Sri Indrakshi Stotram – श्री इन्द्राक्षी स्तोत्रम्

श्री इन्द्राक्षी स्तोत्रम् - परिचय (Introduction)
श्री इन्द्राक्षी स्तोत्रम् (Sri Indrakshi Stotram) शक्ति उपासना के अंतर्गत एक अत्यंत प्रभावशाली, दुर्लभ और सिद्ध स्तोत्र है। यह स्तोत्र मात्र शब्दों का समूह नहीं, अपितु आरोग्य और विशेष रूप से नेत्र-रोग (Eye Ailments) तथा ज्वर (Fever) नाशक एक अमोघ अस्त्र है। इसका संबंध देवराज इन्द्र और महर्षि गौतम के प्रसिद्ध आख्यान से है।
पौराणिक कथा (Legend): पुराणों के अनुसार, एक बार देवराज इन्द्र ने महर्षि गौतम की पत्नी अहिल्या के प्रति आसक्त होकर छल किया। क्रोधित होकर महर्षि गौतम ने इन्द्र को श्राप दे दिया, जिससे उनके पूरे शरीर पर 1000 कुरूप चिन्ह (योनियाँ) उभर आए। इन्द्र लज्जित होकर छिप गए और देवलोक में हाहाकार मच गया। तब देवताओं के गुरु बृहस्पति की सलाह पर इन्द्र ने माँ आदि शक्ति की घोर तपस्या की। देवी इन्द्र की तपस्या से प्रसन्न हुईं और उन्होंने इन्द्र के शरीर पर उभरे उन 1000 चिन्हों को 1000 नेत्रों (Eyes) में बदल दिया। इस प्रकार इन्द्र 'सहस्राक्ष' (हजार आँखों वाले) कहलाए। जिस स्वरूप में देवी ने इन्द्र को दर्शन दिए और उनकी 'आँखों' (अक्षि) का उद्धार किया, वह स्वरूप 'इन्द्राक्षी' (इन्द्र + अक्षि) कहलाया।
इन्द्र द्वारा कृत यह स्तुति ही 'इन्द्राक्षी स्तोत्र' के नाम से विख्यात हुई। इन्द्र ने कहा—हे देवी! आपने मेरे नेत्रों को रोग और कलंक से मुक्त किया है, अतः भविष्य में जो भी भक्त 'इन्द्राक्षी' के रूप में आपकी स्तुति करेगा, उसे कोई भी नेत्र रोग, त्वचा रोग या ज्वर नहीं सताएगा।
स्वरूप और शक्ति: इन्द्राक्षी देवी कोई साधारण देवी नहीं हैं। स्तोत्र में उन्हें 'महेश्वरी', 'वैष्णवी', 'वाराही', 'नारसिंही' और 'ब्रह्माणी' जैसे अनेक नामों से संबोधित किया गया है (श्लोक 9-11)। वे सभी शक्तियों का समागम हैं। उनके हाथ में 'वज्र' (इन्द्र का अस्त्र) सुशोभित है ("वामहस्ते वज्रधरां", श्लोक 2), जो यह दर्शाता है कि वे इन्द्र की शक्ति और रक्षक हैं। वे पीताम्बर (पीले वस्त्र) धारण करती हैं और अप्सराओं द्वारा सेवित हैं।
यह स्तोत्र विशेष रूप से उन लोगों के लिए वरदान है जो असाध्य रोगों से पीड़ित हैं। चाहे वह आधुनिक चिकित्सा विज्ञान द्वारा अनुत्तरित ज्वर (Viral Fever) हो, आँखों की कमजोरी हो, या त्वचा के रोग (Skin Disease) हों—इन्द्राक्षी स्तोत्र में इन सबका शमन करने की अद्भुत क्षमता है। इसे 'सर्वरोगनिवारिणी' विद्या भी कहा जाता है।
विशिष्ट महत्व (Significance)
नेत्र ज्योति वर्धक (Vision Enhancement): इन्द्राक्षी देवी नेत्रों की अधिष्ठात्री हैं। जिनके नेत्रों में पीड़ा रहती हो, चश्मे का नंबर बढ़ रहा हो, या मोतियाबिंद (Cataract) जैसी समस्या हो, उन्हें इस स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए। इसे 'नेत्रोपनिषद' के समान फलदायी माना गया है।
ज्वर नाशक (Fever Cure): स्तोत्र के माला-मंत्र भाग (श्लोक 23) में विशेष रूप से 'एक दिन का बुखार', 'दो दिन का बुखार', 'मलेरिया', 'टाइफाइड' आदि सभी प्रकार के ज्वरों (Fevers) को नष्ट करने की शक्ति निहित है। मंत्र के शब्द हैं—"एकाहिकज्वर द्वयाहिकज्वर... नाशय नाशय"।
शत्रु और भय नाश: केवल रोग ही नहीं, इन्द्राक्षी देवी शत्रुओं और अज्ञात भय का भी नाश करती हैं। श्लोक 16 में उन्हें "जननरक्षणमोक्षविधायिनी" (जन्म-मृत्यु से रक्षा और मोक्ष देने वाली) कहा गया है।
पाठ के लाभ (Phala Shruti & Benefits)
भगवान नारायण ने स्वयं नारद जी से इस स्तोत्र के फल का वर्णन किया है (श्लोक 27-32):
समस्त रोगों का नाश: विशेष रूप से क्षय (TB), अपस्मार (Epilepsy/Mirgi), और कुष्ठ (Leprosy/Skin Disases) जैसे गंभीर रोगों में यह स्तोत्र प्राणरक्षक है। ("क्षयापस्मारकुष्ठादि...", श्लोक 28)।
अकाल मृत्यु से रक्षा: "अपमृत्युभयापहम्" — यह दुर्घटना, बीमारी या किसी भी प्रकार की अकाल मृत्यु (Untimely Death) के भय को समाप्त करता है।
वाक सिद्धि और ऐश्वर्य: जो साधक इसका 6 महीने तक नियमित पाठ करता है, उसे 'वाक सिद्धि' (वाणी में सत्यता) और राजतुल्य ऐश्वर्य प्राप्त होता है (श्लोक 35, 40)।
ग्रह शांति: माला मंत्र में "महाग्रहान् संहर संहर" का उल्लेख है, जो नवग्रहों और क्रूर ग्रहों के दुष्प्रभाव को शांत करता है।
पाठ विधि (Ritual Method)
इन्द्राक्षी साधना अत्यंत सरल और सात्विक है।
शुभ दिन: पूर्णिमा (Full Moon), रविवार (Sunday), या नवरात्रि के दिन। रविवार को विशेष रूप से नेत्र रोगों की शांति के लिए पाठ किया जाता है।
समय: सूर्योदय के समय (Brahmamuhurta) पूर्व दिशा की ओर मुख करके पाठ करना सर्वश्रेष्ठ है।
नैवेद्य: देवी को पायसम (खीर) या दूध से बनी मिठाई का भोग अत्यंत प्रिय है।
विशेष प्रयोग (नेत्र ज्योति के लिए): एक तांबे के पात्र में जल रखें। इन्द्राक्षी स्तोत्र का पाठ करते हुए जल को देखते रहें। पाठ के बाद उस अभिमंत्रित जल से आँखों को धोएं (Netra Prakshalan)। ऐसा 41 दिन तक करने से नेत्र रोग में चमत्कारी लाभ मिलता है।
ज्वर शांति के लिए: रोगी के सिरहाने बैठकर कुमकुम या भस्म (Vibhuti) को अभिमंत्रित कर उसके माथे पर लगाएं।