Logoपवित्र ग्रंथ

Sri Lakshmi Ashtottara Shatanama Stotram 3 – श्री लक्ष्म्यष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ३

Sri Lakshmi Ashtottara Shatanama Stotram 3 – श्री लक्ष्म्यष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ३
॥ श्री लक्ष्म्यष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥ ब्रह्मज्ञा ब्रह्मसुखदा ब्रह्मण्या ब्रह्मरूपिणी । सुमतिः सुभगा सुन्दा प्रयतिर्नियतिर्यतिः ॥ १ ॥ सर्वप्राणस्वरूपा च सर्वेन्द्रियसुखप्रदा । संविन्मयी सदाचारा सदातुष्टा सदानता ॥ २ ॥ कौमुदी कुमुदानन्दा कुः कुत्सिततमोहरी । हृदयार्तिहरी हारशोभिनी हानिवारिणी ॥ ३ ॥ सम्भाज्या संविभज्याऽऽज्ञा ज्यायसी जनिहारिणी । महाक्रोधा महातर्षा महर्षिजनसेविता ॥ ४ ॥ कैटभारिप्रिया कीर्तिः कीर्तिता कैतवोज्झिता । कौमुदी शीतलमनाः कौसल्यासुतभामिनी ॥ ५ ॥ कासारनाभिः का ता याऽऽप्येषेयत्ताविवर्जिता । [सा] अन्तिकस्थाऽतिदूरस्था हृदयस्थाऽम्बुजस्थिता ॥ ६ ॥ मुनिचित्तस्थिता मौनिगम्या मान्धातृपूजिता । मतिस्थिरीकर्तृकार्यनित्यनिर्वहणोत्सुका ॥ ७ ॥ महीस्थिता च मध्यस्था द्युस्थिताऽधःस्थितोर्ध्वगा । भूतिर्विभूतिः सुरभिः सुरसिद्धार्तिहारिणी ॥ ८ ॥ अतिभोगाऽतिदानाऽतिरूपाऽतिकरुणाऽतिभाः । विज्वरा वियदाभोगा वितन्द्रा विरहासहा ॥ ९ ॥ शूर्पकारातिजननी शून्यदोषा शुचिप्रिया । निःस्पृहा सस्पृहा नीलासपत्नी निधिदायिनी ॥ १० ॥ कुम्भस्तनी कुन्दरदा कुङ्कुमालेपिता कुजा । शास्त्रज्ञा शास्त्रजननी शास्त्रज्ञेया शरीरगा ॥ ११ ॥ सत्यभाः सत्यसङ्कल्पा सत्यकामा सरोजिनी । चन्द्रप्रिया चन्द्रगता चन्द्रा चन्द्रसहोदरी ॥ १२ ॥ औदर्यौपयिकी प्रीता गीता चौता गिरिस्थिता । अनन्विताऽप्यमूलार्तिध्वान्तपुञ्जरविप्रभा ॥ १३ ॥ मङ्गला मङ्गलपरा मृग्या मङ्गलदेवता । कोमला च महालक्ष्मीः नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ॥ १४ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ सर्वपापक्षयकरं सर्वशत्रुविनाशनम् । दारिद्र्यध्वंसनकरं पराभवनिवर्तकम् ॥ १५ ॥ शतसंवत्सरं विंशत्युत्तरं जीवितं भवेत् । मङ्गलानि तनोत्येषा श्रीविद्यामङ्गला शुभा ॥ १६ ॥ ॥ इति नारदीयोपपुराणान्तर्गतं श्री लक्ष्म्यष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥

श्री लक्ष्मी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र ३: नारदीय पुराण रहस्य

नारदीय उपपुराण से उद्धृत यह श्री लक्ष्मी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र ३, धन लक्ष्मी के अन्य स्तोत्रों से भिन्न है। जहाँ अन्य पाठ केवल भौतिक समृद्धि पर केंद्रित होते हैं, वहीं यह पाठ 'ब्रह्म-ज्ञान' (आत्मज्ञान) और 'मोक्ष' का भी मार्ग प्रशस्त करता है।

इस स्तोत्र में माँ लक्ष्मी को 'सुमति', 'सत्यभा' और 'सत्यसङ्कल्पा' कहा गया है। यह दर्शाता है कि सच्ची समृद्धि केवल धन संचय में नहीं, बल्कि सद्बुद्धि और सत्य के मार्ग पर चलने में है। जो साधक इस भाव से पाठ करता है, उसे लक्ष्मी जी कभी त्यागती नहीं हैं।

आध्यात्मिक और भौतिक महत्व

ज्ञान और बुद्धि: पहले श्लोक में ही देवी को 'ब्रह्मज्ञा' कहा गया है। यह स्तोत्र छात्रों, लेखकों और बुद्धिजीवियों के लिए वरदान समान है, क्योंकि यह तीक्ष्ण बुद्धि प्रदान करता है।

दुःख निवारण: श्लोक 3 में उन्हें 'हृदयार्तिहरी' (हृदय की पीड़ा हरने वाली) कहा गया है। यह भावनात्मक कष्टों, अवसाद (Depression) और मानसिक तनाव को दूर करने में अचूक है।

स्तोत्र पाठ के अद्भुत लाभ

  • दीर्घायु (Long Life): श्लोक 16 के अनुसार, "शतसंवत्सरं विंशत्युत्तरं जीवितं भवेत्" - साधक को 100 + 20 = 120 वर्ष की पूर्ण आयु प्राप्त होती है। यह अकाल मृत्यु के भय को नष्ट करता है।
  • पराभव निवर्तक: यह पाठ शत्रुओं द्वारा किए गए अपमान और हार (Defeat) को विजय में बदल देता है।
  • दरिद्रता नाश: यह जन्म-जन्मांतर की गरीबी को मिटाकर घर को धन-धान्य से भर देता है।
  • सर्वपाप क्षय: यह पूर्व जन्मों के पापों का नाश कर जीवन को शुद्ध और पवित्र बनाता है।

पाठ विधि और नियम

नारदीय परंपरा के अनुसार इस स्तोत्र की विधि इस प्रकार है:
  1. आसन: श्वेत (सफेद) या पीला आसन बिछाएं। यह सात्विकता का प्रतीक है।
  2. समय: ब्रह्म मुहूर्त (4:00 AM - 6:00 AM) सर्वश्रेष्ठ है। अन्यथा संध्या वंदन के समय पाठ करें।
  3. भोग: माँ को दूध से बनी मिठाई या केवल मिश्री का भोग लगाएं।
  4. संख्या: किसी विशेष कामना के लिए 41 दिनों तक प्रतिदिन 3 बार पाठ करें। सामान्य नित्य पूजा में 1 बार पाठ पर्याप्त है।

प्रश्नोत्तरी (FAQ)

  1. यह अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र अन्य स्तोत्रों से कैसे भिन्न है?

यह स्तोत्र नारदीय उपपुराण से है और इसमें लक्ष्मी को 'ब्रह्मज्ञा' (ब्रह्म को जानने वाली) कहा गया है। यह भौतिक सुख के साथ-साथ आध्यात्मिक ज्ञान और मोक्ष भी देता है, जो अन्य धन-प्रधान स्तोत्रों में दुर्लभ है।

  1. इस स्तोत्र के पाठ का विशेष फल क्या है?

इसकी फलश्रुति (श्लोक 16) में स्पष्ट कहा गया है कि साधक को 'शतसंवत्सरं विंशत्युत्तरं' यानी 120 वर्ष की पूर्ण आयु और आरोग्य प्राप्त होता है। यह स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए अद्वितीय है।

  1. क्या यह स्तोत्र दरिद्रता मिटा सकता है?

जी हाँ, श्लोक 15 में इसे 'दारिद्र्यध्वंसनकरं' कहा गया है। यह हर प्रकार की दरिद्रता, ऋण और दुर्भाग्य को नष्ट करने में सक्षम है।

  1. नारदीय पुराण के अनुसार पाठ का सर्वोत्तम समय क्या है?

ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व) इस पाठ के लिए सर्वोत्तम है क्योंकि यह ज्ञान और शांति प्रदान करता है। शुक्रवार को इसका विशेष पूजन करें।

  1. क्या विद्यार्थी (Students) यह पाठ कर सकते हैं?

अवश्य। 'सुमतिः', 'शास्त्रज्ञा' और 'विद्या' जैसे नामों के कारण यह बुद्धि, एकाग्रता और स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए विद्यार्थियों के लिए अत्यंत लाभकारी है।

  1. क्या पाठ के लिए किसी विशेष माला की आवश्यकता है?

स्तोत्र पाठ के लिए माला अनिवार्य नहीं है। यदि आप नामावली जाप करते हैं, तो स्फटिक (Sphatik) या कमल गट्टे की माला का प्रयोग करें।

  1. क्या यह स्तोत्र शत्रुओं से रक्षा करता है?

हाँ, श्लोक 15 में इसे 'सर्वशत्रुविनाशनम्' कहा गया है। यह गुप्त और प्रकट शत्रुओं का नाश कर साधक को निर्भय बनाता है।

  1. श्लोक 16 में 'श्रीविद्यामङ्गला' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है कि माँ लक्ष्मी ही श्रीविद्या (त्रिपुर सुंदरी) रूपी मंगलकारी शक्ति हैं। यह शाक्त परंपरा से इसके गहरे जुड़ाव को दर्शाता है।

  1. कितने दिनों में इसका प्रभाव दिखता है?

पूर्ण श्रद्धा से 21 दिन तक नित्य पाठ करने से सकारात्मक बदलाव अनुभव होने लगते हैं। मानसिक शांति और सकारात्मकता तुरंत मिलती है।

  1. पाठ के अंत में क्या करना चाहिए?

पाठ के अंत में क्षमा प्रार्थना करें और 'ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद...' मंत्र का 11 बार जाप करें या माँ की आरती उतारें।