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श्रीमातङ्गीस्तुतिः

Sri Matangi Stuti

श्रीमातङ्गीस्तुतिः
॥ श्रीमातङ्गीस्तुतिः ॥ मातङ्गि मातरीशे मधुमदमथनाराधिते महामाये । मोहिनि मोहप्रमथिनि मन्मथमथनप्रिये नमस्तेऽस्तु ॥ १॥ स्तुतिषु तव देवि विधिरपि पिहितमतिर्भवति विहितमतिः । तदपि तु भक्तिर्मामपि भवर्ती स्तोतुं विलोभयति ॥ २॥ यतिजनहृदयनिवासे वासववरदे वराङ्गि मातङ्गि । वीणावादविनोदिनि नारदगीते नमो देवि ॥ ३॥ देवि प्रसीद सुन्दरि पीनस्तनि कम्बुकण्ठि घनकेशि । मातङ्गि विद्रुमौष्ठि स्मितमुग्धाक्ष्यम्ब मौक्तिकाभरणे ॥ ४॥ भरणे त्रिविष्टपस्य प्रभवसि तत एव भैरवी त्वमसि । त्वद्भक्तिलब्धविभवो भवति क्षुद्रोऽपि भुवनपतिः ॥ ५॥ पतितः कृपणो मूकोऽप्यम्ब भवत्याः प्रसादलेशेन । पूज्यः सुभगो वाग्मी भवति जडश्चापि सर्वज्ञः ॥ ६॥ ज्ञानात्मिके जगन्मयि निरञ्जने नित्यशुद्धपदे । निर्वाणरूपिणि शिवे त्रिपुरे शरणं प्रपन्नस्त्वाम् ॥ ७॥ त्वां मनसि क्षणमपि यो ध्यायति मुक्तामणीवृतां श्यामाम् । तस्य जगत्त्रितयेऽस्मिन् कास्ताः ननु याः स्त्रियोऽसाध्याः ॥ ८॥ साध्याक्षरेण गर्भितपञ्चनवत्यक्षराञ्चिते मातः । भगवति मातङ्गीश्वरि नमोऽस्तु तुभ्यं महादेवि ॥ ९॥ विद्याधरसुरकिन्नरगुह्यकगन्धर्वयक्षसिद्धवरैः । आराधिते नमस्ते प्रसीद कृपयैव मातङ्गि ॥ १०॥ वीणावादनवेलानर्तदलाबुस्थगित वामकुचाम् । श्यामलकोमलगार्त्री पाटलनयनां स्मरामि त्वाम् ॥ ११॥ अवटुतटघटितचूलीताडिततालीपलाशताटङ्कां वीणावादनवेलाकम्पितशिरसं नमामि मातङ्गीम् ॥ १२॥ माता मरकतश्यामा मातङ्गी मदशालिनी । कटाक्षयतु कल्याणी कदम्बवनवासिनी ॥ १३॥ वामे विस्तृतिशालिनि स्तनतटे विन्यस्तवीणामुखं तन्त्रीं तारविराविणीमसकलैरास्फालयन्ती नखैः । अर्धोन्मीलदपाङ्गमंसवलितग्रीवं मुखं बिभ्रती माया काचन मोहिनी विजयते मातङ्गकन्यामयी ॥ १४॥ वीणावाद्यविनोदगीत(नैक) निरतां लीलाशुकोल्लासिनीं विम्बोष्ठीं नवयावकार्द्रचरणामाकीर्णकेशालिकां (वलिम्) । हृद्याङ्गीं सितशङ्खकुण्डलधरां शृङ्गारवेषोज्ज्वलां मातङ्गीं प्रणतोऽस्मि सुस्मितमुखीं देवीं शुकश्यामलाम् ॥ १५॥ स्रस्तं केसरदामभिः वलयितं धम्मिल्लमाबिभ्रती तालीपत्रपुटान्तरेषु घटितैस्ताटकिनी मौक्तिकैः । मूले कल्पतरोर्महामणिमये सिंहासने मोहिनी काचिद्गायनदेवता विजयते वीणावती वासना ॥ १६॥ वेणीमूलविराजितेन्दुशकलां वीणानिनादप्रियां क्षोणीपालसुरेन्द्रपन्नगवरैराराधिताङ्घ्रिद्वयाम् । एणीचञ्चललोचनां सुवसनां वणीं पुराणोज्ज्वलां श्रोणीभारभरालसामनिमिषः पश्यामि विश्वेश्वरीम् ॥ १७॥ ॥ फलश्रुति ॥ मातङ्गीस्तुतिरियमन्वहं प्रजप्ता जन्तूनां वितरति कौशलं क्रियासु । वाग्मित्वं श्रियमधिकाञ्च गानशक्तिं सौभाग्यं नृपतिभिरर्चनीयताञ्च ॥ १८॥ (मन्त्रकोशतः) ॥ इति मातङ्गीस्तुतिः समाप्ता ॥

श्रीमातङ्गीस्तुतिः — परिचय (Introduction)

श्री मातंगी स्तुति के 18 श्लोकों में देवी मातंगी के अत्यंत सम्मोहक, श्याम वर्ण और वीणावादिनी स्वरूप का अद्भुत वर्णन किया गया है। यह स्तुति ज्ञान, स्वर और कला का साक्षात स्वरूप है।

स्तोत्र के प्रारंभिक श्लोकों में देवी मातंगी को 'महामाया', 'मोहिनी', 'ईशानी' कहकर प्रणाम किया गया है। साधक कहता है कि हे देवि! आपके गुणों का वर्णन करने में स्वयं ब्रह्मा भी असमर्थ हैं, परंतु मेरी अगाध भक्ति मुझे आपकी स्तुति करने के लिए प्रेरित कर रही है। आप यतियों और तपस्वियों के हृदय में निवास करने वाली, इन्द्र आदि देवताओं को वरदान देने वाली और नारद मुनि के गीतों में रमण करने वाली हैं (वीणावादविनोदिनि)।

आगे के श्लोकों में उनके दिव्य रूप का वर्णन है — घुंघराले बालों वाली, मुंगे के समान लाल होंठों (विद्रुमौष्ठि) वाली, मोतियों के आभूषण धारण करने वाली और सुंदर मुस्कान वाली माँ मातंगी मुझ पर प्रसन्न हों। यदि आपकी क्षण मात्र भी कृपा हो जाए, तो अत्यंत क्षुद्र व्यक्ति भी संसार का स्वामी बन सकता है। आपकी कृपा से मूंगा (गूंगा) व्यक्ति भी श्रेष्ठ वक्ता (वाग्मी) बन जाता है, और महामूर्ख व्यक्ति भी 'सर्वज्ञ' (सब कुछ जानने वाला) हो जाता है।

मातंगी स्तुति: दुर्लभ रहस्य और कथा

वीणावादिनी स्वरूप: वे महाविद्याओं, गंधर्वों, यक्षों और सिद्धों द्वारा पूजनीय हैं। उनका वर्ण मरकत मणि (पन्ने) के समान हरा-श्याम है, वे कदम्ब वन में वास करती हैं और महान वीणावादिनी (Veenavadini) हैं। वे वीणा बजाने में मग्न हैं और तोता (लीलाशुक) उनके हाथों में सुशोभित है। अपने शंख के समान कुण्डलों को धारण किये, मस्तक पर चन्द्रमा (शशिशेखरां) सजाये, देवी सभी को अपनी मधुर माया में सम्मोहित किए हुए हैं।

स्तोत्र पाठ के विशिष्ट लाभ — फलश्रुति (Benefits from Phala Shruti)

इस स्तुति की फलश्रुति (श्लोक 18) में इसके चमत्कारी प्रभावों का स्पष्ट वर्णन है:

  • कौशलं क्रियासु: जो व्यक्ति प्रतिदिन इस मातंगी स्तुति का पाठ (जप) करता है, देवी उसके सभी कार्यों में अनुपम कुशलता (Skill) प्रदान करती हैं।
  • वाग्मित्वं (Speech Power): मूंगा व्यक्ति भी श्रेष्ठ वक्ता बन जाता है, और महामूर्ख व्यक्ति भी 'सर्वज्ञ' हो जाता है।
  • गानशक्तिं (Musical Ability): यह पाठ व्यक्ति को श्रेष्ठ गायन शक्ति और संगीत कला में अपार सफलता दिलाता है।
  • सौभाग्यं नृपतिभिरर्चनीयताञ्च: साधक को अखंड सौभाग्य प्राप्त होता है और राजाओं तथा उच्च शासकों द्वारा भी उसका सम्मान और पूजन किया जाता है।

पाठ विधि और विशेष नियम (Ritual Method & Rules)

समय और स्थान

  • श्रेष्ठ समय: प्रातःकाल या संधिकाल में, विशेषकर ज्ञानार्जन या कला के अभ्यास से पूर्व।
  • दिशा: उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • आसन और वस्त्र: स्वच्छ वस्त्र (अधिमानतः हरे या लाल) धारण करें और उसी रंग के आसन का प्रयोग करें।

संकल्प विधि

पाठ शुरू करने से पहले माता मातंगी का ध्यान करें (विशेष रूप से उनके शशिशेखरा और वीणावादिनी स्वरूप का) और मन में पूर्ण भक्ति के साथ उनके चरणों में मानसिक प्रणाम करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री मातङ्गी स्तुति का पाठ करने से क्या लाभ होता है?

श्री मातंगी स्तुति (18 श्लोक) का नियमित पाठ करने से वाक्-सिद्धि (बोलने की शक्ति), कलाओं और संगीत में निपुणता, आकर्षण भाव और समाज में राजसी सम्मान प्राप्त होता है। यह साधक के भाग्य को पूरी तरह से प्रकाशित कर देती है।

2. इस स्तुति में देवी मातंगी के किस स्वरूप का वर्णन है?

इस स्तुति में माता मातंगी को श्यामवर्णा, वीणावादिनी, रत्नों के आभूषणों से सुसज्जित, तोते (लीलाशुक) के साथ खेलने वाली और मस्तक पर अर्धचन्द्र धारण की हुई अत्यंत सुंदर, मोहिनी स्वरूप में वर्णित किया गया है।

3. अंतिम श्लोक (फलश्रुति) का क्या अर्थ है?

अंतिम 18वें श्लोक में बताया गया है कि जो व्यक्ति प्रतिदिन इस स्तुति का जप करता है, उसे कार्यों में अद्भुत कुशलता, उत्कृष्ट वाणी, अपार संपत्ति, महान गायन शक्ति, सौभाग्य और राजाओं (शासकों) द्वारा सम्मान प्राप्त होता है।

4. क्या विद्यार्थी और कला प्रेमी इसका पाठ कर सकते हैं?

हाँ, यह स्तुति विशेष रूप से विद्यार्थियों, गायकों, संगीतकारों और कला प्रेमियों के लिए एक वरदान है। यह अविद्या को दूर कर परम मेधा और सृजनात्मक ऊर्जा प्रदान करती है।

5. पाठ की उत्तम विधि क्या है?

पाठ का सर्वोत्तम समय प्रातःकाल स्नान के पश्चात् है। हरे या लाल आसन पर बैठकर, पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके पाठ करना चाहिए।