Sri Kali Kavacham Trailokya Vijayam – श्री काली कवचम् (त्रैलोक्यविजयम्)

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री काली कवचम् (त्रैलोक्यविजयम्) ॥
॥ महानिर्वाण तंत्र - सप्तमोल्लासः ॥
॥ श्रीसदाशिव उवाच ॥
त्रैलोक्यविजयस्यास्य कवचस्य ऋषिः शिवः ।
छन्दोऽनुष्टुब्देवता च आद्याकाली प्रकीर्तिता ॥ १ ॥
मायाबीजं बीजमिति रमा शक्तिरुदाहृता ।
क्रीं कीलकं काम्यसिद्धौ विनियोगः प्रकीर्तितः ॥ २ ॥
॥ अथ कवचम् ॥
ह्रीमाद्या मे शिरः पातु श्रीं काली वदनं मम ।
हृदयं क्रीं परा शक्तिः पायात्कण्ठं परात्परा ॥ ३ ॥
नेत्रे पातु जगद्धात्री कर्णौ रक्षतु शङ्करी ।
घ्राणं पातु महामाया रसनां सर्वमङ्गला ॥ ४ ॥
दन्तान् रक्षतु कौमारी कपोलौ कमलालया ।
ओष्ठाधरौ क्षमा रक्षेच्चिबुकं चारुहासिनी ॥ ५ ॥
ग्रीवां पायात्कुलेशानी ककुत्पातु कृपामयी ।
द्वौ बाहू बाहुदा रक्षेत्करौ कैवल्यदायिनी ॥ ६ ॥
स्कन्धौ कपर्दिनी पातु पृष्ठं त्रैलोक्यतारिणी ।
पार्श्वे पायादपर्णा मे कटिं मे कमठासना ॥ ७ ॥
नाभौ पातु विशालाक्षी प्रजास्थानं प्रभावती ।
ऊरू रक्षतु कल्याणी पादौ मे पातु पार्वती ॥ ८ ॥
जयदुर्गाऽवतु प्राणान् सर्वाङ्गं सर्वसिद्धिदा ।
रक्षाहीनं तु यत् स्थानं वर्जितं कवचेन च ॥ ९ ॥
तत्सर्वं मे सदा रक्षेदाद्याकाली सनातनी ।
इति ते कथितं दिव्यं त्रैलोक्यविजयाभिधम् ॥ १० ॥
॥ फलश्रुति ॥
कवचं कालिकादेव्या आद्यायाः परमाद्भुतम् ।
पूजाकाले पठेद्यस्तु आद्याधिकृतमानसः ॥ ११ ॥
सर्वान् कामानवाप्नोति तस्याद्याशु प्रसीदति ।
मन्त्रसिद्धिर्भवेदाशु किङ्कराः क्षुद्रसिद्धयः ॥ १२ ॥
अपुत्रो लभते पुत्रं धनार्थी प्राप्नुयाद्धनम् ।
विद्यार्थी लभते विद्यां कामी कामानवाप्नुयात् ॥ १३ ॥
॥ पुरश्चरण विधि ॥
सहस्रावृत्तपाठेन वर्मणोऽस्य पुरस्क्रिया ।
पुरश्चरणसम्पन्नं यथोक्तफलदं भवेत् ॥ १४ ॥
॥ धारण विधि ॥
चन्दनागरुकस्तूरीकुङ्कुमै रक्तचन्दनैः ।
भूर्जे विलिख्य गुटिकां स्वर्णस्थां धारयेद्यदि ॥ १५ ॥
शिखायां दक्षिणे बाहौ कण्ठे वा साधकः कटौ ।
तस्याद्या कालिका वश्या वाञ्छितार्थं प्रयच्छति ॥ १६ ॥
न कुत्रापि भयं तस्य सर्वत्र विजयी कविः ।
अरोगी चिरजीवी स्याद्बलवान् धारणक्षमः ॥ १७ ॥
सर्वविद्यासु निपुणः सर्वशास्त्रार्थतत्त्ववित् ।
वशे तस्य महीपाला भोगमोक्षौ करस्थितौ ॥ १८ ॥
॥ इति महानिर्वाणतन्त्रे सप्तमोल्लासे त्रैलोक्यविजयकवचं नाम श्री कालिका कवचम् सम्पूर्णम् ॥
संलिखित ग्रंथ
त्रैलोक्यविजय कवच - परिचय
श्री काली कवचम् (त्रैलोक्यविजयम्) महानिर्वाण तंत्र के सप्तम उल्लास से उद्धृत है। भगवान सदाशिव द्वारा कथित।
"त्रैलोक्यविजय" अर्थ: तीनों लोकों (भू, भुव, स्व) पर विजय प्रदान करने वाला। इस कवच को धारण करने वाला सर्वत्र विजयी होता है।
कवच विनियोग:
• ऋषि: शिव
• छन्द: अनुष्टुप्
• देवता: आद्याकाली
• बीज: ह्रीं (मायाबीज)
• शक्ति: श्रीं (रमा)
• कीलक: क्रीं
• विनियोग: काम्यसिद्धि
अंग रक्षा - देवी नाम और अंग
| अंग | देवी नाम | अंग | देवी नाम |
|---|---|---|---|
| शिर (मस्तक) | ह्रीं आद्या | वदन (मुख) | श्रीं काली |
| हृदय | क्रीं परा शक्ति | कण्ठ | परात्परा |
| नेत्र | जगद्धात्री | कर्ण | शङ्करी |
| घ्राण (नाक) | महामाया | रसना (जिह्वा) | सर्वमङ्गला |
| दन्त | कौमारी | कपोल (गाल) | कमलालया |
| ओष्ठ-अधर | क्षमा | चिबुक (ठुड्डी) | चारुहासिनी |
| ग्रीवा (गर्दन) | कुलेशानी | ककुत् (कन्धे) | कृपामयी |
| बाहू | बाहुदा | कर (हाथ) | कैवल्यदायिनी |
| स्कन्ध | कपर्दिनी | पृष्ठ (पीठ) | त्रैलोक्यतारिणी |
| पार्श्व (बगल) | अपर्णा | कटि (कमर) | कमठासना |
| नाभि | विशालाक्षी | प्रजास्थान | प्रभावती |
| ऊरू (जंघा) | कल्याणी | पाद | पार्वती |
| प्राण | जयदुर्गा | सर्वाङ्ग | सर्वसिद्धिदा |
| शेष स्थान | आद्याकाली सनातनी | ||
फलश्रुति - कवच के लाभ
✓सर्वकाम सिद्धि: सभी इच्छाएं पूर्ण
✓मंत्र सिद्धि: शीघ्र मंत्र सिद्ध
✓क्षुद्र सिद्धि: छोटी सिद्धियाँ किंकर
✓पुत्र प्राप्ति: निःसंतान को पुत्र
✓धन प्राप्ति: धनार्थी को धन
✓विद्या सिद्धि: विद्यार्थी को विद्या
✓काम प्राप्ति: कामी को काम
✓भय नाश: कहीं भी भय नहीं
✓सर्वत्र विजय: हर क्षेत्र में विजय
✓कवित्व: कवि बनना
✓आरोग्य: रोगमुक्त
✓दीर्घायु: लंबी आयु
✓बल: शारीरिक शक्ति
✓सर्वविद्या: सभी विद्याओं में निपुण
✓शास्त्रज्ञान: सभी शास्त्रों का तत्व
✓राजवश्य: राजा भी वश में
✓भोग-मोक्ष: दोनों हाथ में
धारण विधि - यंत्र बनाना
सामग्री: चंदन, अगर, कस्तूरी, कुंकुम, रक्तचंदन
विधि: भोजपत्र पर उपरोक्त सामग्री से कवच लिखें। स्वर्ण गुटिका (ताबीज) में रखें।
धारण स्थान:
- शिखा में: मस्तिष्क शक्ति
- दक्षिण बाहु में: कार्य सिद्धि
- कण्ठ में: वाक् सिद्धि
- कटि में: शारीरिक बल
पुरश्चरण विधि
1000 पाठ से कवच का पुरश्चरण पूर्ण होता है। पुरश्चरण सम्पन्न होने पर यथोक्त फल मिलता है।
FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. महानिर्वाण तंत्र क्या है?
महानिर्वाण तंत्र प्रमुख शाक्त तंत्र ग्रंथ है जिसमें काली, तारा आदि देवियों की उपासना विधि है। इसमें 14 उल्लास (अध्याय) हैं।
2. "आद्याकाली" कौन हैं?
आद्या = आदि, प्रथम। आद्याकाली का अर्थ है "मूल/प्रथम काली" - सृष्टि से पूर्व विद्यमान आदिशक्ति।
3. क्या बिना धारण के पाठ कर सकते हैं?
हाँ! नियमित पाठ से भी सभी फल मिलते हैं। धारण करना अतिरिक्त लाभ देता है।
4. पाठ का शुभ समय?
पूजा के समय पढ़ना सर्वोत्तम है (श्लोक 11)। अमावस्या, काली चतुर्दशी, मंगलवार विशेष शुभ।
5. "क्षुद्र सिद्धि" क्या हैं?
छोटी तांत्रिक सिद्धियाँ जो किंकर (सेवक) की भांति साधक की सेवा करती हैं।
6. जगन्मंगल और त्रैलोक्यविजय में अंतर?
दोनों अलग कवच हैं। जगन्मंगल ब्रह्मयामल से है, त्रैलोक्यविजय महानिर्वाण तंत्र से। दोनों शक्तिशाली हैं।