Sri Kalika Kavacham (Vairinashakam) – श्री कालिका कवचम् (वैरिनाशकरम्)

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कालिका कवचम् (वैरिनाशकरम्) ॥
॥ श्रीरुद्रयामले कालिकाकल्पे ॥
कैलासशिखरासीनं शङ्करं वरदं शिवम् ।
देवी पप्रच्छ सर्वज्ञं देवदेवं महेश्वरम् ॥ १ ॥
॥ देव्युवाच ॥
भगवन् देवदेवेश देवानां मोक्षद प्रभो ।
प्रब्रूहि मे महाभाग गोप्यं यद्यपि च प्रभो ॥ २ ॥
शत्रूणां येन नाशः स्यादात्मनो रक्षणं भवेत् ।
परमैश्वर्यमतुलं लभेद्येन हि तद्वद ॥ ३ ॥
॥ भैरव उवाच ॥
वक्ष्यामि ते महादेवि सर्वधर्महिताय च ।
अद्भुतं कवचं देव्याः सर्वरक्षाकरं नृणाम् ॥ ४ ॥
सर्वारिष्टप्रशमनं सर्वोपद्रवनाशनम् ।
सुखदं भोगदं चैव वश्याकर्षणमद्भुतम् ॥ ५ ॥
शत्रूणां सङ्क्षयकरं सर्वव्याधिनिवारणम् ।
दुःखिनो ज्वरिणश्चैव स्वाभीष्टप्रहतास्तथा ।
भोगमोक्षप्रदं चैव कालिकाकवचं पठेत् ॥ ६ ॥
॥ विनियोग ॥
अस्य श्रीकालिकाकवचस्य भैरव ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः
श्रीकालिका देवता मम शत्रुसंहारार्थं जपे विनियोगः ।
॥ करन्यासः ॥
ओं क्रां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
ओं क्रीं तर्जनीभ्यां नमः ।
ओं क्रूं मध्यमाभ्यां नमः ।
ओं क्रैं अनामिकाभ्यां नमः ।
ओं क्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ओं क्रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
॥ हृदयादि न्यासः ॥
ओं क्रां हृदयाय नमः ।
ओं क्रीं शिरसे स्वाहा ।
ओं क्रूं शिखायै वषट् ।
ओं क्रैं कवचाय हुम् ।
ओं क्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ओं क्रः अस्त्राय फट् ।
॥ ध्यानम् ॥
ध्यायेत् कालीं महामायां त्रिनेत्रां बहुरूपिणीम् ।
चतुर्भुजां ललज्जिह्वां पूर्णचन्द्रनिभाननाम् ॥ ७ ॥
नीलोत्पलदलप्रख्यां शत्रुसङ्घविदारिणीम् ।
नरमुण्डं तथा खड्गं कमलं च वरं तथा ॥ ८ ॥
बिभ्राणां रक्तवसनां दंष्ट्रया घोररूपिणीम् ।
अट्टाट्टहासनिरतां सर्वदा च दिगम्बराम् ॥ ९ ॥
शवासनस्थितां देवीं मुण्डमालाविभूषिताम् ।
इति ध्यात्वा महादेवीं ततस्तु कवचं पठेत् ॥ १० ॥
॥ अथ कवचम् ॥
ओम् । कालिका घोररूपाद्या सर्वकामप्रदा शुभा ।
सर्वदेवस्तुता देवी शत्रुनाशं करोतु मे ॥ ११ ॥
ह्रीं ह्रीं स्वरूपिणीं चैव ह्रीं ह्रीं हूं रूपिणीं तथा ।
ह्रीं ह्रीं क्षें क्षें स्वरूपा सा सदा शत्रून् विदारयेत् ॥ १२ ॥
श्रीं ह्रीं ऐं रूपिणी देवी भवबन्धविमोचिनी ।
हूं रूपिणी महाकाली रक्षास्मान् देवि सर्वदा ॥ १३ ॥
यथा शुम्भो हतो दैत्यो निशुम्भश्च महासुरः ।
वैरिनाशाय वन्दे तां कालिकां शङ्करप्रियाम् ॥ १४ ॥
॥ अष्ट मातृका रक्षा ॥
ब्राह्मी शैवी वैष्णवी च वाराही नारसिंहिका ।
कौमार्यैन्द्री च चामुण्डा खादयन्तु मम द्विषः ॥ १५ ॥
सुरेश्वरी घोररूपा चण्डमुण्डविनाशिनी ।
मुण्डमालावृताङ्गी च सर्वतः पातु मां सदा ॥ १६ ॥
॥ शत्रुनाश बीज मंत्र ॥
ह्रां ह्रीं कालिके घोरदंष्ट्रे रुधिरप्रिये रुधिरपूर्णवक्त्रे
रुधिरावृत्तितस्तनि मम शत्रून् खादय खादय हिंस हिंस
मारय मारय भिन्धि भिन्धि छिन्धि छिन्धि उच्चाटय उच्चाटय
द्रावय द्रावय शोषय शोषय स्वाहा ।
ओं जय जय किरि किरि मर्दय मर्दय मोहय मोहय
हर हर मम रिपून् ध्वंसय ध्वंसय भक्षय भक्षय
त्रोटय त्रोटय यातुदानानि चामुण्डी
सर्वजनान् राज्ञो राजपुरुषान् स्त्रियो वशान् कुरु कुरु
तनु तनु धान्यं धनमश्वाश्च गजांश्च रत्नानि दिव्यकामिनीः
पुत्रान् राज्यं प्रियं देहि देहि यच्छय यच्छय
क्षां क्षीं क्षूं क्षैं क्षौं क्षः स्वाहा ॥ १७ ॥
॥ फलश्रुति ॥
इत्येतत् कवचं दिव्यं कथितं शम्भुना पुरा ।
ये पठन्ति सदा तेषां ध्रुवं नश्यन्ति शत्रवः ॥ १८ ॥
प्रलयः सर्वव्याधीनां भवतीह न संशयः ।
धनहीनाः पुत्रहीनाः शत्रवस्तस्य सर्वदा ॥ १९ ॥
सहस्रपठनात् सिद्धिः कवचस्य भवेत्तदा ।
ततः कार्याणि सिद्ध्यन्ति यथा शङ्करभाषितम् ॥ २० ॥
॥ प्रयोग विधि ॥
श्मशानाङ्गारमादाय चूर्णीकृत्य प्रयत्नतः ।
पादोदकेन स्पृष्ट्वा च लिखेल्लोहशलाकया ॥ २१ ॥
भूमौ शत्रून् हीनरूपान् उत्तराशिरसस्तथा ।
हस्तं दत्त्वा तु हृदये कवचं तु स्वयं पठेत् ॥ २२ ॥
शत्रोः प्राणप्रतिष्ठां तु कुर्यान्मन्त्रेण मन्त्रवित् ।
हन्यादस्त्रप्रहारेण शत्रुर्गच्छेद्यमालयम् ॥ २३ ॥
ज्वलदङ्गारतापेन भवन्ति ज्वरिणोऽरयः ।
प्रोक्षणैर्वामपादेन दरिद्रो भवति ध्रुवम् ॥ २४ ॥
वैरिनाशकरं प्रोक्तं कवचं वश्यकारकम् ।
परमैश्वर्यदं चैव पुत्रपौत्रादिवृद्धिदम् ॥ २५ ॥
प्रभातसमये चैव पूजाकाले च यत्नतः ।
सायङ्काले तथा पाठात् सर्वसिद्धिर्भवेद्ध्रुवम् ॥ २६ ॥
शत्रुरुच्चाटनं याति देशाच्च विच्युतो भवेत् ।
पश्चात्किङ्करमाप्नोति सत्यं सत्यं न संशयः ॥ २७ ॥
शत्रुनाशकरं देवि सर्वसम्पत्प्रदे शुभे ।
सर्वदेवस्तुते देवि कालिके त्वां नमाम्यहम् ॥ २८ ॥
॥ इति श्रीरुद्रयामले कालिकाकल्पे वैरिनाशकरं नाम श्रीकालिकाकवचं सम्पूर्णम् ॥
कवच परिचय
श्री कालिका कवचम् (वैरिनाशकरम्) रुद्रयामल तंत्र के कालिकाकल्प से लिया गया अत्यंत शक्तिशाली कवच है।
ग्रंथ: श्रीरुद्रयामल कालिकाकल्प
ऋषि: भैरव
छंद: अनुष्टुप्
देवता: श्रीकालिका
विनियोग: शत्रुसंहारार्थं
श्लोक: 28
नाम: वैरिनाशकरम् (शत्रुनाशक)
कवच की संरचना
| भाग | श्लोक | विषय |
|---|---|---|
| प्रश्न | 1-3 | देवी का शिव से प्रश्न |
| उत्तर | 4-6 | भैरव द्वारा कवच महिमा |
| विनियोग | - | ऋषि-छंद-देवता |
| करन्यास | - | 6 बीज मंत्र |
| हृदयादि न्यास | - | षडंग न्यास |
| ध्यान | 7-10 | काली स्वरूप ध्यान |
| कवच | 11-17 | मुख्य कवच + बीज मंत्र |
| फलश्रुति | 18-28 | पाठ फल और प्रयोग |
करन्यास - बीज मंत्र
| बीज | अंगुली | मंत्र |
|---|---|---|
| क्रां | अंगूठा | ओं क्रां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः |
| क्रीं | तर्जनी | ओं क्रीं तर्जनीभ्यां नमः |
| क्रूं | मध्यमा | ओं क्रूं मध्यमाभ्यां नमः |
| क्रैं | अनामिका | ओं क्रैं अनामिकाभ्यां नमः |
| क्रौं | कनिष्ठिका | ओं क्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः |
| क्रः | करतल-पृष्ठ | ओं क्रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः |
हृदयादि न्यास (षडंग)
| अंग | बीज | समापन |
|---|---|---|
| हृदय | क्रां | नमः |
| शिर | क्रीं | स्वाहा |
| शिखा | क्रूं | वषट् |
| कवच | क्रैं | हुम् |
| नेत्र | क्रौं | वौषट् |
| अस्त्र | क्रः | फट् |
अष्ट मातृकाएं (श्लोक 15)
"ब्राह्मी शैवी वैष्णवी च वाराही नारसिंहिका ।
कौमार्यैन्द्री च चामुण्डा खादयन्तु मम द्विषः ॥"
आठ मातृकाएं शत्रुओं को खा जाएं - यह प्रार्थना है:
1. ब्राह्मी
2. शैवी
3. वैष्णवी
4. वाराही
5. नारसिंही
6. कौमारी
7. ऐन्द्री
8. चामुण्डा
शत्रुनाश बीज मंत्र (श्लोक 17)
यह कवच का मुख्य शक्तिशाली मंत्र है जिसमें अनेक क्रियाएं हैं:
| क्रिया | अर्थ |
|---|---|
| खादय खादय | खा जाओ |
| हिंस हिंस | हिंसा करो |
| मारय मारय | मार डालो |
| भिन्धि भिन्धि | तोड़ दो |
| छिन्धि छिन्धि | काट दो |
| उच्चाटय उच्चाटय | उच्चाटन करो |
| द्रावय द्रावय | भगा दो |
| शोषय शोषय | सुखा दो |
| मोहय मोहय | मोहित करो |
| ध्वंसय ध्वंसय | नष्ट करो |
फलश्रुति
✓शत्रुनाश: शत्रु ध्रुव (निश्चित) नष्ट होते हैं
✓व्याधि नाश: सभी रोगों का अंत
✓वश्यकारक: वशीकरण शक्ति
✓ऐश्वर्य: परम ऐश्वर्य प्राप्ति
✓पुत्र-पौत्र: वंश वृद्धि
✓उच्चाटन: शत्रु देश से विच्युत
✓किंकर: शत्रु सेवक बन जाए
सिद्धि: 1000 बार पाठ से कवच सिद्ध होता है।
पाठ विधि
- समय: प्रातः, पूजाकाल, सायंकाल
- क्रम: विनियोग → करन्यास → हृदयादि न्यास → ध्यान → कवच
- पाठ: 1, 11, 21 या 108 बार
- सिद्धि: 1000 पाठ से पूर्ण सिद्धि
- विशेष: अमावस्या, मंगलवार, शनिवार में विशेष फल
- सावधानी: शत्रुनाश प्रयोग गुरु मार्गदर्शन में करें
FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. वैरिनाशकम् का क्या अर्थ है?
वैरि = शत्रु, नाशकम् = नष्ट करने वाला। यह कवच विशेष रूप से शत्रुओं के नाश हेतु है।
2. कालिकाकल्प क्या है?
रुद्रयामल तंत्र का वह भाग जिसमें विशेष रूप से काली साधना का वर्णन है।
3. क्रीं बीज का क्या महत्व है?
क्रीं = काली बीज मंत्र। क = काली, र = ब्रह्म, ई = महामाया, ं = नाद। काली की मूल शक्ति।
4. क्या गृहस्थ पाठ कर सकते हैं?
हाँ, रक्षा हेतु पाठ कर सकते हैं। शत्रुनाश प्रयोग के लिए गुरु दीक्षा आवश्यक।
5. "खादय खादय" का अर्थ?
खाद = खाना। "खादय" = खा जाओ। माँ काली से प्रार्थना कि शत्रुओं को खा जाएं।
6. 1000 पाठ क्यों?
तांत्रिक परम्परा में मंत्र/कवच सिद्धि के लिए निश्चित संख्या में पाठ आवश्यक। पुरश्चरण विधि।