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Sri Gayatri Kavacham 2 – श्री गायत्री कवचम् २ (विश्वामित्र संहिता)

Sri Gayatri Kavacham 2 – श्री गायत्री कवचम् २ (विश्वामित्र संहिता)
॥ श्री गायत्री कवचम् २ ॥
(श्री विश्वामित्र संहितायाम्)
अस्य श्रीगायत्री कवचस्य ब्रह्मा ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः गायत्री देवता भूः बीजं भुवः शक्तिः स्वः कीलकं श्रीगायत्री प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः । (जल छोड़ें) ॥ ध्यानम् ॥पञ्चवक्त्रां दशभुजां सूर्यकोटिसमप्रभाम् । सावित्रीं ब्रह्मवरदां चन्द्रकोटिसुशीतलाम् ॥ १ ॥ त्रिनेत्रां सितवक्त्रां च मुक्ताहारविराजिताम् । वराऽभयाङ्कुशकशां हेमपात्राक्षमालिकाम् ॥ २ ॥ शङ्खचक्राब्जयुगलं कराभ्यां दधती पराम् । सितपङ्कजसंस्था च हंसारूढां सुखस्मिताम् ॥ ३ ॥ ध्यात्वैवं मानसाम्भोजे गायत्रीकवचं जपेत् ॥ ४ ॥ ॥ ब्रह्मा उवाच ॥विश्वामित्र महाप्राज्ञ गायत्रीकवचं शृणु । यस्य विज्ञानमात्रेण त्रैलोक्यं वशयेत् क्षणात् ॥ ५ ॥ सावित्री मे शिरः पातु शिखायाममृतेश्वरी । ललाटं ब्रह्मदैवत्या भ्रुवौ मे पातु वैष्णवी ॥ ६ ॥ कर्णौ मे पातु रुद्राणी सूर्या सावित्रिकाऽम्बिके । गायत्री वदनं पातु शारदा दशनच्छदौ ॥ ७ ॥ द्विजान् यज्ञप्रिया पातु रसनायां सरस्वती । साङ्ख्यायनी नासिका मे कपोलं चन्द्रहासिनी ॥ ८ ॥ चिबुकं वेदगर्भा च कण्ठं पात्वघनाशिनी । स्तनौ मे पातु इन्द्राणी हृदयं ब्रह्मवादिनी ॥ ९ ॥ उदरं विश्वभोक्त्री च नाभिं पातु सुरप्रिया । जघनं नारसिंही च पृष्ठं ब्रह्माण्डधारिणी ॥ १० ॥ पार्श्वौ मे पातु पद्माक्षी गुह्यं मे गोत्रिकाऽवतु । ऊर्वोरोङ्काररूपा च जान्वोः सन्ध्यात्मिकाऽवतु ॥ ११ ॥ जङ्घयोः पातु चाऽक्षोभ्या गुल्फयोर्ब्रह्मशीर्षका । सूर्या पदद्वयं पातु चन्द्रा पादाङ्गुलीषु च ॥ १२ ॥ सर्वाङ्गं वेदमाता च पातु मे सर्वदाऽनघा । इत्येतत् कवचं ब्रह्मन् गायत्र्याः सर्वपावनम् ॥ १३ ॥ ॥ फलश्रुति ॥पुण्यं पवित्रं पापघ्नं सर्वरोगनिवारणम् । त्रिसन्ध्यं यः पठेद्विद्वान् सर्वान् कामानवाप्नुयात् ॥ १४ ॥ सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः स भवेद्वेदवित्तमः । सर्वयज्ञफलं पुण्यं ब्रह्मान्ते समवाप्नुयात् ॥ १५ ॥
॥ इति श्री विश्वामित्र संहितायाम् श्री गायत्री कवचम् सम्पूर्णम् ॥

श्री गायत्री कवचम् २ - विस्तृत आध्यात्मिक परिचय

श्री गायत्री कवचम् २ (Sri Gayatri Kavacham 2) सनातन वैदिक परंपरा का एक अत्यंत शक्तिशाली और रक्षक स्तोत्र है। यह स्तोत्र 'श्री विश्वामित्र संहिता' से उद्धृत है, जो स्वयं गायत्री मंत्र के द्रष्टा महर्षि विश्वामित्र की आध्यात्मिक यात्रा से जुड़ी है। 'कवच' का अर्थ होता है सुरक्षा कवच या ढाल। जिस प्रकार एक सैनिक युद्ध क्षेत्र में कवच पहनकर शस्त्रों से सुरक्षित रहता है, उसी प्रकार एक साधक 'गायत्री कवच' का पाठ कर संसार की नकारात्मक ऊर्जाओं, शत्रुओं और व्याधियों से अपनी रक्षा करता है।

इस कवच के रचयिता और ऋषि स्वयं भगवान ब्रह्मा हैं। ब्रह्मा जी ने महर्षि विश्वामित्र को संबोधित करते हुए कहा कि माँ गायत्री का यह कवच मात्र एक स्तुति नहीं, बल्कि साक्षात् 'ब्रह्म-ऊर्जा' है। इसके "विज्ञानमात्रेण" अर्थात् केवल तात्विक बोध मात्र से साधक के भीतर वह सामर्थ्य जागृत हो जाता है कि वह तीनों लोकों की अनुकूलता प्राप्त कर सके। यह माँ गायत्री के 'वेदमाता' स्वरूप की सर्वोच्च महत्ता को सिद्ध करता है।

गायत्री कवच की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सूक्ष्म शारीरिक संरचना है। इसमें साधक माँ के विविध स्वरूपों (सावित्री, वैष्णवी, रुद्राणी, शारदा आदि) का आवाहन कर अपने शरीर के प्रत्येक सूक्ष्म और स्थूल अंग को मन्त्रों से 'कीलित' या सुरक्षित करता है। सिर से लेकर पैरों की उंगलियों तक, माँ गायत्री की कृपा एक अदृश्य घेरे की तरह साधक के साथ रहती है।

तान्त्रिक और वैदिक ग्रंथों के अनुसार, गायत्री मंत्र की पूर्ण सिद्धि के लिए 'न्यास' और 'कवच' का पाठ अनिवार्य माना गया है। यह साधक के चित्त को अभय प्रदान करता है, जिससे वह निर्भय होकर अपनी साधना में लीन रह सके। वर्तमान युग की आपाधापी, मानसिक तनाव और असुरक्षा के भाव को मिटाने के लिए गायत्री कवच का पाठ एक आध्यात्मिक संजीवनी के समान है।

विशिष्ट महत्व और दार्शनिक आधार

विश्वामित्र संहिता के इस गायत्री कवच का महत्व इसके तात्विक और योगिक रहस्यों में छिपा है:

  • पंचमुखी स्वरूप का ध्यान: कवच के ध्यान में माँ को 'पञ्चवक्त्रां' (पांच मुख वाली) कहा गया है। ये पांच मुख पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) और पंचप्राणों के अधिपति हैं।

  • सूर्य और चंद्र का संतुलन: जहाँ माँ को 'सूर्यकोटिसमप्रभा' (करोड़ों सूर्यों का तेज) कहा गया है, वहीं उन्हें 'चन्द्रकोटिसुशीतला' (करोड़ों चंद्रमाओं की शीतलता) भी बताया गया है। यह साधक के भीतर 'इड़ा' और 'पिंगला' नाड़ियों के संतुलन को दर्शाता है।

  • अङ्ग-न्यास का विज्ञान: कवच में शरीर के विभिन्न अंगों जैसे शिखा, ललाट, भ्रू, कर्ण और नाभि के लिए अलग-अलग देवियों (सूर्या, रुद्राणी, वैष्णवी) का आवाहन है। यह हमारे शरीर के 'चक्रों' को सुरक्षा प्रदान करता है।

  • ब्रह्मविद्या की पराकाष्ठा: माँ को 'ब्रह्मवादिनी' और 'वेदमाता' कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे सत्य ज्ञान की वह वाणी हैं जो समस्त अज्ञान का विनाश करती है।

फलश्रुति लाभ (Divine Benefits)

इस दिव्य गायत्री कवच के पाठ से होने वाले लाभों का वर्णन 'फलश्रुति' (श्लोक १४-१५) में विस्तृत रूप से मिलता है:
१. चहुंओर रक्षा और अभय प्राप्ति
कवच का पाठ साधक के चारों ओर एक सुरक्षा घेरा बना देता है, जिससे बुरी शक्तियां, नकारात्मक विचार और नजर दोष पास नहीं फटकते।
२. सर्वरोग निवारण
फलश्रुति में इसे 'सर्वरोगनिवारणम्' कहा गया है। यह असाध्य बीमारियों और मानसिक व्याधियों (चिंता, भय) को दूर कर साधक को आरोग्य प्रदान करता है।
३. ज्ञान और मन्त्र सिद्धि
इसके पाठ से साधक 'सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः' बनता है, अर्थात् उसे शास्त्रों का गहरा ज्ञान प्राप्त होता है। वह वेदों के सार को समझने में सक्षम होता है।
४. वशीकरण और प्रभाव
श्लोक ५ के अनुसार, जो इस कवच को जानता है, वह अपनी वाणी और तेज से 'त्रैलोक्य' (तीनों लोकों) में अनुकूलता और सम्मान प्राप्त करता है।

पाठ विधि और अनुष्ठान नियम (Ritual Guide)

गायत्री कवच का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित विधि अपनाएं:
  • समय (Time): प्रातः काल (सूर्योदय के समय), मध्याह्न (दोपहर १२ बजे) और सायंकाल (सूर्यास्त) - त्रिकाल सन्ध्या में इसका पाठ विशेष फलदायी है।
  • शुद्धि (Purification): स्नान के उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण करें। गायत्री उपासना में पीले या सफ़ेद वस्त्रों का विशेष महत्व है।
  • आसन: ऊनी या कुश के आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • विनियोग: पाठ प्रारंभ करने से पूर्व दायें हाथ में जल लेकर 'विनियोग' मन्त्र पढ़ें और जल भूमि पर छोड़ें।
  • न्यास: कवच में वर्णित अंगों का स्पर्श करते हुए ध्यान केंद्रित करें। जैसे "सावित्री मे शिरः पातु" कहते समय सिर का स्पर्श करें।
  • जप: कवच पाठ के उपरांत न्यूनतम २४ या १०८ बार मूल गायत्री मन्त्र का जप करना सोने पर सुहागा है।
नोट: पाठ के दौरान पूर्ण श्रद्धा और अटूट विश्वास रखें। गायत्री माँ को करुणा की जननी माना गया है, वे अपने शरणागत की रक्षा अवश्य करती हैं।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. श्री गायत्री कवचम् २ का मूल स्रोत क्या है?

यह कवच प्राचीन 'श्री विश्वामित्र संहिता' से लिया गया है। इसमें भगवान ब्रह्मा स्वयं ऋषि हैं और वे महर्षि विश्वामित्र को इसका उपदेश देते हैं।

2. गायत्री कवच और गायत्री मन्त्र जप में क्या संबंध है?

गायत्री मन्त्र मुख्य शक्ति है और कवच उस शक्ति को साधक के शरीर में सुरक्षित रखने वाला आवरण है। कवच पाठ के बिना मन्त्र साधना का पूर्ण फल प्राप्त होना कठिन माना गया है।

3. क्या इस कवच से वाक-सिद्धि प्राप्त होती है?

जी हाँ, माँ सरस्वती और शारदा के आवाहन से साधक की वाणी प्रभावशाली और ओजस्वी बनती है, जिससे वह विद्वानों की सभा में ख्याति प्राप्त करता है।

4. 'अघनाशिनी' नाम का क्या तात्पर्य है?

'अघ' का अर्थ है पाप। माँ गायत्री को 'अघनाशिनी' (कण्ठ की रक्षिका) कहा गया है क्योंकि वे वाणी के माध्यम से होने वाले पापों और संचित कर्मों को नष्ट करती हैं।

5. क्या स्त्रियाँ इस कवच का पाठ कर सकती हैं?

हाँ, माँ गायत्री वेदों की माता और शक्ति स्वरूपा हैं। कोई भी श्रद्धावान भक्त, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, शुचिता के साथ इस कवच का पाठ कर सकता है।

6. 'जघनं नारसिंही' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है कि माँ का 'नारसिंही' (शक्तिशाली उग्र स्वरूप) साधक के जंघाओं और निचले अंगों की रक्षा करे। यह शत्रु बाधाओं से सुरक्षा का प्रतीक है।

7. क्या बीमार व्यक्ति के लिए यह कवच उपयोगी है?

बिल्कुल, फलश्रुति के अनुसार यह 'सर्वरोगनिवारणम्' है। नियमित पाठ से शारीरिक दुर्बलता और असाध्य रोगों में चमत्कारिक सुधार देखा गया है।

8. पाठ के लिए किसी विशेष माला की आवश्यकता है?

स्तोत्र पाठ के लिए माला की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन पाठ के बाद मन्त्र जप के लिए सफ़ेद चन्दन या रुद्राक्ष की माला उत्तम है।

9. 'त्रैलोक्य वशयेत्' का अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है कि साधक का व्यक्तित्व इतना प्रभावी और तेजस्वी हो जाता है कि वह जहाँ भी जाता है, लोग उसके प्रति आकर्षित और अनुकूल हो जाते हैं।

10. क्या बिना गुरु दीक्षा के पाठ कर सकते हैं?

हाँ, भक्ति भाव से स्तोत्र और कवच का पाठ किया जा सकता है। हालाँकि, किसी तांत्रिक अनुष्ठान के लिए गुरु का मार्गदर्शन सदैव मंगलकारी होता है।