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Sri Matangi Hrudayam – श्री मातङ्गी हृदयम्

Sri Matangi Hrudayam – श्री मातङ्गी हृदयम्
॥ श्री मातङ्गी हृदयम् ॥ एकदा कौतुकाविष्टा भैरवं भूतसेवितम् । भैरवी परिपप्रच्छ सर्वभूतहिते रता ॥ १ ॥ ॥ श्रीभैरव्युवाच ॥ भगवन् सर्वधर्मज्ञ भूतवात्सल्यभावन । अहं तु वेत्तुमिच्छामि सर्वभूतोपकारम् ॥ २ ॥ केन मन्त्रेण जप्तेन स्तोत्रेण पठितेन च । सर्वथा श्रेयसां प्राप्तिर्भूतानां भूतिमिच्छताम् ॥ ३ ॥ ॥ श्रीभैरव उवाच ॥ शृणु देवि तव स्नेहात्प्रायो गोप्यमपि प्रिये । कथयिष्यामि तत्सर्वं सुखसम्पत्करं शुभम् ॥ ४ ॥ पठतां शृण्वतां नित्यं सर्वसम्पत्तिदायकम् । विद्यैश्वर्यसुखावाप्ति मङ्गलप्रदमुत्तमम् ॥ ५ ॥ मातङ्ग्या हृदयं स्तोत्रं दुःखदारिद्र्यभञ्जनम् । मङ्गलं मङ्गलानां च ह्यस्ति सर्वसुखप्रदम् ॥ ६ ॥ ॥ विनियोगः ॥ अस्य श्रीमातङ्गी हृदयस्तोत्र मन्त्रस्य दक्षिणामूर्तिरृषिः विराट् छन्दः मातङ्गी देवता ह्रीं बीजं हूं शक्तिः क्लीं कीलकं सर्ववाञ्छितार्थसिद्ध्यर्थे पाठे विनियोगः ॥ ॥ ऋष्यादिन्यासः ॥ ओं दक्षिणामूर्तिरृषये नमः शिरसि । विराट्छन्दसे नमो मुखे । मातङ्गीदेवतायै नमः हृदि । ह्रीं बीजाय नमः गुह्ये । हूं शक्तये नमः पादयोः । क्लीं कीलकाय नमो नाभौ । विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ॥ ॥ करन्यासः ॥ ओं ह्रीं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ओं क्लीं तर्जनीभ्यां नमः । ओं हूं मध्यमाभ्यां नमः । ओं ह्रीं अनामिकाभ्यां नमः । ओं क्लीं कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ओं हूं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । ॥ अङ्गन्यासः ॥ ओं ह्रीं हृदयाय नमः । ओं क्लीं शिरसे स्वाहा । ओं हूं शिखायै वषट् । ओं ह्रीं नेत्रत्रयाय वौषट् । ओं क्लीं कवचाय हुम् । ओं हूं अस्त्राय फट् । ॥ ध्यानम् ॥ श्यामां शुभ्रांशुभालां त्रिकमलनयनां रत्नसिंहासनस्थां भक्ताभीष्टप्रदात्रीं सुरनिकरकरासेव्यकञ्जाङ्घ्रियुग्माम् । नीलाम्भोजांशुकान्तिं निशिचरनिकरारण्यदावाग्निरूपां मातङ्गीमावहन्तीमभिमतफलदां मोदिनीं चिन्तयामि ॥ ७ ॥ नमस्ते मातङ्ग्यै मृदुमुदिततन्वै तनुमतां परश्रेयोदायै कमलचरणध्यानमनसाम् । सदा संसेव्यायै सदसि विबुधैर्दिव्यधिषणै- -र्दयार्द्रायै देव्यै दुरितदलनोद्दण्डमनसे ॥ ८ ॥ परं मातस्ते यो जपति मनुमव्यग्रहृदयः कवित्वं कल्पानां कलयति सुकल्पः प्रतिपदम् । अपि प्रायो रम्याऽमृतमयपदा तस्य ललिता नटीं मन्या वाणी नटति रसनायां च फलिता ॥ ९ ॥ तव ध्यायन्तो ये वपुरनुजपन्ति प्रवलितं सदा मन्त्रं मातर्नहि भवति तेषां परिभवः । कदम्बानां मालाः शिरसि युञ्जन्ति सदये भवन्ति प्रायस्ते युवतिजनयूथस्ववशगाः ॥ १० ॥ सरोजैः साहस्रैः सरसिजपदद्वन्द्वमपि ये सहस्रं नामोक्त्वा तदपि तव ङेन्तं मनुमितम् । पृथङ्नाम्ना तेनायुतकलितमर्चन्ति खलु ते सदा देवव्रातप्रणमितपदाम्भोजयुगलाः ॥ ११ ॥ तव प्रीत्यै मातर्ददति बलिमाधाय बलिना समत्स्यं मांसं वा सुरुचिरसितं राजरुचितम् । सुपुण्या ये स्वान्तस्तव चरणमोदैकरसिका अहो भाग्यं तेषां त्रिभुवनमलं वश्यमखिलम् ॥ १२ ॥ लसल्लोलश्रोत्राभरणकिरणक्रान्तिकलितं [ मितस्मित्यापन्नप्रतिभितममन्नं विकरितम् ] मितस्मेरज्योत्स्नाप्रतिफलितभाभिर्विकरितम् । मुखाम्भोजं मातस्तव परिलुठद्भ्रूमधुकरं रमा ये ध्यायन्ति त्यजति न हि तेषां सुभवनम् ॥ १३ ॥ परः श्रीमातङ्ग्या जपति हृदयाख्यः सुमनसा- -मयं सेव्यः सद्योऽभिमतफलदश्चातिललितः । नरा ये शृण्वन्ति स्तवमपि पठन्तीममनिशं न तेषां दुष्प्राप्यं जगति यदलभ्यं दिविषदाम् ॥ १४ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ धनार्थी धनमाप्नोति दारार्थी सुन्दरीं प्रियाम् । सुतार्थी लभते पुत्रं स्तवस्यास्य प्रकीर्तनात् ॥ १५ ॥ विद्यार्थी लभते विद्यां विविधां विभवप्रदाम् । जयार्थी पठनादस्य जयं प्राप्नोति निश्चितम् ॥ १६ ॥ नष्टराज्यो लभेद्राज्यं सर्वसम्पत्समाश्रितम् । कुबेरसमसम्पत्तिः स भवेद्धृदयं पठन् ॥ १७ ॥ किमत्र बहुनोक्तेन यद्यदिच्छति मानवः । मातङ्गीहृदयस्तोत्रपाठात्तत्सर्वमाप्नुयात् ॥ १८ ॥ ॥ इति श्रीदक्षिणामूर्तिसंहितायां श्री मातङ्गी हृदय स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री मातङ्गी हृदयम् - विस्तृत परिचय

श्री मातङ्गी हृदयम् (Sri Matangi Hrudayam) भारतीय तांत्रिक साहित्य की अमूल्य निधि दक्षिणामूर्ति संहिता में संकलित एक अत्यंत गोपनीय और प्रभावशाली हृदय स्तोत्र है। 'हृदय' शब्द का तात्पर्य है — किसी देवता की सार-विद्या, उनकी शक्ति का केन्द्रबिन्दु। जैसे शरीर में हृदय प्राणों का आधार है, वैसे ही यह स्तोत्र माँ मातङ्गी की समस्त शक्तियों का सार है।


माँ मातङ्गी दश महाविद्याओं में नवम शक्ति हैं। शक्ति उपासना की दस सर्वोच्च विद्याएं — काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातङ्गी और कमला — में मातङ्गी का स्थान विशिष्ट है। जहाँ अन्य महाविद्याएं मुख्यतः शत्रु नाश, भय निवारण या मोक्ष प्रदान करती हैं, वहीं मातङ्गी वाक् सिद्धि, कवित्व शक्ति, संगीत कला और विद्या ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री देवी हैं। इसीलिए उन्हें 'तांत्रिक सरस्वती' कहा जाता है।


इस स्तोत्र की प्रस्तुति भैरव-भैरवी संवाद के रूप में है। प्रथम श्लोकों में भैरवी देवी (पार्वती का तांत्रिक स्वरूप) भैरव (शिव) से प्रश्न करती हैं — "केन मन्त्रेण जप्तेन स्तोत्रेण पठितेन च, सर्वथा श्रेयसां प्राप्तिर्भूतानां भूतिमिच्छताम्" — अर्थात् किस मन्त्र या स्तोत्र से प्राणियों का कल्याण और सम्पत्ति प्राप्त होती है? इसके उत्तर में भैरव मातङ्गी हृदय स्तोत्र का प्रकाश करते हैं और कहते हैं कि यह "दुःखदारिद्र्यभञ्जनम्" — दुःख और दरिद्रता को नष्ट करने वाला तथा "मङ्गलं मङ्गलानां च" — सभी मंगलों में श्रेष्ठ मंगल है।


स्तोत्र की रचना-शैली अत्यंत उदात्त है। विनियोग में बताया गया है कि इसके ऋषि दक्षिणामूर्ति (शिव का ज्ञानदाता स्वरूप), छन्द विराट्, देवता मातङ्गी, बीज ह्रीं, शक्ति हूं और कीलक क्लीं है। न्यास विधि में ऋष्यादि, करन्यास और अङ्गन्यास तीनों सम्मिलित हैं जो इस स्तोत्र की तांत्रिक प्रामाणिकता को दर्शाते हैं। ध्यान श्लोक में माँ मातङ्गी का अत्यंत मनोहर वर्णन है — "श्यामां शुभ्रांशुभालां त्रिकमलनयनां रत्नसिंहासनस्थां" — श्यामवर्णी, चन्द्रमा जैसे ललाट वाली, कमल जैसे तीन नेत्रों वाली, रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान देवी।


श्लोक ८ से १४ तक मातङ्गी की स्तुति अत्यंत काव्यात्मक संस्कृत में की गई है। ये श्लोक शार्दूलविक्रीडित और मालिनी जैसे उच्च कोटि के छन्दों में हैं, जो इस स्तोत्र की साहित्यिक श्रेष्ठता को प्रमाणित करते हैं। श्लोक ९ में कहा गया है कि जो व्यक्ति मातङ्गी का मन्त्र जपता है, उसकी रसना पर ललिता वाणी नृत्य करती है — अर्थात् उसकी वाणी में अनायास काव्य, संगीत और प्रभाव उत्पन्न होता है।


मातङ्गी उपासना की एक विशेषता यह भी है कि यह 'उच्छिष्ट' (अपारम्परिक) मार्ग की देवी हैं। तंत्र शास्त्र में 'उच्छिष्ट' का अर्थ है वह जो सामान्य नियमों से परे है। मातङ्गी की साधना में कठोर शुचिता के नियम शिथिल हैं क्योंकि देवी स्वयं सभी सीमाओं से परे हैं। यही कारण है कि उन्हें 'उच्छिष्ट चाण्डालिनी' और 'उच्छिष्ट मातङ्गी' भी कहा जाता है। तंत्रसार और शारदातिलक जैसे प्रामाणिक ग्रंथों में मातङ्गी को कदम्बवनवासिनी — कदम्ब वन में निवास करने वाली देवी — के रूप में वर्णित किया गया है।

इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व

श्री मातङ्गी हृदयम् की विशिष्टता कई कारणों से है। सबसे पहले, यह दक्षिणामूर्ति संहिता का अंग है — जो शैव-शाक्त तंत्र के सबसे प्रतिष्ठित ग्रंथों में से एक है। दक्षिणामूर्ति स्वयं शिव का वह स्वरूप है जो मौन में ज्ञान प्रदान करता है। ऐसे ज्ञानदाता ऋषि द्वारा प्रकट यह स्तोत्र अत्यंत प्रामाणिक और शक्तिशाली माना जाता है।


'हृदय' श्रेणी के स्तोत्र तांत्रिक परम्परा में विशेष महत्व रखते हैं। जैसे आदित्य हृदयम् सूर्य की, शिव हृदयम् शिव की, वैसे ही मातङ्गी हृदयम् माँ मातङ्गी की सम्पूर्ण शक्ति का सार-निचोड़ है। इसका पाठ देवी के सान्निध्य का अनुभव कराता है।


श्लोक १० में एक अति महत्वपूर्ण बात कही गई है — जो साधक कदम्ब पुष्पों की माला शिर पर धारण करते हैं और मातङ्गी का ध्यान करते हैं, वे "युवतिजनयूथस्ववशगाः" — समस्त जनसमूह को अपने वश में कर लेते हैं। यह वशीकरण शक्ति मातङ्गी की विशिष्ट सिद्धि है। श्लोक ११ में सहस्र कमलों से पूजा और सहस्रनाम पाठ का विधान दिया गया है। श्लोक १२ में बलिदान प्रक्रिया का उल्लेख है जो तांत्रिक उपासना पद्धति की ओर संकेत करता है। श्लोक १४ में भैरव स्वयं कहते हैं — "नरा ये शृण्वन्ति स्तवमपि पठन्तीममनिशं, न तेषां दुष्प्राप्यं जगति यदलभ्यं दिविषदाम्" — जो इसे सुनते और पढ़ते हैं, उनके लिए वह भी दुर्लभ नहीं जो देवताओं को भी अलभ्य है।

फलश्रुति — स्तोत्र पाठ के प्रामाणिक लाभ

श्लोक १५ से १८ में स्वयं भैरव ने इस स्तोत्र से प्राप्त होने वाले फलों का वर्णन किया है:

  • धन प्राप्ति: "धनार्थी धनमाप्नोति" — धन चाहने वाला व्यक्ति इस स्तोत्र से निश्चित रूप से धन प्राप्त करता है।

  • सुन्दर पत्नी: "दारार्थी सुन्दरीं प्रियाम्" — सुयोग्य जीवनसाथी की इच्छा रखने वाले को सुन्दर और प्रिय पत्नी मिलती है।

  • पुत्र प्राप्ति: "सुतार्थी लभते पुत्रं" — संतान की कामना करने वाले को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है।

  • विद्या और कवित्व: "विद्यार्थी लभते विद्यां विविधां विभवप्रदाम्" — विद्यार्थी को विविध प्रकार की ऐश्वर्यदायिनी विद्या प्राप्त होती है। यह मातङ्गी का सबसे प्रमुख वरदान है।

  • विजय: "जयार्थी पठनादस्य जयं प्राप्नोति निश्चितम्" — विजय चाहने वाला निश्चित विजय प्राप्त करता है।

  • राज्य पुनर्प्राप्ति: "नष्टराज्यो लभेद्राज्यं सर्वसम्पत्समाश्रितम्" — जिसका राज्य नष्ट हो गया हो वह सम्पूर्ण सम्पत्ति सहित राज्य पुनः प्राप्त करता है।

  • कुबेर-तुल्य सम्पत्ति: "कुबेरसमसम्पत्तिः स भवेद्धृदयं पठन्" — हृदय स्तोत्र का नियमित पाठ करने वाला कुबेर (धन के देवता) के समान सम्पत्तिवान हो जाता है।

  • सर्व मनोकामना पूर्ति: "किमत्र बहुनोक्तेन यद्यदिच्छति मानवः, मातङ्गीहृदयस्तोत्रपाठात्तत्सर्वमाप्नुयात्" — अधिक कहने की क्या आवश्यकता? मनुष्य जो कुछ भी चाहे, वह सब इस स्तोत्र के पाठ से प्राप्त हो जाता है।

पाठ विधि और विशेष अवसर

  • विनियोग और न्यास: पाठ से पूर्व स्तोत्र में दिए गए विनियोग, ऋष्यादि न्यास, करन्यास और अङ्गन्यास अवश्य करें। ये देवी की शक्ति को शरीर में स्थापित करते हैं।

  • ध्यान: न्यास के बाद ध्यान श्लोक का पाठ करते हुए माँ मातङ्गी के श्यामवर्णी, त्रिनेत्री, रत्नसिंहासनस्थ स्वरूप का मानसिक चिंतन करें।

  • उत्तम समय: रात्रि का तृतीय प्रहर (निशीथ काल) मातङ्गी साधना के लिए सर्वोत्तम है। प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में भी पाठ किया जा सकता है। मंगलवार और शुक्रवार विशेष फलदायी माने जाते हैं।

  • आसन और दिशा: हरे या लाल रंग के आसन पर उत्तर या पूर्व मुख होकर बैठें। मातङ्गी का वर्ण श्याम (हरा-नीला) होने के कारण हरा आसन विशेष उपयुक्त है।

  • पुष्प और सामग्री: कदम्ब पुष्प माँ मातङ्गी को अत्यंत प्रिय हैं (श्लोक १० में संदर्भ)। इसके अतिरिक्त हरे रंग के पुष्प, पान, सुपारी और गुड़ का नैवेद्य अर्पित करें।

  • जप संख्या: नियमित पाठ के लिए प्रतिदिन एक बार पूर्ण स्तोत्र पढ़ें। विशेष अनुष्ठान में ४१ दिन तक प्रतिदिन ११ बार पाठ का विधान है।

  • विशेष अवसर: नवरात्रि का नवाँ दिन (महानवमी), अमावस्या, पूर्णिमा, और शुक्र-मंगल योग में पाठ अत्यंत शुभ है। गुप्त नवरात्रि में इसका विशेष महत्व है।

  • गुरु दीक्षा: सौम्य भाव से स्तोत्र पाठ सभी कर सकते हैं। परन्तु बीज मन्त्र (ह्रीं, हूं, क्लीं) का जप और गहन तांत्रिक साधना गुरु दीक्षा के बिना नहीं करनी चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री मातङ्गी हृदयम् किस ग्रंथ से लिया गया है?

यह स्तोत्र श्री दक्षिणामूर्ति संहिता से है। दक्षिणामूर्ति संहिता शैव-शाक्त तंत्र का एक प्रतिष्ठित ग्रंथ है जिसमें विभिन्न देवी-देवताओं के हृदय स्तोत्र, कवच और मन्त्र संकलित हैं। इसके ऋषि स्वयं दक्षिणामूर्ति (शिव का ज्ञानदाता स्वरूप) हैं।

2. मातङ्गी और सरस्वती में क्या अंतर है?

मातङ्गी को 'तांत्रिक सरस्वती' कहा जाता है, परन्तु दोनों में मूलभूत अंतर है। सरस्वती सात्विक मार्ग से विद्या और कला प्रदान करती हैं, जबकि मातङ्गी 'उच्छिष्ट' (अपारम्परिक) मार्ग से वाक् सिद्धि देती हैं। सरस्वती का वर्ण श्वेत है, मातङ्गी का श्याम। सरस्वती वैदिक परम्परा की देवी हैं, मातङ्गी तांत्रिक। दोनों वाणी की अधिष्ठात्री हैं किन्तु उपासना पद्धति भिन्न है।

3. इस स्तोत्र में कितने श्लोक हैं और इसकी संरचना क्या है?

श्री मातङ्गी हृदयम् में कुल 18 श्लोक हैं। संरचना इस प्रकार है: श्लोक १-३ में भैरवी का प्रश्न, श्लोक ४-६ में भैरव का परिचय वचन, फिर विनियोग-न्यास-ध्यान प्रक्रिया, श्लोक ७ में ध्यान श्लोक, श्लोक ८-१४ में मातङ्गी स्तुति, और श्लोक १५-१८ में फलश्रुति। यह एक सम्पूर्ण उपासना पद्धति है।

4. क्या बिना गुरु दीक्षा के मातङ्गी हृदयम् का पाठ कर सकते हैं?

हाँ, सौम्य भाव से स्तोत्र पाठ भक्तिपूर्वक किया जा सकता है। परन्तु बीज मन्त्रों (ह्रीं, हूं, क्लीं) का जप, न्यास विधि और गहन तांत्रिक साधना अवश्य गुरु दीक्षा के बाद ही करनी चाहिए। महाविद्या साधना में अनधिकृत प्रयोग से लाभ के स्थान पर हानि हो सकती है। स्तोत्र श्रवण और भक्ति पाठ सभी के लिए सुरक्षित और लाभकारी है।

5. 'हृदय स्तोत्र' का क्या विशेष अर्थ है?

तांत्रिक और वैदिक साहित्य में 'हृदय' का अर्थ किसी देवता की सार-विद्या या मूल शक्ति है। जैसे वाल्मीकि रामायण में आदित्य हृदयम् सूर्य की समस्त शक्ति का सार है, वैसे ही मातङ्गी हृदयम् माँ मातङ्गी की वाक् सिद्धि, कवित्व और ऐश्वर्य शक्ति का केन्द्रबिन्दु है। यह अन्य स्तोत्रों से अधिक गहन और प्रभावशाली माना जाता है।

6. 'उच्छिष्ट मातङ्गी' का क्या तात्पर्य है?

तंत्र शास्त्र में 'उच्छिष्ट' का अर्थ है 'जूठा' या 'अवशिष्ट', किन्तु यहाँ इसका गहरा दार्शनिक अर्थ है। माँ मातङ्गी सभी सामाजिक सीमाओं, शुद्ध-अशुद्ध के भेदों से परे हैं। उनकी साधना में कठोर शुचिता के बंधन शिथिल हैं क्योंकि देवी सर्वव्यापी हैं — शुद्ध और अशुद्ध दोनों में विद्यमान। यह अद्वैत तंत्र दर्शन का प्रतिबिम्ब है।

7. कदम्ब पुष्प का मातङ्गी से क्या संबंध है?

श्लोक १० में कहा गया है — "कदम्बानां मालाः शिरसि" — कदम्ब पुष्पों की माला शिर पर धारण करने वाले को मातङ्गी का विशेष अनुग्रह प्राप्त होता है। मातङ्गी को 'कदम्बवनवासिनी' कहा जाता है — कदम्ब वन में निवास करने वाली। कदम्ब का पीला-हरा रंग और मधुर सुगंध देवी के श्याम स्वरूप और मधुर वाणी का प्रतीक है।

8. मातङ्गी हृदय स्तोत्र किन लोगों के लिए विशेष लाभकारी है?

यह स्तोत्र विशेष रूप से कवि, लेखक, गायक, संगीतकार, वक्ता, अध्यापक, वकील और ऐसे सभी व्यक्तियों के लिए अत्यंत लाभकारी है जिनका कार्य वाणी और कला से जुड़ा है। विद्यार्थियों के लिए भी यह परीक्षा, प्रतियोगिता और शोध में सफलता प्रदान करता है। श्लोक ९ में स्पष्ट कहा गया है कि मातङ्गी के उपासक को कवित्व शक्ति प्रतिपदम् (हर कदम पर) प्राप्त होती है।

9. दश महाविद्याओं में मातङ्गी का स्थान क्यों विशिष्ट है?

दश महाविद्याएं — काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातङ्गी और कमला — में मातङ्गी नवम स्थान पर हैं। इनकी विशिष्टता यह है कि ये विद्या, कला और वाणी की एकमात्र महाविद्या हैं। जहाँ काली काल-शक्ति, तारा उद्धार-शक्ति, बगलामुखी स्तम्भन-शक्ति की देवी हैं, वहीं मातङ्गी सृजन-शक्ति — कविता, संगीत, ज्ञान और अभिव्यक्ति की अधिष्ठात्री हैं।

10. 'कुबेरसमसम्पत्तिः' का क्या अर्थ है और क्या यह सम्भव है?

श्लोक १७ में कहा गया है — "कुबेरसमसम्पत्तिः स भवेद्धृदयं पठन्" — हृदय स्तोत्र का पाठ करने वाला कुबेर (देवताओं के कोषाध्यक्ष) के समान धनवान हो जाता है। शास्त्रों में ऐसे वचन साधक की श्रद्धा और नियमित अभ्यास की शर्त पर कहे गए हैं। इसका तात्पर्य यह है कि पाठक को कभी धन का अभाव नहीं रहता, उसका जीवन सम्पन्न और समृद्ध होता है। यह भौतिक के साथ-साथ आत्मिक सम्पत्ति (ज्ञान, शान्ति, संतोष) को भी इंगित करता है।