Sri Mahalakshmi Stuti (16 Forms) – श्री महालक्ष्मी स्तुति

॥ श्री महालक्ष्मी स्तुतिः ॥
आदिलक्ष्मि नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरूपिणि ।
यशो देहि धनं देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ १ ॥
सन्तानलक्ष्मि नमस्तेऽस्तु पुत्रपौत्रप्रदायिनि ।
पुत्रान् देहि धनं देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ २ ॥
विद्यालक्ष्मि नमस्तेऽस्तु ब्रह्मविद्यास्वरूपिणि ।
विद्यां देहि कलान् देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ ३ ॥
धनलक्ष्मि नमस्तेऽस्तु सर्वदारिद्र्यनाशिनि ।
धनं देहि श्रियं देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ ४ ॥
धान्यलक्ष्मि नमस्तेऽस्तु सर्वाभरणभूषिते ।
धान्यं देहि धनं देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ ५ ॥
मेधालक्ष्मि नमस्तेऽस्तु कलिकल्मषनाशिनि ।
प्रज्ञां देहि श्रियं देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ ६ ॥
गजलक्ष्मि नमस्तेऽस्तु सर्वदेवस्वरूपिणि ।
अश्वांश्च गोकुलं देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ ७ ॥
वीरलक्ष्मि नमस्तेऽस्तु पराशक्तिस्वरूपिणि ।
वीर्यं देहि बलं देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ ८ ॥
जयलक्ष्मि नमस्तेऽस्तु सर्वकार्यजयप्रदे ।
जयं देहि शुभं देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ ९ ॥
भाग्यलक्ष्मि नमस्तेऽस्तु सौमाङ्गल्यविवर्धिनि ।
भाग्यं देहि श्रियं देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ १० ॥
कीर्तिलक्ष्मि नमस्तेऽस्तु विष्णुवक्षःस्थलस्थिते ।
कीर्तिं देहि श्रियं देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ ११ ॥
आरोग्यलक्ष्मि नमस्तेऽस्तु सर्वरोगनिवारणि ।
आयुर्देहि श्रियं देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ १२ ॥
सिद्धलक्ष्मि नमस्तेऽस्तु सर्वसिद्धिप्रदायिनि ।
सिद्धिं देहि श्रियं देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ १३ ॥
सौन्दर्यलक्ष्मि नमस्तेऽस्तु सर्वालङ्कारशोभिते ।
रूपं देहि श्रियं देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ १४ ॥
साम्राज्यलक्ष्मि नमस्तेऽस्तु भुक्तिमुक्तिप्रदायिनि ।
मोक्षं देहि श्रियं देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ १५ ॥
मङ्गले मङ्गलाधारे माङ्गल्ये मङ्गलप्रदे ।
मङ्गलार्थं मङ्गलेशि माङ्गल्यं देहि मे सदा ॥ १६ ॥
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ १७ ॥
शुभं भवतु कल्याणी आयुरारोग्यसम्पदाम् ।
मम शत्रुविनाशाय दीपलक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ १८ ॥
॥ इति श्री महालक्ष्मी स्तुतिः सम्पूर्णम् ॥
संलिखित ग्रंथ
अष्टलक्ष्मी vs षोडश लक्ष्मी
हिन्दू धर्म में 'अष्टलक्ष्मी' (8 रूप - आदि, धन, धान्य, गज, संतान, वीर, विजय, विद्या) सर्वाधिक प्रचलित हैं। लेकिन साधना की उच्च अवस्थाओं में 'षोडश लक्ष्मी' (16 रूप) का वर्णन मिलता है। यह स्तुति उन 16 रूपों को समर्पित है।
इसमें अष्टलक्ष्मी के अलावा 8 और अति-विशिष्ट रूपों को जोड़ा गया है जैसे - सौंदर्य (Beauty), आरोग्य (Health), मेधा (Intellect), सिद्धि (Occult Powers) और साम्राज्य (Empire)। यह मनुष्य के जीवन को 'पूर्ण' (Holistic) बनाती है।
16 लक्ष्मी रूप और उनके फल
| क्रम | स्वरूप (नाम) | प्रार्थना (मांग) | जीवन क्षेत्र |
|---|---|---|---|
| 1 | आदिलक्ष्मी | यशो देहि (Fame) | मूल शक्ति, कीर्ति |
| 2 | संतानलक्ष्मी | पुत्र-पौत्र (Progeny) | वंश वृद्धि |
| 3 | विद्यालक्ष्मी | विद्यां, कलान् (Arts) | शिक्षा, कला |
| 4 | धनलक्ष्मी | दारिद्र्य नाश | आर्थिक सम्पन्नता |
| 5 | धान्यलक्ष्मी | धान्य (Grain) | कृषि, भोजन |
| 6 | मेधालक्ष्मी | प्रज्ञा (Intellect) | बुद्धि, विवेक |
| 7 | गजलक्ष्मी | अश्व, गोकुल (Livestock) | राजसी वैभव |
| 8 | वीरलक्ष्मी | वीर्य, बल (Strength) | साहस, धैर्य |
| 9 | जयलक्ष्मी | सर्वकार्य-जय (Victory) | सफलता |
| 10 | भाग्यलक्ष्मी | सौमाङ्गल्य (Good Fortune) | भाग्य उदय |
| 11 | कीर्तिलक्ष्मी | कीर्ति (Reputation) | समाज में सम्मान |
| 12 | आरोग्यलक्ष्मी | आयु, रोग नाश | उत्तम स्वास्थ्य |
| 13 | सिद्धलक्ष्मी | सिद्धि (Attainment) | आध्यात्मिक शक्ति |
| 14 | सौंदर्यलक्ष्मी | रूप (Beauty) | सौंदर्य, आकर्षण |
| 15 | साम्राज्यलक्ष्मी | भुक्ति-मुक्ति (Power & Liberation) | शासन, अधिकार |
| 16 | मंगल-लक्ष्मी | मांगल्य (Auspiciousness) | सर्वत्र शुभ होना |
दीपलक्ष्मी का महत्व
इस स्तोत्र का अंतिम श्लोक (18) विशेष रूप से 'दीपलक्ष्मी' (Deepa Lakshmi) को समर्पित है:
"शुभं भवतु कल्याणी आयुरारोग्यसम्पदाम् ।
मम शत्रुविनाशाय दीपलक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥"
यह श्लोक संध्या वंदन के समय दीपक जलाते हुए बोला जाता है। इसका अर्थ है - "हे कल्याणी! मेरा शुभ हो। मुझे आयु, आरोग्य और सम्पदा मिले। मेरे शत्रुओं (बाहरी और आंतरिक जैसे क्रोध, लोभ) का नाश हो। हे दीपक में वास करने वाली लक्ष्मी, आपको नमस्कार है।"
FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. मेधा लक्ष्मी (Medha Lakshmi) और विद्या लक्ष्मी में क्या अंतर है?
विद्या लक्ष्मी ज्ञान, शास्त्र और कला (Arts/Science) की देवी हैं। मेधा लक्ष्मी 'प्रज्ञा' (Intellect/Wisdom) की देवी हैं। विद्या सीखने से आती है, लेकिन मेधा उस विद्या को सही समय पर सही ढंग से उपयोग करने की क्षमता है।
2. साम्राज्य लक्ष्मी (Samrajya Lakshmi) का क्या अर्थ है?
यह रूप केवल राजाओं के लिए नहीं है। आधुनिक संदर्भ में, अपने कार्यक्षेत्र (Business/Career) में शीर्ष स्थान प्राप्त करना, नेतृत्व (Leadership) करना और समाज में प्रभाव रखना ही 'साम्राज्य' है। यह रूप 'भुक्ति' (भोग) और 'मुक्ति' (मोक्ष) दोनों देता है।
3. क्या 'सर्वमंगल मांगल्ये' श्लोक यहाँ दुर्गा जी के लिए नहीं है?
यह श्लोक मूलतः दुर्गा सप्तशती का है, लेकिन वैष्णव परंपरा में इसे 'नारायणी' (विष्णु शक्ति) के लिए प्रयुक्त किया जाता है। यहाँ लक्ष्मी जी को ही 'शिवे' (कल्याणकारी), 'त्र्यम्बके' (तीनों लोकों की माता) और 'शरण्ये' (शरण देने वाली) कहा गया है।
4. इस स्तुति के पाठ का सर्वोत्तम समय क्या है?
शुक्रवार की शाम को दीपक जलाते समय इसका पाठ सर्वोत्तम है। यह घर की दरिद्रता को दूर करता है और 'अखंड लक्ष्मी' (स्थिर धन) प्रदान करता है।