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Sri Kalika Keelaka Stotram – श्री कालिका कीलक स्तोत्रम्

Sri Kalika Keelaka Stotram – श्री कालिका कीलक स्तोत्रम्
॥ श्री गणेशाय नमः ॥ ॥ श्री कालिका कीलक स्तोत्रम् ॥ ॥ विनियोग ॥ अस्य श्री कालिका कीलकस्य सदाशिव ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः श्री दक्षिणकालिका देवता सर्वार्थसिद्धिसाधने कीलकन्यासे जपे विनियोगः । ॥ स्तोत्र ॥ अथातः सम्प्रवक्ष्यामि कीलकं सर्वकामदम् । कालिकायाः परं तत्त्वं सत्यं सत्यं त्रिभिर्ममः ॥ १ ॥ (अब मैं सब कामनाओं को देने वाला 'कीलक' कहता हूँ। यह कालिका का परम तत्त्व है, यह मेरे लिए तीन बार सत्य है।) दुर्वासाश्च वशिष्ठश्च दत्तात्रेयो बृहस्पतिः । सुरेशो धनदश्चैव अङ्गिराश्च भृगूद्वाहः ॥ २ ॥ (दुर्वासा, वशिष्ठ, दत्तात्रेय, बृहस्पति, इन्द्र (सुरेश), कुबेर (धनद), अंगिरा और भृगु वंश के श्रेष्ठ ऋषि...) च्यवनः कार्तवीर्यश्च कश्यपोऽथ प्रजापतिः । कीलकस्य प्रसादेन सर्वैश्वर्यमवाप्नुयुः ॥ ३ ॥ (च्यवन, कार्तवीर्य अर्जुन, कश्यप और प्रजापति—इन सभी ने इसी कीलक के प्रसाद से सम्पूर्ण ऐश्वर्य प्राप्त किया।) ॥ न्यास विधि ॥ ओङ्कारं तु शिखाप्रान्ते लम्बिका स्थान उत्तमे । सहस्रारे पङ्कजे तु क्रीं क्रीं क्रीं वाग्विलासिनी ॥ ४ ॥ (शिखा के अंत में 'ॐ' का न्यास करें। उत्तम स्थान लम्बिका (तालु) और सहस्रार कमल में 'क्रीं क्रीं क्रीं' (वाग्विलासिनी) का न्यास करें।) कूर्चबीजयुगं भाले नाभौ लज्जायुगं प्रिये । दक्षिणे कालिके पातु स्वनासापुटयुग्मके ॥ ५ ॥ (ललाट पर दो कूर्च बीज (हूँ हूँ), नाभि में दो लज्जा बीज (ह्रीं ह्रीं) और नासिका के दोनों छिद्रों में 'दक्षिणे कालिके' मंत्र रक्षा करे।) हूङ्कारद्वन्द्वं गण्डे द्वे द्वेमाये श्रवणद्वये । आद्यातृतीयं विन्यस्य उत्तराधर सम्पुटे ॥ ६ ॥ (दोनों गालों पर दो हूंकार (हूँ हूँ), दोनों कानों में दो माया बीज (ह्रीं ह्रीं) और ऊपर-नीचे के होंठों पर आद्या (क्रीं) का तीसरा बीज न्यास करें।) स्वाहा दशनमध्ये तु सर्ववर्णन्न्यसेत् क्रमात् । मुण्डमाला असिकरा काली सर्वार्थसिद्धिदा ॥ ७ ॥ (दांतों के मध्य में 'स्वाहा' और क्रमानुसार सभी वर्णों का न्यास करें। मुण्डमाला धारण करने वाली, हाथ में तलवार लिए काली सर्वार्थ सिद्धि देने वाली हैं।) चतुरक्षरी महाविद्या क्रीं क्रीं हृदय पङ्कजे । ओं हूं ह्रीं क्रीं ततो हूं फट् स्वाहा च कण्ठकूपके ॥ ८ ॥ (हृदय कमल में चार अक्षरों वाली महाविद्या 'क्रीं क्रीं' और कंठकूप में 'ॐ हूं ह्रीं क्रीं हूं फट् स्वाहा' का न्यास करें।) अष्टाक्षरी कालिकाया नाभौ विन्यस्य पार्वति । क्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं स्वाहान्ते च दशाक्षरी ॥ ९ ॥ (हे पार्वति! नाभि में कालिका के अष्टाक्षरी मंत्र का न्यास करें। अंत में 'क्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं स्वाहा'—इस दशाक्षरी मंत्र का न्यास करें।) मम बाहुयुगे तिष्ठ मम कुण्डलिकुण्डले । हूं ह्रीं मे वह्निजाया च हूं विद्या तिष्ठ पृष्ठके ॥ १० ॥ (मेरी दोनों भुजाओं में स्थित रहो, मेरे कुण्डलों में स्थित रहो। 'हूं ह्रीं स्वाहा' और 'हूं' विद्या मेरी पीठ पर स्थित रहे।) क्रीं हूं ह्रीं वक्षदेशे च दक्षिणे कालिके सदा । क्रीं हूं ह्रीं वह्निजायाऽन्ते चतुर्दशाक्षरेश्वरी ॥ ११ ॥ (वक्षस्थल (छाती) पर सदा 'क्रीं हूं ह्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं हूं ह्रीं स्वाहा'—इस चौदह अक्षरों वाली ईश्वरी का न्यास करें।) क्रीं तिष्ठ गुह्यदेशे मे एकाक्षरी च कालिका । ह्रीं हूं फट् च महाकाली मूलाधारनिवासिनी ॥ १२ ॥ (मेरे गुह्य स्थान में एकाक्षरी कालिका 'क्रीं' स्थित रहे। मूलाधार में निवास करने वाली महाकाली 'ह्रीं हूं फट्' रूप में स्थित रहे।) सर्वरोमाणि मे काली कराङ्गुल्यङ्कपालिनी । कुल्ला कटिं कुरुकुल्ला तिष्ठ तिष्ठ सदा मम ॥ १३ ॥ (काली मेरे सभी रोमों की और कपालिनी হাতের अंगुलियों की रक्षा करे। कुल्ला और कुरुकुल्ला मेरी कमर (कटि) में सदा स्थित रहें।) विरोधिनी जानुयुग्मे विप्रचित्ता पदद्वये । तिष्ठ मे च तथा चोग्रा पादमूले न्यसेत् क्रमात् ॥ १४ ॥ (विरोधिनी दोनों घुटनों में, विप्रचित्ता दोनों पैरों में और उग्र देवी पादमूल (पैरों के तलवों) में क्रमशः स्थित होकर रक्षा करें।) प्रभा तिष्ठतु पादाग्रे दीप्ता पादाङ्गुलीनपि । नीला न्यसेद्बिन्दुदेशे घना नादे च तिष्ठ मे ॥ १५ ॥ (प्रभा पैरों के अग्रभाग में, दीप्ता पैरों की अंगुलियों में, नीला बिन्दु स्थान में और घना नाद स्थान में स्थित रहे।) बलाका बिन्दुमार्गे च न्यसेत् सर्वाङ्गसुन्दरी । मम पातालके मात्रा तिष्ठ स्वकुलकायिके ॥ १६ ॥ (बलाका बिन्दु मार्ग में और सर्वांगसुन्दरी का न्यास करें। हे स्वकुलकायिके! पाताल (पैरों के नीचे) में मात्रा रूप में स्थित रहो।) मुद्रा तिष्ठ स्वमर्त्येमां मितास्वङ्गाकुलेषु च । एता नृमुण्डमालास्रग्धारिण्यः खड्गपाणयः ॥ १७ ॥ (मुद्रा अपने मर्त्य रूप में और मिता अपने अंगों में स्थित रहें। ये सभी नरमुण्डमाला धारण करने वाली और हाथों में खड्ग लेने वाली देवियां हैं।) तिष्ठन्तु मम गात्राणि सन्धिकूपानि सर्वशः । बाह्मी च ब्रह्मरन्ध्रे तु तिष्ठस्व घटिका परा ॥ १८ ॥ (ये मेरे शरीर के अंगों और सभी संधियों (जोड़ों) में स्थित रहें। ब्राह्मी मेरे ब्रह्मरन्ध्र में और परा देवी घटिका में स्थित रहें।) नारायणी नेत्रयुगे मुखे माहेश्वरी तथा । चामुण्डा श्रवणद्वन्द्वे कौमारी चिबुके शुभे ॥ १९ ॥ (नारायणी दोनों नेत्रों में, माहेश्वरी मुख में, चामुण्डा दोनों कानों में और कौमारी शुभ चिबुक (ठोड़ी) में स्थित रहे।) तथामुदरमध्ये तु तिष्ठ मे चापराजिता । वाराही चास्थिसन्धौ च नारसिंही नृसिंहके ॥ २० ॥ (अपराजिता मेरे उदर (पेट) के मध्य में, वाराही हड्डियों के जोड़ों में और नारसिंही नृसिंहक (नाखूनों/पंजों) में स्थित रहे।) आयुधानि गृहीतानि तिष्ठस्वेतानि मे सदा । इति ते कीलकं दिव्यं नित्यं यः कीलयेत् स्वकम् ॥ २१ ॥ (ये सभी अपनी-अपनी आयुधों (शस्त्रों) को लेकर सदा मुझमें स्थित रहें। यह दिव्य कीलक है, जो नित्य अपने (शरीर/मंत्र) का कीलन करता है...) ॥ फलश्रुति ॥ कवचादौ महेशानि तस्यः सिद्धिर्न संशयः । श्मशाने प्रेतयोर्वापि प्रेतदर्शनतत्परः ॥ २२ ॥ (हे महेशानि! कवच आदि के पाठ से उसे निःसंदेह सिद्धि प्राप्त होती है। श्मशान में प्रेतों के बीच या प्रेत दर्शन में तत्पर होने पर भी...) यः पठेत्पाठयेद्वापि सर्वसिद्धीश्वरो भवेत् । सवाग्मी धनवान् दक्षः सर्वाध्यक्षः कुलेश्वरः ॥ २३ ॥ (जो इसे पढ़ता या पढ़ाता है, वह सर्वसिद्धियों का ईश्वर हो जाता है। वह वाग्मी (वक्ता), धनवान, दक्ष, सबका अध्यक्ष और कुलेश्वर बन जाता है।) पुत्र बान्धव सम्पन्नः समीर सदृशो बले । न रोगवान् सदा धीरस्तापत्रय निषूदनः ॥ २४ ॥ (वह पुत्र और बान्धवों से सम्पन्न, बल में वायु के समान, रोगों से मुक्त, सदा धैर्यवान और तीनों तापों (दैहिक, दैविक, भौतिक) का नाश करने वाला होता है।) मुच्यते कालिका पायात् तृणराशिमिवानला । न शत्रुभ्यो भयं तस्य दुर्गमेभ्यो न बाध्यते ॥ २५ ॥ (कालिका की कृपा से वह वैसे ही मुक्त हो जाता है जैसे अग्नि से घास का ढेर भस्म हो जाता है। उसे शत्रुओं से भय नहीं होता और दुर्गम संकट उसे बाधा नहीं पहुँचाते।) यस्य देशे कीलकं तु धारणं सर्वदाम्बिके । तस्य सर्वार्थसिद्धिः स्यात् सत्यं सत्यं वरानने ॥ २६ ॥ (हे अम्बिके! हे वरानने! जिसके देश (स्थान/शरीर) में यह कीलक धारण किया जाता है, उसे सदा सर्वार्थ सिद्धि प्राप्त होती है, यह सत्य है, सत्य है।) मन्त्राच्छतगुणं देवि कवचं यन्मयोदितम् । तस्माच्छतगुणं चैव कीलकं सर्वकामदम् ॥ २७ ॥ (हे देवि! मंत्र से सौ गुना फलदायी कवच है जो मैंने कहा है। और उस कवच से भी सौ गुना अधिक फलदायी यह सर्वकामनापूरक कीलक है।) तथा चाप्यसिता मन्त्रं नीलसारस्वते मनौ । न सिद्ध्यति वरारोहे कीलकार्गलके विना ॥ २८ ॥ (हे वरारोहे! उसी प्रकार असिता (काली) मंत्र या नील सरस्वती मंत्र—कीलक और अर्गल के बिना सिद्ध नहीं होते।) विना कीलकार्गलके काली कवचं यः पठेत् । तस्य सर्वाणि मन्त्राणि स्तोत्राण्यसिद्धये प्रिये ॥ २९ ॥ (हे प्रिये! जो कीलक और अर्गल के बिना काली कवच का पाठ करता है, उसके सभी मंत्र और स्तोत्र असिद्ध (निष्फल) रह जाते हैं।) ॥ इति श्री काली कीलक स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

स्तोत्र परिचय

श्री कालिका कीलक स्तोत्रम् साधना की सफलता की कुंजी है। तंत्र शास्त्र और श्री दुर्गा सप्तशती के अंतर्गत इस स्तोत्र का विशेष महत्व है। 'कीलक' का अर्थ होता है कीलना या स्थिर करना। जिस प्रकार कवच रक्षा करता है और अर्गल अवरोधों को खोलता है, वैसे ही कीलक मन्त्र चैतन्य को जागृत करता है। भगवान शिव ने कलियुग में मन्त्रों को 'कीलित' कर दिया था, ताकि उनका दुरुपयोग न हो सके। इस स्तोत्र का पाठ उस 'कीलक' को हटाकर मंत्र को चैतन्य और फलदायी बनाता है।

ऋषि: सदाशिव
छंद: अनुष्टुप्
देवता: श्री दक्षिणकालिका
विनियोग: सर्वार्थसिद्धि, कीलकन्यास
विशेषता: मंत्र उत्कीलन, एश्वर्य प्राप्ति, शाप विमोचन

कीलक का महत्व

श्लोक संख्या 2-3 में वर्णित ऋषियों (दुर्वासा, वशिष्ठ, दत्तात्रेय आदि) ने इसी कीलक के प्रसाद से सर्वोच्च ऐश्वर्य और सिद्धियां प्राप्त कीं। यह स्तोत्र मंत्र के प्रभावों को 'कीलित' करता है ताकि साधक को उसका पूर्ण फल मिल सके। इसके बिना की गई साधना परिश्रम तो कराती है, परन्तु फल प्रदान नहीं करती।
तत्वकार्यश्लोक संदर्भ
कवचरक्षा करना (शरीर)सर्वत्र रक्षण
अर्गलबाधा निवारण (मन)पाप नाश
कीलकमंत्र उत्कीलन (आत्मा)सिद्धि प्राप्ति

साधना विधि

  • समय: ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व) या रात्रि काल (विशेषकर अष्टमी, चतुर्दशी या अमावस्या)।
  • आसन: लाल या काले ऊनी आसन का प्रयोग करें।
  • दिशा: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • माला: रुद्राक्ष या रक्त चन्दन की माला का प्रयोग श्रेष्ठ है।
  • क्रम: सर्वप्रथम गणेश जी का ध्यान, फिर श्री कालिका कवच, अर्गल स्तोत्र और अंत में कीलक स्तोत्र का पाठ करें।

फलश्रुति (विशेष लाभ)

श्लोक 22-29 में इसके अद्भुत फलों का वर्णन है:
  • सर्वसिद्धि: कवच, अर्गल और कीलक के बिना सिद्धि दुर्लभ है।
  • शत्रु नाश: शत्रुओं से भय नहीं रहता।
  • ऐश्वर्य: धनवान और समाज में सम्मान।
  • मंत्र सिद्धि: इसके बिना अन्य मंत्र और स्तोत्र निष्फल हो सकते हैं।

चेतावनी (श्लोक 29):
"विना कीलकार्गलके काली कवचं यः पठेत्।
तस्य सर्वाणि मन्त्राणि स्तोत्राण्यसिद्धये प्रिये॥"
अर्थात: बिना कीलक और अर्गल के जो केवल कवच का पाठ करता है, उसके मंत्र सिद्ध नहीं होते।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. कीलक स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?

सप्तशती पाठ या काली साधना के क्रम में: पहले कवच, फिर अर्गल और अंत में कीलक का पाठ करना चाहिए। इसे नित्य पूजा में भी शामिल किया जा सकता है।

2. मंत्र उत्कीलन क्या है?

शाप या बंधन से मंत्र को मुक्त करना। कलियुग में महादेव ने मंत्रों को कीलित किया है, कीलक पाठ से मंत्र की सुप्त शक्ति जागृत होती है और वह फलदायी होता है।

3. क्या इसे स्वतंत्र रूप से पढ़ा जा सकता है?

हाँ, सर्वार्थ सिद्धि के लिए इसका स्वतंत्र पाठ भी अत्यंत फलदायी है, परन्तु कवच और अर्गल के साथ यह अधिक प्रभावशाली और पूर्णता प्रदान करने वाला है।

4. इसके ऋषि कौन हैं?

इसके ऋषि सदाशिव हैं, जो स्वयं आदिगुरु और तंत्र के प्रवर्तक हैं।

5. क्या कीलक पाठ के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?

सामान्य भक्ति और नित्य पाठ के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं है, परन्तु विशेष तांत्रिक सिद्धि या पुरश्चरण के लिए गुरु का मार्गदर्शन अत्यंत आवश्यक है।

6. सिद्धि प्राप्ति के लिए कितनी बार पाठ करना चाहिए?

सामान्यतः नित्य 1 या 3 बार पाठ पर्याप्त है। विशेष सिद्धि के लिए अनुष्ठान काल में 108 बार या 1000 बार (सहस्रावर्त) पाठ का विधान है।

7. अर्गल और कीलक स्तोत्र में क्या अंतर है?

अर्गल स्तोत्र पाप नाशक और बाधा निवारक है (मन की शुद्धि), जबकि कीलक स्तोत्र मंत्र शक्ति को जागृत करता है (आत्मा की शक्ति)। सिद्ध कुंजिका स्तोत्र में दोनों का समावेश है।

8. क्या इसका पाठ रात्रि में किया जा सकता है?

हाँ, माँ काली की साधना में रात्रि (विशेषकर महानिशा) का समय सर्वोत्तम माना जाता है। रात्रि में किया गया पाठ शीघ्र फलदायी होता है।

9. 'कीलक' शब्द का शाब्दिक अर्थ क्या है?

'कीलक' का अर्थ है 'कीला' या 'पिन'। यह उस रहस्यमयी चाबी या पिन के समान है जो मंत्रों में छिपी हुई शक्ति के भंडार को खोल देती है।

10. क्या महिलाएं इस स्तोत्र का पाठ कर सकती हैं?

हाँ, महिलाएं पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ इसका पाठ कर सकती हैं। मासिक धर्म के दौरान मानसिक जप या श्रवण किया जा सकता है, परन्तु स्पर्श या पूजा वर्जित है।