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Sri Adya Kalika Shatanama Stotram – श्री आद्या कालिका शतनाम स्तोत्रम्

Sri Adya Kalika Shatanama Stotram – श्री आद्या कालिका शतनाम स्तोत्रम्
॥ श्री गणेशाय नमः ॥ ॥ श्री आद्या कालिका शतनाम स्तोत्रम् ॥ ॥ श्रीसदाशिव उवाच ॥ शृणु देवि जगद्वन्द्ये स्तोत्रमेतदनुत्तमम् । पठनाच्छ्रवणाद्यस्य सर्वसिद्धीश्वरो भवेत् ॥ १ ॥ (श्री सदाशिव बोले: हे जगद्वन्द्ये देवि! इस सर्वोत्तम स्तोत्र को सुनो, जिसके पढ़ने और सुनने से साधक समस्त सिद्धियों का ईश्वर (स्वामी) हो जाता है।) असौभाग्यप्रशमनं सुखसम्पद्विवर्धनम् । अकालमृत्युहरणं सर्वापद्विनिवारणम् ॥ २ ॥ (यह दुर्भाग्य को शांत करने वाला, सुख और सम्पत्ति को बढ़ाने वाला, अकाल मृत्यु का हरण करने वाला और सभी आपदाओं का निवारण करने वाला है।) श्रीमदाद्याकालिकायाः सुखसान्निध्यकारणम् । स्तवस्यास्य प्रसीदेन त्रिपुरारिरहं प्रिये ॥ ३ ॥ (हे प्रिये! यह श्रीमदाद्या कालिका के सुखदायक सान्निध्य का कारण है। इस स्तव (स्तोत्र) के प्रभाव से मैं (त्रिपुरारी शिव) प्रसन्न होता हूँ।) स्तोत्रस्यास्य ऋषिर्देवि सदाशिव उदाहृतः । छन्दोऽनुष्टुब्देवताद्या कालिका परिकीर्तिता । धर्मकामार्थमोक्षेषु विनियोगः प्रकीर्तितः ॥ ४ ॥ (हे देवि! इस स्तोत्र के ऋषि सदाशिव हैं, छंद अनुष्टुप् है, और देवता आद्या कालिका हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष (चतुर्वर्ग) की प्राप्ति में इसका विनियोग कहा गया है।) ॥ स्तोत्रम् ॥ ह्रीं काली श्रीं कराली च क्रीं कल्याणी कलावती । कमला कलिदर्पघ्नी कपर्दीशकृपान्विता ॥ ५ ॥ (ह्रीं काली, श्रीं कराली, क्रीं कल्याणी, कलावती, कमला, कलयुग का दर्प (घमंड) नाश करने वाली और कपर्दीश (शिव) की कृपा से युक्त।) कालिका कालमाता च कालानलसमद्युतिः । कपर्दिनी करालास्या करुणामृतसागरा ॥ ६ ॥ (कालिका, कालमाता, कालाग्नि के समान आभा वाली, कपर्दिनी (जटाधारी), विकराल मुख वाली और करुणा रूपी अमृत का सागर।) कृपामयी कृपाधारा कृपापारा कृपागमा । कृशानुः कपिला कृष्णा कृष्णानन्दविवर्धिनी ॥ ७ ॥ (कृपामयी, कृपाधारा, कृपापारा (कृपा का पार न पाने योग्य), कृपागमा, अग्निस्वरूपा (कृशानु), कपिला, कृष्णा और कृष्ण के आनंद को बढ़ाने वाली।) कालरात्रिः कामरूपा कामपाशविमोचिनी । कादम्बिनी कलाधारा कलिकल्मषनाशिनी ॥ ८ ॥ (कालरात्रि, इच्छानुसार रूप धारण करने वाली (कामरूपा), कामनाओं के बंधन से मुक्त करने वाली, कादम्बिनी (मेघमाला), कलाधारा और कलयुग के पापों का नाश करने वाली।) कुमारीपूजनप्रीता कुमारीपूजकालया । कुमारीभोजनानन्दा कुमारीरूपधारिणी ॥ ९ ॥ (कुमारी पूजन से प्रसन्न होने वाली, कुमारी पूजकों के घर निवास करने वाली, कुमारी भोजन से आनंदित होने वाली और स्वयं कुमारी रूप धारण करने वाली।) कदम्बवनसञ्चारा कदम्बवनवासिनी । कदम्बपुष्पसन्तोषा कदम्बपुष्पमालिनी ॥ १० ॥ (कदम्ब वन में विचरण करने वाली, कदम्ब वन में निवास करने वाली, कदम्ब पुष्पों से संतुष्ट होने वाली और कदम्ब पुष्पों की माला पहनने वाली।) किशोरी कलकण्ठा च कलनादनिनादिनी । कादम्बरीपानरता तथा कादम्बरीप्रिया ॥ ११ ॥ (किशोरी, मधुर कंठ वाली (कलकण्ठा), मधुर ध्वनि करने वाली, कादम्बरी (मदिरा/अमृत) पान में रत और कादम्बरी प्रिया।) कपालपात्रनिरता कङ्कालमाल्यधारिणी । कमलासनसन्तुष्टा कमलासनवासिनी ॥ १२ ॥ (कपाल पात्र (खोपड़ी) रखने वाली, कंकाल की माला धारण करने वाली, कमलासन (कमल/शिव) से संतुष्ट और कमलासन पर निवास करने वाली।) कमलालयमध्यस्था कमलामोदमोदिनी । कलहंसगतिः क्लैब्यनाशिनी कामरूपिणी ॥ १३ ॥ (कमल समूह के मध्य स्थित, कमल की सुगंध से प्रसन्न, राजहंस के समान चाल वाली, नपुंसकता (कायरता) का नाश करने वाली और इच्छाधारी (कामरूपिणी)।) कामरूपकृतावासा कामपीठविलासिनी । कमनीया कल्पलता कमनीयविभूषणा ॥ १४ ॥ (कामरूप (कामाख्या) में निवास करने वाली, कामपीठ में विलास करने वाली, सुंदर (कमनीया), कल्पलता के समान और सुंदर आभूषणों वाली।) कमनीयगुणाराध्या कोमलाङ्गी कृशोदरी । कारणामृतसन्तोषा कारणानन्दसिद्धिदा ॥ १५ ॥ (सुंदर गुणों से आराधित, कोमल अंगों वाली, पतली कमर वाली (कृशोदरी), कारणामृत (मदिरा/विशेष द्रव्य) से संतुष्ट और कारण (मूल) आनंद की सिद्धि देने वाली।) कारणामृतसन्तोषा कारणानन्दसिद्धिदा । कारणानन्दजापेष्टा कारणार्चनहर्षिता ॥ १६ ॥ (पुनरुक्ति: कारणामृत से संतुष्ट...। कारणानन्द जप से प्रसन्न, और 'कारण' पूजा से हर्षित होने वाली।) कारणार्णवसम्मग्ना कारणव्रतपालिनी । कस्तूरीसौरभामोदा कस्तूरीतिलकोज्ज्वला ॥ १७ ॥ (कारण रूपी सागर में मग्न, कारण व्रत का पालन करने वाली, कस्तूरी की सुगंध से प्रसन्न और कस्तूरी तिलक से उज्ज्वल।) कस्तूरीपूजनरता कस्तूरीपूजकप्रिया । कस्तूरीदाहजननी कस्तूरीमृगतोषिणी ॥ १८ ॥ (कस्तूरी से पूजन में रत, कस्तूरी पूजकों की प्रिया, कस्तूरी मृग को उत्पन्न करने वाली और उसे संतुष्ट रखने वाली।) कस्तूरीभोजनप्रीता कर्पूरामोदमोदिता । कर्पूरमालाभरणा कर्पूरचन्दनोक्षिता ॥ १९ ॥ (कस्तूरी भोजन से प्रसन्न, कपूर की सुगंध से मोदित, कपूर की माला पहनने वाली और कपूर-चंदन से लेपित।) कर्पूरकारणाह्लादा कर्पूरामृतपायिनी । कर्पूरसागरस्नाता कर्पूरसागरालया ॥ २० ॥ (कपूर के कारण आह्लादित, कर्पूर-अमृत का पान करने वाली, कर्पूर सागर में स्नान करने वाली और कर्पूर सागर में निवास करने वाली।) कूर्चबीजजपप्रीता कूर्चजापपरायणा । कुलीना कौलिकाराध्या कौलिकप्रियकारिणी ॥ २१ ॥ (कूर्च बीज (हूं) के जप से प्रसन्न, कूर्च जप में लीन, कुलीन, कौलिकों (वाममार्गी साधकों) द्वारा आराध्य और कौलिकों का प्रिय करने वाली।) कुलाचारा कौतुकिनी कुलमार्गप्रदर्शिनी । काशीश्वरी कष्टहर्त्री काशीशवरदायिनी ॥ २२ ॥ (कुलाचार का पालन करने वाली, कौतुक (लीला) करने वाली, कुलमार्ग (कौल मार्ग) दिखाने वाली। काशी की स्वामिनी (काशीश्वरी), कष्ट हरने वाली और काशीश (शिव) को वर देने वाली।) काशीश्वरकृतामोदा काशीश्वरमनोरमा । कलमञ्जीरचरणा क्वणत्काञ्चीविभूषणा ॥ २३ ॥ (काशीश्वर (शिव) को आनंदित करने वाली, शिव की मनोरमा। चरणों में सुंदर नूपुर पहनने वाली और खनकती करधनी (कांची) से विभूषित।) काञ्चनाद्रिकृतागारा काञ्चनाचलकौमुदी । कामबीजजपानन्दा कामबीजस्वरूपिणी ॥ २४ ॥ (सुमेरु (कांचन पर्वत) पर घर बनाने वाली, सुमेरु की चांदनी (कौमुदी), कामबीज (क्लीं) के जप से आनंदित और साक्षात् कामबीज स्वरूपिणी।) कुमतिघ्नी कुलीनार्तिनाशिनी कुलकामिनी । क्रीं ह्रीं श्रीं मन्त्रवर्णेन कालकण्टकघातिनी ॥ २५ ॥ (कुबुद्धि का नाश करने वाली, कुलीनों के दुःखों को हरने वाली और कुल की कामना पूर्ण करने वाली। क्रीं, ह्रीं, श्रीं—इन मंत्र वर्णों द्वारा काल रूपी कांटे का नाश करने वाली।) ॥ फलश्रुति ॥ इत्याद्याकालिकादेव्याः शतनाम प्रकीर्तितम् । ककारकूटघटितं कालीरूपस्वरूपकम् ॥ २६ ॥ (इस प्रकार आद्या कालिका देवी का यह शतनाम (100 नाम) कहा गया है। यह 'क' कार कूठ (समूह) से बना है और साक्षात् काली का स्वरूप है।) पूजाकाले पठेद्यस्तु कालिकाकृतमानसः । मन्त्रसिद्धिर्भवेदाशु तस्य काली प्रसीदति ॥ २७ ॥ (जो साधक पूजा के समय एकाग्रचित्त होकर (कालीगत मन से) इसका पाठ करता है, उसे शीघ्र मंत्र सिद्धि होती है और काली उस पर प्रसन्न होती हैं।) बुद्धिं विद्यां च लभते गुरोरादेशमात्रतः । धनवान् कीर्तिमान् भूयाद्दानशीलो दयान्वितः ॥ २८ ॥ (गुरु के आदेश मात्र से वह बुद्धि और विद्या प्राप्त करता है। वह धनवान, कीर्तिमान, दानशील और दयावान होता है।) पुत्रपौत्रसुखैश्वर्यैर्मोदते साधको भुवि । भौमावास्यानिशाभागे मपञ्चकसमन्वितः ॥ २९ ॥ (वह साधक पृथ्वी पर पुत्र-पौत्र और सुख-ऐश्वर्य के साथ आनंद करता है। यदि वह भौमावास्या (मंगलवारी अमावस्या) की रात्रि में 'म-पंचक' (पंचमकार) विधि से...) पूजयित्वा महाकालीमाद्यां त्रिभुवनेश्वरीम् । पठित्वा शतनामानि साक्षात्कालीमयो भवेत् ॥ ३० ॥ (त्रिभुवनेश्वरी महाकाली आद्या की पूजा करके इन सौ नामों का पाठ करे, तो वह साक्षात् कालीमय (काली स्वरूप) हो जाता है।) नासाध्यं विद्यते तस्य त्रिषु लोकेषु किञ्चन । विद्यायां वाक्पतिः साक्षात् धने धनपतिर्भवेत् ॥ ३१ ॥ (तीनों लोकों में उसके लिए कुछ भी असाध्य नहीं रहता। विद्या में वह साक्षात् वाक्पति (बृहस्पति) और धन में धनपति (कुबेर) हो जाता है।) समुद्र इव गाम्भीर्ये बले च पवनोपमः । तिग्मांशुरिव दुष्प्रेक्ष्यः शशिवच्छुभदर्शनः ॥ ३२ ॥ (वह गंभीरता में समुद्र के समान, बल में पवन (वायु) के समान, तेज में सूर्य के समान (जिसे देखा न जा सके) और दर्शन में चंद्रमा के समान शुभ (सौम्य) हो जाता है।) रूपे मूर्तिधरः कामो योषितां हृदयङ्गमः । सर्वत्र जयमाप्नोति स्तवस्यास्य प्रसादतः ॥ ३३ ॥ (रूप में वह साक्षात् कामदेव और स्त्रियों के हृदय को प्रिय होता है। इस स्तोत्र की कृपा से वह सर्वत्र विजय प्राप्त करता है।) यं यं कामं पुरस्कृत्य स्तोत्रमेतदुदीरयेत् । तं तं काममवाप्नोति श्रीमदाद्याप्रसादतः ॥ ३४ ॥ (वह जिस-जिस कामना को रखकर इस स्तोत्र का पाठ करता है, श्रीमदाद्या (काली) की कृपा से वह उस-उस कामना को प्राप्त कर लेता है।) रणे राजकुले द्यूते विवादे प्राणसङ्कटे । दस्युग्रस्ते ग्रामदाहे सिंहव्याघ्रावृते तथा ॥ ३५ ॥ (युद्ध में, राज दरबार में, जुए में, विवाद में, प्राण संकट में, डाकुओं से घिरने पर, गाँव में आग लगने पर, या शेर-बाघ से घिर जाने पर...) अरण्ये प्रान्तरे दुर्गे ग्रहराजभयेऽपि वा । ज्वरदाहे चिरव्याधौ महारोगादिसङ्कुले ॥ ३६ ॥ (जंगल में, सुनसान रास्ते में, किले में, ग्रहों के राजा (सूर्य/शनि आदि) के भय में, ज्वर (बुखार) की जलन में, पुराने रोग में, या महारोगों से घिरे होने पर...) बालग्रहादि रोगे च तथा दुःस्वप्नदर्शने । दुस्तरे सलिले वापि पोते वातविपद्गते ॥ ३७ ॥ (बच्चों के रोगों (बालग्रह) में, बुरे सपने आने पर, गहरे जल में डूबते समय, या जहाज के तूफान में फँसने पर...) विचिन्त्य परमां मायामाद्यां कालीं परात्पराम् । यः पठेच्छतनामानि दृढभक्तिसमन्वितः ॥ ३८ ॥ (जो साधक परम माया, परात्परा आद्या काली का ध्यान करके दृढ़ भक्ति के साथ इन सौ नामों का पाठ करता है...) सर्वापद्भ्यो विमुच्येत देवि सत्यं न संशयः । न पापेभ्यो भयं तस्य न रोगोभ्यो भयं क्वचित् ॥ ३९ ॥ (हे देवि! वह सभी विपत्तियों से मुक्त हो जाता है, यह सत्य है, इसमें संशय नहीं। उसे न पापों से भय रहता है और न कभी रोगों से।) सर्वत्र विजयस्तस्य न कुत्रापि पराभवः । तस्य दर्शनमात्रेण पलायन्ते विपद्गणाः ॥ ४० ॥ (उसकी सर्वत्र विजय होती है, कहीं भी पराजय नहीं। उसके दर्शन मात्र से ही विपत्तियों के समूह भाग जाते हैं।) स वक्ता सर्वशास्त्राणां स भोक्ता सर्वसम्पदाम् । स कर्ता जातिधर्माणां ज्ञातीनां प्रभुरेव सः ॥ ४१ ॥ (वह सभी शास्त्रों का वक्ता (विद्वान) और सभी सम्पदाओं का भोग करने वाला होता है। वह जाति-धर्मों का नेता और अपने कुल/सगे-संबंधियों का स्वामी होता है।) वाणी तस्य वसेद्वक्त्रे कमला निश्चला गृहे । तन्नाम्ना मानवाः सर्वे प्रणमन्ति ससम्भ्रमाः ॥ ४२ ॥ (सरस्वती उसके मुख में और लक्ष्मी उसके घर में निश्चल होकर वास करती हैं। उसके नाम मात्र से सभी मनुष्य आदरपूर्वक उसे प्रणाम करते हैं।) दृष्ट्या तस्य तृणायन्ते ह्यणिमाद्यष्टसिद्धयः । आद्याकालीस्वरूपाख्यं शतनाम प्रकीर्तितम् ॥ ४३ ॥ (उसकी दृष्टि में अणिमा आदि आठों सिद्धियाँ तिनके के समान तुच्छ हो जाती हैं (अर्थात उसे सहज ही प्राप्त होती हैं)। यह आद्या काली स्वरूप शतनाम कहा गया है।) अष्टोत्तरशतावृत्या पुरश्चर्याऽस्य गीयते । पुरस्क्रियान्वितं स्तोत्रं सर्वाभीष्टफलप्रदम् ॥ ४४ ॥ (इसकी एक सौ आठ (108) आवृत्ति करने से पुरश्चरण होता है। पुरश्चरण के साथ किया गया यह स्तोत्र-पाठ सभी अभीष्ट फलों को देने वाला है।) शतनामस्तुतिमिमामाद्याकालीस्वरूपिणीम् । पठेद्वा पाठयेद्वापि शृणुयाच्छ्रावयेदपि । सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मसायुज्यमाप्नुयात् ॥ ४५ ॥ (जो इस आद्या काली स्वरूप शतनाम स्तुति को पढ़ता है, पढ़ाता है, सुनता है या सुनाता है—वह सभी पापों से मुक्त होकर ब्रह्म सायुज्य (मोक्ष) प्राप्त करता है।) ॥ इति महानिर्वाणतन्त्रे सप्तमोल्लासान्तर्गतं श्री आद्या कालिका शतनाम स्तोत्रम् संपूर्णम् ॥

स्तोत्र परिचय

श्री आद्या कालिका शतनाम स्तोत्रम् का वर्णन महानिर्वाण तन्त्र के सप्तम उल्लास में मिलता है। यह स्तोत्र स्वयं भगवान सदाशिव ने माँ पार्वती (कालिका) को सुनाया है। इसमें माँ के 100 दिव्य नामों (शतनाम) का वर्णन है, जिनमें से अधिकांश 'क' कार से प्रारंभ होते हैं। इसे 'ककारादि काली शतनाम' भी कहा जा सकता है। यह 'आद्या' शक्ति की उपासना का प्रमुख स्तोत्र है।

तन्त्र: महानिर्वाण तन्त्र (सप्तम उल्लास)
ऋषि: सदाशिव
छंद: अनुष्टुप्
देवता: श्री आद्या कालिका
विनियोग: धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष
बीज: ह्रीं, श्रीं, क्रीं

महत्व और लाभ

श्लोक 1-3 और फलश्रुति (26-45) में इस स्तोत्र की अपार महिमा बताई गई है:
  • अकाल मृत्यु हरण: यह स्तोत्र अकाल मृत्यु को हरने वाला और सभी आपदाओं का निवारण करने वाला है।
  • वाक सिद्धि: इसका साधक 'वाकपति' (बृहस्पति) के समान विद्वान हो जाता है।
  • धन और ऐश्वर्य: साधक 'धनपति' (कुबेर) के समान धनी हो जाता है।
  • शत्रु और भय नाश: युद्ध, विवाद, चोर, अग्नि, सिंह-व्याघ्र और राजभय से मुक्ति मिलती है।
  • रोग निवारण: ज्वर, पुराने रोग और बालग्रह आदि दोष शांत होते हैं।

साधना विधि (भौमावास्या)

श्लोक 29 में विशेष साधना का उल्लेख है:

"भौमावास्या निशाभागे..." अर्थात यदि मंगलवार के दिन अमावस्या की रात्रि हो, तो वह काल इस स्तोत्र की सिद्धि के लिए सर्वोत्तम है। उस रात्रि में पंचमकार (शुद्धि सहित) या सात्विक विधि से माँ आद्या काली की पूजा करके इस शतनाम का पाठ करने से साधक साक्षात् कालीमय हो जाता है।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. आद्या कालिका शतनाम स्तोत्र क्या है?

यह माँ काली के 100 अत्यंत प्रभावशाली नामों का संग्रह है जो महानिर्वाण तन्त्र से लिया गया है।

2. 'ककारादि' का क्या अर्थ है?

इस स्तोत्र में माँ के अनेक नाम 'क' अक्षर से शुरू होते हैं (जैसे काली, कराली, कमला, कुलिशांगी), इसलिए इसे ककारादि भी कहा जाता है।

3. 'भौमावास्या' क्या है?

जब अमावस्या तिथि मंगलवार को पड़ती है, तो उसे भौमावास्या या सोमवती (सोमवार) की तरह ही अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। तंत्र साधना के लिए यह योग सर्वश्रेष्ठ है।

4. क्या यह रोग निवारण में सहायक है?

हाँ, श्लोक 36 में स्पष्ट लिखा है कि यह ज्वर (बुखार), दीर्घकालीन व्याधि और महारोगों का नाश करता है।

5. इसकी पुरश्चरण विधि क्या है?

श्लोक 43 के अनुसार, इस स्तोत्र का 108 बार (अष्टोत्तरशत) पाठ करने से इसका पुरश्चरण पूर्ण होता है।

6. क्या गृहस्थ इसका पाठ कर सकते हैं?

हाँ, यह सभी के लिए कल्याणकारी है। गृहस्थ इसे नित्य पूजा में शामिल कर सकते हैं।

7. क्या रात्रि में पाठ करना अनिवार्य है?

सिद्धि प्राप्ति के लिए रात्रि (निशीथ काल) श्रेष्ठ है, परन्तु नित्य कल्याण के लिए इसे सुबह या शाम को भी पढ़ा जा सकता है।

8. माँ को क्या भोग प्रिय है?

इस पाठ में कस्तूरी, कर्पूर, और मधुपर्क आदि का उल्लेख है, परन्तु श्रद्धा भाव सबसे बड़ा भोग है।

9. क्या इसके पाठ से अष्टसिद्धि मिलती है?

हाँ, श्लोक 42 में कहा गया है कि सिद्ध साधक की दृष्टि मात्र से अणिमा आदि आठों सिद्धियाँ तिनके के समान (तुच्छ) प्रतीत होती हैं, अर्थात वे सहज ही उपलब्ध हो जाती हैं।

10. क्या महिलाएं इसका पाठ कर सकती हैं?

हाँ, महिलाएं भी पूर्ण पवित्रता के साथ इसका पाठ कर सकती हैं।