Devi Aswadhati Stotram – देवी अश्वधाटि स्तोत्रम् (Laghu Stuti) | Meaning & Significance

॥ देवी अश्वधाटि स्तोत्रम् - परिचय (Introduction) ॥
देवी अश्वधाटि स्तोत्रम् (Devi Aswadhati Stotram), जिसे 'लघु स्तुति' (Laghu Stuti) के नाम से भी जाना जाता है, माँ आदिशक्ति की एक अत्यंत ओजस्वी और प्रभावशाली रचना है। इसके रचयिता महाकवि कालिदास माने जाते हैं, जो माँ काली के वरदपुत्र और संस्कृत साहित्य के सूर्य कहे जाते हैं।
इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता इसका 'छंद' (Meter) है। 'अश्वधाटि' का अर्थ है - 'घोड़े (अश्व) की दौड़ (धाटि)'। जिस प्रकार एक तीव्रगामी अश्व सरपट दौड़ता है, उसी प्रकार इस स्तोत्र के शब्दों का प्रवाह होता है। इसे पढ़ते समय जिह्वा को विश्राम नहीं मिलता, अपितु एक अद्भुत ऊर्जा और लय (Rhythm) का संचार होता है। यह छंद पाठक के मन से आलस्य और जड़ता को तत्काल दूर कर देता है।
इसमें कुल १३ श्लोक हैं। प्रत्येक श्लोक में देवी के विराट स्वरूप, उनकी करुणा, सौंदर्य और असुर-संहारिणी शक्ति का अद्भुत संगम है। यह स्तोत्र साधक को न केवल आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है, बल्कि उसे वाक-सिद्धि (Power of Speech) और सांसारिक ऐश्वर्य भी देने में सक्षम है। इसे 'प्रणवश्लोकी' भी कहा जाता है, क्योंकि यह ओंकार के नाद की तरह गूंजता है।
॥ स्तोत्र भावार्थ (Meaning) ॥
श्लोक १ हे माँ! कदम्ब वन की वाटिका में निवास करने वाली, समस्त आकाशचारी शक्तियां (खेचरी) और देवताओं के समूह स्वयं आपकी 'चेटी' (दासी) बनकर सेवा करते हैं। जिनके चरण-कमल करोड़ों (देवताओं के) मुकुटों की मणियों की किरणों से मिश्रित (रंजित) हो रहे हैं। जिनका शरीर चंदन के समान सुगंधित है और वक्षस्थल सुंदर वस्त्र से ढका है। हे पर्वतराज हिमालय की पुत्री! आप मेरे मुख में (पान के बीड़े/ताम्बूल रस के समान) घोड़े की टाप से भी अधिक वेग वाली कवित्व शक्ति (धाराप्रवाह वाणी) का विस्तार करें।
श्लोक २ वेदव्यास (द्वैपायन) आदि मुनि, जिनके 'शाप' ही अस्त्र हैं, वे भी आपके चरणों की धूल को स्वर्ग की सीढ़ी मानते हैं। आप अपने मंत्र का जाप करने वाले भक्तों के पापों और संतापों (कष्टों) को दूर करने में निपुण हैं। कदम्ब वन (नीपालय) में रहने वाली, सुगंधित धूप से सुवासित केशों वाली, पर्वतराज के कुल की मणि और दीपक के समान प्रकाशमान हे भगवती! आप मुझे पाप रूपी कूप (कुएं) से बाहर निकालें।
श्लोक ३ जो अपनी सखियों के साथ कदम्ब के वृक्षों की पंक्तियों (पाली) में खेलती हैं। जिनके केशों (चूली) का भार काले सर्प और नेवले (के रंग) के समान घना और काला है। जिनके चरणों की धूल में मणियां चमक रही हैं। जो कानों में ताड़ पत्र (ताली दल) के आभूषण और माथे पर सुंदर तिलक धारण करती हैं। वह माँ काली मेरे मन को अपने चरण-कमलों की सेवा (ध्यान) के भ्रमर (भंवरे) की तरह बना दें।
श्लोक ४ जिनका ललाट बाल-चंद्रमा (अष्टमी के चाँद) के समान है, जो थोड़ा लाल रंग का वस्त्र (साड़ी) नितंब पर धारण करती हैं। जो कोलाहल (युद्ध) में असुरों के काल को भी नष्ट करने वाली हैं और देवताओं के अमंगल रूपी कीचड़/जल को सुखाने के लिए सूर्य के समान हैं। जिनके स्तन पीन (उभरे हुए) हैं और केश बादलों की तरह काले हैं। वह शूल-धारिणी, शरणागत-वत्सल पर्वतराज-पुत्री (पार्वती) मेरे हृदय में निवास करें।
श्लोक ५ जिनका कंठ शंख (कम्बु) की शोभा को भी लज्जित करता है, जिनके पास नवीन तुम्बा (लौकी) जैसी वीणा सुशोभित है। जिनके होंठ बिम्बफल (कुंदरू) के समान लाल हैं, जो शम्बरासुर के शत्रु (कामदेव) आदि देवताओं द्वारा नमित हैं। हे अम्बा! कस्तूरी और चंदन के लेप से सुशोभित, लम्बे केशों वाली माँ, जिनका मुख कार्तिकेय (बाहुलेय) और चंद्रमा के समान सुंदर है, वे मुझे कल्याण (शं) प्रदान करें।
श्लोक ६ जो अपनी मंद मुस्कान से सेवकों (दासों) को अभय देती हैं, जिनका वास कदम्ब वन में है। जो कुसुम्भ (लाल) रंग के पुष्पों जैसे वस्त्र धारण करती हैं। जिन्होंने रास-लीला (विपञ्चिकृत रासा) रची है, जो वसंत ऋतु (मधुमास) को भी तिरस्कृत करने वाली सुंदरता रखती हैं और कमल के समान मधुर हैं। अपनी नासिका (नाक) की मणि (नथ) की कांति से शोभायमान, करुणा की वर्षा करने वाली वह 'शिवा' (कल्याणकारी देवी) मेरे अज्ञान (तिमिर) का नाश करें।
श्लोक ७ (हे मन!) तू इस नश्वर शरीर में क्या कामना करता है? यह तो कलंक का घर (न्यङ्काकरे), हड्डियों का ढांचा (कङ्काल) और रक्त-मांस से भरा है, जो अंततः गिद्ध (कङ्क) आदि पक्षियों का भोजन (विषय) बनेगा। तू अपने हृदय के कीचड़ (पाप) की शत्रु 'गिरिजा' (पार्वती) की शरण में क्यों नहीं जाता? जिनके चरण शंका रूपी पत्थर (कठोरता) को तोड़ने के लिए तीखे टंके (छेनी) के समान हैं, और जिनके मुख-कमल पर चंद्रमा की कांति है।
श्लोक ८ जो इंद्र (जम्भारि) के हाथी (ऐरावत) के विशाल कुंभस्थल की शोभा का उपहास करने वाले (उन्नत) स्तनों पर हार-लता धारण करती हैं। जिनकी जांघें (उरु) रम्भा (केले) के वृक्ष और हाथी की सूंड के गर्व को भी हरने वाली हैं। जो भगवान शिव (शम्भु) के उदार आलिंगन से रोमांचित (पुलकित) होती हैं और उनके प्रेम की सूचक हैं। शुम्भ असुर का संहार करने वाली, चमकते आभूषणों वाली वह देवी सदा मुझे कल्याण (शं) दें।
श्लोक ९ जो दाक्षायणी (दक्ष की पुत्री - सती) हैं, जो दानवों को दंड देने की विधा में (विकृत) दीक्षा लेने वाली हैं, जिनके गुण मनोहर हैं। जो भिक्षा माँगने वाले (शिव) के नृत्य को देखने में आनंदित होती हैं और दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करने वाली हैं। हे दक्षा (कुशल)! जो अपने सेवकों का पक्ष लेने वाली और शत्रुओं (विपक्ष) से विमुख हैं। कुबेर (यक्षेश) द्वारा सेवित, वह 'जयलक्ष्मी' शक्ति निर्बाध रूप से मुझ पर अपनी कृपादृष्टि डालें।
श्लोक १० जो वंदना करने वाले लोकों को वरदान देती हैं, जिनके दाँत (रदना) निर्मल कुंद के फूल जैसे सफेद हैं। जिनके चरण देवताओं (वृन्दारक) के समूहों (वृन्द) की मणियों और कमलों के मकरंद से अभिषिक्त हैं। मंद हवा से हिलते हुए मन्दार पुष्पों की माला से जिनका मुकुट शोभायमान है। वह कमल के आसन पर बैठने वाली (अरविन्दासना / सरस्वती रूपिणी) देवी मेरे लिए गंगा (मंदाकिनी) के वेग जैसी (प्रवाहपूर्ण) वाणी का भेदन (दान) करें।
श्लोक ११ मेरा मन जहाँ भी लगे, वहाँ पर्वतराज-पुत्री (आगजा) ही निवास करें। जो अतुलनीय तोते (शुक) को धारण करती हैं। जिनके चरण इंद्र (सुत्राम) और यम (काल) आदि के भय को त्रास देने वाले और रक्षा (सुत्राण) करने वाले हैं। छत्र, चंवर आदि राजसी चिह्नों से सुशोभित, जो इंद्राणी (अमरी) की सखी हैं। वह विचित्र मणियों से सजी देवी मुझे सुयोग्य पुत्र आदि वरदान देने में निपुण हों।
श्लोक १२ जो तटों को तोड़ने वाली (प्रलयंकारी) भय की लताओं को जलाने के लिए अग्नि की ज्वाला (कीला) हैं, जब उनकी स्तुति की जाती है। जो कोलाहल (युद्ध) में असुरों के काल (मृत्यु) को क्षपित (मारने) वाली और देवताओं (अमरी) का कुशल पोषण करने वाली आकाश (नभा) स्वरूपा हैं। जिनका शरीर और केश बादलों जैसे नीले हैं, जो नीलांचल (पर्वत) पर विराजती हैं। वह शूल-धारिणी शैलपुत्री मेरे हृदय में प्रकाशित हों।
श्लोक १३ जिनकी कलाई (मणिबंध) चमक रही है, जो संसार (भव) के हृदय-बंधन में अत्यंत रस लेने वाली हैं। जो भुवन (जगत) को धारण करने (सन्धारणे) के लिए दौड़ती (सन्धावती) हैं और अमृत के सागर में जिनका उदार निवास है। गंध और प्रभाव से अंधे होकर भंवरे (अलि) जिनके केश-पाश का रस पीते हैं। वह देवी मेरे उस स्थान (पद) का अनुसंधान करें (रक्षा करें) जो सूर्य के तेज (धाम) को भी रोक देता है (अर्थात मोक्ष प्रदान करें)।
॥ विशिष्ट महत्व (Significance) ॥
- अश्वधाटि छंद का चमत्कार: इस स्तोत्र की सबसे बड़ी शक्ति इसकी 'ध्वनि' (Sound) है। 'अश्वधाटि' छंद (Galloping Horse Meter) मन की सुस्ती को तोड़कर मस्तिष्क की नसों को झंकृत कर देता है। इसे पढ़ने से 'Alpha Waves' जाग्रत होती हैं जो एकाग्रता बढ़ाती हैं।
- कालिदास की वाक-सिद्धि: यह स्तोत्र स्वयं वाक-सिद्ध कवि कालिदास की रचना है। इसलिए, जो भी इसका पाठ करता है, उसे भी माँ सरस्वती की कृपा से विलक्षण वाक-पटुता और कवित्व शक्ति प्राप्त होती है।
- शत्रु और भय नाश: श्लोक १२ में स्पष्ट कहा गया है कि देवी 'भय की लताओं को जलाने वाली अग्नि' हैं। यह स्तोत्र कोर्ट-कचहरी, शत्रु-बाधा और अज्ञात भय (Anxiety) से मुक्ति दिलाने में अत्यंत प्रभावशाली है।
॥ पाठ विधि (Recitation Method) ॥
- लय (Rhythm): इस स्तोत्र को धीरे-धीरे नहीं रुक-रुक कर नहीं पढ़ना चाहिए। इसे एक प्रवाह (Flow) में, तेज गति से पढ़ना चाहिए ताकि 'अश्वधाटि' छंद की ऊर्जा उत्पन्न हो सके।
- समय: विद्यार्थियों और कलाकारों के लिए 'प्रातःकाल' (सरस्वती बेला) सर्वोत्तम है। शत्रु बाधा निवारण के लिए 'संध्याकाल' या 'रात्रि' में पाठ करें।
- आसन: लाल या श्वेत आसन पर बैठें।
- अनुष्ठान: नवरात्रि में प्रतिदिन २१ बार पाठ करने से विशेष सिद्धि प्राप्त होती है।