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Sri Mahalakshmi Stava (Narayana Krutam) – श्री महालक्ष्मी स्तव

Sri Mahalakshmi Stava (Narayana Krutam) – श्री महालक्ष्मी स्तव
॥ श्री महालक्ष्मी स्तवः ॥ ॥ श्रीब्रह्मवैवर्तमहापुराणे गणपतिखण्डे द्वाविंशोऽध्याये ॥ नारायण उवाच । देवि त्वां स्तोतुमिच्छामि न क्षमाः स्तोतुमीश्वराः । बुद्धेरगोचरां सूक्ष्मां तेजोरूपां सनातनीम् । अत्यनिर्वचनीयां च को वा निर्वक्तुमीश्वरः ॥ १ ॥ स्वेच्छामयीं निराकारां भक्तानुग्रहविग्रहाम् । स्तौमि वाङ्मनसोः पारां किं वाऽहं जगदम्बिके ॥ २ ॥ परां चतुर्णां वेदानां पारबीजं भवार्णवे । सर्वसस्याऽधिदेवीं च सर्वासामपि सम्पदाम् ॥ ३ ॥ योगिनां चैव योगानां ज्ञानानां ज्ञानिनां तथा । वेदानां वै वेदविदां जननीं वर्णयामि किम् ॥ ४ ॥ यया विना जगत्सर्वमबीजं निष्फलं ध्रुवम् । यथा स्तनन्धयानां च विना मात्रा सुखं भवेत् ॥ ५ ॥ प्रसीद जगतां माता रक्षास्मानतिकातरान् । वयं त्वच्चरणाम्भोजे प्रपन्नाः शरणं गताः ॥ ६ ॥ नमः शक्तिस्वरूपायै जगन्मात्रे नमो नमः । ज्ञानदायै बुद्धिदायै सर्वदायै नमो नमः ॥ ७ ॥ हरिभक्तिप्रदायिन्यै मुक्तिदायै नमो नमः । सर्वज्ञायै सर्वदायै महालक्ष्म्यै नमो नमः ॥ ८ ॥ कुपुत्राः कुत्रचित्सन्ति न कुत्राऽपि कुमातरः । कुत्र माता पुत्रदोषं तं विहाय च गच्छति ॥ ९ ॥ स्तनन्धयेभ्य इव मे हे मातर्देहि दर्शनम् । कृपां कुरु कृपासिन्धो त्वमस्मान्भक्तवत्सले ॥ १० ॥ ॥ फलश्रुति ॥ इत्येवं कथितं वत्स पद्मायाश्च शुभावहम् । सुखदं मोक्षदं सारं शुभदं सम्पदः प्रदम् ॥ ११ ॥ इदं स्तोत्रं महापुण्यं पूजाकाले च यः पठेत् । महालक्ष्मीर्गृहं तस्य न जहाति कदाचन ॥ १२ ॥ ॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्तमहापुराणे गणपतिखण्डे द्वाविंशोऽध्याये नारदनारायणसंवादे श्री लक्ष्मी स्तवः ॥

स्तोत्र परिचय

ग्रंथब्रह्मवैवर्त महापुराण (गणपति खण्ड)
वक्ताभगवान् नारायण (विष्णु)
श्रोतादेवर्षि नारद (कथा संदर्भ में)
अध्याय22 (द्वाविंशोध्यायः)
मुख्य भावक्षमा याचना और वात्सल्य (Forgiveness & Motherly Love)
प्रसिद्ध श्लोककुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति (Verse 9)

श्लोक विश्लेषण: 'कुपुत्रो जायेत...'

यह स्तोत्र का 9वां श्लोक भारतीय संस्कृति का सबसे प्रसिद्ध मातृ-वंदना श्लोक है:

"कुपुत्राः कुत्रचित्सन्ति न कुत्राऽपि कुमातरः ।
कुत्र माता पुत्रदोषं तं विहाय च गच्छति ॥"

अर्थ: इस संसार में कई 'कुपुत्र' (बुरे पुत्र) हो सकते हैं जो माता की सेवा न करें या अवज्ञा करें, लेकिन 'कुमाता' (बुरी माता) कहीं नहीं होती। माता कभी अपने पुत्र के दोषों को देखकर उसे त्यागती नहीं है।
भावार्थ: भगवान नारायण यहाँ एक भक्त के रूप में माँ लक्ष्मी से कह रहे हैं - "हे माँ! हम जीव (संतान) अज्ञानी हैं, हमसे गलतियां (पाप) होना स्वाभाविक है। हम कुपुत्र हो सकते हैं, पर आप तो जगत-जननी हैं। आप हमारे दोषों को क्षमा करें, क्योंकि माँ अपने बच्चे को कभी नहीं छोड़ती।" यह श्लोक क्षमा प्राप्ति का महामंत्र है।

नारायण द्वारा लक्ष्मी स्तुति का रहस्य

अक्सर प्रश्न उठता है कि "शक्तिमान" (विष्णु) अपनी ही "शक्ति" (लक्ष्मी) की स्तुति क्यों कर रहे हैं? इसके दार्शनिक कारण हैं:
  • शक्ति की महत्ता: श्लोक 5 में नारायण कहते हैं - "यया विना जगत्सर्वमबीजं निष्फलं ध्रुवम्"। अर्थार्थ, आपके (शक्ति) बिना यह पूरा संसार बीजरहित और निष्फल है। शिव 'शक्ति' के बिना 'शव' हैं, वैसे ही नारायण 'लक्ष्मी' के बिना कार्य नहीं कर सकते।
  • मातृ भाव: नारायण यहाँ 'पति' रूप में नहीं, बल्कि समस्त जीवों के प्रतिनिधि बनकर 'पुत्र' भाव से प्रार्थना कर रहे हैं (श्लोक 10 - "स्तनन्धयेभ्य इव मे हे मातर्देहि दर्शनम्" - जैसे एक दुधमुंहा बच्चा माँ को पुकारता है)।
  • लीला: भगवान स्वयं आचरण करके सिखाते हैं कि गृहस्थ में नारी (शक्ति) का सम्मान और आदर कितना आवश्यक है।

फलश्रुति (Benefits)

श्लोक 11 और 12 में पाठ के लाभ बताए गए हैं:
लाभविवरण
स्थिर लक्ष्मी"महालक्ष्मीर्गृहं तस्य न जहाति कदाचन" - महालक्ष्मी उसके घर को कभी नहीं छोड़तीं, यानी धन हमेशा स्थिर रहता है।
सुख और मोक्षयह पाठ केवल सांसारिक 'सुख' ही नहीं, बल्कि परम 'मोक्ष' भी प्रदान करता है (श्लोक 11)।
हरि भक्तिश्लोक 8 में उन्हें "हरिभक्तिप्रदायिनी" कहा गया है। लक्ष्मी की कृपा से ही भगवान विष्णु की शुद्ध भक्ति प्राप्त होती है।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. 'देवि क्षमापन स्तोत्र' (Devi Aparadha Kshamapana) और इसमें क्या अंतर है?

'देवि अपराध क्षमापन स्तोत्र' आदि शंकराचार्य द्वारा रचित है और वह सामान्यतः माँ दुर्गा/काली के लिए पढ़ा जाता है (वहाँ भी 'कुपुत्रो जायेत...' श्लोक आता है)। यह 'श्री महालक्ष्मी स्तव' भगवान नारायण द्वारा रचित है और विशेषतः माँ लक्ष्मी (विष्णु पत्नी) को समर्पित है। दोनों में एक ही भाव है, पर इष्ट भिन्न हैं।

2. क्या इस स्तोत्र का पाठ रोज कर सकते हैं?

जी हाँ, यह बहुत छोटा (केवल 12 श्लोक) और सरल स्तोत्र है। इसे अपनी दैनिक पूजा के अंत में 'क्षमा प्रार्थना' के रूप में सम्मिलित करना सर्वोत्तम है। इससे पूजा में हुई कोई भी त्रुटि क्षमा हो जाती है।

3. 'स्तनन्धयेभ्य इव' का क्या अर्थ है?

श्लोक 10 में 'स्तनन्धय' का अर्थ है 'स्तनपान करने वाला शिशु'। जैसे एक छोटा बच्चा भूख लगने पर केवल माँ को देखता है और रोता है, वैसे ही भक्त भगवान से कह रहा है - "मैं अबोध बालक हूँ, मुझे दर्शन दो।" यह पूर्ण समर्पण (Surrender) का भाव है।

4. ब्रह्मवैवर्त पुराण का क्या महत्व है?

ब्रह्मवैवर्त पुराण में प्रकृति (शक्ति) और पुरुष (कृष्ण/विष्णु) के भेद-रहित संबंधों का वर्णन है। इसमें लक्ष्मी, राधा, दुर्गा, सावित्री और सरस्वती - इन पांच प्रकृतियों की उपासना बताई गई है। यह स्तव उसी परंपरा का हिस्सा है।

5. क्या यह कर्ज मुक्ति में सहायक है?

प्रत्यक्ष रूप से इसमें 'ऋण' शब्द नहीं है, परंतु श्लोक 11 में इसे 'सम्पदः प्रदम्' (सम्पत्ति देने वाला) कहा गया है। लक्ष्मी की कृपा और स्थिरता से स्वतः ही आर्थिक समस्याएं और कर्ज दूर हो जाते हैं।

6. 'बुद्धेरगोचरां' का क्या अर्थ है?

श्लोक 1 में माँ को 'बुद्धेरगोचरां' कहा गया है। इसका अर्थ है जो 'बुद्धि से परे' हैं। मानव बुद्धि सीमित है और ईश्वरीय शक्ति असीमित है, इसलिए उन्हें केवल तर्क से नहीं, बल्कि 'भाव' और 'भक्ति' से ही जाना जा सकता है।