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श्रीमातङ्गीध्यानम्

Sri Matangi Dhyanam

श्रीमातङ्गीध्यानम्
॥ श्रीमातङ्गीध्यानम् ॥ तालीदलेनार्पितकर्णभूषां माध्वीमदोद्घूर्णितनेत्रपद्माम् । घनस्तनीं शम्भुवधूं नमामि । तडिल्लताकान्तिमनर्घ्यभूषाम् ॥ १॥ घनश्यामलाङ्गीं स्थितां रत्नपीठे शुकस्योदितं शृण्वतीं रक्तवस्त्राम् । सुरापानमत्तां सरोजस्थितां श्रीं भजे वल्लकीं वादयन्तीं मतङ्गीम् ॥ २॥ माणिक्याभरणान्वितां स्मितमुखीं नीलोत्पलाभां वरां रम्यालक्तक लिप्तपादकमलां नेत्रत्रयोल्लासिनीम् । वीणावादनतत्परां सुरनुतां कीरच्छदश्यामलां मातङ्गीं शशिशेखरामनुभजे ताम्बूलपूर्णाननाम् ॥ ३॥ श्यामाङ्गीं शशिशेखरां त्रिनयनां वेदैः करैर्बिभ्रतीं पाशं खेटमथाङ्कुशं दृढमसिं नाशाय भक्तद्विषाम् । रत्नालङ्करणप्रभोज्वलतनुं भास्वत्किरीटां शुभां मातङ्गीं मनसा स्मरामि सदयां सर्वार्थसिद्धिप्रदाम् ॥ ४॥ देवीं षोडशवार्षिकीं शवगतां माध्वीरसाघूर्णितां श्यामाङ्गीमरुणाम्बरां पृथुकुचां गुञ्जावलीशोभिताम् । हस्ताभ्यां दधतीं कपालममलं तीक्ष्णां तथा कर्त्रिकां ध्यायेन्मानसपङ्कजे भगवतीमुच्छिष्टचाण्डालिनीम् ॥ ५॥ ॥ इति श्रीमातङ्गीध्यानम् ॥

स्तोत्र का सरल भावार्थ (Hindi Meaning)

श्लोक १: ताड़ के पत्तों का कर्णफूल धारण करने वाली, मदिरा के मद से जिनके नेत्र-रूपी कमल घूर्णित (घूमते) हो रहे हैं, जिनके वक्षस्थल उन्नत हैं, उन विद्युल्लता के समान कान्ति वाली और बहुमूल्य आभूषण धारण की हुई शम्भु-पत्नी को मैं नमस्कार करता हूँ।

श्लोक २: जिनके शरीर की कान्ति घने मेघों के समान श्याम है, जो रत्नमयी पीठ पर विराजमान हैं, जो शुक (तोते) द्वारा कहे गए वचनों को सुन रही हैं, लाल वस्त्र धारण करने वाली, सुरापान से मत्त, कमल पर स्थित उन वीणावादिनी श्रीमातंगी भवानी का मैं भजन (स्मरण) करता हूँ।

श्लोक ३: उत्तम माणिक्य आदि आभूषणों से युक्त, मंद मुस्कुराते हुए मुख वाली, नीले कमल की आभा वाली वरेण्या देवी, जिनके चरण कमलों में सुंदर महावर (आलक्तक) लगा हुआ है, जो अपने तीन नेत्रों से सुशोभित हैं। वीणा बजाने में तत्पर, देवताओं द्वारा वंदित, तोते के पंखों के समान श्याम वर्ण वाली, मस्तक पर चन्द्राकार बालेंदु धारण करने वाली एवं पान से भरे मुख वाली उन श्रीमातंगी अम्बा का मैं निरंतर ध्यान करता हूँ।

श्लोक ४: अपने चार हाथों में पाश, खेट (ढाल), अंकुश और भक्तों के शत्रुओं का नाश करने के लिए एक दृढ़ (मजबूत) खड्ग धारण करने वाली, श्यामवर्णा, मस्तक पर चन्द्रमा धारण करने वाली त्रिणेत्रा देवी। जिनके शरीर पर रत्नों के आभूषण जगमगा रहे हैं, जो प्रदीप्त मुकुट धारण किए हुए हैं, उन कल्याणकारी, दयालु और सर्वार्थ सिद्धि देने वाली श्रीमातंगी का मैं अपने मन में स्मरण करता हूँ।

श्लोक ५: भवानी जगदम्बा सोलह वर्ष की अवस्था वाली, शव पर विराजमान, मधुर रस (सुरा) के प्रभाव से घूर्णित रहने वाली, श्यामांगी, लाल वस्त्र धारण की हुई, उन्नत उरोजों वाली और गुंजा (घुंघची) की माला से सुशोभित देवी। अपने दोनों हाथों में निर्मल कपाल तथा तीक्ष्ण कर्त्री (कैंची/खड्ग) धारण करने वाली, साक्षात माता उच्छिष्टचाण्डालिनी (मातंगी) का मैं अपने हृदय रूपी कमल में ध्यान करता हूँ।

ध्यानम् के पाठ का विशिष्ट महत्व

श्री मातंगी तान्त्रिक सरस्वती के रूप में प्रतिष्ठित हैं। इनका ध्यान विशेष रूप से उन साधकों द्वारा किया जाता है जो संगीत, कला, वाक्-सिद्धि, और अकाट्य तर्क-शक्ति में वर्चस्व प्राप्त करना चाहते हैं।

देवी मातंगी समाज में वशीकरण और आकर्षण भी प्रदान करती हैं। इस रूप में भगवती का ध्यान करने वाला व्यक्ति समाज में सर्वत्र सम्मानित होता है और उसकी विद्या की चराचर जगत में ख्याति फैलती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री मातङ्गी ध्यानम् का पाठ करने से क्या लाभ होता है?

श्री मातंगी ध्यानम् के 5 श्लोकों का पाठ करने से साधक को उत्तम ज्ञान, अपार स्मरण शक्ति, वाक्-सिद्धि (Speech Power), और संगीत व सभी कलाओं में निपुणता प्राप्त होती है। देवी विद्या और ऐश्वर्य का आशीर्वाद देती हैं।

2. मातंगी ध्यानम् का पाठ किस समय करना चाहिए?

इसका पाठ प्रातःकाल स्नान के बाद, पूजा के समय या किसी भी शुभ कार्य (विशेषकर विद्या और कला से जुड़े कार्य) को आरंभ करने से पहले करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

3. इस ध्यान स्तोत्र में देवी मातंगी के किस स्वरूप का वर्णन है?

इसमें देवी मातंगी को श्यामवर्णा, मस्तक पर अर्धचन्द्र धारण की हुई, वीणा बजाती हुई, अमृत-रस में मग्न, और हाथों में पाश, अंकुश व खड्ग धारण की हुई परम दयालु माता के रूप में वर्णित किया गया है।