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Sri Gayatri Manjari Stotram – श्री गायत्री मञ्जरी स्तोत्रम् (शिव-पार्वती संवाद)

Sri Gayatri Manjari Stotram – श्री गायत्री मञ्जरी स्तोत्रम् (शिव-पार्वती संवाद)
॥ श्री गायत्री मञ्जरी ॥
(भगवान शिव-पार्वती संवादः)
एकदा तु महादेवं कैलाशगिरिसंस्थितम् । पप्रच्छ देवी वन्द्या विबुधमण्डलैः ॥ १॥ कतमं योगमासीनो योगेश त्वमुपाससे । येन हि परमां सिद्धिं प्राप्नुवान् जगदीश्वर ॥ २॥ श्रुत्वा तु पार्वती वाचं मधुसिक्तां श्रुतिप्रियाम् । समुवाच महादेवो विश्वकल्याणकारकः ॥ ३॥ महद्रहस्यं तद्गुप्तं यत्तु पृष्टं त्वया प्रिये । तथापि कथयिष्यामि स्नेहात्तत्त्वामहं समम् ॥ ४॥ गायत्री वेद मातास्ति साद्या शक्तिर्मता भुवि । जगतां जननी चैव तामुपासेऽहमेव हि ॥ ५॥ यौगिकानां समस्तानां साधनानां तु हे प्रिये । गायत्र्येव मता लोके मूलाधारो विदांवरैः ॥ ६॥ अति रहस्यमय्येषा गायत्री तु दश भुजा । लोकेऽति राजते पञ्च धारयन्ति मुखानि तु ॥ ७॥ अति गूढानि संश्रुत्य वचनानि शिवस्य च । अति संवृद्ध जिज्ञासा शिवमूचे तु पार्वती ॥ ८॥ पञ्चास्य दशबाहूनामेतेषां प्राणवल्लभ । कृत्वा कृपां कृपालो त्वं किं रहस्यं तु मे वद ॥ ९॥ श्रुत्वा त्वेतन्महादेवः पार्वतीवचनं मृदु । तस्याः शंकामपाकुर्वन् प्रत्युवाच निजां प्रियाम् ॥ १०॥ गायत्र्यास्तु महाशक्तिर्विद्यते या हि भूतले । अनन्य भावतो ह्यस्मिन्नोतप्रोतोऽस्ति चात्मनि ॥ ११॥ बिभर्ति पञ्चावरणान् जीवः कोशास्तु ते मताः । मुखानि पञ्च गायत्र्यास्तानेव वेद पार्वति ॥ १२॥ विज्ञानमयान्नमय-प्राणमय-मनोमयाः । तथानन्दमयश्चैव पञ्च कोशाः प्रकीर्तिताः ॥ १३॥ एष्वेव कोशकोशेषु ह्यनन्ता ऋद्धि सिद्धयः । गुप्ता आसाद्य या जीवो धन्यत्वमधिगच्छति ॥ १४॥ यस्तु योगीश्वरो ह्येतान् पञ्च कोशान्नु वेधते । स भवसागरं तीर्त्वा बन्धनेभ्यो विमुच्यते ॥ १५॥ गुप्तं रहस्यमेतेषां कोषाणां योऽवगच्छति । परमां गतिमाप्नोति स एव नात्र संशयः ॥ १६॥ लोकानां तु शरीराणि ह्यन्नादेव भवन्ति नु । उपत्यकासु स्वास्थ्यं च निर्भरं वर्तते सदा ॥ १७॥ आसनेनोपवासेन तत्त्व शुद्ध्या तपस्यया । चैवान्नमयकोशस्य संशुद्धिरभिजायते ॥ १८॥ ऐश्वर्यं पुरुषार्थश्च तेज ओजो यशस्तथा । प्राणशक्त्या तु वर्धन्ते लोकानामित्यसंशयम् ॥ १९॥ पञ्चभिस्तु महाप्राणैर्लघुप्राणैश्च पञ्चभिः । एतैः प्राणमयः कोशो जातो दशभिरुत्तमः ॥ २०॥ बन्धेन मुद्रया चैव प्राणायामेन चैव हि । एष प्राणमयः कोशो यतमानं तु सिद्ध्यति ॥ २१॥ चेतनाया हि केन्द्रन्तु मनुष्याणां मनोमतम् । जायते महतीत्वन्तः शक्तिस्तस्मिन् वशङ्गते ॥ २२॥ ध्यान-त्राटक-तन्मात्रा जपानां साधनैर्ननु । भवत्युज्ज्वलः कोशः पार्वत्येष मनोमयः ॥ २३॥ यथावत् पूर्णतो ज्ञानं संसारस्य च स्वस्य च । नूनमित्येव विज्ञानं प्रोक्तं विज्ञानवेत्तृभिः ॥ २४॥ साधना सोऽहमित्येषा तथा वात्मानुभूतयः । स्वराणां संयमश्चैव ग्रन्थिभेदस्तथैव च ॥ २५॥ एषां संसिद्धिभिर्नूनं यतमानस्य ह्यात्मनि । नु विज्ञानमयः कोशः प्रिये याति प्रबुद्धताम् ॥ २६॥ आनन्दावरणोन्नत्यात्यन्तशान्ति-प्रदायिका । तुरीयावस्थितिर्लोके साधकम् त्वधिगच्छति ॥ २७॥ नाद बिन्दु कलानां तु पूर्ण साधनया खलु । नन्वानन्दमयः कोशः साधके हि प्रबुद्ध्यते ॥ २८॥ भूलोकस्यास्य गायत्री कामधेनुर्मता बुधैः । लोक आश्रयणेनामूं सर्वमेवाधिगच्छति ॥ २९॥ पञ्चास्या यास्तु गायत्र्याः विद्यां यस्त्ववगच्छति । पञ्चतत्त्व प्रपञ्चात्तु स नूनं हि प्रमुच्यते ॥ ३०॥ दशभुजास्तु गायत्र्याः प्रसिद्धा भुवनेषु याः । पञ्च शूल महाशूलान्येताः सङ्केतयन्ति हि ॥ ३१॥ दशभुजान्नामेतासां यो रहस्यं तु वेत्ति यं सः । त्रासं शूलमहाशूलानां ना नैवावगच्छति ॥ ३२॥ दृष्टिस्तु दोषसंयुक्ता परेषामवलम्बनम् । भयं च क्षुद्रताऽसावधानता स्वार्थयुक्तता ॥ ३३॥ अविवेकस्तथावेशस्तृष्णालस्यं तथैव च एतानि दश शूलानि शूलदानि भवन्ति हि ॥ ३४॥ निजैर्दशभुजैर्नूनं शूलान्येतानि तु दश । संहरते हि गायत्री लोककल्याणकारिणी ॥ ३५॥ कलौ युगे मनुष्याणां शरीराणीति पार्वति । पृथ्वी तत्त्व प्रधानानि जानास्येव भवन्ति हि ॥ ३६॥ सूक्ष्मतत्त्व प्रधानान्ययुगोद्भूत नृणामतः । सिद्धीनां तपसामेते न भवन्त्यधिकारिणः ॥ ३७॥ पञ्चाङ्ग योग संसिद्ध्या गायत्र्यास्तु तथापि ते । तद्युगानां सर्वश्रेष्ठां सिद्धिं सम्प्राप्नुवन्ति हि ॥ ३८॥ गायत्र्या वाममार्गीयं ज्ञेयमत्युच्चसाधकैः । उग्रं प्रचण्डमत्यन्तं वर्तते तन्त्र साधनम् ॥ ३९॥ अत एव तु तद्गुप्तं रक्षितं हि विचक्षणैः । स्याद्यतो दुरुपयोगो न कुपात्रैः कथंचन ॥ ४०॥ गुरुणैव प्रिये विद्या तत्त्वं हृदि प्रकाश्यते । गुरुं विना तु सा विद्या सर्वथा निष्फला भवेत् ॥ ४१॥ गायत्री तु पराविद्या तत्फलावाप्तये गुरुः । साधकेन विधातव्यो गायत्री-तत्त्व पण्डितः ॥ ४२॥ गायत्रीं यो विजानाति सर्वं जानाति स ननु । जानातीमां न यस्तस्य सर्वा विद्यास्तु निष्फलाः ॥ ४३॥ गायत्र्येवतपो योगः साधनं ध्यानमुच्यते । सिद्धीनां सा मता माता नातः किञ्चित् बृहत्तरम् ॥ ४४॥ गायत्री साधना लोके न कस्यापि कदापि हि । याति निष्फलतामेतत् ध्रुवं सत्यं हि भूतले ॥ ४५॥ गुप्तमुक्तं रहस्यं यत् पार्वति त्वां पतिव्रताम् । प्राप्स्यन्ति परमां सिद्धिं ज्ञास्यन्त्येतत् तु ये जनाः ॥ ४६॥
॥ इति श्री गायत्री मञ्जरी सम्पूर्णा ॥

श्री गायत्री मञ्जरी - एक विस्तृत आध्यात्मिक परिचय

श्री गायत्री मञ्जरी (Sri Gayatri Manjari Stotram) सनातन धर्म का वह दुर्लभ और रहस्यमयी ग्रन्थ है, जो भगवान शिव और माता पार्वती के संवाद के रूप में रचित है। यह स्तोत्र मात्र माँ गायत्री की स्तुति नहीं है, बल्कि यह 'गायत्री विद्या' का वह सम्पूर्ण चार्टर है जो मनुष्य के अस्तित्व की पाँच परतों (पञ्च कोश) और जीवन के दस मूलभूत कष्टों (दश शूल) की तान्त्रिक व्याख्या करता है।

कैलाश पर्वत पर एक बार माता पार्वती ने महादेव से पूछा—"हे योगेश्वर! आप किस योग की उपासना करते हैं जिससे आप जगदीश्वर होकर भी परम सिद्धि को प्राप्त हैं?" इस प्रश्न के उत्तर में भगवान शिव ने 'गायत्री' को 'साधनाओं का मूलाधार' बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि गायत्री ही वह आदि-शक्ति है जो वेदों की माता है और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की जननी है। शिव जी के अनुसार, गायत्री साधना का मार्ग मनुष्य के शरीर और चेतना के भीतर ही स्थित है।

इस ग्रन्थ की अद्वितीयता इसके पञ्च कोश (Five Sheaths) दर्शन में है। माँ गायत्री के पाँच मुख वास्तव में हमारे अस्तित्व के पाँच स्तर हैं—अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय। शिव जी बताते हैं कि जो योगी इन पाँचों कोशों का भेदन (वेधन) करना सीख जाता है, वह साक्षात् ब्रह्मरूप होकर भवसागर के बन्धनों से सदा के लिए मुक्त हो जाता है। यह ग्रन्थ अध्यात्म को एक 'टेक्नोलॉजी' की तरह समझाता है।

इसके अतिरिक्त, गायत्री की दश भुजाओं (Ten Arms) का रहस्य इस स्तोत्र में बड़े ही सुंदर ढंग से वर्णित है। माँ की ये दश भुजाएं हमारे जीवन के दस शूलों (जैसे- भय, आलस्य, तृष्णा, स्वार्थ आदि) का विनाश करने वाली अमोघ शक्तियाँ हैं। गायत्री मञ्जरी का पाठ साधक को यह बोध कराता है कि यदि वह माँ की शरण में है, तो संसार का कोई भी कष्ट उसे विचलित नहीं कर सकता।

पञ्च कोश और दश भुजाओं का तात्विक रहस्य

गायत्री मञ्जरी का महत्व इसके दार्शनिक और योगिक सिद्धान्तों में निहित है, जो साधक की चेतना को उन्नत बनाते हैं:

  • पञ्च कोश का वेधन: प्रत्येक कोश एक आवरण है। अन्नमय कोश (शरीर), प्राणमय (ऊर्जा), मनोमय (विचार), विज्ञानमय (विवेक) और आनन्दमय (परम शांति)। इन कोशों की शुद्धि से ही 'आत्म-साक्षात्कार' संभव है।

  • दश शूलों का संहार: श्लोक ३३-३४ में दश कष्टों का उल्लेख है—दोषपूर्ण दृष्टि, दूसरों पर निर्भरता, भय, क्षुद्रता, असावधानी, स्वार्थ, अविवेक, आवेश, तृष्णा और आलस्य। माँ गायत्री अपनी दश भुजाओं से इन तामसिक प्रवृत्तियों का विनाश करती हैं।

  • मूलाधार शक्ति: शिव जी के अनुसार गायत्री ही सभी योगिक साधनाओं का 'मूलाधार' है। इसके बिना कोई भी योग या तप पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकता।

  • गुरु मन्त्र का सार: श्लोक ४१-४२ स्पष्ट करते हैं कि गायत्री 'पराविद्या' है और इसके फल की प्राप्ति के लिए एक सुपात्र गुरु (गायत्री-तत्त्व पण्डित) का होना अनिवार्य है।

फलश्रुति लाभ: चतुर्विध पुरुषार्थ की प्राप्ति

भगवान शिव ने इस स्तोत्र की फलश्रुति (श्लोक ४४-४६) में अनन्त लाभों की घोषणा की है:
१. पञ्चकोश जाग्रति और आरोग्य
इसके पाठ और चिन्तन से शरीर के पाँचों स्तर शुद्ध होते हैं। साधक शारीरिक व्याधियों से मुक्त होकर तेजस्वी बनता है और उसकी प्राण-शक्ति (Immunity) कई गुना बढ़ जाती है।
२. मानसिक क्लेशों से मुक्ति
माँ की दश भुजाएं साधक के भीतर के भय, आलस्य और स्वार्थ को जड़ से मिटा देती हैं। इससे मन शांत होता है और 'मनोमय कोश' उज्ज्वल होकर दिव्य विचारों को ग्रहण करने योग्य बनता है।
३. सर्वसिद्धि प्रदायक (Mantra Power)
श्लोक ४४ के अनुसार गायत्री 'सिद्धियों की माता' है। इस मञ्जरी का ज्ञान रखने वाला साधक अल्प प्रयास से ही वह प्राप्त कर लेता है जो साधारण लोग वर्षों की तपस्या से नहीं पाते।
४. भवसागर से तारण (Moksha)
इसका सबसे बड़ा फल 'परम गति' है। यह स्तोत्र साधक को 'तुरीय' अवस्था तक पहुँचाता है, जहाँ उसे संसार के जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति और अनन्त आनन्द की प्राप्ति होती है।

पाठ विधि और साधना के पाँच सोपान (Ritual Guide)

गायत्री मञ्जरी में वर्णित विद्या को सिद्ध करने के लिए निम्नलिखित विधि का पालन करना चाहिए:
  • अन्नमय कोश शुद्धि: आसन के अभ्यास, मितहार (सात्त्विक भोजन) और उपवास के द्वारा शरीर को शुद्ध करें।
  • प्राणमय कोश शुद्धि: प्रतिदिन 'प्राणायाम', 'मुद्रा' और 'बन्ध' (जैसे मूलबन्ध) का अभ्यास करें ताकि दशों प्राण संतुलित हो सकें।
  • मनोमय कोश शुद्धि: मन की एकाग्रता के लिए 'त्राटक' और 'गायत्री जप' का सहारा लें। इससे चंचलता दूर होगी।
  • विज्ञानमय कोश शुद्धि: स्वाध्याय, 'सोऽहम्' साधना और आत्म-अनुभूतियों के चिन्तन से बुद्धि को प्रखर करें।
  • आनन्दमय कोश शुद्धि: 'नाद-बिन्दु' और 'कला' के ध्यान में लीन हों, जो पूर्ण शान्ति और तुरीय अवस्था प्रदान करती है।
विशेष: गायत्री साधना कभी निष्फल नहीं होती। श्लोक ४६ के अनुसार, जो इस रहस्य को जान लेता है, उसे साक्षात् महादेव का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. 'गायत्री मञ्जरी' का वास्तव में क्या अर्थ है?

'मञ्जरी' का अर्थ है पुष्पों का गुच्छा या अंकुर। यह स्तोत्र गायत्री विद्या के उन खिलते हुए रहस्यों का संकलन है जो साधक के जीवन में ज्ञान का पुष्प खिलाते हैं।

2. गायत्री के 'पञ्च मुख' जीव के कोशों से कैसे जुड़े हैं?

भगवान शिव के अनुसार जीव के ऊपर अज्ञान के पाँच आवरण (कोश) चढ़े होते हैं। गायत्री के पाँच मुख इन्हीं पाँच आवरणों को हटाकर आत्मा को मुक्त करने का संकेत हैं।

3. क्या गृहस्थ व्यक्ति इस विद्या का अभ्यास कर सकते हैं?

हाँ, यह विद्या सभी के लिए है। गृहस्थ व्यक्ति 'सात्त्विक आहार' और 'दैनिक सन्ध्या' के माध्यम से पञ्चकोशों को शुद्ध कर सकता है।

4. 'दश शूल' क्या हैं और वे हमें कैसे प्रभावित करते हैं?

भय, आलस्य, तृष्णा जैसी दस प्रवृत्तियाँ हमारे मन में कांटे (शूल) की तरह चुभती रहती हैं और हमें दुखी करती हैं। गायत्री की दश भुजाएँ इन्हीं का नाश करती हैं।

5. क्या पाठ के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?

श्लोक ४१ और ४२ में शिव जी ने गुरु की महत्ता पर विशेष बल दिया है। तान्त्रिक रहस्यों को समझने के लिए गुरु का सानिध्य आवश्यक है।

6. गायत्री को 'कामधेनु' क्यों कहा गया है?

कामधेनु वह गाय है जो हर मनोकामना पूरी करती है। श्लोक २९ के अनुसार, गायत्री की शरण में आने वाला साधक धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—सब कुछ पा लेता है।

7. क्या इस पाठ से बौद्धिक क्षमता बढ़ती है?

बिल्कुल, 'विज्ञानमय कोश' की जाग्रति का अर्थ ही है बुद्धि का सर्वोच्च विकास, जिससे साधक को संसार और स्वयं का यथार्थ ज्ञान होता है।

8. 'वाममार्ग' और 'तन्त्र' का यहाँ क्या संदर्भ है?

यह गायत्री के उस अत्यंत शक्तिशाली और गोपनीय स्वरूप की ओर संकेत है जिसका उपयोग उच्च स्तरीय सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए किया जाता है।

9. क्या स्त्रियाँ इस स्तोत्र का पाठ कर सकती हैं?

हाँ, माँ गायत्री स्वयं नारी शक्ति की पराकाष्ठा हैं। पूर्ण श्रद्धा और पवित्रता के साथ स्त्रियाँ इसका पाठ कर सकती हैं।

10. पाठ के लिए सबसे अच्छा समय कौन सा है?

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः ४ से ६ बजे) साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि उस समय प्रकृति की ऊर्जा पञ्चकोशों को जाग्रत करने में सहायक होती है।