श्री मातङ्गी स्तोत्रम् (एकजटा कल्पलतिका)
Sri Matangi Stotram — Ekajata Kalpalatika Shiva Diksha

स्तोत्र का महत्त्व (Significance of the Stotra)
अष्ट-सिद्धि और षट्कर्म:
श्लोक 3 में स्पष्ट उल्लेख है: "मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनाकर्ष दायिनी।"
माँ मातङ्गी अपने साधकों को मारण (शत्रु-नाश), मोहन (मोहित करना), वशीकरण, स्तम्भन (शत्रु की बुद्धि/गती को जड़ कर देना) और आकर्षण (दूर गए व्यक्ति को खींच लाना) की अलौकिक क्षमता प्रदान करती हैं।
त्रिदेवों की नियन्ता:
श्लोक 6 के अनुसार: "शिवविष्णुविरञ्चीनां साद्यां बुद्धिप्रदायिनीम्।"
अर्थात्, परम ज्योति-स्वरूपा माँ मातङ्गी ही साक्षात् शिव (महेश), विष्णु (हरि) और विरञ्चि (ब्रह्मा) को भी बुद्धि प्रदान करने वाली हैं। सारे विश्व का ज्ञान और बुद्धि उन्हीं से प्रवाहित होती है।
असंभव को संभव करने वाली:
"असाध्यं साधिनीं नित्यां" — जो कार्य लौकिक दृष्टि से पूर्णतः असाध्य (असंभव) जान पड़ता हो, माँ मातङ्गी की कृपा से वह भी सुगमता से सध (पूर्ण हो) जाता है।
देवी का रौद्र एवं तांत्रिक स्वरूप (Tantric Form of Matangi)
इस स्तोत्र में वामाचार और कौल मार्ग की उन्नत तांत्रिक साधनाओं का संकेत है। देवी का रूप 'रौद्री' है (श्लोक 7)। उनके साथ पिशाचगण (पिशाचगणसेविताम्) चलते हैं, वे शव पर आरूढ़ हैं (शवस्थां), और नरमुण्डों की करधनी (मुण्ड कर्त्रिं) धारण करती हैं।
वे मद्यप्रिया (मदिरा पसंद करने वाली) हैं और 'परंज्योतिस्वरूपिणी' (परम प्रकाश से युक्त) भी हैं। यह तांत्रिक दर्शन है कि जो वस्तुएं समाज में निंदित या निकृष्ट मानी जाती हैं, परमतत्व (महाविद्या) उनसे परे है। शुभ और अशुभ, शुद्ध और अशुद्ध के पार जाकर ही साधक महाविद्या की पूर्ण कृपा प्राप्त कर सकता है। "रजस्वला भवेन्नित्यं" (श्लोक 5) इसी वैचारिक सीमा को तोड़ने का प्रतीक है।
पाठ विधि एवं विशेष मुहूर्त (Chanting Method & Timings)
स्तोत्र के श्लोक 8 और 9 में स्वयं बताया गया है कि इस पाठ से सिद्धि कब और कैसे मिलती है:
- विशिष्ट दिन: शिवरात्रि, पूर्णिमा (पौर्णमासी), अमावस्या और वारूणी पर्व।
- साप्ताहिक दिन: शनिवार (शनि दिन) और मंगलवार (भौम दिन) इस अनुष्ठान के लिए विशेष फलदायी बताए गए हैं।
- रात्रि पाठ: महाविद्याओं (विशेषकर मातङ्गी, काली, तारा) की पूजा सदैव रात्रि-काल (महानिशा) में अत्यधिक सिद्धमानी गई है। स्तोत्र में भी "रात्रौ पूजा बलियुतां" कहा गया है।
"सततं वा पठेद्यस्तु तस्य सिद्धि पदे पदे" — जो साधक इन निर्देशों का पालन करते हुए निरंतर (सतत) एकाग्र मन से इसका गान करता है, उसे पग-पग पर (प्रत्येक कार्य में) सिद्धि प्राप्त होती है तथा उसकी लौकिक और अलौकिक समस्त इच्छाएं पूर्ण होती हैं।
* गुरु-निर्देश अनिवार्य: इस स्तोत्र में उग्र तांत्रिक कर्मों (मारण-आकर्षण) का उल्लेख है। अतः किसी विशेष सांसारिक सिद्धि या शत्रु-नाश हेतु इसका प्रयोग योग्य तंत्राचार्य या सिद्ध गुरु के सानिध्य में ही किया जाना चाहिए। सामान्य जन केवल 'माँ का आशीर्वाद प्राप्ति' के भाव से इसका सौम्य पाठ कर सकते हैं।