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Sri Gauri Saptashloki Stuti – श्री गौरी सप्तश्लोकी स्तुतिः | Meaning & Benefits

Sri Gauri Saptashloki Stuti – श्री गौरी सप्तश्लोकी स्तुतिः | Meaning & Benefits
॥ श्री गौरी सप्तश्लोकी स्तुतिः ॥ करोपान्ते कान्ते वितरणरवन्ते विदधतीं नवां वीणां शोणामभिरुचिभरेणाङ्कवदनां । सदा वन्दे मन्देतरमतिरहं देशिकवशा- -त्कृपालम्बामम्बां कुसुमितकदम्बाङ्कणगृहाम् ॥ १ ॥ शशिप्रख्यं मुख्यं कृतकमलसख्यं तव मुखं सुधावासं हासं स्मितरुचिभिरासन्न कुमुदं । कृपापात्रे नेत्रे दुरितकरितोत्रे च नमतां सदा लोके लोकेश्वरि विगतशोकेन मनसा ॥ २ ॥ अपि व्याधा वाधावपि सति समाधाय हृदि ता मनौपम्यां रम्यां मुनिभिरवगम्यां तव कलां । निजामाद्यां विद्यां नियतमनवद्यां न कलये न मातङ्गीमङ्गीकृतसरससङ्गीतरसिकाम् ॥ ३ ॥ स्फुरद्रूपानीपावनिरुहसमीपाश्रयपरा सुधाधाराधाराधररुचिरुदारा करुणया । स्तुति प्रीता गीतामुनिभिरुपनीता तव कला त्रयीसीमा सा मामवतु सुरसामाजिकमता ॥ ४ ॥ तुलाकोटीकोटी किरणपरिपाटि दिनकरं नखच्छायामाया शशिनलिनदायादविभवं । पदं सेवे भावे तव विपदभावे विलसितं जगन्मातः प्रातः कमलमुखि नातः परतरम् ॥ ५ ॥ कनत्फालां बालां ललितशुकलीलाम्बुजकरां लसद्धाराधारां कचविजितधाराधररुचिं । रमेन्द्राणीवाणी लसदसितवेणीसुमपदां महत्सीमां श्यामामरुणगिरिवामां भज मते ॥ ६ ॥ गजारण्य़े पुण्ये श्रितजनशरण्ये भगवती जपावर्णापर्णां तरलतरकर्णान्तनयना । अनाद्यन्ता शान्ताबुधजनसुसन्तानलतिका जगन्माता पूता तुहिनगिरिजाता विजयते ॥ ७ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ गौर्यास्सप्तस्तुतिं नित्यं प्रभाते नियतः पठेत् । तस्य सर्वाणि सिद्ध्यन्ति वाञ्छितानि न संशयः ॥ ८ ॥ ॥ इति श्री गौरी सप्तश्लोकी स्तुतिः सम्पूर्णा ॥

॥ श्री गौरी सप्तश्लोकी स्तुतिः - परिचय (Introduction) ॥

श्री गौरी सप्तश्लोकी स्तुतिः (Sri Gauri Saptashloki Stuti) माँ आदिशक्ति के 'गौरी' स्वरूप को समर्पित एक अत्यंत दुर्लभ और प्रभावशाली स्तोत्र है। 'सप्तश्लोकी' का अर्थ है 'सात श्लोकों वाला'। ऋषियों और मुनियों ने जन-कल्याण के लिए देवी की विशाल महिमा को इन सात श्लोकों में समाहित (encapsulate) कर दिया है। इसे पढ़ने में अत्यंत कम समय लगता है, किन्तु इसका फल विशाल स्तोत्रों के समान ही माना गया है।

'गौरी' शब्द पवित्रता, तपस्या और सौम्य सौंदर्य का प्रतीक है। देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए हजारों वर्षों तक कठिन तप (Panchagni Tap) किया था। उस तप के प्रभाव से उनका वर्ण गौर (श्वेत) और तेजस्विनी हो गया, जिससे वे 'गौरी' कहलाईं। इसलिए, यह स्तोत्र विशेष रूप से उन भक्तों के लिए एक वरदान है जो वैवाहिक सुख, सुयोग्य जीवनसाथी और गृहस्थ जीवन में शांति चाहते हैं।

इस स्तोत्र में देवी के न केवल सौम्य रूप का, बल्कि उनके 'मातङ्गी' (ज्ञान और संगीत की देवी) और 'जगन्माता' (विश्व की जननी) स्वरूप का भी वर्णन है। यह साधक को भोग (भौतिक सुख) और मोक्ष (आध्यात्मिक मुक्ति) दोनों प्रदान करने में समर्थ है।

॥ स्तोत्र भावार्थ (Meaning) ॥

श्लोक १ जो अपने सुंदर कर-कमलों (हाथों) के समीप नवीन (नई) वीणा धारण किए हुए हैं, जो लाल वर्ण की (अरुण आभा वाली) हैं, और अपनी कांति के भार से जिनका मुखमंडल अत्यंत सुंदर लग रहा है। जो खिले हुए कदम्ब के फूलों से भरे आंगन वाले घर में निवास करती हैं; उस दयालु माँ (अम्बा) की मैं (गुरु की कृपा से) स्थिर बुद्धि होकर सदा वंदना करता हूँ।

श्लोक २ हे लोकेश्वरी! आपका मुख चंद्रमा के समान (सुंदर) और कमलों का मित्र (कमल जैसा कोमल) है। आपकी हंसी अमृत का निवास स्थान है और आपकी मुस्कान की कांति से कुमुद (रात्रि कमल) भी खिल उठते हैं। आपके नेत्र कृपा के पात्र हैं और पाप रूपी हाथियों को अंकुश (तोत्र) से नियंत्रित करने वाले हैं। मैं शोक रहित मन से सदा आपको नमन करता हूँ।

श्लोक ३ हे माँ! यद्यपि (मुझमें) अनेक व्याधियां और बाधाएं हैं, फिर भी मैं आपकी उस अनुपम और रमणीय 'कला' (शक्ति) को हृदय में धारण करता हूँ जिसे मुनिजन ही समझ पाते हैं। मैं आपकी उस 'आद्या विद्या' (श्रीविद्या) को जानता हूँ जो निश्चित रूप से दोषरहित है। आप ही 'मातंगी' हैं और आप ही सरस संगीत की रसिका हैं। (मैं आपकी शरण में हूँ)।

श्लोक ४ जो कदम्ब के वृक्षों के समीप आश्रय लेने में तत्पर हैं (कदम्ब वन वासिनी), जो अमृत की धारा बरसाने वाले बादलों की तरह कांति वाली हैं, और जो अपनी करुणा से अत्यंत उदार हैं। जो स्तुति से प्रसन्न होती हैं, जिनका गान मुनियों द्वारा किया जाता है, और जो देवताओं के लिए भी पूजनीय हैं; वेदत्रयी (तीनों वेदों) की सीमा (सार) वह 'कला' (आपकी शक्ति) मेरी रक्षा करे।

श्लोक ५ हे जगन्माता! हे कमलमुखी! जिनके नूपुरों (पायल) की नोक से निकलती हुई किरणों की पंक्ति (चमक) सूर्य के समान है। जिनकी नखों की छाया (कांति) चंद्रमा और कमल के वैभव को भी मात देती है। आपके उन 'विपद-नाशक' (विपत्ति हरने वाले) और शोभायमान चरणों की मैं प्रातःकाल हृदय से सेवा (ध्यान) करता हूँ। इससे श्रेष्ठ और कुछ नहीं है।

श्लोक ६ जिनका मस्तक (ललाट) चमक रहा है, जो 'बाला' (किशोरी) रूप में हैं, जिनके हाथ में लीला-कमल और तोता (शुक) सुशोभित है। जो उज्ज्वल (ज्ञान/अमृत की) धारा को धारण करती हैं, और जिनके केशों (बालों) की कांति बादलों को भी जीत लेती है। रमा (लक्ष्मी), इद्राणी और वाणी (सरस्वती) जिनके चरणों की सेवा करती हैं; हे मन! तू उस अरुणाचल (या अरुण वर्ण वाली) वाम-भाग में स्थित 'श्यामा' (गौरी) का भजन कर।

श्लोक ७ जो पवित्र 'गजारण्य' (पुण्य क्षेत्र) में, शरणागतों की रक्षा करने वाली भगवती हैं। जिनका वर्ण जपा-कुसुम (गुड़हल) जैसा लाल है, जो अपर्णा (तपस्विनी) हैं, और जिनके नेत्र कानों तक लंबे (विशाल) और चंचल हैं। जो आदि और अंत से रहित (अनाद्यन्ता) हैं, शांत स्वरूपा हैं, और बुधजनों (ज्ञानियों) के लिए कल्पलता के समान हैं। वह हिमालय-पुत्री (तुहिनगिरि-जाता), पवित्र जगन्माता सर्वत्र विजयमान हैं।

श्लोक ८ (फलश्रुति) जो व्यक्ति प्रतिदिन प्रातःकाल नियमपूर्वक गौरी की इस सप्तश्लोकी स्तुति का पाठ करता है; उसकी सभी मनोकामनाएं (वाञ्छितानि) निश्चित रूप से सिद्ध होती हैं, इसमें कोई संशय नहीं है।

॥ विशिष्ट महत्व एवं लाभ (Significance & Benefits) ॥

  • शीघ्र विवाह (Early Marriage): गौरी स्तुति विवाह में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए अचूक मानी जाती है। जिन कन्याओं के विवाह में विलंब हो रहा हो, उनके लिए यह 'संजीवनी' समान है।
  • दांपत्य सुख (Marital Bliss): विवाहित स्त्रियां अपने सुहाग की रक्षा और पति की दीर्घायु के लिए इसका पाठ करती हैं। यह परिवार में कलह को समाप्त कर प्रेम बढ़ाता है।
  • कला और विद्या की प्राप्ति: श्लोक ३ और ६ में देवी को वीणा-धारिणी और संगीत-रसिका बताया गया है। अतः संगीत, कला और विद्या के विद्यार्थियों के लिए इसका पाठ अत्यंत लाभकारी है।
  • पाप और संकट नाश: श्लोक २ के अनुसार, देवी की कृपा-दृष्टि पाप रूपी हाथियों को नियंत्रित करने वाले अंकुश (महावत) के समान है। यह भक्तों के समस्त 'दुरित' (पाप/कष्ट) नष्ट करती है।
  • सौंदर्य और आरोग्‍य: यह स्तोत्र देवी के दिव्य सौंदर्य का निरूपण है। इसका नित्य ध्यान साधक को आंतरिक और बाह्य आकर्षण (Tejas) तथा उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करता है।

॥ पाठ विधि (Recitation Method) ॥

  1. समय: सर्वोत्तम समय 'ब्रह्म मुहूर्त' (सूर्योदय से पूर्व) है। यदि संभव न हो तो प्रातः स्नान के बाद या संध्या वंदन के समय पाठ करें।
  2. दिशा और आसान: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। लाल या पीले रंग के ऊनी आसन का प्रयोग करें।
  3. ध्यान: पाठ शुरू करने से पहले माँ गौरी का ध्यान करें - जो श्वेत वर्ण की हैं, स्वर्ण आभूषणों से लदी हैं और बैल (वृषभ) या सिंह पर सवार हैं।
  4. निवेदन: पूजा में लाल फूल (गुड़हल या गुलाब), कुमकुम, अक्षत और सुहाग की सामग्री (सिंदूर, बिंदी आदि) अर्पित करना विशेष शुभ होता है।
  5. संकल्प: अपनी मनोकामना (जैसे - विवाह, शांति, संतान) को मन में दोहराते हुए संकल्प लें और फिर ७ श्लोकों का पाठ श्रद्धापूर्वक करें।

॥ FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न ॥

1. श्री गौरी सप्तश्लोकी स्तुतिः (Sri Gauri Saptashloki Stuti) क्या है?

श्री गौरी सप्तश्लोकी स्तुतिः माँ गौरी (पार्वती) की महिमा का वर्णन करने वाला एक अत्यंत प्रभावशाली लघु स्तोत्र है। इसमें केवल 7 श्लोकों के माध्यम से देवी के दिव्य स्वरूप, करुणा और शक्ति की आराधना की गई है। यह शीघ्र फलदायी माना जाता है।

2. गौरी और पार्वती में क्या अंतर है?

तात्विक रूप से दोनों एक ही हैं। जब सती ने पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लिया, तब वे 'पार्वती' (पर्वत-पुत्री) कहलायीं। भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए की गई कठोर तपस्या के बाद जब उनका वर्ण गौर (श्वेत/सुनहरा) हो गया, तब वे 'गौरी' नाम से प्रसिद्ध हुईं।

3. इस स्तोत्र का पाठ विशेष रूप से क्यों किया जाता है?

इसका पाठ मुख्य रूप से सुयोग्य वर की प्राप्ति, सुखमय दांपत्य जीवन, गृह क्लेश की समाप्ति और अखंड सौभाग्य के लिए किया जाता है। इसके अलावा, यह विद्या, कला और मानसिक शांति भी प्रदान करता है।

4. सप्तश्लोकी (7 श्लोक) का क्या महत्व है?

अंक 7 (सप्त) भारतीय आध्यात्म में अत्यंत महत्वपूर्ण है (जैसे सप्तऋषि, सप्तलोक)। 'सप्तश्लोकी' स्तोत्र ‘गागर में सागर’ के समान होते हैं, जिनमें देवता की संपूर्ण शक्ति का सार समाहित होता है।

5. क्या विवाह में हो रही देरी के लिए यह पाठ लाभकारी है?

जी हाँ, विवाह बाधायें दूर करने के लिए गौरी उपासना अचूक मानी जाती है। रामचरितमानस में भी उल्लेख है कि सीता जी ने श्री राम को वर रूप में प्राप्त करने के लिए गौरी पूजन ही किया था।

6. इसका पाठ दिन में कितनी बार करना चाहिए?

सामान्य रूप से दिन में एक बार प्रातःकाल पाठ पर्याप्त है। विशेष अनुष्ठान में १०८ बार पाठ करने का विधान है। नवरात्रि में इसे प्रतिदिन पढना चाहिए।

7. श्लोक ५ में देवी को 'तुलाकोटि-कोटि' क्यों कहा गया है?

'तुलाकोटि' का अर्थ है 'नूपुर' (पायल)। श्लोक ५ में वर्णन है कि देवी के नूपुरों की मणियां करोड़ों सूर्यों के समान चमक रही हैं, जो उनके अलौकिक ऐश्वर्य और तेज़ का प्रतीक है।

8. क्या पुरुष (Male devotees) भी गौरी स्तुति कर सकते हैं?

अवश्य। पुरुष भी सुयोग्य पत्नी की प्राप्ति, शांत गृहस्थ जीवन और मोक्ष के लिए माँ गौरी की शरण लेते हैं। शिव और शक्ति अभिन्न हैं, गौरी की पूजा शिव की पूजा ही है।

9. इस स्तोत्र में 'मातङ्गी' का उल्लेख किस संदर्भ में है?

श्लोक ३ में देवी को 'मातङ्गी' (संगीत और कला की देवी) के रूप में नमन किया गया है। यह दर्शाता है कि गौरी केवल तपस्विनी ही नहीं, बल्कि समस्त विद्याओं, राग-रागिनियों और कलाओं की भी अधिष्ठात्री हैं।

10. क्या गर्भावस्था में इसका पाठ किया जा सकता है?

जी हाँ, गर्भावस्था में गौरी स्तुति करने से माँ और शिशु दोनों की रक्षा होती है। यह गर्भ को नकारात्मक ऊर्जा से बचाता है और आने वाली संतान को सुसंस्कारी बनाता है।