Sri Kalika Sahasranama Stotram – श्री कालिका सहस्रनाम स्तोत्रम्

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कालिका सहस्रनाम स्तोत्रम् ॥
॥ श्री शिव उवाच ॥
कथितोऽयं महामन्त्रः सर्वमन्त्रोत्तमोत्तमः ।
यामासाद्य मया प्राप्तमैश्वर्यपदमुत्तमम् ॥ १ ॥
(श्री शिव बोले: यह महामंत्र कहा गया है जो सभी मंत्रों में उत्तम से भी उत्तम है। जिसे प्राप्त करके मैंने उत्तम ऐश्वर्य पद प्राप्त किया है।)
सम्युक्तः परया भक्त्या यथोक्त विधिना भवान् ।
कुरुतामर्चनं देव्यास्त्रैलोक्यविजिगीषया ॥ २ ॥
(आप परम भक्ति से युक्त होकर और यथोक्त विधि से त्रैलोक्य को जीतने की इच्छा से देवी का अर्चन करें।)
॥ श्रीपरशुराम उवाच ॥
प्रसन्नो यदि मे देव परमेश पुरातन ।
रहस्यं परमं देव्याः कृपया कथय प्रभो ॥ ३ ॥
(श्री परशुराम बोले: हे देव! हे पुरातन परमेश्वर! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो हे प्रभो! कृपया देवी का परम रहस्य कहिए।)
विनार्चनं विना होमं विना न्यासं विना बलिम् ।
विना गन्धं विना पुष्पं विना नित्योदितां क्रियाम् ॥ ४ ॥
प्राणायामं विना ध्यानम् विना भूतविशोधनम् ।
विना दानं विना जापं येन काली प्रसीदति ॥ ५ ॥
(जिसके बिना अर्चन, बिना होम, बिना न्यास, बिना बलि, बिना गंध-पुष्प, बिना नित्य क्रिया, बिना प्राणायाम-ध्यान, बिना भूत-शुद्धि और बिना दान-जप के ही काली प्रसन्न हो जाती हैं—वह रहस्य बताइए।)
॥ श्री शिव उवाच ॥
पृष्टं त्वयोत्तमं प्राज्ञ भृगुवंश समुद्भव ।
भक्तानामपि भक्तोऽसि त्वमेव साधयिष्यसि ॥ ६ ॥
(श्री शिव बोले: हे भृगुवंश में उत्पन्न प्राज्ञ! तुमने बहुत उत्तम प्रश्न पूछा है। तुम भक्तों के भी भक्त हो, तुम इसे अवश्य सिद्ध कर सकोगे।)
देवीं दानवकोटिघ्नीं लीलया रुधिरप्रियाम् ।
सदा स्तोत्रप्रियामुग्रां कामकौतुकलालसाम् ॥ ७ ॥
(उन देवी को जो करोड़ों दानवों का नाश करने वाली हैं, जिन्हें लीलापूर्वक रुधिर (रक्त) प्रिय है, जो सदा स्तोत्र से प्रसन्न होती हैं, जो उग्र हैं और काम-कौतुक की लालसा रखती हैं।)
सर्वदाऽऽनन्दहृदयामासवोत्सव मानसाम् ।
माध्वीक मत्स्यमांसानुरागिणीं वैष्णवीं पराम् ॥ ८ ॥
(जिनका हृदय सदा आनंद से भरा रहता है, जो आसव (मदिरा) के उत्सव में मग्न रहती हैं, जो मधु, मत्स्य और मांस में अनुराग रखती हैं, और जो परम वैष्णवी शक्ति हैं।)
श्मशानवासिनीं प्रेतगणनृत्यमहोत्सवाम् ।
योगप्रभावां योगेशीं योगीन्द्रहृदयस्थिताम् ॥ ९ ॥
(जो श्मशान में निवास करती हैं, जिन्हें प्रेतगणों का नृत्य और महोत्सव प्रिय है। जो योगप्रभावा हैं, योगेश्वरी हैं और योगन्द्रों के हृदय में स्थित रहती हैं।)
तामुग्रकालिकां राम प्रसीदयितुमर्हसि ।
तस्याः स्तोत्रं परं पुण्यं स्वयं काल्या प्रकाशितम् ॥ १० ॥
(हे राम (परशुराम)! उन उग्र कालिका को तुम प्रसन्न करने योग्य हो। उनका यह परम पवित्र स्तोत्र स्वयं काली द्वारा प्रकाशित किया गया है।)
तव तत् कथयिष्यामि श्रुत्वा वत्सावधारय ।
गोपनीयं प्रयत्नेन पठनीयं परात्परम् ॥ ११ ॥
(हे वत्स! मैं तुम्हें वह बताता हूँ, सुनकर इसे धारण करो। यह परात्पर स्तोत्र प्रयत्नपूर्वक गोपनीय रखना चाहिए और पढ़ना चाहिए।)
यस्यैककालपठनात् सर्वे विघ्नाः समाकुलाः ।
नश्यन्ति दहने दीप्ते पतङ्गा इव सर्वतः ॥ १२ ॥
(जिसके एक बार पढ़ने मात्र से सभी विघ्न व्याकुल होकर वैसे ही नष्ट हो जाते हैं जैसे जलती हुई अग्नि में पतंगे।)
गद्यपद्यमयी वाणी तस्य गङ्गाप्रवाहवत् ।
तस्य दर्शनमात्रेण वादिनो निष्प्रभां गताः ॥ १३ ॥
(उसकी गद्य-पद्य मयी वाणी गंगा के प्रवाह की तरह (धाराप्रवाह) हो जाती है। उसके दर्शन मात्र से ही वादी (तर्क करने वाले) निस्तेज हो जाते हैं।)
तस्य हस्ते सदैवास्ति सर्वसिद्धिर्न संशयः ।
राजानोऽपि च दासत्वं भजन्ते किं परे जनाः ॥ १४ ॥
(उसके हाथ में सदा सर्वसिद्धि रहती है, इसमें संशय नहीं। राजा भी उसकी दासता स्वीकार कर लेते हैं, तो अन्य लोगों की क्या बात!)
निशीथे मुक्तकेशस्तु नग्नः शक्तिसमाहितः ।
मनसा चिन्तयेत् कालीं महाकालेन चालिताम् ॥ १५ ॥
(मध्यरात्रि (निशीथ) में मुक्तकेश (बाल खोलकर), नग्न होकर, शक्ति के साथ एकाग्र होकर, महाकाल द्वारा संचालित काली का मन से चिंतन करे।)
पठेत् सहस्रनामाख्यं स्तोत्रं मोक्षस्य साधनम् ।
प्रसन्ना कालिका तस्य पुत्रत्वेनानुकम्पते ॥ १६ ॥
(और मोक्ष के साधन इस 'सहस्रनाम' स्तोत्र का पाठ करे। उससे प्रसन्न होकर कालिका उस पर पुत्रवत कृपा करती हैं।)
यथा ब्रह्ममृतैर्ब्रह्मकुसुमैः पूजिता परा ।
प्रसीदति तथानेन स्तुता काली प्रसीदति ॥ १७ ॥
(जैसे ब्रह्म-अमृत और ब्रह्म-पुष्पों से पूजित होने पर पराशक्ति प्रसन्न होती हैं, वैसे ही इस स्तुति से काली प्रसन्न होती हैं।)
॥ विनियोग ॥
अस्य श्री दक्षिणकालिका सहस्रनाम स्तोत्रस्य महाकालभैरव ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः श्मशानकाली देवता धर्मार्थकाममोक्षार्थे पाठे विनियोगः ।
॥ ध्यानम् ॥
शवारूढां महाभीमां घोरदंष्ट्रां हसन्मुखीं
चतुर्भुजां खड्गमुण्डवराभयकरां शिवाम् ।
मुण्डमालाधरां देवीं ललाज्जिह्वां दिगम्बरां
एवं सञ्चिन्तयेत्कालीं श्मशानालयवासिनीम् ॥
॥ स्तोत्रम् ॥
श्मशानकालिका काली भद्रकाली कपालिनी ।
गुह्यकाली महाकाली कुरुकुल्ला विरोधिनी ॥ १ ॥
कालिका कालरात्रिश्च महाकालनितम्बिनी ।
कालभैरवभार्या च कुलवर्त्मप्रकाशिनी ॥ २ ॥
कामदा कामिनी कन्या कमनीयस्वरूपिणी ।
कस्तूरीरसलिप्ताङ्गी कुञ्जरेश्वरगामिनी ॥ ३ ॥
ककारवर्णसर्वाङ्गी कामिनी कामसुन्दरी ।
कामार्ता कामरूपा च कामधेनुः कलावती ॥ ४ ॥
कान्ता कामस्वरूपा च कामाख्या कुलकामिनी ।
कुलीना कुलवत्यम्बा दुर्गा दुर्गतिनाशिनी ॥ ५ ॥
कौमारी कलजा कृष्णा कृष्णदेहा कृशोदरी ।
कृशाङ्गी कुलिशाङ्गी च क्रीङ्कारी कमला कला ॥ ६ ॥
करालास्या कराली च कुलकान्ताऽपराजिता ।
उग्रा उग्रप्रभा दीप्ता विप्रचित्ता महाबला ॥ ७ ॥
नीला घना मेघनादा मात्रा मुद्रा मितामिता ।
ब्राह्मी नारायणी भद्रा सुभद्रा भक्तवत्सला ॥ ८ ॥
माहेश्वरी च चामुण्डा वाराही नारसिंहिका ।
वज्राङ्गी वज्रकङ्काली नृमुण्डस्रग्विणी शिवा ॥ ९ ॥
मालिनी नरमुण्डाली गलद्रक्तविभूषणा ।
रक्तचन्दनसिक्ताङ्गी सिन्दूरारुणमस्तका ॥ १० ॥
घोररूपा घोरदंष्ट्रा घोराघोरतरा शुभा ।
महादंष्ट्रा महामाया सुदती युगदन्तुरा ॥ ११ ॥
सुलोचना विरूपाक्षी विशालाक्षी त्रिलोचना ।
शारदेन्दुप्रसन्नास्या स्फुरत्स्मेराम्बुजेक्षणा ॥ १२ ॥
अट्टहासप्रफुल्लास्या स्मेरवक्त्रा सुभाषिणी ।
प्रफुल्लपद्मवदना स्मितास्या प्रियभाषिणी ॥ १३ ॥
कोटराक्षी कुलश्रेष्ठा महती बहुभाषिणी ।
सुमतिः कुमतिश्चण्डा चण्डमुण्डातिवेगिनी ॥ १४ ॥
सुकेशी मुक्तकेशी च दीर्घकेशी महाकचा ।
प्रेतदेहाकर्णपूरा प्रेतपाणिसुमेखला ॥ १५ ॥
प्रेतासना प्रियप्रेता पुण्यदा कुलपण्डिता ।
पुण्यालया पुण्यदेहा पुण्यश्लोका च पावनी ॥ १६ ॥
पूता पवित्रा परमा परा पुण्यविभूषणा ।
पुण्यनाम्नी भीतिहरा वरदा खड्गपाणिनी ॥ १७ ॥
नृमुण्डहस्ता शान्ता च छिन्नमस्ता सुनासिका ।
दक्षिणा श्यामला श्यामा शान्ता पीनोन्नतस्तनी ॥ १८ ॥
दिगम्बरा घोररावा सृक्कान्तरक्तवाहिनी ।
घोररावा शिवासङ्गा निःसङ्गा मदनातुरा ॥ १९ ॥
मत्ता प्रमत्ता मदना सुधासिन्धुनिवासिनी ।
अतिमत्ता महामत्ता सर्वाकर्षणकारिणी ॥ २० ॥
गीतप्रिया वाद्यरता प्रेतनृत्यपरायणा ।
चतुर्भुजा दशभुजा अष्टादशभुजा तथा ॥ २१ ॥
कात्यायनी जगन्माता जगती परमेश्वरी ।
जगद्बन्धुर्जगद्धात्री जगदानन्दकारिणी ॥ २२ ॥
जगज्जीववती हैमवती माया महालया ।
नागयज्ञोपवीताङ्गी नागिनी नागशायिनी ॥ २३ ॥
नागकन्या देवकन्या गान्धारी किन्नरी सुरी ।
मोहरात्री महारात्री दारुणामासुरासुरी ॥ २४ ॥
विद्याधरी वसुमती यक्षिणी योगिनी जरा ।
राक्षसी डाकिनी वेदमयी वेदविभूषणा ॥ २५ ॥
श्रुतिस्मृतिमहाविद्या गुह्यविद्या पुरातनी ।
चिन्त्याऽचिन्त्या स्वधा स्वाहा निद्रा तन्द्रा च पार्वती ॥ २६ ॥
अपर्णा निश्चला लोला सर्वविद्या तपस्विनी ।
गङ्गा काशी शची सीता सती सत्यपरायणा ॥ २७ ॥
नीतिः सुनीतिः सुरुचिस्तुष्टिः पुष्टिर्धृतिः क्षमा ।
वाणी बुद्धिर्महालक्ष्मी लक्ष्मीर्नीलसरस्वती ॥ २८ ॥
स्रोतस्वती स्रोतवती मातङ्गी विजया जया ।
नदी सिन्धुः सर्वमयी तारा शून्यनिवासिनी ॥ २९ ॥
शुद्धा तरङ्गिणी मेधा लाकिनी बहुरूपिणी ।
सदानन्दमयी सत्या सर्वानन्दस्वरूपिणी ॥ ३० ॥
सुनन्दा नन्दिनी स्तुत्या स्तवनीया स्वभाविनी ।
रङ्किणी टङ्किणी चित्रा विचित्रा चित्ररूपिणी ॥ ३१ ॥
पद्मा पद्मालया पद्मसुखी पद्मविभूषणा ।
शाकिनी हाकिनी क्षान्ता राकिणी रुधिरप्रिया ॥ ३२ ॥
भ्रान्तिर्भवानी रुद्राणी मृडानी शत्रुमर्दिनी ।
उपेन्द्राणी महेशानी ज्योत्स्ना चेन्द्रस्वरूपिणी ॥ ३३ ॥
सूर्यात्मिका रुद्रपत्नी रौद्री स्त्री प्रकृतिः पुमान् ।
शक्तिः सूक्तिर्मतिमती भुक्तिर्मुक्तिः पतिव्रता ॥ ३४ ॥
सर्वेश्वरी सर्वमाता शर्वाणी हरवल्लभा ।
सर्वज्ञा सिद्धिदा सिद्धा भाव्या भव्या भयापहा ॥ ३५ ॥
कर्त्री हर्त्री पालयित्री शर्वरी तामसी दया ।
तमिस्रा यामिनीस्था च स्थिरा धीरा तपस्विनी ॥ ३६ ॥
चार्वङ्गी चञ्चला लोलजिह्वा चारुचरित्रिणी ।
त्रपा त्रपावती लज्जा निर्लज्जा ह्रीं रजोवती ॥ ३७ ॥
सत्त्ववती धर्मनिष्ठा श्रेष्ठा निष्ठुरवादिनी ।
गरिष्ठा दुष्टसंहर्त्री विशिष्टा श्रेयसी घृणा ॥ ३८ ॥
भीमा भयानका भीमनादिनी भीः प्रभावती ।
वागीश्वरी श्रीर्यमुना यज्ञकर्त्री यजुःप्रिया ॥ ३९ ॥
ऋक्सामाथर्वनिलया रागिणी शोभनस्वरा ।
कलकण्ठी कम्बुकण्ठी वेणुवीणापरायणा ॥ ४० ॥
वंशिनी वैष्णवी स्वच्छा धात्री त्रिजगदीश्वरी ।
मधुमती कुण्डलिनी ऋद्धिः सिद्धिः शुचिस्मिता ॥ ४१ ॥
रम्भोर्वशी रती रामा रोहिणी रेवती रमा ।
शङ्खिनी चक्रिणी कृष्णा गदिनी पद्मिनी तथा ॥ ४२ ॥
शूलिनी परिघास्त्रा च पाशिनी शार्ङ्गपाणिनी ।
पिनाकधारिणी धूम्रा शरभी वनमालिनी ॥ ४३ ॥
वज्रिणी समरप्रीता वेगिनी रणपण्डिता ।
जटिनी बिम्बिनी नीला लावण्याम्बुधिचन्द्रिका ॥ ४४ ॥
बलिप्रिया सदापूज्या पूर्णा दैत्येन्द्रमाथिनी ।
महिषासुरसंहन्त्री वासिनी रक्तदन्तिका ॥ ४५ ॥
रक्तपा रुधिराक्ताङ्गी रक्तखर्परहस्तिनी ।
रक्तप्रिया मांसरुचिर्वासवासक्तमानसा ॥ ४६ ॥
गलच्छोणितमुण्डालिकण्ठमालाविभूषणा ।
शवासना चितान्तस्था माहेशी वृषवाहिनी ॥ ४७ ॥
व्याघ्रत्वगम्बरा चीनचेलिनी सिंहवाहिनी ।
वामदेवी महादेवी गौरी सर्वज्ञभाविनी ॥ ४८ ॥
बालिका तरुणी वृद्धा वृद्धमाता जरातुरा ।
सुभ्रुर्विलासिनी ब्रह्मवादिनी ब्राह्मणी मही ॥ ४९ ॥
स्वप्नवती चित्रलेखा लोपामुद्रा सुरेश्वरी ।
अमोघाऽरुन्धती तीक्ष्णा भोगवत्यनुवादिनी ॥ ५० ॥
मन्दाकिनी मन्दहासा ज्वालामुख्यसुरान्तका ।
मानदा मानिनी मान्या माननीया मदोद्धता ॥ ५१ ॥
मदिरा मदिरान्मादा मेध्या नव्या प्रसादिनी ।
सुमध्याऽनन्तगुणिनी सर्वलोकोत्तमोत्तमा ॥ ५२ ॥
जयदा जित्वरा जैत्री जयश्रीर्जयशालिनी ।
सुखदा शुभदा सत्या सभासङ्क्षोभकारिणी ॥ ५३ ॥
शिवदूती भूतिमती विभूतिर्भीषणानना ।
कौमारी कुलजा कुन्ती कुलस्त्री कुलपालिका ॥ ५४ ॥
कीर्तिर्यशस्विनी भूषा भूष्या भूतपतिप्रिया ।
सगुणा निर्गुणा धृष्टा निष्ठा काष्ठा प्रतिष्ठिता ॥ ५५ ॥
धनिष्ठा धनदा धन्या वसुधा स्वप्रकाशिनी ।
उर्वी गुर्वी गुरुश्रेष्ठा सगुणा त्रिगुणात्मिका ॥ ५६ ॥
महाकुलीना निष्कामा सकामा कामजीवना ।
कामदेवकला रामाऽभिरामा शिवनर्तकी ॥ ५७ ॥
चिन्तामणिः कल्पलता जाग्रती दीनवत्सला ।
कार्तिकी कीर्तिका कृत्या अयोध्या विषमा समा ॥ ५८ ॥
सुमन्त्रा मन्त्रिणी घूर्णा ह्लादिनी क्लेशनाशिनी ।
त्रैलोक्यजननी हृष्टा निर्मांसा मनोरूपिणी ॥ ५९ ॥
तडागनिम्नजठरा शुष्कमांसास्थिमालिनी ।
अवन्ती मथुरा माया त्रैलोक्यपावनीश्वरी ॥ ६० ॥
व्यक्ताऽव्यक्ताऽनेकमूर्तिः शर्वरी भीमनादिनी ।
क्षेमङ्करी शङ्करी च सर्वसम्मोहकारिणी ॥ ६१ ॥
ऊर्ध्वतेजस्विनी क्लिन्ना महातेजस्विनी तथा ।
अद्वैता भोगिनी पूज्या युवती सर्वमङ्गला ॥ ६२ ॥
सर्वप्रियङ्करी भोग्या धरणी पिशिताशना ।
भयङ्करी पापहरा निष्कलङ्का वशङ्करी ॥ ६३ ॥
आशा तृष्णा चन्द्रकला निद्रान्या वायुवेगिनी ।
सहस्रसूर्यसङ्काशा चन्द्रकोटिसमप्रभा ॥ ६४ ॥
वह्निमण्डलसंस्था च सर्वतत्त्वप्रतिष्ठिता ।
सर्वाचारवती सर्वदेवकन्याधिदेवता ॥ ६५ ॥
दक्षकन्या दक्षयज्ञनाशिनी दुर्गतारिका ।
इज्या पूज्या विभा भूतिः सत्कीर्तिर्ब्रह्मरूपिणी ॥ ६६ ॥
रम्भोरुश्चतुरा राका जयन्ती करुणा कुहुः ।
मनस्विनी देवमाता यशस्या ब्रह्मचारिणी ॥ ६७ ॥
ऋद्धिदा वृद्धिदा वृद्धिः सर्वाद्या सर्वदायिनी ।
आधाररूपिणी ध्येया मूलाधारनिवासिनी ॥ ६८ ॥
अज्ञा प्रज्ञा पूर्णमनाश्चन्द्रमुख्यनुकूलिनी ।
वावदूका निम्ननाभिः सत्या सन्ध्या दृढव्रता ॥ ६९ ॥
आन्वीक्षिकी दण्डनीतिस्त्रयी त्रिदिवसुन्दरी ।
ज्वलिनी ज्वालिनी शैलतनया विन्ध्यवासिनी ॥ ७० ॥
अमेया खेचरी धैर्या तुरीया विमलाऽऽतुरा ।
प्रगल्भा वारुणी छाया शशिनी विस्फुलिङ्गिनी ॥ ७१ ॥
भुक्तिः सिद्धिः सदाप्राप्तिः प्राकाम्या महिमाऽणिमा ।
इच्छासिद्धिर्विसिद्धा च वशित्वोर्ध्वनिवासिनी ॥ ७२ ॥
लघिमा चैव गायत्री सावित्री भुवनेश्वरी ।
मनोहरा चिता दिव्या देव्युदारा मनोरमा ॥ ७३ ॥
पिङ्गला कपिला जिह्वारसज्ञा रसिका रसा ।
सुषुम्नेडा भोगवती गान्धारी नरकान्तका ॥ ७४ ॥
पाञ्चाली रुक्मिणी राधाराध्या भीमाधिराधिका ।
अमृता तुलसी वृन्दा कैटभी कपटेश्वरी ॥ ७५ ॥
उग्रचण्डेश्वरी वीरा जननी वीरसुन्दरी ।
उग्रतारा यशोदाख्या दैवकी देवमानिता ॥ ७६ ॥
निरञ्जना चित्रदेवी क्रोधिनी कुलदीपिका ।
कुलवागीश्वरी वाणी मातृका द्राविणी द्रवा ॥ ७७ ॥
योगेश्वरी महामारी भ्रामरी बिन्दुरूपिणी ।
दूती प्राणेश्वरी गुप्ता बहुला चमरी प्रभा ॥ ७८ ॥
कुब्जिका ज्ञानिनी ज्येष्ठा भुशुण्डी प्रकटा तिथिः ।
द्रविणी गोपनी माया कामबीजेश्वरी क्रिया ॥ ७९ ॥
शाम्भवी केकरा मेना मूषलास्त्रा तिलोत्तमा ।
अमेयविक्रमा क्रूरा सम्पत्शाला त्रिलोचना ॥ ८० ॥
स्वस्तिर्हव्यवहा प्रीतिरुष्मा धूम्रार्चिरङ्गदा ।
तपिनी तापिनी विश्वा भोगदा धारिणी धरा ॥ ८१ ॥
त्रिखण्डा बोधिनी वश्या सकला शब्दरूपिणी ।
बीजरूपा महामुद्रा योगिनी योनिरूपिणी ॥ ८२ ॥
अनङ्गकुसुमाऽनङ्गमेखलाऽनङ्गरूपिणी ।
वज्रेश्वरी च जयिनी सर्वद्वन्द्वक्षयङ्करी ॥ ८३ ॥
षडङ्गयुवती योगयुक्ता ज्वालांशुमालिनी ।
दुराशया दुराधारा दुर्जया दुर्गरूपिणी ॥ ८४ ॥
दुरन्ता दुष्कृतिहरा दुर्ध्येया दुरतिक्रमा ।
हंसेश्वरी त्रिकोणस्था शाकम्भर्यनुकम्पिनी ॥ ८५ ॥
त्रिकोणनिलया नित्या परमामृतरञ्जिता ।
महाविद्येश्वरी श्वेता भेरुण्डा कुलसुन्दरी ॥ ८६ ॥
त्वरिता भक्तिसंसक्ता भक्तवश्या सनातनी ।
भक्तानन्दमयी भक्तभाविका भक्तशङ्करी ॥ ८७ ॥
सर्वसौन्दर्यनिलया सर्वसौभाग्यशालिनी ।
सर्वसम्भोगभवना सर्वसौख्यनिरूपिणी ॥ ८८ ॥
कुमारीपूजनरता कुमारीव्रतचारिणी ।
कुमारीभक्तिसुखिनी कुमारीरूपधारिणी ॥ ८९ ॥
कुमारीपूजकप्रीता कुमारीप्रीतिदा प्रिया ।
कुमारीसेवकासङ्गा कुमारीसेवकालया ॥ ९० ॥
आनन्दभैरवी बालभैरवी बटुभैरवी ।
श्मशानभैरवी कालभैरवी पुरभैरवी ॥ ९१ ॥
महाभैरवपत्नी च परमानन्दभैरवी ।
सुधानन्दभैरवी च उन्मादानन्दभैरवी ॥ ९२ ॥
मुक्तानन्दभैरवी च तथा तरुणभैरवी ।
ज्ञानानन्दभैरवी च अमृतानन्दभैरवी ॥ ९३ ॥
महाभयङ्करी तीव्रा तीव्रवेगा तपस्विनी ।
त्रिपुरा परमेशानी सुन्दरी पुरसुन्दरी ॥ ९४ ॥
त्रिपुरेशी पञ्चदशी पञ्चमी पुरवासिनी ।
महासप्तदशी चैव षोडशी त्रिपुरेश्वरी ॥ ९५ ॥
महाङ्कुशस्वरूपा च महाचक्रेश्वरी तथा ।
नवचक्रेश्वरी चक्रेश्वरी त्रिपुरमालिनी ॥ ९६ ॥
राजराजेश्वरी धीरा महात्रिपुरसुन्दरी ।
सिन्दूरपूररुचिरा श्रीमत्त्रिपुरसुन्दरी ॥ ९७ ॥
सर्वाङ्गसुन्दरी रक्तारक्तवस्त्रोत्तरीयिणी ।
जवायावकसिन्दूररक्तचन्दनधारिणी ॥ ९९ ॥
जवायावकसिन्दूररक्तचन्दनरूपधृक् ।
चामरी बालकुटिलनिर्मला श्यामकेशिनी ॥ १०० ॥
वज्रमौक्तिकरत्नाढ्या किरीटमुकुटोज्ज्वला ।
रत्नकुण्डलसम्युक्तस्फुरद्गण्डमनोरमा ॥ १०१ ॥
कुञ्जरेश्वरकुम्भोत्थमुक्तारञ्जितनासिका ।
मुक्ताविद्रुममाणिक्यहाराढ्यस्तनमण्डला ॥ १०२ ॥
सूर्यकान्तेन्दुकान्ताढ्यस्पर्शाश्मकण्ठभूषणा ।
बीजपूरस्फुरद्बीजदन्तपङ्क्तिरनुत्तमा ॥ १०३ ॥
कामकोदण्डकाभुग्नभ्रूकटाक्षप्रवर्षिणी ।
मातङ्गकुम्भवक्षोजा लसत्कोकनदेक्षणा ॥ १०४ ॥
मनोज्ञशष्कुलीकर्णा हंसीगतिविडम्बिनी ।
पद्मरागाङ्गदज्योतिर्दोश्चतुष्कप्रकाशिनी ॥ १०५ ॥
नानामणिपरिस्फूर्जच्छुद्धकाञ्चनकङ्कणा ।
नागेन्द्रदन्तनिर्माणवलयाङ्कितपाणिनी ॥ १०६ ॥
अङ्गुरीयकचित्राङ्गी विचित्रक्षुद्रघण्टिका ।
पट्टाम्बरपरीधाना कलमञ्जीरशिञ्जिनी ॥ १०७ ॥
कर्पूरागरुकस्तूरीकुङ्कुमद्रवलेपिता ।
विचित्ररत्नपृथिवीकल्पशाखितलस्थिता ॥ १०८ ॥
रत्नद्वीपस्फुरद्रत्नसिंहासनविलासिनी ।
षट्चक्रभेदनकरी परमानन्दरूपिणी ॥ १०९ ॥
सहस्रदलपद्मान्तश्चन्द्रमण्डलवर्तिनी ।
ब्रह्मरूपा शिवक्रोडा नानासुखविलासिनी ॥ ११० ॥
हरविष्णुविरिञ्चीन्द्रग्रहनायकसेविता ।
शिवा शैवा च रुद्राणी तथैव शिववादिनी ॥ १११ ॥
मातङ्गिनी श्रीमती च तथैवानङ्गमेखला ।
डाकिनी योगिनी चैव तथोपयोगिनी मता ॥ ११२ ॥
माहेश्वरी वैष्णवी च भ्रामरी शिवरूपिणी ।
अलम्बुषा वेगवती क्रोधरूपा सुमेखला ॥ ११३ ॥
गान्धारी हस्तजिह्वा च इडा चैव शुभङ्करी ।
पिङ्गला ब्रह्मदूती च सुषुम्ना चैव गन्धिनी ॥ ११४ ॥
आत्मयोनिर्ब्रह्मयोनिर्जगद्योनिरयोनिजा ।
भगरूपा भगस्थात्री भगिनी भगरूपिणी ॥ ११५ ॥
भगात्मिका भगाधाररूपिणी भगमालिनी ।
लिङ्गाख्या चैव लिङ्गेशी त्रिपुरा भैरवी तथा ॥ ११६ ॥
लिङ्गगीतिः सुगीतिश्च लिङ्गस्था लिङ्गरूपधृक् ।
लिङ्गमाना लिङ्गभवा लिङ्गलिङ्गा च पार्वती ॥ ११७ ॥
भगवती कौशिकी च प्रेमा चैव प्रियंवदा ।
गृध्ररूपा शिवारूपा चक्रिणी चक्ररूपधृक् ॥ ११८ ॥
लिङ्गाभिधायिनी लिङ्गप्रिया लिङ्गनिवासिनी ।
लिङ्गस्था लिङ्गनी लिङ्गरूपिणी लिङ्गसुन्दरी ॥ ११९ ॥
लिङ्गगीतिर्महाप्रीता भगगीतिर्महासुखा ।
लिङ्गनामसदानन्दा भगनामसदागतिः ॥ १२० ॥
लिङ्गमालाकण्ठभूषा भगमालाविभूषणा ।
भगलिङ्गामृतप्रीता भगलिङ्गस्वरूपिणी ॥ १२१ ॥
भगलिङ्गस्य रूपा च भगलिङ्गसुखावहा ।
स्वयम्भूकुसुमप्रीता स्वयम्भूकुसुमार्चिता ॥ १२२ ॥
स्वयम्भूकुसुमप्राणा स्वयम्भूपुष्पतर्पिता ।
स्वयम्भूपुष्पघटिता स्वयम्भूपुष्पधारिणी ॥ १२३ ॥
स्वयम्भूपुष्पतिलका स्वयम्भूपुष्पचर्चिता ।
स्वयम्भूपुष्पनिरता स्वयम्भूकुसुमग्रहा ॥ १२४ ॥
स्वयम्भूपुष्पयज्ञांशा स्वयम्भूकुसुमात्मिका ।
स्वयम्भूपुष्पनिचिता स्वयम्भूकुसुमप्रिया ॥ १२५ ॥
स्वयम्भूकुसुमादानलालसोन्मत्तमानसा ।
स्वयम्भूकुसुमानन्दलहरीस्निग्धदेहिनी ॥ १२६ ॥
स्वयम्भूकुसुमाधारा स्वयम्भूकुसुमाकुला ।
स्वयम्भूपुष्पनिलया स्वयम्भूपुष्पवासिनी ॥ १२७ ॥
स्वयम्भूकुसुमस्निग्धा स्वयम्भूकुसुमात्मिका ।
स्वयम्भूपुष्पकरिणी स्वयम्भूपुष्पवाणिका ॥ १२८ ॥
स्वयम्भूकुसुमध्याना स्वयम्भूकुसुमप्रभा ।
स्वयम्भूकुसुमज्ञाना स्वयम्भूपुष्पभागिनी ॥ १२९ ॥
स्वयम्भूकुसुमोल्लासा स्वयम्भूपुष्पवर्षिणी ।
स्वयम्भूकुसुमोत्साहा स्वयम्भूपुष्परूपिणी ॥ १३० ॥
स्वयम्भूकुसुमोन्मादा स्वयम्भूपुष्पसुन्दरी ।
स्वयम्भूकुसुमाराध्या स्वयम्भूकुसुमोद्भवा ॥ १३१ ॥
स्वयम्भूकुसुमाव्यग्रा स्वयम्भूपुष्पपूर्णिता ।
स्वयम्भूपूजकप्राज्ञा स्वयम्भूहोतृमातृका ॥ १३२ ॥
स्वयम्भूदातृरक्षित्री स्वयम्भूरक्ततारिका ।
स्वयम्भूपूजकग्रस्ता स्वयम्भूपूजकप्रिया ॥ १३३ ॥
स्वयम्भूवन्दकाधारा स्वयम्भूनिन्दकान्तका ।
स्वयम्भूप्रदसर्वस्वा स्वयम्भूप्रदपुत्रिणी ॥ १३४ ॥
स्वयम्भूप्रदसस्मेरा स्वयम्भूतशरीरिणी ।
सर्वकालोद्भवप्रीता सर्वकालोद्भवात्मिका ॥ १३५ ॥
सर्वकालोद्भवोद्भावा सर्वकालोद्भवोद्भवा ।
कुण्डपुष्पसदाप्रीता कुण्डपुष्पसदारतिः ॥ १३६ ॥
कुण्डगोलोद्भवप्राणा कुण्डगोलोद्भवात्मिका ।
स्वयम्भूर्वा शिवा धात्री पावनी लोकपावनी ॥ १३७ ॥
कीर्तिर्यशस्विनी मेधा विमेधा शुक्रसुन्दरी ।
अश्विनी कृत्तिका पुष्या तेजस्का चन्द्रमण्डला ॥ १३८ ॥
सूक्ष्माऽसूक्ष्मा बलाका च वरदा भयनाशिनी ।
वरदाऽभयदा चैव मुक्तिबन्धविनाशिनी ॥ १३९ ॥
कामुका कामदा कान्ता कामाख्या कुलसुन्दरी ।
दुःखदा सुखदा मोक्षा मोक्षदार्थप्रकाशिनी ॥ १४० ॥
दुष्टादुष्टमतिश्चैव सर्वकार्यविनाशिनी ।
शुक्राधारा शुक्ररूपा शुक्रसिन्धुनिवासिनी ॥ १४१ ॥
शुक्रालया शुक्रभोगा शुक्रपूजासदारतिः ।
शुक्रपूज्या शुक्रहोमसन्तुष्टा शुक्रवत्सला ॥ १४२ ॥
शुक्रमूर्तिः शुक्रदेहा शुक्रपूजकपुत्रिणी ।
शुक्रस्था शुक्रिणी शुक्रसंस्पृहा शुक्रसुन्दरी ॥ १४३ ॥
शुक्रस्नाता शुक्रकरी शुक्रसेव्याऽतिशुक्रिणी ।
महाशुक्रा शुक्रभवा शुक्रवृष्टिविधायिनी ॥ १४४ ॥
शुक्राभिधेया शुक्रार्हा शुक्रवन्दकवन्दिता ।
शुक्रानन्दकरी शुक्रसदानन्दाभिधायिका ॥ १४५ ॥
शुक्रोत्सवा सदाशुक्रपूर्णा शुक्रमनोरमा ।
शुक्रपूजकसर्वस्वा शुक्रनिन्दकनाशिनी ॥ १४६ ॥
शुक्रात्मिका शुक्रसंवत् शुक्राकर्षणकारिणी ।
शारदा साधकप्राणा साधकासक्तमानसा ॥ १४७ ॥
साधकोत्तमसर्वस्वा साधकाभक्तरक्तपा ।
साधकानन्दसन्तोषा साधकानन्दकारिणी ॥ १४८ ॥
आत्मविद्या ब्रह्मविद्या परब्रह्मस्वरूपिणी ।
त्रिकूटस्था पञ्चकूटा सर्वकूटशरीरिणी ॥ १४९ ॥
सर्ववर्णमयी वर्णजपमालाविधायिनी ।
इति श्रीकालिकानामसहस्रं शिवभाषितम् ॥ १५० ॥
(वह सर्ववर्णमयी है और वर्णमाला (अक्षरों) के जप की माला धारण करने वाली है। इस प्रकार शिव द्वारा कहा गया यह श्री कालिका का सहस्रनाम सम्पूर्ण हुआ।)
गुह्याद्गुह्यतरं साक्षान्महापातकनाशनम् ।
पूजाकाले निशीथे च सन्ध्ययोरुभयोरपि ॥ १५१ ॥
(यह साक्षात् गोपनीय से भी गोपनीय और महापातकों (पापों) का नाश करने वाला है। पूजा काल में, मध्यरात्रि (निशीथ) में और दोनों संध्याओं में...)
लभते गाणपत्यं स यः पठेत् साधकोत्तमः ।
यः पठेत् पाठयेद्वापि शृणोति श्रावयेदपि ॥ १५२ ॥
(जो उत्तम साधक इसे पढ़ता है, या जो पढ़ता-पढ़ाता है, सुनता-सुनाता है, वह 'गाणपत्य' (शिव के गणों का पद) प्राप्त करता है।)
सर्वपापविनिर्मुक्तः स याति कालिकापुरम् ।
श्रद्धयाऽश्रद्धया वापि यः कश्चिन्मानवः स्मरेत् ॥ १५३ ॥
(वह सभी पापों से मुक्त होकर कालिकापुर (देवी लोक) को जाता है। श्रद्धा से या बिना श्रद्धा के भी जो कोई मनुष्य इसका स्मरण करता है...)
दुर्गं दुर्गशतं तीर्त्वा स याति परमाङ्गतिम् ।
वन्ध्या वा काकवन्ध्या वा मृतवत्सा च याङ्गना ॥ १५४ ॥
(वह सैकड़ों दुर्गम संकटों को पार करके परम गति को प्राप्त करता है। वन्ध्या (बांझ), काकवन्ध्या (एक संतान वाली) या मृतवत्सा (जिसकी संतान मर जाती हो) स्त्री भी...)
श्रुत्वा स्तोत्रमिदं पुत्रान् लभते चिरजीविनः ।
यं यं कामयते कामं पठन् स्तोत्रमनुत्तमम् ।
देवीपादप्रसादेन तत्तदाप्नोति निश्चितम् ॥ १५५ ॥
(इस स्तोत्र को सुनकर चिरजीवी पुत्र प्राप्त करती है। साधक जिस-जिस कामना की इच्छा करके इस सर्वोत्तम स्तोत्र का पाठ करता है, देवी के चरणों की कृपा से वह उस-उस कामना को निश्चित ही प्राप्त कर लेता है।)
॥ इति श्रीकालिकाकुलसर्वस्वे हरपरशुरामसंवादे श्री कालिका सहस्रनाम स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥
संलिखित ग्रंथ
स्तोत्र परिचय
श्री कालिका सहस्रनाम स्तोत्रम् मुण्डमाला तन्त्र का अत्यंत दुर्लभ और शक्तिशाली अंश है। यह स्तोत्र भगवान शिव और परशुराम जी के संवाद रूप में वर्णित है। परशुराम जी ने जब भगवान शिव से देवी के परम रहस्य को जानने की प्रार्थना की, तब महादेव ने इस गोपनीय स्तोत्र को प्रकट किया। इसमें माँ काली के 1000 पवित्र नामों का वर्णन है, जो उनके उग्र और सौम्य दोनों स्वरूपों को दर्शाते हैं।
तन्त्र: मुण्डमाला तन्त्र
ऋषि: महाकाल भैरव
छंद: अनुष्टुप्
देवता: श्मशान काली
विनियोग: धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष
सहस्रनाम का महत्व
सहस्रनाम का अर्थ होता है 'एक हजार नाम'। प्रत्येक नाम देवी के एक विशिष्ट गुण, शक्ति या लीला को प्रकट करता है। इस स्तोत्र के पाठ से साधक माँ काली की सम्पूर्ण कृपा प्राप्त कर सकता है।
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| तांत्रिक महत्व | यह स्तोत्र तांत्रिक साधनाओं (जैसे षटकर्म) में भी प्रयुक्त होता है। |
| भोग और मोक्ष | यह साधक को सांसारिक सुख (भोग) और अंत में मुक्ति (मोक्ष) दोनों प्रदान करता है। |
| शत्रु नाश | इसके प्रभाव से बड़े से बड़े शत्रु भी परास्त हो जाते हैं। |
साधना विधि
- समय: निशीथ काल (मध्यरात्रि) इसके पाठ के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। सामान्य पूजा में संध्या समय भी पाठ किया जा सकता है।
- स्थान: एकांत स्थान या पूजा कक्ष।
- पुष्प: जवाकुसुम (गुड़हल) और रक्त कनेर जैसे लाल पुष्प माँ को अत्यंत प्रिय हैं।
- नियम: साधक को पवित्रता और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।
- विशेष: श्लोक 4 में वर्णित है कि बिना अर्चन, बिना होम, बिना न्यास और बिना बलि के भी केवल इस स्तोत्र के पाठ से माँ काली प्रसन्न हो जाती हैं।
फलश्रुति (लाभ)
स्तोत्र के अंत में (श्लोक 151-155) इसके अद्भुत लाभ बताए गए हैं:
- पाप नाश: समस्त पापों का नाश होकर साधक 'कालिकापुर' (मोक्ष) को प्राप्त होता है।
- संतान प्राप्ति: वंध्या स्त्रियों को भी चिरंजीवी पुत्र की प्राप्ति होती है।
- मनोकामना पूर्ति: साधक जिस भी कामना से इसका पाठ करता है, वह निश्चित रूप से पूर्ण होती है।
- वाक सिद्धि: साधक की वाणी गंगा के प्रवाह जैसी ओजस्वी हो जाती है (गद्यपद्यमयी वाणी)।
- राज कृपा: राजा और शासक भी साधक के वश में हो जाते हैं।
FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. कालिका सहस्रनाम क्या है?
यह माँ काली के 1000 दिव्य नामों का संग्रह है जो उनकी शक्तियों और स्वरूपों का वर्णन करता है।
2. इस स्तोत्र का उपदेश किसने दिया?
भगवान शिव ने परशुराम जी को इसका उपदेश दिया था।
3. इसके पाठ का सर्वोत्तम समय क्या है?
यद्यपि इसे कभी भी पढ़ा जा सकता है, किन्तु 'निशीथ काल' (मध्यरात्रि, विशेषकर अष्टमी या अमावस्या की रात) में इसका पाठ शीघ्र फलदायी होता है।
4. क्या इसके लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?
सामान्य भक्ति पाठ के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं है, परन्तु तांत्रिक प्रयोग और विशेष सिद्धि के लिए गुरु मार्गदर्शन आवश्यक है।
5. क्या इसे घर पर पढ़ा जा सकता है?
हाँ, इसे घर पर सात्विक विधि से पढ़ा जा सकता है। यह घर की नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है।
6. 'सहस्रनाम' का अर्थ क्या है?
'सहस्र' का अर्थ है हजार (1000) और 'नाम' का अर्थ है नाम। अतः यह 1000 नामों की स्तुति है।
7. क्या महिलाएं इसका पाठ कर सकती हैं?
हाँ, महिलाएं पूर्ण श्रद्धा से इसका पाठ कर सकती हैं। मासिक धर्म के समय मानसिक जप किया जा सकता है।
8. इसके पाठ से क्या विशेष लाभ मिलता है?
यह 'धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष' चारों पुरुषार्थ प्रदान करता है। विशेष रूप से वाक सिद्धि (वाणी का प्रभाव) और शत्रु विजय के लिए यह अमोघ है।
9. क्या अन्य सहस्रनामों से यह भिन्न है?
हाँ, काली सहस्रनाम कई तन्त्रों में मिलते हैं (जैसे महानिर्वाण तन्त्र)। यह मुण्डमाला तन्त्र का पाठ है, जो अत्यंत उग्र और प्रभावशाली माना जाता है।
10. पाठ के समय कौन से वस्त्र धारण करने चाहिए?
साधना काल में लाल या काले रंग के वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है।
11. क्या भोग (नैवेद्य) अर्पण करना आवश्यक है?
श्लोक 4 के अनुसार, यदि कोई बाह्य उपचार (गंध, पुष्प, बलि) न भी हो, तो भी केवल भक्ति भाव से पाठ करने पर माँ काली प्रसन्न होती हैं।