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Vividha Gayatri Mantra – विविध गायत्री मन्त्राः (देवताओं के सिद्ध गायत्री मन्त्र)

Vividha Gayatri Mantra – विविध गायत्री मन्त्राः (देवताओं के सिद्ध गायत्री मन्त्र)
॥ विविध गायत्री मन्त्राः ॥
(प्रमुख देवी-देवताओं के गायत्री मन्त्र)
१. शिव गायत्री: तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि । तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥ १ ॥ २. गणेश गायत्री: तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ॥ २ ॥ ३. नन्दि गायत्री: तत्पुरुषाय विद्महे चक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो नन्दिः प्रचोदयात् ॥ ३ ॥ ४. षण्मुख (कार्तिकेय) गायत्री: तत्पुरुषाय विद्महे महासेनाय धीमहि । तन्नः षण्मुखः प्रचोदयात् ॥ ४ ॥ ५. गरुड़ गायत्री: तत्पुरुषाय विद्महे सुवर्णपक्षाय धीमहि । तन्नो गरुडः प्रचोदयात् ॥ ५ ॥ ६. ब्रह्मा गायत्री: वेदात्मनाय विद्महे हिरण्यगर्भाय धीमहि । तन्नो ब्रह्म प्रचोदयात् ॥ ६ ॥ ७. विष्णु गायत्री: नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि । तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥ ७ ॥ ८. नृसिंह गायत्री: वज्रनखाय विद्महे तीक्ष्णदंष्ट्राय धीमहि । तन्नो नारसिंहः प्रचोदयात् ॥ ८ ॥ ९. सूर्य गायत्री (आदित्य): भास्कराय विद्महे महद्द्युतिकराय धीमहि । तन्नो आदित्यः प्रचोदयात् ॥ ९ ॥ १०. अग्नि गायत्री: वैश्वानराय विद्महे लालीलाय धीमहि । तन्नो अग्निः प्रचोदयात् ॥ १० ॥ ११. दुर्गा गायत्री: कात्यायनाय विद्महे कन्यकुमारि धीमहि । तन्नो दुर्गिः प्रचोदयात् ॥ ११ ॥ १२. चतुर्मुख ब्रह्मा गायत्री: चतुर्मुखाय विद्महे कमण्डलुधराय धीमहि । तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात् ॥ १२ ॥ १३. भानु गायत्री: आदित्याय विद्महे सहस्रकिरणाय धीमहि । तन्नो भानुः प्रचोदयात् ॥ १३ ॥ १४. वैश्वानर गायत्री: पावकाय विद्महे सप्तजिह्वाय धीमहि । तन्नो वैश्वानरः प्रचोदयात् ॥ १४ ॥ १५. महादुर्गा गायत्री: महाशूलिन्यै विद्महे महादुर्गायै धीमहि । तन्नो भगवती प्रचोदयात् ॥ १५ ॥ १६. गौरी गायत्री: सुभगायै विद्महे कमलमालिन्यै धीमहि । तन्नो गौरी प्रचोदयात् ॥ १६ ॥ १७. सर्प गायत्री: नवकुलाय विद्महे विषदन्ताय धीमहि । तन्नो सर्पः प्रचोदयात् ॥ १७ ॥ १८. लक्ष्मी गायत्री: महादेव्यै च विद्महे विष्णुपत्नी च धीमहि । तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥ १८ ॥
॥ इति विविध गायत्री मन्त्राः सम्पूर्णाः ॥

विविध गायत्री मन्त्राः - विस्तृत आध्यात्मिक परिचय

विविध गायत्री मन्त्राः (Vividha Gayatri Mantra) सनातन धर्म के मन्त्र विज्ञान का वह अनूठा संकलन है, जहाँ वेदों के सर्वोच्च छन्द 'गायत्री' का उपयोग सृष्टि की विभिन्न ईश्वरीय सत्ताओं का आवाहन करने के लिए किया गया है। यद्यपि 'ॐ भूर्भुवः स्वः' वाला मूल गायत्री मन्त्र सर्वोपरि है, परन्तु ऋषियों ने अनुभव किया कि जिस प्रकार एक ही सूर्य की किरणें अलग-अलग रंगों के कांच से गुजरकर अलग प्रभाव छोड़ती हैं, उसी प्रकार गायत्री की महाशक्ति को जब विशिष्ट देवताओं के नाम और गुणों के साथ जोड़ा जाता है, तो वह साधक को उस देवता की विशेष ऊर्जा प्रदान करती है।
'विविध गायत्री मन्त्र' का अर्थ है वे मन्त्र जो गायत्री के २४ अक्षरों की संरचना (२४ वर्णों का छन्द) का पालन करते हैं, परन्तु उनके लक्ष्य देव अलग-अलग होते हैं। इनमें प्रत्येक मन्त्र के तीन चरण होते हैं—प्रथम चरण में देवता का स्वरूप (विद्महे), द्वितीय चरण में उनका ध्यान (धीमहि), और तृतीय चरण में उनसे बुद्धि को सन्मार्ग पर ले जाने की प्रार्थना (प्रचोदयात्)। यह मात्र शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि एक आध्यात्मिक टेलीकम्युनिकेशन है, जो साधक के सूक्ष्म शरीर को सीधे ब्रह्माण्डीय शक्तियों से जोड़ता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से, ये मन्त्र साधक की विशिष्ट कामनाओं और दोषों के निवारण हेतु अमोघ अस्त्र हैं। यदि साधक को ज्ञान की आवश्यकता है, तो वह 'ब्रह्मा गायत्री' का आश्रय लेता है; यदि सुरक्षा की आवश्यकता है, तो 'रुद्र' या 'दुर्गा गायत्री' और यदि आरोग्य व तेज की इच्छा है, तो 'आदित्य गायत्री' का। यह संग्रह हिन्दू देवमण्डल की व्यापकता और गायत्री मन्त्र की सार्वभौमिक शक्ति का साक्षात् प्रमाण है।
वर्तमान समय में, जहाँ एकाग्रता का अभाव है, इन मन्त्रों का जप साधक को एक 'पॉइंटेड फोकस' (Pointed Focus) प्रदान करता है। जो व्यक्ति निष्काम भाव से इन विविध मन्त्रों का पाठ करता है, वह न केवल उस विशिष्ट देवता की कृपा पाता है, बल्कि वेदमाता गायत्री के तेज से भी ओत-प्रोत हो जाता है।

मन्त्र संरचना और विशिष्ट महत्व (Significance)

विविध गायत्री मन्त्रों का महत्व उनकी संरचना और ध्वन्यात्मक विज्ञान (Science of Sound) में निहित है:
  • छन्द का प्रभाव: गायत्री छन्द में २४ अक्षर होते हैं। तन्त्र शास्त्र के अनुसार, ये २४ अक्षर हमारे शरीर की २४ सूक्ष्म ग्रंथियों (Glands) को झंकृत करते हैं। जब हम शिव या विष्णु गायत्री पढ़ते हैं, तो वह ऊर्जा उसी विशिष्ट फ्रीक्वेंसी (Frequency) पर कार्य करती है।
  • त्रिपदा महिमा: प्रत्येक मन्त्र के तीन पाद (पैर/चरण) होते हैं। यह मनुष्य के तीन शरीरों (स्थूल, सूक्ष्म और कारण) की शुद्धि का प्रतीक है। 'प्रचोदयात्' शब्द हमारी सुप्त चेतना को धक्का देकर ऊर्ध्वगामी बनाता है।
  • सर्वात्मक उपासना: यह मन्त्रमाला सिद्ध करती है कि सभी देवता एक ही परम चेतना के विभिन्न केंद्र हैं। यह 'एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति' के वैदिक सिद्धान्त को व्यावहारिक रूप प्रदान करती है।
  • दोष निवारण: विशिष्ट मन्त्रों (जैसे सर्प गायत्री या नृसिंह गायत्री) का पाठ कुण्डली के कालसर्प दोष, भय, और ग्रहों के अशुभ प्रभावों को शांत करने के लिए किया जाता है।

फलश्रुति लाभ: देवताओं की विशेष अनुकम्पा

इन सिद्ध गायत्री मन्त्रों के पाठ से प्राप्त होने वाले लाभ देवताओं के स्वरूप के अनुसार इस प्रकार हैं:
१. शिव और रुद्र गायत्री (मानसिक शान्ति)
भगवान शिव के मन्त्र से अकाल मृत्यु का भय टलता है, क्रोध पर विजय प्राप्त होती है और साधक को गहन ध्यान (Meditation) की अवस्था प्राप्त होती है।
२. विष्णु और लक्ष्मी गायत्री (समृद्धि)
इन मन्त्रों का जाप घर में ऐश्वर्य, स्थिर लक्ष्मी, और पारिवारिक सामंजस्य लाता है। यह 'पालन शक्ति' को जाग्रत करता है।
३. गणेश और दुर्गा गायत्री (बाधा मुक्ति)
कार्य के प्रारंभ में गणेश गायत्री का पाठ विघ्नों को दूर करता है, जबकि दुर्गा गायत्री शत्रुओं के षड्यंत्रों से रक्षा और आत्मविश्वास प्रदान करती है।
४. आदित्य और अग्नि गायत्री (तेज और ओज)
सूर्य और अग्नि के मन्त्र शरीर के रोगों (विशेषकर त्वचा और नेत्र रोग) को जला देते हैं और साधक के व्यक्तित्व में एक दिव्य आकर्षण (Magnetism) लाते हैं।

पाठ विधि और साधना नियम (Ritual Guide)

विविध गायत्री मन्त्रों की साधना के लिए निम्नलिखित विधि अपनाना श्रेष्ठ है:
  • समय (Time): प्रातः काल (सूर्योदय) और सायंकाल (सूर्यास्त) सन्ध्या के समय पाठ करना सर्वाधिक प्रभावशाली है। विशेष कार्य हेतु रात्रि (निशीथ काल) में भी जप किया जा सकता है।
  • शुद्धि: स्नान के उपरान्त शुद्ध और सात्विक वस्त्र (पीले, सफ़ेद या केसरिया) धारण करें। गायत्री साधना में शरीर और स्थान की पवित्रता अनिवार्य है।
  • आसन और दिशा: पूर्व दिशा (ज्ञान हेतु) या उत्तर दिशा (सिद्धि हेतु) की ओर मुख करके कुश या ऊनी आसन पर बैठें।
  • संख्या: प्रत्येक मन्त्र की कम से कम १०, २८ या १०८ बार माला जपें। माला रुद्राक्ष (शिव हेतु), तुलसी (विष्णु हेतु) या सफ़ेद चन्दन (माँ गायत्री हेतु) की हो सकती है।
  • ध्यान: मन्त्र पढ़ते समय उस विशिष्ट देवता के स्वरूप का अपने हृदय या आज्ञा चक्र (भ्रूमध्य) में चिन्तन करें।
नोट: मन्त्रों का उच्चारण स्पष्ट होना चाहिए। यदि संस्कृत में कठिनाई हो, तो अर्थ को मन में रखकर धीरे-धीरे अभ्यास करें।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. क्या इन सभी मन्त्रों का पाठ एक साथ किया जा सकता है?

हाँ, यह एक स्तोत्र के रूप में संकलित है। आप इन सभी का पाठ कर सकते हैं या अपनी आवश्यकतानुसार किसी एक मन्त्र का अधिक जप कर सकते हैं।

2. क्या इन मन्त्रों के पाठ के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?

भक्ति मार्ग के सामान्य पाठ के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं है, परन्तु किसी विशेष तान्त्रिक अनुष्ठान या पुरश्चरण के लिए गुरु का सानिध्य उत्तम रहता है।

3. 'प्रचोदयात्' का वास्तविक अर्थ क्या है?

'प्रचोदयात्' का अर्थ है—प्रेरित करें। हम प्रार्थना करते हैं कि वह परमात्मा हमारी बुद्धि को उच्च और सत्य मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे।

4. क्या स्त्रियाँ इन गायत्री मन्त्रों का पाठ कर सकती हैं?

बिल्कुल, माँ गायत्री वेदों की माता हैं और उनकी संतान के रूप में स्त्रियाँ पूर्ण शुचिता और श्रद्धा के साथ इन मन्त्रों का पाठ कर सकती हैं।

5. कार्तिकेय (षण्मुख) गायत्री का क्या लाभ है?

यह मन्त्र साहस बढ़ाने, विवादों में विजय प्राप्त करने और मंगल दोष के कुप्रभावों को कम करने के लिए जपा जाता है।

6. 'विद्महे' का क्या अर्थ है?

'विद्महे' का अर्थ है 'हम जानते हैं' या 'हम बोध करते हैं'। यह साधक के ज्ञान पक्ष को जाग्रत करने का शब्द है।

7. क्या इन मन्त्रों से एकाग्रता बढ़ती है?

हाँ, क्योंकि गायत्री मन्त्र सीधे हमारी बुद्धि पर कार्य करते हैं। इनके निरंतर पाठ से मन की चंचलता दूर होती है और एकाग्रता बढ़ती है।

8. 'वैश्वानर' गायत्री किसलिए है?

वैश्वानर साक्षात् जठराग्नि और ऊर्जा के देवता हैं। यह मन्त्र पाचन क्रिया सुधारने और शरीर के आंतरिक तेज को बढ़ाने के लिए श्रेष्ठ है।

9. क्या केवल सुनने मात्र से लाभ मिलता है?

हाँ, मन्त्रों की ध्वनि तरंगें (Sound Waves) वातावरण और मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डालती हैं, परन्तु स्वयं उच्चारण करना अधिक प्रभावशाली माना गया है।

10. गायत्री को 'मन्त्रों का राजा' क्यों कहते हैं?

क्योंकि यह मन्त्र चेतना को जगाने वाला सर्वश्रेष्ठ मन्त्र है और इसके छन्द की गति ब्रह्माण्ड की गति के साथ पूर्ण सामंजस्य रखती है।