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Agastya Kruta Sri Lakshmi Stotram – श्री लक्ष्मी स्तोत्रम् (अगस्त्य कृतम्)

Agastya Kruta Sri Lakshmi Stotram – श्री लक्ष्मी स्तोत्रम् (अगस्त्य कृतम्)
॥ श्री लक्ष्मी स्तोत्रम् (अगस्त्य कृतम्) ॥ जय पद्मपलाशाक्षि जय त्वं श्रीपतिप्रिये । जय मातर्महालक्ष्मि संसारार्णवतारिणि ॥ १ ॥ महालक्ष्मि नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं सुरेश्वरि । हरिप्रिये नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं दयानिधे ॥ २ ॥ पद्मालये नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं च सर्वदे । सर्वभूतहितार्थाय वसुवृष्टिं सदा कुरु ॥ ३ ॥ जगन्मातर्नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं दयानिधे । दयावति नमस्तुभ्यं विश्वेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥ ४ ॥ नमः क्षीरार्णवसुते नमस्त्रैलोक्यधारिणि । वसुवृष्टे नमस्तुभ्यं रक्ष मां शरणागतम् ॥ ५ ॥ रक्ष त्वं देवदेवेशि देवदेवस्य वल्लभे । दारिद्र्यात्त्राहि मां लक्ष्मि कृपां कुरु ममोपरि ॥ ६ ॥ नमस्त्रैलोक्यजननि नमस्त्रैलोक्यपावनि । ब्रह्मादयो नमन्ति त्वां जगदानन्ददायिनि ॥ ७ ॥ विष्णुप्रिये नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं जगद्धिते । आर्तिहन्त्रि नमस्तुभ्यं समृद्धिं कुरु मे सदा ॥ ८ ॥ अब्जवासे नमस्तुभ्यं चपलायै नमो नमः । चञ्चलायै नमस्तुभ्यं ललितायै नमो नमः ॥ ९ ॥ नमः प्रद्युम्नजननि मातस्तुभ्यं नमो नमः । परिपालय मां मातः मां तुभ्यं शरणागतम् ॥ १० ॥ शरण्ये त्वां प्रपन्नोऽस्मि कमले कमलालये । त्राहि त्राहि महालक्ष्मि परित्राणपरायणे ॥ ११ ॥ पाण्डित्यं शोभते नैव न शोभन्ते गुणा नरे । शीलत्वं नैव शोभेत महालक्ष्मि त्वया विना ॥ १२ ॥ तावद्विराजते रूपं तावच्छीलं विराजते । तावद्गुणा नराणां च यावल्लक्ष्मीः प्रसीदति ॥ १३ ॥ लक्ष्मि त्वयाऽलङ्कृतमानवा ये पापैर्विमुक्ता नृपलोकमान्याः । गुणैर्विहीना गुणिनो भवन्ति दुश्शीलिनः शीलवतां वरिष्ठाः ॥ १४ ॥ लक्ष्मीर्भूषयते रूपं लक्ष्मीर्भूषयते कुलम् । लक्ष्मीर्भूषयते विद्यां सर्वा लक्ष्मीर्विशिष्यते ॥ १५ ॥ लक्ष्मी त्वद्गुणकीर्तनेन कमला भूर्यात्यलं जिह्मताम् रुद्राद्या रविचन्द्रदेवपतयो वक्तुं च नैव क्षमाः । अस्माभिस्तव रूपलक्षणगुणान्वक्तुं कथं शक्यते मातर्मां परिपाहि विश्वजननी कृत्वा ममेष्टं ध्रुवम् ॥ १६ ॥ दीनार्तिभीतं भवतापपीडितं धनैर्विहीनं तव पार्श्वमागतम् । कृपानिधित्वान्मम लक्ष्मि सत्वरं धनप्रदानाद्धननायकं कुरु ॥ १७ ॥ मां विलोक्य जननी हरिप्रिये निर्धनं तव समीपमागतम् । देहि मे झटिति लक्ष्मि कराग्रं वस्त्रकाञ्चनवरान्नमद्भुतम् ॥ १८ ॥ त्वमेव जननी लक्ष्मीः पिता लक्ष्मीस्त्वमेव च । भ्राता त्वं च सखा लक्ष्मीर्विद्या लक्ष्मीस्त्वमेव च ॥ १९ ॥ त्राहि त्राहि महालक्ष्मि त्राहि त्राहि सुरेश्वरि । त्राहि त्राहि जगन्मातः दारिद्र्यात्त्राहि वेगतः ॥ २० ॥ नमस्तुभ्यं जगद्धात्रि नमस्तुभ्यं नमो नमः । धर्माधारे नमस्तुभ्यं नमः सम्पत्तिदायिनी ॥ २१ ॥ दारिद्र्यार्णवमग्नोऽहं निमग्नोऽहं रसातले । मज्जन्तं मां करे धृत्वा तूद्धर त्वं रमे द्रुतम् ॥ २२ ॥ किं लक्ष्मि बहुनोक्तेन जल्पितेन पुनः पुनः । अन्यन्मे शरणं नास्ति सत्यं सत्यं हरिप्रिये ॥ २३ ॥ एतच्छ्रुत्वाऽगस्त्यवाक्यं हृष्यमाणा हरिप्रिया । उवाच मधुरां वाणीं तुष्टाऽहं तव सर्वदा ॥ २४ ॥ श्रीलक्ष्मीरुवाच । यत्त्वयोक्तमिदं स्तोत्रं यः पठिष्यति मानवः । शृणोति च महाभागस्तस्याहं वशवर्तिनी ॥ २५ ॥ नित्यं पठति यो भक्त्या त्वलक्ष्मीस्तस्य नश्यति । ऋणं च नश्यते तीव्रं वियोगं नैव पश्यति ॥ २६ ॥ यः पठेत्प्रातरुत्थाय श्रद्धाभक्तिसमन्वितः । गृहे तस्य सदा तिष्टेन्नित्यं श्रीः पतिना सह ॥ २७ ॥ सुखसौभाग्यसम्पन्नो मनस्वी बुद्धिमान्भवेत् । पुत्रवान् गुणवान् श्रेष्ठो भोगभोक्ता च मानवः ॥ २८ ॥ इदं स्तोत्रं महापुण्यं लक्ष्म्यागस्त्यप्रकीर्तितम् । विष्णुप्रसादजननं चतुर्वर्गफलप्रदम् ॥ २९ ॥ राजद्वारे जयश्चैव शत्रोश्चैव पराजयः । भूतप्रेतपिशाचानां व्याघ्राणां न भयं तथा ॥ ३० ॥ न शस्त्रानलतोयौघाद्भयं तस्य प्रजायते । दुर्वृत्तानां च पापानां बहुहानिकरं परम् ॥ ३१ ॥ मन्दुराकरिशालासु गवां गोष्ठे समाहितः । पठेत्तद्दोषशान्त्यर्थं महापातकनाशनम् ॥ ३२ ॥ सर्वसौख्यकरं नॄणामायुरारोग्यदं तथा । अगस्त्यमुनिना प्रोक्तं प्रजानां हितकाम्यया ॥ ३३ ॥ ॥ इत्यगस्त्यविरचितं श्री लक्ष्मी स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री लक्ष्मी स्तोत्र: अगत्स्य मुनि का वरदान

यह स्तोत्र वैदिक काल के महान ऋषि अगस्त्य द्वारा रचित है। अगस्त्य मुनि अपनी उग्र तपस्या और अपार शक्ति (जैसे समुद्र पान करना) के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने जब माँ लक्ष्मी की स्तुति की, तो वह "जय" (Victory) के उद्घोष के साथ की।

इसलिए, यह स्तोत्र केवल धन याचना नहीं है, बल्कि यह जीवन के हर संघर्ष में विजय प्राप्ति का मंत्र है। इसकी शुरुआत ही "जय पद्मपलाशाक्षि" से होती है, जो साधक के आत्मविश्वास को जगाता है।

अलक्ष्मी नाशक एवं भय निवारक

माँ लक्ष्मी स्वयं श्लोक 26 में कहती हैं - "त्वलक्ष्मीस्तस्य नश्यति"। अर्थात, जो इसका पाठ करता है, उसकी 'अलक्ष्मी' (दुर्भाग्य, दरिद्रता, अशुभता) का तत्काल नाश हो जाता है।

यह स्तोत्र भय मुक्त भी करता है। श्लोक 31 कहता है कि साधक को न शस्त्र का भय रहता है, न अग्नि का, और न ही जल का। यहाँ तक कि दुष्ट आत्माओं और शत्रुओं का भय भी समाप्त हो जाता है।

स्तोत्र पाठ के अद्भुत लाभ

  • राजद्वारे जय (Court Victory): यदि आप किसी कानूनी विवाद या सरकारी अड़चन में हैं, तो श्लोक 30 का फल "राजद्वारे जयश्चैव" आपको निश्चित सफलता दिलाता है।
  • तीव्र ऋण मुक्ति: पुराने और भारी कर्ज (Debt) को उतारने के लिए यह अत्यंत प्रभावशाली है (श्लोक 26: "ऋणं च नश्यते तीव्रं")।
  • संपद: इसके पाठ से पुत्र, धन, धान्य और उत्तम भोग की प्राप्ति होती है।

प्रश्नोत्तरी (FAQ)

  1. अगस्त्य रचित लक्ष्मी स्तोत्र की मुख्य विशेषता क्या है?

इसकी सबसे बड़ी विशेषता 'अलक्ष्मी नाश' (Removing Bad Luck) और 'राजद्वारे जय' (Victory in Official/Legal matters) है। यह केवल धन नहीं, बल्कि सम्मान और विजय भी देता है।

  1. क्या यह स्तोत्र कर्ज मुक्ति में सहायक है?

जी हाँ, श्लोक 26 में स्पष्ट कहा गया है - 'ऋणं च नश्यते तीव्रं' (Grave debts are destroyed). यह तीव्र कर्ज को भी शीघ्र समाप्त कर देता है।

  1. श्लोक 30 में 'राजद्वारे जय' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है कि यदि कोई कोर्ट-कचहरी, सरकारी काम या किसी भी अधिकारिक विवाद में फंसा हो, तो इस पाठ से उसे विजय प्राप्त होती है और शत्रु पराजित होते हैं।

  1. स्तोत्र में 'जय पद्मपलाशाक्षि' का क्या भाव है?

ऋषि अगस्त्य माँ को 'कमल की पंखुड़ी जैसी आँखों वाली' कहकर संबोधित करते हैं और उनकी 'जय-जयकार' करते हैं। यह विजय का उद्घोष है।

  1. भूत-प्रेत बाधा में इसका क्या उपयोग है?

श्लोक 30-31 के अनुसार, इसके पाठ से भूत, प्रेत, पिशाच या हिंसक जानवरों (व्याघ्र) का भय नहीं रहता। यह एक रक्षा कवच की तरह भी कार्य करता है।

  1. क्या इसे घर के बाहर भी पढ़ा जा सकता है?

हाँ, श्लोक 32 में कहा गया है कि इसे गौशाला, हाथीशाला (वाहन रखने का स्थान) या घर के किसी भी पवित्र स्थान पर पढ़ा जा सकता है।

  1. इसके पाठ से 'वियोग' कैसे दूर होता है?

श्लोक 26 के अनुसार, जो इसका नित्य पाठ करता है, उसे अपने प्रियजनों का वियोग (Separation) नहीं सहना पड़ता। यह परिवार को जोड़े रखता है।

  1. ऋषि अगस्त्य कौन थे?

अगस्त्य मुनि वैदिक काल के एक महान सप्तर्षि थे। उन्होंने दक्षिण भारत में वैदिक ज्ञान का प्रसार किया। उनकी वाणी में अद्भुत शक्ति और आशीर्वाद माना जाता है।

  1. क्या लक्ष्मी जी इस स्तोत्र से प्रसन्न होती हैं?

हाँ, श्लोक 24 और 25 में लक्ष्मी जी स्वयं प्रकट होकर कहती हैं, 'अगस्त्य! मैं तुम्हारे इस स्तोत्र से सदैव संतुष्ट रहूँगी और जो इसे पढ़ेगा, मैं उसके वश में हो जाऊँगी।'"

  1. पाठ के लिए कोई विशेष नियम?

श्लोक 27 के अनुसार, 'प्रातरुत्थाय' - सुबह उठकर श्रद्धा और भक्ति के साथ इसे पढ़ना चाहिए। शुद्धता और एकाग्रता मुख्य नियम हैं।