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Sri Mukambika Stotram – श्री मूकाम्बिका स्तोत्रम्

Sri Mukambika Stotram – श्री मूकाम्बिका स्तोत्रम्
॥ श्री मूकाम्बिका स्तोत्रम् ॥ मूलाम्भोरुहमध्यकोणविलसद्बन्धूकरागोज्ज्वलां ज्वालाजालजितेन्दुकान्तिलहरीमानन्दसन्दायिनीं । एलाललितनीलकुन्तलधरां नीलोत्पलाभाम्शुकां कोलूराद्रिनिवासिनीं भगवतीं ध्यायामि मूकाम्बिकाम् ॥ १ ॥ बालादित्यनिभाननां त्रिनयनां बालेन्दुना भूषितां नीलाकारसुकेशिनीं सुललितां नित्यान्नदानप्रियां । शङ्खं चक्र वराभयां च दधतीं सारस्वतार्थप्रदां तां बालां त्रिपुरां शिवेनसहितां ध्यायामि मूकाम्बिकाम् ॥ २ ॥ मध्याह्नार्कसहस्रकोटिसदृशां मायान्धकारच्छिदां मध्यान्तादिविवर्जितां मदकरीं मारेण संसेवितां । शूलम्पाशकपालपुस्तकधरां शुद्धार्थविज्ञानदां तां बालां त्रिपुरां शिवेनसहितां ध्यायामि मूकाम्बिकाम् ॥ ३ ॥ सन्ध्यारागसमाऽननां त्रिनयनां सन्मानसैः पूजितां चक्राक्षाभय कम्पि शोभितकरां प्रालम्बवेणीयुतां । ईषत्फुल्लसुकेतकीदललसत्सभ्यार्चिताङ्घ्रिद्वयां तां बालां त्रिपुरां शिवेनसहितां ध्यायामि मूकाम्बिकाम् ॥ ४ ॥ चन्द्रादित्यसमानकुण्डलधरां चन्द्रार्ककोटिप्रभां चन्द्रार्काग्निविलोचनां शशिमुखीमिन्द्रादिसंसेवितां । मन्त्राद्यन्तसुतन्त्रयागभजितां चिन्ताकुलध्वंसिनीं मन्दारादिवनेस्थितां मणिमयीं ध्यायामि मूकाम्बिकाम् ॥ ५ ॥ कल्याणीं कमलेक्षणां वरनिधिं वन्दारुचिन्तामणिं कल्य़ाणाचलसंस्थितां घनकृपां मायां महावैष्णवीं । कल्यां कम्बुसुदर्शनां भयहरां शम्भुप्रियां कामदां कल्याणीं त्रिपुरां शिवेनसहितां ध्यायामि मूकाम्बिकाम् ॥ ६ ॥ कालाम्भोधरकुन्तलाञ्चितमुखां कर्पूरवीटीयुतां कर्णालम्बितहेमकुण्डलधरां माणिक्यकाञ्चीधरां । कैवल्यैकपरायणां कलिमलप्रध्वंसिनीं कामदां कल्याणीं त्रिपुरां शिवेनसहितां ध्यायामि मूकाम्बिकाम् ॥ ७ ॥ नानाकान्तिविचित्रवस्त्रसहितां नानाविधैर्भूषितां नानापुष्पसुगन्धमाल्यसहितां नानाजनैस्सेवितां । नानावेदपुराणशास्त्रविनुतां नानाकवित्वप्रदां नानारूपधरां महेशमहिषीं ध्यायामि मूकाम्बिकाम् ॥ ८ ॥ राकातारकनायकोज्ज्वलमुखीं श्रीकामकाम्यप्रदां शोकारण्यधनञ्जयप्रतिनिभां कोपाटवीचन्द्रिकां । श्रीकान्तादिसुरार्चितां स्त्रियमिमां लोकावलीनाशिनीं लोकानन्दकरीं नमामि शिरसा ध्यायामि मूकाम्बिकाम् ॥ ९ ॥ काञ्चीकिङ्किणिकङ्कणाङ्गदधरां मञ्जीरहारोज्ज्वलां चञ्चत्काञ्चनसत्किरीटघटितां ग्रैवेयभूषोज्ज्वलां । किञ्चिन्त्काञ्चनकञ्चुके मणिमये पद्मासने संस्थितां पञ्चास्याञ्चितचञ्चरीं भगवतीं ध्यायामि मूकाम्बिकाम् ॥ १० ॥ सौवर्णाम्बुजमध्यकान्तिनयनां सौदामिनीसन्निभां शङ्खं चक्रवराभयानि दधतीमिन्दोः कलां बिभ्रतीं । ग्रैवेयाङ्गदहारकुण्डलधरामाखण्डलादिस्तुतां मायाविन्ध्यनिवासिनीं भगवतीं ध्यायामि मूकाम्बिकाम् ॥ ११ ॥ श्रीमन्नीपवने सुरैर्मुनिगणैरप्सरोभिश्च सेव्यां मन्दारादि समस्तदेवतरुभिस्सम्शोभमानां शिवां । सौवर्णाम्बुजधारिणीं त्रिनयनां एकादिकामेश्वरीं मूकाम्बां सकलेष्टसिद्धिफलदां वन्दे परां देवताम् ॥ १२ ॥ ॥ इति श्री मूकाम्बा स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

श्री मूकाम्बिका स्तोत्रम् - परिचय (Introduction)

श्री मूकाम्बिका स्तोत्रम् दक्षिण भारत के प्रसिद्ध तीर्थ स्थल कोल्लूर (Kollur) की अधिष्ठात्री देवी को समर्पित है। मूकाम्बिका देवी 'त्रिगुणात्मक' शक्ति हैं, जिनमें महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का वास है, फिर भी वे मुख्य रूप से 'ज्ञान' और 'सरस्वती' के स्वरूप में पूजी जाती हैं।

पौराणिक कथा: प्राचीन काल में कोला महर्षि यहाँ तपस्या कर रहे थे। एक 'कामसुर' नामक राक्षस शिवजी को प्रसन्न कर अमरत्व का वरदान मांगना चाहता था। देवताओं के अनुरोध पर देवी सरस्वती ने उस राक्षस की जिह्वा को जकड़ लिया (Wag-stambhan), जिससे वह गूंगा (मूक) हो गया और वरदान नहीं मांग सका। क्रोधित होकर उस मूक राक्षस (मूकासुर) ने देवताओं को सताना शुरू किया, तब देवी ने शक्ति का रूप धरकर उसका वध किया। इसलिए वे 'मूकाम्बिका' (मूक-असुर का वध करने वाली अंबिका) कहलाईं।

आदि शंकराचार्य और स्वर्ण रेखा: जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने यहाँ देवी की घोर उपासना की थी। उनके आग्रह पर देवी उनके साथ केरल जाने को तैयार हुईं, शर्त यह थी कि वे पीछे मुड़कर नहीं देखेंगे। कोल्लूर पहुँचने पर देवी की पायलों की आवाज आनी बंद हो गई, और शंकराचार्य ने संदेहवश पीछे मुड़कर देख लिया। वे वहीं स्थिर हो गईं। यहाँ जो 'स्वयंभू लिंग' (Self-manifested Linga) है, उसके बीच में एक 'स्वर्ण रेखा' (Golden Line) है। यह रेखा लिंग को दो भागों में बांटती है—बायां और दायां, जो शिव और शक्ति के अर्धनारीश्वर स्वरूप का प्रतीक है। शंकराचार्य ने यहाँ 'श्री चक्र' की भी स्थापना की थी।

यह स्तोत्र देवी के उसी परम तेजस्वी स्वरूप का वर्णन करता है—"मूलाम्भोरुहमध्यकोणविलसद्" (मूलाधार चक्र के कोण में विलास करने वाली)। यह साधक को भौतिक बंधनों से मुक्त कर 'आनन्द' (Bliss) प्रदान करता है।

विशिष्ट महत्व (Significance)

  • विद्या और कला: मूकाम्बिका देवी को 'वाग्देवी' (Goddess of Speech) माना जाता है। श्लोक 8 में कहा गया है "नानाकवित्वप्रदां" (विभिन्न प्रकार की काव्य शक्ति देने वाली)। जो कला, साहित्य और संगीत में उन्नति चाहते हैं, उनके लिए यह स्तोत्र सर्वोच्च है।

  • वाणी दोष निवारण: चूँकि उन्होंने मूक राक्षस का संहार किया और वह स्वयं वाक्-शक्ति हैं, इसलिए जो बच्चे बोलने में असमर्थ हैं या तुतलाते हैं, उनके माता-पिता यदि संकल्प लेकर इस स्तोत्र का पाठ करें, तो देवी की कृपा से वाणी दोष ठीक हो जाता है।

  • नित्यान्नदानप्रिया: श्लोक 2 में देवी को "नित्यान्नदानप्रियां" कहा गया है। यह संकेत करता है कि वे अन्नपूर्णा भी हैं। इनकी उपासना से घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती।

पाठ के लाभ (Benefits)

श्रद्धापूर्वक श्री मूकाम्बिका स्तोत्र का पाठ करने से निम्नलिखित फल प्राप्त होते हैं:

  • कुशाग्र बुद्धि: यह 'सारस्वतार्थप्रदां' (सारस्वत ज्ञान देने वाली) स्तोत्र है। विद्यार्थियों की स्मरण शक्ति और एकाग्रता बढ़ती है।

  • शत्रु और भय नाश: श्लोक 6 में देवी को "भयहरां" (भय हरने वाली) कहा गया है। यह मानसिक चिंताओं और शत्रुओं के भय को दूर करता है।

  • मोक्ष और कैवल्य: श्लोक 7 के अनुसार, देवी "कैवल्यैकपरायणां" (कैवल्य मोक्ष प्रदान करने में तत्पर) हैं। यह स्तोत्र भोग और मोक्ष दोनों देता है।

  • समस्त मनोरथ सिद्धि: अंतिम श्लोक (12) में कहा गया है "सकलेष्टसिद्धिफलदां" (सभी इष्ट कार्यों को सिद्ध करने वाली)। विवाह, संतान, या करियर संबंधी बाधाएं दूर होती हैं।

पाठ विधि (Ritual Method)

देवी मूकाम्बिका की साधना विधि अत्यंत सौम्य और सात्विक है:

  • विद्यारंभ (Aksharabhyasa): यदि घर में छोटा बच्चा है, तो उसे गोद में बिठाकर इस स्तोत्र का पाठ सुनाएं और उसे शहद (Honey) चटाएं। यह उसकी वाणी को मधुर और प्रखर बनाता है।

  • दिन: बुधवार (बुद्धि के लिए) और शुक्रवार (ऐश्वर्य के लिए) का दिन श्रेष्ठ है।

  • भोग: देवी को त्रिमधुर (गुड़, शहद और केला मिलाकर बनाया गया प्रसाद) अत्यंत प्रिय है।

  • दीप: घी का दीपक जलाकर, श्वेत या पीले पुष्प अर्पित करें।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. मूकाम्बिका देवी का मंदिर कहाँ है?

श्री मूकाम्बिका मंदिर कर्नाटक के उडुपी जिले में कोल्लूर (Kollur) नामक स्थान पर कोडचाद्रि पहाड़ियों की तलहटी में स्थित है। यह सौपर्णिका नदी के तट पर बसा एक अत्यंत पवित्र सिद्ध पीठ है।

2. इन्हें 'मूकाम्बिका' क्यों कहा जाता है?

कामसुर (कौमसुर) नामक राक्षस शिवजी से अमरत्व का वरदान मांगना चाहता था। देवी सरस्वती ने उसकी वाणी हर ली (उसे मूक/गूंगा बना दिया) ताकि वह वरदान न मांग सके। मूक बने उस असुर का वध करने के कारण देवी 'मूकाम्बिका' कहलाईं।

3. आदि शंकराचार्य का इस मंदिर से क्या संबंध है?

आदि शंकराचार्य ने यहाँ घोर तपस्या की थी। जब देवी सरस्वती उनके साथ केरल जाने को तैयार हुईं, तो शर्त यह थी कि शंकर पीछे मुड़कर नहीं देखेंगे। कोल्लूर में पायलों की ध्वनि आनी बंद हुई, और शंकर ने पीछे मुड़कर देख लिया। देवी वहीं 'स्वयंभू लिंग' के रूप में स्थापित हो गईं।

4. इस स्तोत्र के पाठ से क्या विशेष लाभ है?

यह स्तोत्र 'वाक-सिद्धि' (Speech Perfection) देने वाला है। जो बच्चे तुतलाते हैं, देर से बोलते हैं, या पढ़ाई में कमजोर हैं, उनके लिए यह रामबाण है। यह संगीत (Music) और कला (Arts) में निपुणता प्रदान करता है।

5. स्वयंभू लिंग की क्या विशेषता है?

यहाँ स्थापित लिंग के मध्य में एक स्वर्ण रेखा (Golden Line) है। यह रेखा लिंग को दो भागों में बांटती है—बायां भाग 'शक्ति' (लक्ष्मी, सरस्वती, पार्वती) का और दायां भाग 'शिव' (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) का प्रतीक है। यह अर्धनारीश्वर स्वरूप है।

6. अक्षराभ्यास (Aksharabhyasa) क्या है?

यह दक्षिण भारत की एक परंपरा है जहाँ छोटे बच्चों को पहली बार अक्षर लिखना सिखाया जाता है। कोल्लूर मूकाम्बिका मंदिर विद्यारंभ के लिए सबसे शुभ स्थान माना जाता है।

7. देवी को क्या भोग प्रिय है?

देवी को 'कषाय तीर्थ' (जड़ी-बूटियों का काढ़ा) का भोग लगाया जाता है, जिसे शंकराचार्य ने शुरू किया था। इसके अलावा त्रिमधुर (गुड़, शहद, केला) भी अत्यंत प्रिय है।

8. पाठ के लिए कौन सा दिन श्रेष्ठ है?

सरस्वती का दिन होने के कारण 'बुधवार' (Wednesday) और देवी का दिन होने के कारण 'शुक्रवार' (Friday) और नवरात्रि के दिन श्रेष्ठ हैं।

9. क्या संगीतज्ञों के लिए यह स्तोत्र लाभकारी है?

अत्यंत लाभकारी। प्रसिद्ध संगीतकार और कलाकार अपनी कला में निखार लाने के लिए मूकाम्बिका देवी की उपासना करते हैं। यह 'नाद-ब्रह्म' की साधना है।

10. सौपर्णिका नदी का क्या महत्व है?

कहा जाता है कि गरुड़ (सुपर्ण) ने अपनी माता विनीता के कष्ट दूर करने के लिए यहाँ तपस्या की थी, जिससे नदी का नाम सौपर्णिका पड़ा। इस नदी में अनेक औषधीय गुण हैं, जो रोगों को दूर करते हैं।