमारूपा यथा प्रसूः ॥ ४ ॥ त्वया मे रक्षिताः प्राणा पुत्रदाराः सुरेश्वरि । अहं करोमि त्वां पूज्यां मम प्रीतिश्च वर्धते ॥ ५ ॥ नित्यं यद्यपि पूज्या त्वं भवेऽत्र जगदम्बिके । तथापि तव पूजां वै वर्धयामि पुनः पुनः ॥ ६ ॥ ये त्वामाषाढसङ्क्रान्त्यां पूजयिष्यन्ति भक्तितः । पञ्चम्यां मनसाख्यायां मासान्ते वा दिने दिने ॥ ७ ॥ पुत्रपौत्रादयस्तेषां वर्धन्ते च धनानि च । यशस्विनः कीर्तिमन्तो विद्यावन्तो गुणान्विताः ॥ ८ ॥ ये त्वां न पूजयिष्यन्ति निन्दन्त्यज्ञानतो जनाः । लक्ष्मीहीना भविष्यन्ति तेषां नागभयं सदा ॥ ९ ॥ त्वं स्वर्गलक्ष्मीः स्वर्गे च वैकुण्ठे कमलाकला । नारायणांशो भगवान् जरत्कारुर्मुनीश्वरः ॥ १० ॥ तपसा तेजसा त्वां च मनसा ससृजे पिता । अस्माकं रक्षणायैव तेन त्वं मनसाभिधा ॥ ११ ॥ मनसा देवि तु शक्ता चात्मना सिद्धयोगिनी । तेन त्वं मनसादेवी पूजिता वन्दिता भवे ॥ १२ ॥ यां भक्त्या मनसा देवाः पूजयन्त्यनिशं भृशम् । तेन त्वां मनसादेवीं प्रवदन्ति पुराविदः ॥ १३ ॥ सत्त्वरूपा च देवी त्वं शश्वत्सत्त्वनिषेवया । यो हि यद्भावयेन्नित्यं शतं प्राप्नोति तत्समम् ॥ १४ ॥ इदं स्तोत्रं पुण्यबीजं तां सम्पूज्य च यः पठेत् । तस्य नागभयं नास्ति तस्य वंशोद्भवस्य च ॥ १५ ॥ विषं भवेत्सुधातुल्यं सिद्धस्तोत्रं यदा पठेत् । पञ्चलक्षजपेनैव सिद्धस्तोत्रो भवेन्नरः । सर्पशायी भवेत्सोऽपि निश्चितं सर्पवाहनः ॥ १६ ॥ ॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे प्रकृतिखण्डे षट्चत्वारिंशोऽध्याये महेन्द्र कृत श्री मनसादेवी स्तोत्रम् ॥

श्री मनसा देवी स्तोत्रम् - परिचय (Introduction)

श्री मनसा देवी स्तोत्रम् (महेन्द्र कृतम्) ब्रह्म वैवर्त पुराण के प्रकृति खण्ड के 46वें अध्याय में देवराज इन्द्र (महेन्द्र) द्वारा रचित 16 श्लोकों का अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है। यह स्तोत्र सर्प देवी मनसा की महिमा और उनकी उपासना के फल का वर्णन करता है।

मनसा देवी हिंदू धर्म में सर्प देवी (नाग देवी) हैं। उनकी उत्पत्ति के बारे में विभिन्न ग्रंथों में भिन्न-भिन्न वर्णन है। कुछ ग्रंथों में वे ऋषि कश्यप और कद्रू की पुत्री हैं, जबकि अन्य में उन्हें भगवान शिव की मानस पुत्री बताया गया है। वे नागराज वासुकि की बहन, ऋषि जरत्कारु की पत्नी और प्रसिद्ध आस्तिक ऋषि की माता हैं।

श्लोक 11-13 में देवी के 'मनसा' नाम के तीन कारण बताए गए हैं: (1) पिता ने तप, तेज और मन (मनसा) से उन्हें उत्पन्न किया, (2) वे अपने आत्मबल से सिद्ध योगिनी हैं, (3) देवता भी 'मनसा' (मन से, भक्तिपूर्वक) उनकी पूजा करते हैं। विशेषकर बंगाल, असम, बिहार और झारखण्ड में मनसा देवी की उपासना का विशेष प्रचलन है।

श्लोकों का भावार्थ (Significance)

इन्द्र ने मनसा देवी की स्तुति में अनेक विशेषताएं बताई हैं:

  • श्लोक 1-2 (विनम्रता): 'परात्परां परमां न स्तोतुं क्षमोऽधुना'—परात्पर, परम देवी की स्तुति करने में मैं असमर्थ हूँ। वेद भी आपके गुणों का वर्णन नहीं कर सकते।

  • श्लोक 3 (शुद्ध सत्त्व): 'शुद्धसत्त्वस्वरूपा, कोपहिंसाविवर्जिता'—शुद्ध सत्त्व स्वरूप, क्रोध और हिंसा से रहित।

  • श्लोक 4 (त्रिविध रूप): इन्द्र कहते हैं—आप मेरे लिए अदिति जैसी जननी, दयारूपा भगिनी और क्षमारूपा माता हैं।

  • श्लोक 5-6 (कृतज्ञता): आपने मेरे प्राण, पुत्र और पत्नी की रक्षा की। यद्यपि आप नित्य पूज्य हैं, फिर भी मैं आपकी पूजा बढ़ाता हूँ।

  • श्लोक 7-8 (पूजा का फल): आषाढ़ संक्रांति, मनसा पंचमी (नाग पंचमी), मास के अंत या प्रतिदिन पूजा करने से पुत्र-पौत्र, धन, यश, कीर्ति, विद्या और गुण प्राप्त होते हैं।

  • श्लोक 9 (पूजा न करने का फल): जो अज्ञानवश निंदा करते हैं, वे लक्ष्मीहीन होते हैं और उन्हें सदा नाग भय रहता है।

  • श्लोक 10 (दिव्य स्थिति): आप स्वर्ग में लक्ष्मी और वैकुण्ठ में कमला का अंश हैं। आपके पति जरत्कारु नारायण के अंश हैं।

पाठ के लाभ (Benefits)

श्लोक 15-16 में फलश्रुति (Phala Shruti) विस्तार से दी गई है:

  • सर्प भय नाश: 'तस्य नागभयं नास्ति'—पाठ करने वाले को नाग भय नहीं रहता।

  • वंश रक्षा: 'तस्य वंशोद्भवस्य च'—पाठक की संतानों को भी सर्प भय नहीं।

  • विष निवारण: 'विषं भवेत्सुधातुल्यं'—सिद्ध स्तोत्र पाठ से विष भी अमृत समान हो जाता है।

  • स्तोत्र सिद्धि: 5 लाख (पञ्चलक्ष) जप से स्तोत्र सिद्ध होता है।

  • सर्प शयन: सिद्ध साधक को सर्प पर शयन और सर्प वाहन प्राप्त होता है (जैसे भगवान विष्णु)।

  • नाग दोष और कालसर्प दोष शांति: जन्मकुंडली के नाग दोष और कालसर्प दोष शांत होते हैं।

पाठ विधि (Ritual Method)

नाग पंचमी (श्रावण शुक्ल पंचमी) पर विशेष पूजा होती है:

दैनिक पाठ विधि:

  1. समय: प्रातः काल या संध्या। पंचमी तिथि विशेष शुभ है।
  2. स्थान: पूर्व मुख करके स्वच्छ आसन पर बैठें।
  3. पूजन: सर्प की मिट्टी की मूर्ति या चित्र के सामने दीपक जलाएं।
  4. नैवेद्य: दूध, खीर, लावा (मुरमुरा) और दूब घास अर्पित करें। नाग पंचमी पर मिट्टी नहीं खोदते।
  5. पाठ: 1, 3, 9 या 21 बार पाठ करें।
  6. आस्तिक स्मरण: पाठ के बाद आस्तिक ऋषि का स्मरण करें—उनके नाम से सर्प पास नहीं आते।

कालसर्प दोष शांति अनुष्ठान:

नाग पंचमी से आरंभ करके 21 दिनों तक प्रतिदिन 11 बार पाठ करें। नाग देवता को दूध अर्पित करें। अंतिम दिन ब्राह्मण भोजन कराएं और चांदी का नाग दान करें।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. मनसा देवी कौन हैं?

मनसा देवी सर्प देवी (नाग देवी) हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार वे ऋषि कश्यप और कद्रू की पुत्री हैं। कुछ ग्रंथों में उन्हें भगवान शिव की मानस पुत्री भी बताया गया है। वे नागराज वासुकि की बहन, ऋषि जरत्कारु की पत्नी और आस्तिक ऋषि की माता हैं।

2. 'मनसा' नाम क्यों पड़ा?

श्लोक 11-13 में तीन कारण बताए गए हैं: (1) पिता ने तपसा, तेजसा और 'मनसा' (मन से) उन्हें उत्पन्न किया, (2) वे अपने आत्मबल से सिद्ध योगिनी हैं, (3) देवता भी 'मनसा' (मन से) उनकी पूजा करते हैं।

3. इस स्तोत्र के रचयिता कौन हैं?

यह स्तोत्र देवराज इन्द्र (महेन्द्र) द्वारा रचित है। ब्रह्म वैवर्त पुराण के प्रकृति खण्ड के 46वें अध्याय में यह स्तोत्र है। इन्द्र ने अपनी रक्षा के लिए मनसा देवी की स्तुति की थी।

4. श्लोक 10 में 'नारायणांशो जरत्कारुः' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है कि मनसा देवी के पति जरत्कारु मुनि भगवान नारायण के अंश हैं। मनसा देवी स्वयं 'स्वर्गलक्ष्मीः' (स्वर्ग में लक्ष्मी) और 'वैकुण्ठे कमलाकला' (वैकुण्ठ में कमला का अंश) कही गई हैं।

5. पाठ के क्या लाभ हैं (फलश्रुति)?

श्लोक 15-16 में फलश्रुति है: (1) नाग भय नहीं रहता, (2) वंश में भी सर्प भय नहीं, (3) विष भी अमृत समान हो जाता है, (4) 5 लाख जप से स्तोत्र सिद्ध होता है, (5) सर्प पर शयन और सर्प वाहन प्राप्त होता है।

6. नाग पंचमी पर इसका क्या महत्व है?

श्लोक 7 में स्पष्ट है—'आषाढसङ्क्रान्त्यां पञ्चम्यां मनसाख्यायां' अर्थात आषाढ़ संक्रांति और मनसा पंचमी (नाग पंचमी) पर पूजा करने से पुत्र-पौत्र, धन, यश, कीर्ति, विद्या और गुण प्राप्त होते हैं।

7. नाग दोष और कालसर्प दोष में क्या अंतर है?

नाग दोष सर्प हत्या या सर्प संबंधी पाप से होता है। कालसर्प दोष जन्मकुंडली में राहु-केतु के बीच सभी ग्रहों के होने से होता है। मनसा देवी की उपासना दोनों दोषों को शांत करती है।

8. श्लोक 9 में पूजा न करने का क्या फल बताया है?

'ये त्वां न पूजयिष्यन्ति निन्दन्त्यज्ञानतो जनाः, लक्ष्मीहीना भविष्यन्ति तेषां नागभयं सदा'—जो अज्ञानवश देवी की निंदा करते हैं या पूजा नहीं करते, वे लक्ष्मीहीन होते हैं और उन्हें सदा नाग भय रहता है।

9. इसे कब और कैसे पढ़ना चाहिए?

नाग पंचमी (श्रावण शुक्ल पंचमी) सबसे शुभ है। पंचमी तिथि, मंगलवार और शुक्रवार भी उत्तम है। दूध, खीर, लावा (मुरमुरा) और दूब घास अर्पित करें। सर्प की मिट्टी की मूर्ति या चित्र के सामने पाठ करें।

10. आस्तिक ऋषि का क्या महत्व है?

आस्तिक ऋषि मनसा देवी और जरत्कारु मुनि के पुत्र हैं। उन्होंने राजा जनमेजय के सर्प यज्ञ को रोका था जिसमें सभी सर्पों की आहुति दी जा रही थी। उनका नाम लेने मात्र से सर्प पास नहीं आते।