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Sri Bhairavi Kavacham Trailokyavijayam – श्री भैरवी कवचम् (त्रैलोक्यविजयम्)

Sri Bhairavi Kavacham Trailokyavijayam: The Conqueror of Three Worlds (30 Verses)

Sri Bhairavi Kavacham Trailokyavijayam – श्री भैरवी कवचम् (त्रैलोक्यविजयम्)
॥ श्री भैरवी कवचम् (त्रैलोक्यविजयम्) ॥ श्री देव्युवाच भैरव्याः सकला विद्याः श्रुताश्चाधिगता मया । साम्प्रतं श्रोतुमिच्छामि कवचं यत्पुरोदितम् ॥ १ ॥ त्रैलोक्यविजयं नाम शस्त्रास्त्रविनिवारणम् । त्वत्तः परतरो नाथ कः कृपां कर्तुमर्हति ॥ २ ॥ ईश्वर उवाच शृणु पार्वति वक्ष्यामि सुन्दरि प्राणवल्लभे । त्रैलोक्यविजयं नाम शस्त्रास्त्रविनिवारकम् ॥ ३ ॥ पठित्वा धारयित्वेदं त्रैलोक्यविजयी भवेत् । जघान सकलान्दैत्यान्यद्धृत्वा मधुसूदनः ॥ ४ ॥ ब्रह्मा सृष्टिं वितनुते यद्धृत्वाभीष्टदायकम् । धनाधिपः कुबेरोऽपि वासवस्त्रिदशेश्वरः ॥ ५ ॥ यस्य प्रसादादीशोऽहं त्रैलोक्यविजयी विभुः । न देयं परशिष्येभ्योऽसाधकेभ्यः कदाचन ॥ ६ ॥ पुत्रेभ्यः किमथान्येभ्यो दद्याच्चेन्मृत्युमाप्नुयात् । ऋषिस्तु कवचस्यास्य दक्षिणामूर्तिरेव च ॥ ७ ॥ विराट् छन्दो जगद्धात्री देवता बालभैरवी । धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगः प्रकीर्तितः ॥ ८ ॥ अधरो बिन्दुमानाद्यः कामः शक्तिशशीयुतः । भृगुर्मनुस्वरयुतः सर्गो बीजत्रयात्मकः ॥ ९ ॥ बालैषा मे शिरः पातु बिन्दुनादयुतापि सा । भालं पातु कुमारीशा सर्गहीना कुमारिका ॥ १० ॥ दृशौ पातु च वाग्बीजं कर्णयुग्मं सदावतु । कामबीजं सदा पातु घ्राणयुग्मं परावतु ॥ ११ ॥ सरस्वतीप्रदा बाला जिह्वां पातु शुचिप्रभा । हस्रैं कण्ठं हसकलरीं स्कन्धौ पातु हस्रौ भुजौ ॥ १२ ॥ पञ्चमी भैरवी पातु करौ हसैं सदावतु । हृदयं हसकलीं वक्षः पातु हसौः स्तनौ मम ॥ १३ ॥ पातु सा भैरवी देवी चैतन्यरूपिणी मम । हस्रैं पातु सदा पार्श्वयुग्मं हसकलरीं सदा ॥ १४ ॥ कुक्षिं पातु हसौर्मध्ये भैरवी भुवि दुर्लभा । ऐं ईं ओं वं मध्यदेशं बीजविद्या सदावतु ॥ १५ ॥ हस्रैं पृष्ठं सदा पातु नाभिं हसकलह्रीं सदा । पातु हसौं करौ पातु षट्कूटा भैरवी मम ॥ १६ ॥ सहस्रैं सक्थिनी पातु सहसकलरीं सदावतु । गुह्यदेशं हस्रौं पातु जानुनी भैरवी मम ॥ १७ ॥ सम्पत्प्रदा सदा पातु हैं जङ्घे हसक्लीं पदौ । पातु हंसौः सर्वदेहं भैरवी सर्वदावतु ॥ १८ ॥ हसैं मामवतु प्राच्यां हरक्लीं पावकेऽवतु । हसौं मे दक्षिणे पातु भैरवी चक्रसंस्थिता ॥ १९ ॥ ह्रीं क्लीं ल्वें मां सदा पातु निरृत्यां चक्रभैरवी । क्रीं क्रीं क्रीं पातु वायव्ये हूं हूं पातु सदोत्तरे ॥ २० ॥ ह्रीं ह्रीं पातु सदैशान्ये दक्षिणे कालिकावतु । ऊर्ध्वं प्रागुक्तबीजानि रक्षन्तु मामधः स्थले ॥ २१ ॥ दिग्विदिक्षु स्वाहा पातु कालिका खड्गधारिणी । ओं ह्रीं स्त्रीं हूं फट् सा तारा सर्वत्र मां सदावतु ॥ २२ ॥ सङ्ग्रामे कानने दुर्गे तोये तरङ्गदुस्तरे । खड्गकर्त्रिधरा सोग्रा सदा मां परिरक्षतु ॥ २३ ॥ इति ते कथितं देवि सारात्सारतरं महत् । त्रैलोक्यविजयं नाम कवचं परमाद्भुतम् ॥ २४ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ यः पठेत्प्रयतो भूत्वा पूजायाः फलमाप्नुयात् । स्पर्धामूद्धूय भवने लक्ष्मीर्वाणी वसेत्ततः ॥ २५ ॥ यः शत्रुभीतो रणकातरो वा भीतो वने वा सलिलालये वा । वादे सभायां प्रतिवादिनो वा रक्षःप्रकोपाद्ग्रहसकुलाद्वा ॥ २६ ॥ प्रचण्डदण्डाक्षमनाच्च भीतो गुरोः प्रकोपादपि कृच्छ्रसाध्यात् । अभ्यर्च्य देवीं प्रपठेत्त्रिसन्ध्यं स स्यान्महेशप्रतिमो जयी च ॥ २७ ॥ त्रैलोक्यविजयं नाम कवचं मन्मुखोदितम् । विलिख्य भूर्जगुटिकां स्वर्णस्थां धारयेद्यदि ॥ २८ ॥ कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ त्रैलोक्यविजयी भवेत् । तद्गात्रं प्राप्य शस्त्राणि भवन्ति कुसुमानि च ॥ २९ ॥ लक्ष्मीः सरस्वती तस्य निवसेद्भवने मुखे । एतत्कवचमज्ञात्वा यो जपेद्भैरवीं पराम् । बालां वा प्रजपेद्विद्वान्दरिद्रो मृत्युमाप्नुयात् ॥ ३० ॥ ॥ इति श्रीरुद्रयामले देवीश्वरसंवादे त्रैलोक्यविजयं नाम भैरवी कवचं समाप्तम् ॥

श्री भैरवी कवचम् (त्रैलोक्यविजयम्) - परिचय

श्री भैरवी कवचम्, जिसे 'त्रैलोक्य विजय' (Trailokyavijayam) के नाम से जाना जाता है, तंत्र साहित्य का एक अनमोल रत्न है। भगवान शिव 'ईश्वर' के रूप में देवी पार्वती को इस कवच का रहस्य बताते हैं। यह कवच विशेष रूप से बाल भैरवी (Bala Bhairavi) और जगद्धात्री (Jagaddhatri) स्वरूप से जुड़ा है, जो महाविद्या भैरवी का सौम्य और अत्यंत शक्तिशाली बाल रूप है।

कवच की महिमा: इस कवच की महिमा स्वयं भगवान शिव गाते हैं। वे कहते हैं कि इसी कवच को धारण करके भगवान विष्णु ('मधुसूदन') ने दैत्यों का संहार किया, ब्रह्मा जी सृष्टि की रचना करने में सक्षम हुए, और कुबेर देवताओं के धनाध्यक्ष बने। यह कवच साधक को केवल रक्षा ही नहीं, बल्कि 'सामर्थ्य' (Capacity) और 'ऐश्वर्य' (Opulence) भी प्रदान करता है।

शस्त्रास्त्र निवारण: इस कवच का एक मुख्य गुण है - 'शस्त्रास्त्रविनिवारणम्'। प्राचीन काल में यह अस्त्र-शस्त्रों से रक्षा के लिए प्रयोग होता था, किन्तु आधुनिक परिप्रेक्ष्य में यह हर प्रकार के बाहरी आघातों, दुर्घटनाओं और ईर्ष्या-द्वेष रूपी अदृश्य 'बाणों' से साधक की रक्षा करता है।

विधि और फल: यह कवच ३० श्लोकों में निबद्ध है। इसमें कोई अलग से न्यास विधि नहीं है, क्योंकि इसके श्लोक स्वयं न्यास स्वरूप हैं। श्लोक ९ से २१ तक साधक अपने शरीर के अंगों में देवी की शक्तियों को स्थापित करता है। इसकी फलश्रुति में स्पष्ट चेतावनी है कि बिना इस कवच के भैरवी या बाला की उपासना पूर्ण नहीं होती। जो साधक इसका नित्य पाठ करता है, उसके घर में लक्ष्मी और सरस्वती का स्थाई निवास हो जाता है।

कवच का महत्व (Significance)

  • बाल भैरवी उपासना: यह कवच बाल भैरवी के साधकों के लिए अनिवार्य है। यह उनकी साधना को सुरक्षा घेरा प्रदान करता है।

  • अजेय सुरक्षा: इसे 'त्रैलोक्यविजयी' कहा गया है। यह साधक को ऐसी मानसिक दृढ़ता देता है कि वह किसी भी परिस्थिति में हार नहीं मानता।

  • ग्रह और शत्रु शांति: यह कवच राजभय (Govt troubles), शत्रु भय और ग्रह बाधाओं (विशेषकर राहु-केतु) को शांत करने में अमोघ है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. यह कवच किस स्वरूप को समर्पित है?

यह कवच मुख्य रूप से 'बाल भैरवी' (Bala Bhairavi) और 'जगद्धात्री' (Jagaddhatri) स्वरूप को समर्पित है। श्लोक ८ में स्पष्ट कहा गया है - 'जगद्धात्री देवता बालभैरवी'।

2. 'त्रैलोक्य विजय' का क्या महत्व है?

इसका अर्थ है 'तीनों लोकों को जीतने वाला'। भगवान शिव कहते हैं कि जो इस कवच को धारण करता है, वह मधुसूदन (विष्णु) की तरह दैत्यों का नाश करने में सक्षम हो जाता है (श्लोक ४)।

3. क्या इसमें न्यास विधि अलग है?

हाँ, इस कवच में 'न्यास' श्लोकों के भीतर ही समाहित है। श्लोक ९ से २१ तक शरीर के विभिन्न अंगों (सिर, भाल, नेत्र, आदि) की रक्षा के लिए बीज मंत्रों का प्रयोग किया गया है.

4. इस कवच के पाठ का मुख्य फल क्या है?

सबसे बड़ा फल है 'शस्त्रास्त्र निवारण' (Protection from weapons) और 'सर्वत्र विजय'। यह साधक को युद्ध, वाद-विवाद और घोर संकटों में भी अजेय रखता है।

5. क्या इसे कवच के रूप में धारण किया जा सकता है?

हाँ, श्लोक २८-२९ में विधि बताई गई है कि इसे भोजपत्र पर लिखकर, स्वर्ण की गुटिका (Gold Locket) में डालकर गले या दाहिनी भुजा में धारण करने से व्यक्ति 'त्रैलोक्य विजयी' होता है।

6. इसके ऋषि और छंद कौन हैं?

इस कवच के ऋषि स्वंय 'दक्षिणामूर्ति' हैं और छंद 'विराट्' है। देवता 'बाल भैरवी' हैं (श्लोक ७-८)।

7. श्लोक ३० में क्या चेतावनी दी गई है?

चेतावनी है कि इस कवच को जाने बिना जो भैरवी या बाला की उपासना करता है, वह दरिद्र हो जाता है और मृत्यु को प्राप्त होता है। अतः कवच पाठ अनिवार्य है।

8. क्या यह धन प्रदान करता है?

हाँ, श्लोक ५ में कहा गया है कि इसी कवच के प्रभाव से कुबेर 'धनाधिप' (Lord of Wealth) बने हैं। यह अपार ऐश्वर्य और लक्ष्मी की प्राप्ति कराता है।

9. पाठ का सही समय क्या है?

श्लोक २७ के अनुसार, 'त्रिसन्ध्यं' (प्रात:, दोपहर, सायं) इसका पाठ करना सर्वोत्तम है। विशेष रूप से देवी की पूजा (अभ्यर्च्य देवीं) करने के बाद इसे पढ़ना चाहिए।

10. क्या यह ग्रह बाधा को दूर करता है?

हाँ, श्लोक २६ में स्पष्ट लिखा है 'ग्रहसकुलाद्वा' (Planetary troubles) - यह ग्रहों के कोप और राक्षसी बाधाओं से भी साधक की रक्षा करता है।