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Sri Jwalamukhi Ashtakam – श्री ज्वालामुखि अष्टकम्

Sri Jwalamukhi Ashtakam – श्री ज्वालामुखि अष्टकम्
॥ श्री ज्वालामुखि अष्टकम् ॥ जालन्धरावनिवनीनवनीरदाभ- -प्रोत्तालशैलवलयाकलिताधिवासाम् । आशातिशायिफलकल्पनकल्पवल्लीं ज्वालामुखीमभिमुखीभवनाय वन्दे ॥ १ ॥ ज्येष्ठा क्वचित् क्वचिदुदारकला कनिष्ठा मध्या क्वचित् क्वचिदनुद्भवभावभव्या । एकाप्यनेकविधया परिभाव्यमाना ज्वालामुखी सुमुखभावमुरीकरोतु ॥ २ ॥ अश्रान्तनिर्यदमलोज्वलवारिधारा सन्धाव्यमानभवनान्तरजागरूका । मातर्ज्वलज्ज्वलनशान्तशिखानुकारा रूपच्छटा जयति काचन तावकीना ॥ ३ ॥ मन्ये विहारकुतुकेषु शिवानुरूपं रूपं न्यरूपि खलु यत्सहसा भवत्या । तत्सूचनार्थमिह शैलवनान्तराले ज्वालामुखीत्यभिधया स्फुटमुच्यसेऽद्य ॥ ४ ॥ सत्या ज्वलत्तनुसमुद्गतपावकार्चि- -र्ज्वालामुखीत्यभिमृशन्ति पुराणमिश्राः । आस्तां वयं तु भजतां दुरितानि दग्धुं ज्वालात्मना परिणता भवतीति विद्मः ॥ ५ ॥ यावत् त्वदीयचरणाम्बुजयोर्न राग- -स्तावत् कुतः सुखकराणि हि दर्शनानि । प्राक् पुण्यपाकबलतः प्रसृते तु तस्मिन् नास्त्येव वस्तु भुवने सुखकृन्न यत् स्यात् ॥ ६ ॥ आत्मस्वरूपमिह शर्मसरूपमेव वर्वर्ति किन्तु जगदम्ब न यावदेतत् । उद्घाट्यते करुणया गुरुतां वहन्त्या तावत् सुखस्य कणिकापि न जायतेऽत्र ॥ ७ ॥ आस्तां मतिर्मम सदा तव पादमूले तां चालयेन्न चपलं मन एतदम्ब । याचे पुनः पुनरिदं प्रणिपत्य मात- -र्ज्वालामुखि प्रणतवाञ्छितसिद्धिदे त्वाम् ॥ ८ ॥ ॥ इति श्री ज्वालामुखी अष्टकम् सम्पूर्णम् ॥

ज्वालामुखी देवी - परिचय (Introduction)

श्री ज्वालामुखी अष्टकम् उस दिव्य शक्ति की आराधना है जो निराकार अग्नि रूप में प्रकट हैं। हिमाचल प्रदेश का कांगड़ा जिला (प्राचीन जालंधर पीठ) वह पावन स्थल है जहाँ माता सती की जिह्वा (Tongue) गिरी थी।

यहाँ कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि पृथ्वी के गर्भ से निरंतर निकलने वाली 9 प्राकृतिक ज्वालाएं (Natural Eternal Flames) ही देवी का स्वरूप हैं। ये ज्वालाएं सदियों से बिना किसी तेल या बाती के जल रही हैं, जो विज्ञान के लिए भी एक चमत्कार है।

पौराणिक कथा:
जब भगवान शिव सती का पार्थिव शरीर लेकर ब्रह्मांड में विचरण कर रहे थे, तब भगवान विष्णु ने अपने चक्र से उनके शरीर के 51 टुकड़े कर दिए। जहाँ-जहाँ ये अंग गिरे, वहाँ शक्तिपीठ बने। कांगड़ा में 'जिह्वा' गिरने के कारण इसे 'ज्वालामुखी' कहा गया, और यहाँ देवी 'सिद्धिदा' (अंबिका) और भैरव 'उन्मत्त' के रूप में पूजे जाते हैं।

श्लोकों का भाव (Significance of Verses)

  • श्लोक 1: "जालन्धरावनिवनी..." - यह श्लोक जालंधर क्षेत्र (कांगड़ा घाटी) और वहां के पर्वतों की सुंदरता का वर्णन करता है, जहाँ देवी कल्पलता (Kalpalata - Wish-fulfilling creeper) की तरह विराजमान हैं।

  • श्लोक 3: "मातर्ज्वलज्ज्वलन..." - यहाँ देवी को साक्षात 'ज्वलंत अग्नि' (Blazing Fire) कहा गया है। उनकी छवि अग्नि की लपटों जैसी तेजस्वी और पवित्र है।

  • श्लोक 5: यहाँ यह पुष्टि की गई है कि भक्त केवल एक भौतिक अग्नि की पूजा नहीं कर रहे, बल्कि उस 'परम चेतना' की पूजा कर रहे हैं जो हमारे पापों (दुरित) को जलाने के लिए 'ज्वाला' के रूप में प्रकट हुई है।

पाठ विधि और लाभ (Ritual & Benefits)

  • प्रत्यक्ष फल (Instant Results): ज्वालामुखी देवी को 'जागृत देवी' माना जाता है। इस अष्टकम का पाठ तुरंत फलदायी होता है, विशेषकर मुकदमों में विजय, शत्रु बाधा निवारण और आत्म-बल की प्राप्ति के लिए।

  • भोग और प्रसाद: माँ को नारियल (Coconut), हलवा, और विशेष रूप से रबड़ी-मलाई का भोग बहुत प्रिय है। यहाँ भक्त चाँदी का छत्र भी चढ़ाते हैं।

  • हवन (Fire Ritual): चूँकि देवी अग्नि स्वरूपा हैं, इसलिए उनके मंत्रों के साथ छोटा हवन करना या केवल घी का दीपक जलाकर त्राटक (Trataka) करना भी एक शक्तिशाली साधना है।

  • पाप नाश: जैसे अग्नि सब कुछ जलाकर भस्म कर देती है, वैसे ही यह स्तोत्र साधक के संचित पापों और नकारात्मक कर्मों को जला देता है (दुरितानि दग्धुं)।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. ज्वालामुखी देवी कौन हैं?

ज्वालामुखी देवी (Jwalamukhi Devi) माँ आदिशक्ति का वह स्वरूप हैं जो 'अग्नि' या 'ज्योति' के रूप में पूजी जाती हैं। उनका विश्व-प्रसिद्ध मंदिर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में है, जहाँ प्राकृतिक रूप से 9 अखंड ज्वालाएं जलती रहती हैं।

2. इस स्थान का पौराणिक महत्त्व क्या है?

यह 51 शक्तिपीठों में से एक प्रमुख पीठ है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, यहाँ माता सती की 'जिह्वा' (Tongue) गिरी थी। इसलिए उन्हें 'शब्द ब्रह्म' और 'ज्ञान' की देवी भी माना जाता है।

3. 'जालन्धरा' (Jalandhara) का क्या अर्थ है?

पहले श्लोक में 'जालन्धरा' शब्द आया है। प्राचीन काल में यह पूरा क्षेत्र 'जालंधर पीठ' कहलाता था। जालंधर एक शक्तिशाली असुर भी था, जिसका वध भगवान शिव ने किया था, और यह क्षेत्र तांत्रिक साधना का केंद्र रहा है।

4. यहाँ जलने वाली 9 ज्वालाओं के नाम क्या हैं?

ये 9 ज्वालाएं नवदुर्गा का प्रतीक हैं: 1. महाकाली, 2. महालक्ष्मी, 3. महासरस्वती, 4. अन्नपूर्णा, 5. चंडी, 6. विंध्यवासिनी, 7. हिंगलाज भवानी, 8. अंबिका, और 9. अंजना देवी।

5. इस अष्टकम का पाठ क्यों करना चाहिए?

यह पाठ 'प्रत्यक्ष फल' (Visible Result) देने वाला माना जाता है। जैसे अग्नि को कोई ढक नहीं सकता, वैसे ही इस पाठ से भक्त का तेज और प्रभाव बढ़ता है। यह शत्रुओं का नाश करता है और मोक्ष प्रदान करता है।

6. पूजा में क्या विशेष अर्पण करना चाहिए?

माँ ज्वालाजी को नारियल (Coconut), लाल चुनरी, मिश्री और विशेष रूप से 'रबड़ी-मलाई' का भोग लगाया जाता है। यहाँ 'हवन' का विशेष महत्त्व है क्योंकि देवी स्वयं अग्नि स्वरूपा हैं।

7. अकबर और माँ ज्वालाजी की क्या कथा है?

कहा जाता है कि मुगल बादशाह अकबर ने इन ज्वालाओं को बुझाने के लिए नहर खुदवाकर पानी डलवाया था, लेकिन ज्वालाएं नहीं बुझीं। अंत में उसने हार मानकर सवा मन (50 किलो) सोने का छत्र चढ़ाया, जिसे देवी ने अस्वीकार कर दिया और वह किसी अज्ञात धातु में बदल गया।

8. क्या इस पाठ से रोग दूर होते हैं?

हाँ, चूंकि यह अग्नि तत्त्व प्रधान है, यह शरीर के विषैले तत्त्वों (Toxins) और नकारात्मक ऊर्जा को जलाकर 'काया कल्प' करने में सक्षम है।

9. गोरखनाथ जी का यहाँ क्या संबंध है?

गुरु गोरखनाथ जी ने यहाँ तपस्या की थी। मंदिर परिसर में ही 'गोरख डिब्बी' नामक स्थान है जहाँ खौलता हुआ जल है, जो छूने पर ठंडा लगता है। यह स्थान नाथ संप्रदाय के लिए भी अत्यंत पवित्र है।

10. पाठ करने का सर्वोत्तम समय क्या है?

नवरात्रि के दिनों में इसका पाठ विशेष फलदाई है। इसके अलावा, प्रतिदिन सुबह दीपक जलाकर या किसी भी शुभ कार्य से पहले इसका पाठ किया जा सकता है।