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श्री मातङ्गी स्तोत्रम् (एकजटा कल्पलतिका)

Sri Matangi Stotram — Ekajata Kalpalatika Shiva Diksha

श्री मातङ्गी स्तोत्रम् (एकजटा कल्पलतिका)
॥ श्री मातङ्गी स्तोत्रम् ॥ नमामि वरदां देवीं सुमुखीं सर्वसिद्धिदाम् । सूर्यकोटिनिभां देवीं वह्निरूपां व्यवस्थिताम् ॥ १॥ रक्तवस्त्र नितम्बां च रक्तमाल्योपशोभिताम् । गुंजाहारस्तनाढ्यान्तां परंज्योतिस्वरूपिणीम् ॥ २॥ मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनाकर्ष दायिनी । मुण्ड कर्त्रिं शरावामां परंज्योतिस्वरूपिणीम् ॥ ३॥ स्वयम्भुकुसुम प्रीतां ऋतुयोनिनिवासिनीम् । शवस्थां स्मेरवदनां परंज्योतिस्वरूपिणीम् ॥ ४॥। रजस्वला भवेन्नित्यं पूजेष्टफलदायिनी । मद्यप्रियं रतिमयीं परंज्योतिस्वरूपिणीम् ॥ ५॥ शिवविष्णुविरञ्चीनां साद्यां बुद्धिप्रदायिनीम् । असाध्यं साधिनीं नित्यां परंज्योतिस्वरूपिणीम् ॥ ६॥ रात्रौ पूजा बलियुतां गोमांस रुधिरप्रियाम् । नानाऽलङ्कारिणीं रौद्रीं पिशाचगणसेविताम् ॥ ७॥ इत्यष्टकं पठेद्यस्तु ध्यानरूपां प्रसन्नधीः । शिवरात्रौ व्रतेरात्रौ वारूणी दिवसेऽपिवा ॥ ८॥ पौर्णमास्याममावस्यां शनिभौमदिने तथा । सततं वा पठेद्यस्तु तस्य सिद्धि पदे पदे ॥ ९॥ ॥ इति एकजटा कल्पलतिका शिवदीक्षायान्तर्गतम् मातङ्गी स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

स्तोत्र का महत्त्व (Significance of the Stotra)

यह स्तोत्र 'एकजटा कल्पलतिका' ग्रन्थ के 'शिवदीक्षा' खण्ड से लिया गया है। यह दश महाविद्या की नवम विद्या, माँ मातङ्गी का एक अत्यंत उग्र और तांत्रिक स्तोत्र है। मातङ्गी को तांत्रिक सरस्वती माना जाता है, किन्तु इस स्तोत्र में उनका अत्यंत उग्र, रौद्र और चमत्कारी स्वरूप प्रकट होता है, जो 'षट्कर्म' (तांत्रिक अभिचार) की सिद्धियों को प्रदान करने वाला है।

अष्ट-सिद्धि और षट्कर्म:
श्लोक 3 में स्पष्ट उल्लेख है: "मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनाकर्ष दायिनी।"
माँ मातङ्गी अपने साधकों को मारण (शत्रु-नाश), मोहन (मोहित करना), वशीकरण, स्तम्भन (शत्रु की बुद्धि/गती को जड़ कर देना) और आकर्षण (दूर गए व्यक्ति को खींच लाना) की अलौकिक क्षमता प्रदान करती हैं।

त्रिदेवों की नियन्ता:
श्लोक 6 के अनुसार: "शिवविष्णुविरञ्चीनां साद्यां बुद्धिप्रदायिनीम्।"
अर्थात्, परम ज्योति-स्वरूपा माँ मातङ्गी ही साक्षात् शिव (महेश), विष्णु (हरि) और विरञ्चि (ब्रह्मा) को भी बुद्धि प्रदान करने वाली हैं। सारे विश्व का ज्ञान और बुद्धि उन्हीं से प्रवाहित होती है।

असंभव को संभव करने वाली:
"असाध्यं साधिनीं नित्यां" — जो कार्य लौकिक दृष्टि से पूर्णतः असाध्य (असंभव) जान पड़ता हो, माँ मातङ्गी की कृपा से वह भी सुगमता से सध (पूर्ण हो) जाता है।

देवी का रौद्र एवं तांत्रिक स्वरूप (Tantric Form of Matangi)

इस स्तोत्र में वामाचार और कौल मार्ग की उन्नत तांत्रिक साधनाओं का संकेत है। देवी का रूप 'रौद्री' है (श्लोक 7)। उनके साथ पिशाचगण (पिशाचगणसेविताम्) चलते हैं, वे शव पर आरूढ़ हैं (शवस्थां), और नरमुण्डों की करधनी (मुण्ड कर्त्रिं) धारण करती हैं।

वे मद्यप्रिया (मदिरा पसंद करने वाली) हैं और 'परंज्योतिस्वरूपिणी' (परम प्रकाश से युक्त) भी हैं। यह तांत्रिक दर्शन है कि जो वस्तुएं समाज में निंदित या निकृष्ट मानी जाती हैं, परमतत्व (महाविद्या) उनसे परे है। शुभ और अशुभ, शुद्ध और अशुद्ध के पार जाकर ही साधक महाविद्या की पूर्ण कृपा प्राप्त कर सकता है। "रजस्वला भवेन्नित्यं" (श्लोक 5) इसी वैचारिक सीमा को तोड़ने का प्रतीक है।

पाठ विधि एवं विशेष मुहूर्त (Chanting Method & Timings)

स्तोत्र के श्लोक 8 और 9 में स्वयं बताया गया है कि इस पाठ से सिद्धि कब और कैसे मिलती है:

  • विशिष्ट दिन: शिवरात्रि, पूर्णिमा (पौर्णमासी), अमावस्या और वारूणी पर्व।
  • साप्ताहिक दिन: शनिवार (शनि दिन) और मंगलवार (भौम दिन) इस अनुष्ठान के लिए विशेष फलदायी बताए गए हैं।
  • रात्रि पाठ: महाविद्याओं (विशेषकर मातङ्गी, काली, तारा) की पूजा सदैव रात्रि-काल (महानिशा) में अत्यधिक सिद्धमानी गई है। स्तोत्र में भी "रात्रौ पूजा बलियुतां" कहा गया है।

"सततं वा पठेद्यस्तु तस्य सिद्धि पदे पदे" — जो साधक इन निर्देशों का पालन करते हुए निरंतर (सतत) एकाग्र मन से इसका गान करता है, उसे पग-पग पर (प्रत्येक कार्य में) सिद्धि प्राप्त होती है तथा उसकी लौकिक और अलौकिक समस्त इच्छाएं पूर्ण होती हैं।

* गुरु-निर्देश अनिवार्य: इस स्तोत्र में उग्र तांत्रिक कर्मों (मारण-आकर्षण) का उल्लेख है। अतः किसी विशेष सांसारिक सिद्धि या शत्रु-नाश हेतु इसका प्रयोग योग्य तंत्राचार्य या सिद्ध गुरु के सानिध्य में ही किया जाना चाहिए। सामान्य जन केवल 'माँ का आशीर्वाद प्राप्ति' के भाव से इसका सौम्य पाठ कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. मातङ्गी कौन हैं?

मातङ्गी दश महाविद्याओं में नवम शक्ति हैं, जिन्हें 'तांत्रिक सरस्वती' कहा जाता है। ये वाक् सिद्धि, कला, और तांत्रिक शक्तियों (विशेषतया वशीकरण) की प्रदाता हैं।

2. यह मातङ्गी स्तोत्र किस ग्रन्थ से लिया गया है?

यह शक्तिशाली स्तोत्र आगम शास्त्र ग्रन्थ 'एकजटा कल्पलतिका' के 'शिवदीक्षा' खण्ड से उद्धृत है।

3. इस स्तोत्र से कौन सी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं?

स्तोत्र के तीसरे श्लोक के अनुसार — मारण (शत्रु नाश), मोहन (मोहित करना), वश्य (वशीकरण), स्तम्भन (बुद्धि या प्रगति रोकना) और आकर्षण की सिद्धि मिलती है।

4. इस स्तोत्र के पाठ के लिए सबसे शुभ दिन कौन से हैं?

शिवरात्रि, पूर्णिमा, अमावस्या, शनिवार और मंगलवार इसके पाठ के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं। रात्रि का समय अनुष्ठान हेतु अत्यधिक शुभ माना गया है।

5. 'असाध्यं साधिनीं' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है 'असंभव लगने वाले कार्यों को भी सिद्ध कर देने वाली'। माँ देवी कृपा से बड़े से बड़े संकट मिट जाते हैं।

6. क्या उग्र महाविद्या स्तोत्रों के पाठ के लिए दीक्षा आवश्यक है?

हाँ। यदि इसे किसी विशेष षट्कर्म सिद्धि (जैसे वशीकरण या स्तम्भन) के सकाम भाव से किया जा रहा है तो गुरु-दीक्षा आवश्यक है। निष्काम भक्ति-भाव से सौम्य पाठ सभी कर सकते हैं।

7. मातङ्गी स्तोत्र और मातङ्गी स्तोत्रम्-2 में क्या अंतर है?

यह स्तोत्र (एकजटा कल्पलतिका) उग्र तांत्रिक शक्तियों, शिव-दीक्षा और 'षट्कर्म' पर केंद्रित है। जबकि 'स्तोत्रम्-2' वाक्-सिद्धि, राजसी ऐश्वर्य, अणिमादि अष्टसिद्धि और कलात्मक विकास पर अधिक केंद्रित है।