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Indra Krutha Sri Maha Lakshmi Stotram – श्री महालक्ष्मी स्तोत्रम् (महेन्द्र कृतम्)

Indra Krutha Sri Maha Lakshmi Stotram – श्री महालक्ष्मी स्तोत्रम् (महेन्द्र कृतम्)
॥ श्री महालक्ष्मी स्तोत्रम् (महेन्द्र कृतम्) ॥ महेन्द्र उवाच । नमः कमलवासिन्यै नारायण्यै नमो नमः । कृष्णप्रियायै सारायै पद्मायै च नमो नमः ॥ १ ॥ पद्मपत्रेक्षणायै च पद्मास्यायै नमो नमः । पद्मासनायै पद्मिन्यै वैष्णव्यै च नमो नमः ॥ २ ॥ सर्वसम्पत्स्वरूपायै सर्वदात्र्यै नमो नमः । सुखदायै मोक्षदायै सिद्धिदायै नमो नमः ॥ ३ ॥ हरिभक्तिप्रदात्र्यै च हर्षदात्र्यै नमो नमः । कृष्णवक्षःस्थितायै च कृष्णेशायै नमो नमः ॥ ४ ॥ कृष्णशोभास्वरूपायै रत्नाढ्यायै नमो नमः । सम्पत्यधिष्ठातृदेव्यै महादेव्यै नमो नमः ॥ ५ ॥ सस्याधिष्ठातृदेव्यै च सस्यलक्ष्म्यै नमो नमः । नमो बुद्धिस्वरूपायै बुद्धिदायै नमो नमः ॥ ६ ॥ वैकुण्ठे च महालक्ष्मीर्लक्ष्मीः क्षीरोदसागरे । स्वर्गलक्ष्मीरिन्द्रगेहे राजलक्ष्मीर्नृपालये ॥ ७ ॥ गृहलक्ष्मीश्च गृहिणां गेहे च गृहदेवता । सुरभिः सा गवां माता दक्षिणा यज्ञकामिनी ॥ ८ ॥ अदितिर्देवमाता त्वं कमला कमलालये । स्वाहा त्वं च हविर्दाने कव्यदाने स्वधा स्मृता ॥ ९ ॥ त्वं हि विष्णुस्वरूपा च सर्वाधारा वसुन्धरा । शुद्धसत्त्वस्वरूपा त्वं नारायणपरायाणा ॥ १० ॥ क्रोधहिंसावर्जिता च वरदा च शुभानना । परमार्थप्रदा त्वं च हरिदास्यप्रदा परा ॥ ११ ॥ यया विना जगत्सर्वं भस्मीभूतमसारकम् । जीवन्मृतं च विश्वं च शवतुल्यं यया विना ॥ १२ ॥ सर्वेषां च परा त्वं हि सर्वबान्धवरूपिणी । यया विना न सम्भाष्यो बान्धवैर्बान्धवः सदा ॥ १३ ॥ त्वया हीनो बन्धुहीनस्त्वया युक्तः सबान्धवः । धर्मार्थकाममोक्षाणां त्वं च कारणरूपिणी ॥ १४ ॥ स्तनन्धयानां त्वं माता शिशूनां शैशवे यथा । तथा त्वं सर्वदा माता सर्वेषां सर्वविश्वतः ॥ १५ ॥ त्यक्तस्तनो मातृहीनः स चेज्जीवति दैवतः । त्वया हीनो जनः कोऽपि न जीवत्येव निश्चितम् ॥ १६ ॥ सुप्रसन्नस्वरूपा त्वं मे प्रसन्ना भवाम्बिके । वैरिग्रस्तं च विषयं देहि मह्यं सनातनि ॥ १७ ॥ वयं यावत्त्वया हीना बन्धुहीनाश्च भिक्षुकाः । सर्वसम्पद्विहीनाश्च तावदेव हरिप्रिये ॥ १८ ॥ राज्यं देहि श्रियं देहि बलं देहि सुरेश्वरि । कीर्तिं देहि धनं देहि पुत्रान्मह्यं च देहि वै ॥ १९ ॥ कामं देहि मतिं देहि भोगान् देहि हरिप्रिये । ज्ञानं देहि च धर्मं च सर्वसौभाग्यमीप्सितम् ॥ २० ॥ सर्वाधिकारमेवं वै प्रभावां च प्रतापकम् । जयं पराक्रमं युद्धे परमैश्वर्यमैव च ॥ २१ ॥ इत्युक्त्वा तु महेन्द्रश्च सर्वैः सुरगणैः सह । ननाम साश्रुनेत्रोऽयं मूर्ध्ना चैव पुनः पुनः ॥ २२ ॥ ब्रह्मा च शङ्करश्चैव शेषो धर्मश्च केशवः । सर्वे चक्रुः परीहारं सुरार्थे च पुनः पुनः ॥ २३ ॥ देवेभ्यश्च वरं दत्त्वा पुष्पमालां मनोहराम् । केशवाय ददौ लक्ष्मीः सन्तुष्टा सुरसंसदि ॥ २४ ॥ ययुर्दैवाश्च सन्तुष्टाः स्वं स्वं स्थानं च नारद । देवी ययौ हरेः क्रोडं हृष्टा क्षीरोदशायिनः ॥ २५ ॥ ययतुस्तौ स्वस्वगृहं ब्रह्मेशानौ च नारद । दत्त्वा शुभाशिषं तौ च देवेभ्यः प्रीतिपूर्वकम् ॥ २६ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ इदं स्तोत्रं महापुण्यं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः । कुबेरतुल्यः स भवेद्राजराजेश्वरो महान् ॥ २७ ॥ सिद्धस्तोत्रं यदि पठेत् सोऽपि कल्पतरुर्नरः । पञ्चलक्षजपेनैव स्तोत्रसिद्धिर्भवेन्नृणाम् ॥ २८ ॥ सिद्धस्तोत्रं यदि पठेन्मासमेकं च सम्यतः । महासुखी च राजेन्द्रो भविष्यति न संशयः ॥ २९ ॥ ॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे महेन्द्र कृत श्री महालक्ष्मी स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

इंद्र द्वारा वैभव की पुनः प्राप्ति

पुराणों के अनुसार, ऋषि दुर्वासा के श्राप के कारण देवराज इंद्र 'श्री-हीन' (धन और वैभव से रहित) हो गए थे और असुरों ने स्वर्ग पर कब्ज़ा कर लिया था। अपनी खोई हुई 'राजलक्ष्मी' को पुनः पाने के लिए इंद्र ने इस स्तोत्र की रचना की।

इस स्तोत्र के प्रभाव से माँ लक्ष्मी प्रसन्न हुईं और इंद्र को उनका स्वर्ग और अनंत वैभव वापस मिला। इसीलिए यह स्तोत्र उन लोगों के लिए वरदान है जिन्होंने अपना धन, पद या सम्मान खो दिया है।

सर्व-सम्पत्-स्वरूपायै

श्लोक 7 में इंद्र देव लक्ष्मी के सर्वव्यापी रूप का वर्णन करते हैं: "वैकुण्ठे च महालक्ष्मी..."। वह कहते हैं कि बैकुंठ में आप महालक्ष्मी हैं, क्षीरसागर में लक्ष्मी हैं, स्वर्ग में आप ही स्वर्गलक्ष्मी हैं, राजाओं के महलों में राजलक्ष्मी हैं और गृहस्थों के घर में गृहलक्ष्मी हैं।

यह भाव दर्शाता है कि जीवन का हर सुख और हर स्थान की शोभा केवल लक्ष्मी जी की कृपा से ही संभव है।

कुबेर तुल्य वैभव की प्राप्ति

  • कुबेरतुल्य: श्लोक 27 में स्पष्ट वचन है कि जो इसका तीनों संध्याओं में पाठ करता है, वह धन के देवता कुबेर के समान (Richest of the Rich) हो जाता है।
  • राजराजेश्वर: साधक को केवल धन ही नहीं मिलता, बल्कि उसे 'राजराजेश्वर' (सम्राटों जैसा पद) प्राप्त होता है।
  • कल्पतरु: सिद्ध होने पर साधक स्वयं 'कल्पतरु' (इच्छा पूर्ति वृक्ष) के समान हो जाता है, अर्थात वह जो चाहे वह प्राप्त कर सकता है।

प्रश्नोत्तरी (FAQ)

  1. इंद्र रचित लक्ष्मी स्तोत्र का मुख्य उद्देश्य क्या है?

इसका मुख्य उद्देश्य 'पुनः प्राप्ति' (Regaining what is lost) है। इंद्र ने इसे अपना खोया हुआ स्वर्ग वापस पाने के लिए गाया था। अत: खोई हुई संपत्ति या पद-प्रतिष्ठा पाने के लिए यह सर्वश्रेष्ठ है।

  1. क्या यह स्तोत्र कुबेर समान धन दे सकता है?

जी हाँ, श्लोक 27 में स्पष्ट लिखा है - 'कुबेरतुल्यः स भवेत्' (He becomes equal to Kubera). यह अथाह धन देने में सक्षम है।

  1. इस स्तोत्र में 'सर्वसम्पत्स्वरूपायै' का क्या अर्थ है?

श्लोक 3 में लक्ष्मी जी को 'सर्वसम्पत्स्वरूपायै' कहा गया है, जिसका अर्थ है कि दुनिया की सारी दौलत और ऐश्वर्य उन्हीं का भौतिक रूप है।

  1. क्या इसके पाठ से 'गृहलक्ष्मी' प्रसन्न होती हैं?

बिल्कुल, श्लोक 8 में कहा गया है - 'गृहलक्ष्मीश्च गृहिणां'। वे ही गृहस्थों के घर में गृहलक्ष्मी बनकर निवास करती हैं, जिससे पारिवारिक सुख बढ़ता है।

  1. श्लोक 29 में 'मासमेकं' का क्या महत्व है?

श्लोक 29 एक विशेष अनुष्ठान की बात करता है - यदि कोई नियमपूर्वक 1 महीने तक इसका पाठ करे, तो वह 'महासुखी' और 'राजेन्द्र' (राजाओं का राजा) बन जाता है।

  1. श्लोक 16 में 'त्यक्तस्तनो मातृहीनः' का क्या भाव है?

यह एक बहुत ही भावुक श्लोक है। इंद्र कहते हैं कि एक बच्चा माँ के दूध के बिना शायद जी भी ले, लेकिन 'त्वया हीनो जनः' - हे लक्ष्मी! आपकी कृपा के बिना कोई भी जीवित नहीं रह सकता।

  1. इसे 'त्रिसन्ध्यं' पढ़ने का क्या फल है?

श्लोक 27 के अनुसार, जो व्यक्ति तीनों काल (सुबह, दोपहर, शाम) इसका पाठ करता है, वह 'राजराजेश्वर' (Emperor) बन जाता है।

  1. यह स्तोत्र किस पुराण से लिया गया है?

यह स्तोत्र 'ब्रह्मवैवर्त पुराण' (Brahma Vaivarta Purana) के प्रकृति खंड में नारद-नारायण संवाद के अंतर्गत आता है।

  1. क्या इसके पाठ से बुद्धि की प्राप्ति होती है?

हाँ, श्लोक 6 में माँ को 'बुद्धिस्वरूपायै' और 'बुद्धिदायै' (Giver of Intellect) कहा गया है। यह धन के साथ-साथ सद्बुद्धि भी देता है।

  1. पाठ के अंत में देवताओं ने क्या किया?

पाठ के अंत में ब्रह्मा, शंकर और सभी देवता प्रसन्न होकर अपने-अपने लोक को गए और लक्ष्मी जी भगवान विष्णु के वक्ष स्थल में विराजमान हुईं।