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Sri Mahalakshmi Chaturvimsati Nama Stotram – श्री महालक्ष्मी चतुर्विंशतिनाम स्तोत्रम्

Sri Mahalakshmi Chaturvimsati Nama Stotram – श्री महालक्ष्मी चतुर्विंशतिनाम स्तोत्रम्
॥ श्री महालक्ष्मी चतुर्विंशतिनाम स्तोत्रम् (वराह पुराण) ॥ देवा ऊचुः । नमः श्रियै लोकधात्र्यै ब्रह्ममात्रे नमो नमः । नमस्ते पद्मनेत्रायै पद्ममुख्यै नमो नमः ॥ १ ॥ प्रसन्नमुखपद्मायै पद्मकान्त्यै नमो नमः । नमो बिल्ववनस्थायै विष्णुपत्न्यै नमो नमः ॥ २ ॥ विचित्रक्षौमधारिण्यै पृथुश्रोण्यै नमो नमः । पक्वबिल्वफलापीनतुङ्गस्तन्यै नमो नमः ॥ ३ ॥ सुरक्तपद्मपत्राभकरपादतले शुभे । सुरत्नाङ्गदकेयूरकाञ्चीनूपुरशोभिते । यक्षकर्दमसंलिप्तसर्वाङ्गे कटकोज्ज्वले ॥ ४ ॥ माङ्गल्याभरणैश्चित्रैर्मुक्ताहारैर्विभूषिते । ताटङ्कैरवतंसैश्च शोभमानमुखाम्बुजे ॥ ५ ॥ पद्महस्ते नमस्तुभ्यं प्रसीद हरिवल्लभे । ऋग्यजुस्सामरूपायै विद्यायै ते नमो नमः ॥ ६ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ प्रसीदास्मान् कृपादृष्टिपातैरालोकयाब्धिजे । ये दृष्टास्ते त्वया ब्रह्मरुद्रेन्द्रत्वं समाप्नुयुः ॥ ७ ॥ ॥ इति श्रीवराहपुराणे श्रीवेङ्कटाचलमाहात्म्ये श्री महालक्ष्मी चतुर्विंशतिनामस्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

वराह पुराण और वेंक्टाचल (तिरुपति)

यह स्तोत्र वराह पुराण के 'वेंक्टाचल महात्म्य' से लिया गया है। यह वही पावन भूमि है जहाँ आज भगवान तिरुपति बालाजी विराजमान हैं।

देवताओं ने इसी स्थान पर माँ लक्ष्मी की स्तुति 24 विशेष नामों (चतुर्विंशति नाम) से की थी। यह स्तोत्र छोटा होते हुए भी वेदों के सार (ऋग-यजु-साम रूपायै) को समेटे हुए है।

24 सिद्ध नामों का रहस्य

ये 24 नाम सामान्य नहीं हैं। इनमें माँ का 'बिल्ववनस्थायै' (बिल्व वन में रहने वाली) रूप और 'विचित्रक्षौमधारिण्यै' (विचित्र रेशमी वस्त्र पहनने वाली) रूप वर्णित है, जो अन्यत्र दुर्लभ है।

यह स्तोत्र लक्ष्मी जी के सौंदर्य, ऐश्वर्य और ज्ञान (विद्या) तीनों का अद्भुत संगम है।

ब्रह्मा, रुद्र और इंद्र जैसा ऐश्वर्य

  • सर्वोच्च पद: श्लोक 7 में स्पष्ट वचन है - "ये दृष्टास्ते त्वया ब्रह्मरुद्रेन्द्रत्वं समाप्नुयुः"। अर्थात, जिस पर आपकी दृष्टि पड़ जाए, वह ब्रह्मा, शिव या इंद्र का पद भी प्राप्त कर सकता है।
  • विद्या और ज्ञान: माँ को 'ऋग्यजुस्सामरूपायै' (तीनों वेद) और 'विद्या' कहा गया है, जो साधक को अज्ञान से मुक्त कर परम ज्ञान देता है।

प्रश्नोत्तरी (FAQ)

  1. यह स्तोत्र किस पुराण से लिया गया है?

यह स्तोत्र 'श्री वराह पुराण' (Sri Varaha Purana) के 'श्री वेंक्टाचल महात्म्य' (Sri Venkatachala Mahatmya) खंड के 9वें अध्याय से लिया गया है।

  1. चतुर्विंशति (Chaturvimsati) का क्या अर्थ है?

संस्कृत में 'चतुर्विंशति' का अर्थ है '24'। इस स्तोत्र में माँ लक्ष्मी के 24 अत्यंत शक्तिशाली और सिद्ध नामों का संग्रह है जो वेदों के सार समान हैं।

  1. इसके पाठ का मुख्य फल क्या है?

श्लोक 7 के अनुसार, जिन पर माँ की कृपादृष्टि पड़ती है, वे 'ब्रह्म-रुद्र-इन्द्र' के समान पद और वैभव प्राप्त कर लेते हैं। यह परम ऐश्वर्य देने वाला है।

  1. 'बिल्ववनस्थायै' नाम का क्या महत्व है?

श्लोक 2 में माँ को 'बिल्ववनस्थायै' (बिल्व वन में निवास करने वाली) कहा गया है। बिल्व वृक्ष भगवान शिव और लक्ष्मी दोनों को प्रिय है, जो मोक्ष और समृद्धि का प्रतीक है।

  1. इस स्तोत्र में 'विचित्रक्षौमधारिण्यै' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है 'अद्भुत रेशमी वस्त्र धारण करने वाली'। यह माँ के राजसी और दिव्य सौंदर्य का वर्णन करता है जो भक्तों को आकर्षित करता है।

  1. किस समय इसका पाठ करना चाहिए?

चूंकि यह लघु स्तोत्र है, इसे प्रतिदिन सुबह पूजा के समय या शाम को दीपक जलाते समय पढ़ना अत्यंत शुभ है। विशेष रूप से शुक्रवार को 24 बार पाठ करना फलदायी है।

  1. 'ऋग्यजुस्सामरूपायै' का क्या तात्पर्य है?

श्लोक 6 में माँ को ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद का साक्षात स्वरूप ('विद्या') कहा गया है। यह दर्शाता है कि लक्ष्मी केवल धन ही नहीं, बल्कि परम ज्ञान भी हैं।

  1. क्या इसके साथ कोई और पाठ करना चाहिए?

इसके साथ 'श्री सूक्त' (Sri Suktam) या 'महालक्ष्मी अष्टकम' का पाठ करना सोने पर सुहागा जैसा है। यह शीघ्र फल प्रदान करता है।

  1. वेंक्टाचल महात्म्य से इसका क्या संबंध है?

यह स्तोत्र तिरुपति बालाजी (वेंक्टाचल) के पावन स्थल पर देवताओं द्वारा गाया गया था, इसलिए इसका संबंध भगवान वेंकटेश्वर की कृपा से भी है।

  1. क्या इसे धन प्राप्ति के लिए पढ़ा जा सकता है?

अवश्य। इसमें माँ को 'लोकधात्री' (विश्व का भरण-पोषण करने वाली) और 'वसुवृष्टि' (धन की वर्षा करने वाली) कहा गया है, जो आर्थिक संकट दूर करने में समर्थ है।