Sri Mahalakshmi Ashtottara Shatanamavali 2 – श्री महालक्ष्मी अष्टोत्तरशतनामावली २

॥ श्री महालक्ष्मी अष्टोत्तरशतनामावली (अर्चना हेतु) ॥
ओं शुद्धलक्ष्म्यै नमः ।
ओं बुद्धिलक्ष्म्यै नमः ।
ओं वरलक्ष्म्यै नमः ।
ओं सौभाग्यलक्ष्म्यै नमः ।
ओं वशोलक्ष्म्यै नमः ।
ओं काव्यलक्ष्म्यै नमः ।
ओं गानलक्ष्म्यै नमः ।
ओं शृङ्गारलक्ष्म्यै नमः ।
ओं धनलक्ष्म्यै नमः । ९
ओं धान्यलक्ष्म्यै नमः ।
ओं धरालक्ष्म्यै नमः ।
ओं अष्टैश्वर्यलक्ष्म्यै नमः ।
ओं गृहलक्ष्म्यै नमः ।
ओं ग्रामलक्ष्म्यै नमः ।
ओं राज्यलक्ष्म्यै नमः ।
ओं साम्राज्यलक्ष्म्यै नमः ।
ओं शान्तिलक्ष्म्यै नमः ।
ओं दान्तिलक्ष्म्यै नमः । १८
ओं क्षान्तिलक्ष्म्यै नमः ।
ओं आत्मानन्दलक्ष्म्यै नमः ।
ओं सत्यलक्ष्म्यै नमः ।
ओं दयालक्ष्म्यै नमः ।
ओं सौख्यलक्ष्म्यै नमः ।
ओं पातिव्रत्यलक्ष्म्यै नमः ।
ओं गजलक्ष्म्यै नमः ।
ओं राजलक्ष्म्यै नमः ।
ओं तेजोलक्ष्म्यै नमः । २७
ओं सर्वोत्कर्षलक्ष्म्यै नमः ।
ओं सत्त्वलक्ष्म्यै नमः ।
ओं तत्त्वलक्ष्म्यै नमः ।
ओं बोधलक्ष्म्यै नमः ।
ओं विज्ञानलक्ष्म्यै नमः ।
ओं स्थैर्यलक्ष्म्यै नमः ।
ओं वीर्यलक्ष्म्यै नमः ।
ओं धैर्यलक्ष्म्यै नमः ।
ओं औदार्यलक्ष्म्यै नमः । ३६
ओं सिद्धिलक्ष्म्यै नमः ।
ओं ऋद्धिलक्ष्म्यै नमः ।
ओं विद्यालक्ष्म्यै नमः ।
ओं कल्याणलक्ष्म्यै नमः ।
ओं कीर्तिलक्ष्म्यै नमः ।
ओं मूर्तिलक्ष्म्यै नमः ।
ओं वर्चोलक्ष्म्यै नमः ।
ओं अनन्तलक्ष्म्यै नमः ।
ओं जपलक्ष्म्यै नमः । ४५
ओं तपोलक्ष्म्यै नमः ।
ओं व्रतलक्ष्म्यै नमः ।
ओं वैराग्यलक्ष्म्यै नमः ।
ओं मन्त्रलक्ष्म्यै नमः ।
ओं तन्त्रलक्ष्म्यै नमः ।
ओं यन्त्रलक्ष्म्यै नमः ।
ओं गुरुकृपालक्ष्म्यै नमः ।
ओं सभालक्ष्म्यै नमः ।
ओं प्रभालक्ष्म्यै नमः । ५४
ओं कलालक्ष्म्यै नमः ।
ओं लावण्यलक्ष्म्यै नमः ।
ओं वेदलक्ष्म्यै नमः ।
ओं नादलक्ष्म्यै नमः ।
ओं शास्त्रलक्ष्म्यै नमः ।
ओं वेदान्तलक्ष्म्यै नमः ।
ओं क्षेत्रलक्ष्म्यै नमः ।
ओं तीर्थलक्ष्म्यै नमः ।
ओं वेदिलक्ष्म्यै नमः । ६३
ओं सन्तानलक्ष्म्यै नमः ।
ओं योगलक्ष्म्यै नमः ।
ओं भोगलक्ष्म्यै नमः ।
ओं यज्ञलक्ष्म्यै नमः ।
ओं क्षीरार्णवपुण्यलक्ष्म्यै नमः ।
ओं अन्नलक्ष्म्यै नमः ।
ओं मनोलक्ष्म्यै नमः ।
ओं प्रज्ञालक्ष्म्यै नमः ।
ओं विष्णुवक्षोभूषलक्ष्म्यै नमः । ७२
ओं धर्मलक्ष्म्यै नमः ।
ओं अर्थलक्ष्म्यै नमः ।
ओं कामलक्ष्म्यै नमः ।
ओं निर्वाणलक्ष्म्यै नमः ।
ओं पुण्यलक्ष्म्यै नमः ।
ओं क्षेमलक्ष्म्यै नमः ।
ओं श्रद्धालक्ष्म्यै नमः ।
ओं चैतन्यलक्ष्म्यै नमः ।
ओं भूलक्ष्म्यै नमः । ८१
ओं भुवर्लक्ष्म्यै नमः ।
ओं सुवर्लक्ष्म्यै नमः ।
ओं त्रैलोक्यलक्ष्म्यै नमः ।
ओं महालक्ष्म्यै नमः ।
ओं जनलक्ष्म्यै नमः ।
ओं तपोलक्ष्म्यै नमः ।
ओं सत्यलोकलक्ष्म्यै नमः ।
ओं भावलक्ष्म्यै नमः ।
ओं वृद्धिलक्ष्म्यै नमः । ९०
ओं भव्यलक्ष्म्यै नमः ।
ओं वैकुण्ठलक्ष्म्यै नमः ।
ओं नित्यलक्ष्म्यै नमः ।
ओं सत्यलक्ष्म्यै नमः ।
ओं वंशलक्ष्म्यै नमः ।
ओं कैलासलक्ष्म्यै नमः ।
ओं प्रकृतिलक्ष्म्यै नमः ।
ओं श्रीलक्ष्म्यै नमः ।
ओं स्वस्तिलक्ष्म्यै नमः । ९९
ओं गोलोकलक्ष्म्यै नमः ।
ओं शक्तिलक्ष्म्यै नमः ।
ओं भक्तिलक्ष्म्यै नमः ।
ओं मुक्तिलक्ष्म्यै नमः ।
ओं त्रिमूर्तिलक्ष्म्यै नमः ।
ओं चक्रराजलक्ष्म्यै नमः ।
ओं आदिलक्ष्म्यै नमः ।
ओं ब्रह्मानन्दलक्ष्म्यै नमः ।
ओं श्रीमहालक्ष्म्यै नमः । १०८
॥ इति श्री महालक्ष्मी अष्टोत्तरशतनामावली (२) सम्पूर्णा ॥
महालक्ष्मी अन्य पाठ
नामावली संस्करण 2 की विशेषता
महालक्ष्मी की यह नामावली अत्यंत दुर्लभ और विशिष्ट है। इसमें देवी को केवल धन की देवी ही नहीं, बल्कि शुद्ध, बुद्धि, वर, सौभाग्य और शृंगार की देवी के रूप में पूजा गया है। यह जीवन के सूक्ष्म और स्थूल दोनों पहलुओं को स्पर्श करती है।
यह नामावली 'ओं शुद्धलक्ष्म्यै नमः' से प्रारंभ होती है, जो यह संदेश देती है कि सच्ची समृद्धि (लक्ष्मी) की नींव 'शुद्धता' पर टिकी है।
अर्चना का महत्व और विधि
नामावली का मुख्य उपयोग 'अर्चना' (Archana) में होता है। यह स्तोत्र (Hymn) से भिन्न है क्योंकि इसमें हर एक नाम एक मंत्र है।
विधि: स्नान आदि से निवृत्त होकर, एक थाली में लाल पुष्प या कुमकुम रखें। एक-एक नाम का स्पष्ट उच्चारण करें और अंत में माँ के चित्र या यंत्र पर पुष्प/कुमकुम छोड़ें। यह क्रिया 108 बार दोहराने से वातावरण पूरी तरह दिव्य और सकारात्मक हो जाता है।
नामावली पाठ के लाभ
- ➤सर्वोत्कर्ष (All-round Success): नाम 37 'सर्वोत्कर्षलक्ष्म्यै' की ऊर्जा से साधक को अपने कार्यक्षेत्र में सर्वोच्च शिखर प्राप्त होता है।
- ➤ऋद्धि-सिद्धि: नाम 47-48 'सिद्धिलक्ष्म्यै' और 'ऋद्धिलक्ष्म्यै' साधक को भौतिक विलासिता और आत्मिक शक्ति का संतुलन प्रदान करते हैं।
- ➤गृह शांति: 'गृहलक्ष्म्यै' और 'शान्तिलक्ष्म्यै' नाम से घर के कलह समाप्त होते हैं और शांति का वास होता है।
प्रश्नोत्तरी (FAQ)
- यह नामावली अन्य संस्करणों से कैसे अलग है?
इस संस्करण की विशेषता इसके विशिष्ट नाम हैं। इसमें लक्ष्मी जी के 'शुद्ध', 'बुद्धि', 'वर', 'सौभाग्य' जैसे विभिन्न स्वरूपों का क्रमबद्ध वर्णन है, जो अन्य सूचियों में दुर्लभ है।
- अर्चना (Archana) कैसे करनी चाहिए?
अर्चना के लिए ताजे लाल फूल (गुलाब/कमल) या कुमकुम लें। प्रत्येक नाम के अंत में 'नमः' बोलते हुए माँ के चरणों में एक फूल या चुटकी भर कुमकुम अर्पित करें।
- 'सर्वोत्कर्ष लक्ष्मी' का क्या अर्थ है?
नाम संख्या 37 'ओं सर्वोत्कर्षलक्ष्म्यै नमः' का अर्थ है, वह देवी जो जीवन के हर क्षेत्र (धन, ज्ञान, स्वास्थ्य) में 'उत्कर्ष' (ऊँचाई/सफलता) प्रदान करती हैं।
- क्या पुरुष भी कुमकुम अर्चना कर सकते हैं?
हाँ, भक्ति में लिंग का भेद नहीं है। पुरुष भी कुमकुम, अक्षत (चावल) या पुष्प से अर्चना कर सकते हैं। कुमकुम अर्चना विशेष रूप से श्रीयंत्र या लक्ष्मी विग्रह पर की जाती है।
- शुक्रवार की पूजा में इसका क्या महत्व है?
शुक्रवार माँ लक्ष्मी का दिन है। इस दिन 108 नामों से अर्चना करने से घर में स्थाई लक्ष्मी का वास होता है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।
- 'गजलक्ष्मी' नाम का क्या महत्व है?
नाम संख्या 33 'ओं गजलक्ष्म्यै नमः' शक्ति और राजसी ठाठ का प्रतीक है। गजलक्ष्मी वह स्वरूप है जहाँ दोनों ओर हाथी सुवर्ण कलश से उनका अभिषेक करते हैं।
- क्या इसे बिना सामग्री के केवल पढ़ा जा सकता है?
जी हाँ, इसे 'नाम-जप' की तरह भी पढ़ा जा सकता है। सामग्री (पुष्प/कुमकुम) न होने पर भी केवल श्रद्धापूर्वक पाठ करना पूर्ण फलदायी है।
- 'सिद्धि लक्ष्मी' और 'ऋद्धि लक्ष्मी' कौन हैं?
नाम 47 और 48 दर्शाते हैं कि माँ लक्ष्मी केवल धन ही नहीं, बल्कि 'सिद्धि' (आध्यात्मिक शक्ति) और 'ऋद्धि' (समृद्धि/वैभव) दोनों की स्वामिनी हैं।
- इस नामावली के अंत में 'श्री महालक्ष्म्यै नमः' क्यों है?
108वाँ नाम 'श्रीमहालक्ष्म्यै नमः' एक पूर्णता सूचक है, जो पिछले सभी 107 नामों की शक्तियों को एक ही 'महा-स्वरूप' में समाहित करता है।
- सर्वश्रेष्ठ फल प्राप्ति के लिए किस समय पाठ करें?
गोधूलि वेला (सूर्यास्त का समय) या प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में स्नान के बाद, स्वच्छ वस्त्र धारण कर, दीपक जलाकर इसका पाठ/अर्चना करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।