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Sri Dattatreya Stotram (Kartavirya Arjuna Krutam) – श्री दत्तात्रेय स्तोत्रम् (कार्तवीर्यार्जुन कृतम्)

Sri Dattatreya Stotram (Kartavirya Arjuna Krutam) – श्री दत्तात्रेय स्तोत्रम् (कार्तवीर्यार्जुन कृतम्)
॥ श्री दत्तात्रेय स्तोत्रम् (कार्तवीर्यार्जुन कृतम्) ॥ मोहतमो मम नष्टं त्वद्वचनान्नहि कष्टम् । शिष्टमिदं मयि हृष्टं हृत्परमात्मनि तुष्टम् ॥ १ ॥ ज्ञानरविर्हृदि भातः स्वावरणाख्यतमोऽतः । क्वापि गतं भवदीक्षासौ खलु का मम दीक्षा ॥ २ ॥ क्लेशरुजां हरणेन त्वच्चरणस्मरणेन । अस्मि कृतार्थ इहेश श्रीश परेश महेश ॥ ३ ॥ प्रेमदुघं तव पादं को न भजेदविवादम् । दैववशाद्धृदि मेयं दर्शितवानसि मे यम् ॥ ४ ॥ चित्रमिदं सदमेयः सोऽप्यभवद्धृदि मेयः । देवसुरर्षिसुगेयः सोऽद्य कथं मम हेयः ॥ ५ ॥ आश्रिततापहरं तं पातकदैन्यहरन्तम् । नौमि शिवं भगवन्तं पादमहं तव सन्तम् ॥ ६ ॥ यत्र जगद्भ्रम एषः कल्पित एव सशेषः । भ्रान्तिलयेऽद्वय एवावेदि मयाद्य स एव ॥ ७ ॥ शान्तिपदं तव पादं नौमि सुसेव्यमखेदम् । स्वार्थदमाद्यमनन्तं हापितकामधनं तम् ॥ ८ ॥ देवो भावो राद्धः सिद्धः सत्यो नित्यो बुद्धः शुद्धः । सर्वोऽपूर्वो हर्ता कर्ताऽभिन्नस्त्वं नः पाता माता ॥ ९ ॥ ॥ इति श्रीमद्दत्तपुराणे चतुर्थाष्टके तृतीयोऽध्याये कार्तवीर्यार्जुन कृत श्री दत्तात्रेय स्तोत्रम् ॥

परिचय: श्री दत्तात्रेय स्तोत्रम् और कार्तवीर्यार्जुन की भक्ति (Introduction)

श्री दत्तात्रेय स्तोत्रम् (कार्तवीर्यार्जुन कृतम्) केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि एक सिद्ध योगी और उसके गुरु के बीच के गहन संवाद का सार है। यह स्तोत्र 'दत्त पुराण' (श्री वासुदेवानन्द सरस्वती जी द्वारा रचित एवं पौराणिक मान्यताओं पर आधारित) के चतुर्थ अष्टक के तृतीय अध्याय से लिया गया है। इस स्तोत्र के रचयिता हैहय वंश के प्रतापी राजा कार्तवीर्यार्जुन हैं, जिन्हें 'सहस्रार्जुन' के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, कार्तवीर्यार्जुन जन्म से शारीरिक रूप से अक्षम थे, लेकिन भगवान दत्तात्रेय की अनन्य साधना और उनके चरणों की सेवा के फलस्वरूप उन्हें न केवल एक सहस्र (हजार) भुजाएं प्राप्त हुईं, बल्कि वे समस्त पृथ्वी के चक्रवर्ती सम्राट और अपराजेय योद्धा बने।

यह स्तोत्र उस समय का है जब राजा को आत्मज्ञान की अनुभूति होती है। स्तोत्र का प्रथम श्लोक— "मोहतमो मम नष्टं त्वद्वचनान्नहि कष्टम्"— यह स्पष्ट करता है कि गुरु के वचनों ने राजा के भीतर के अज्ञान रूपी अंधकार (मोहतमो) को समूल नष्ट कर दिया है। दत्तात्रेय साधना में कार्तवीर्यार्जुन का स्थान अत्यंत विशिष्ट है, क्योंकि वे 'योग' और 'ऐश्वर्य' के संतुलन का सबसे बड़ा उदाहरण हैं। उन्होंने सिद्ध किया कि गुरु की कृपा से एक अक्षम व्यक्ति भी ब्रह्मांड का सबसे शक्तिशाली पुरुष बन सकता है।

भगवान दत्तात्रेय, जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश के एकीकृत अवतार हैं, अपने इस शिष्य पर इतने प्रसन्न थे कि उन्होंने उसे न केवल भौतिक सिद्धियाँ दीं, बल्कि अंत में अद्वैत ज्ञान प्रदान कर जन्म-मरण के बंधन से मुक्त कर दिया। इस स्तोत्र में राजा अपने गुरु को 'परमात्मनि तुष्टम्' कहकर संबोधित करते हैं, जो यह दर्शाता है कि गुरु ही साक्षात परमात्मा हैं और उनकी शरण में आने के बाद कोई कष्ट (कष्टम्) शेष नहीं रहता।

विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व और अद्वैत दर्शन (Significance)

इस स्तोत्र का आध्यात्मिक महत्व इसमें निहित 'ज्ञानरवि' (ज्ञान का सूर्य) के रूपक में है। श्लोक २ में राजा कहते हैं कि उनके हृदय में ज्ञान का सूर्य उदित हो गया है, जिससे 'स्वावरणाख्य' अर्थात स्वयं को अज्ञानी समझने वाला आवरण हट गया है। यह स्तोत्र अद्वैत वेदांत के उस सिद्धांत की पुष्टि करता है जहाँ 'भ्रान्ति' के मिटते ही साधक को स्वयं के भीतर ही परमात्मा के दर्शन होते हैं। श्लोक ७ में "यत्र जगद्भ्रम एषः कल्पित एव सशेषः" का उल्लेख है, जो यह बताता है कि यह संपूर्ण जगत एक भ्रम या कल्पना मात्र है, और सत्य केवल वह एक 'अद्वय' (Non-dual) तत्व है जिसे गुरु की दीक्षा के बिना नहीं जाना जा सकता।

एक अन्य महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि कार्तवीर्यार्जुन ने भगवान दत्तात्रेय को 'शिवं भगवन्तं' (कल्याणकारी भगवान) कहा है। यह स्तोत्र साधक को 'अपूर्ण' से 'पूर्ण' की ओर ले जाता है। राजा स्वीकार करते हैं कि गुरु के चरणों का स्मरण (त्वच्चरणस्मरणेन) ही उनके सभी क्लेशों और रोगों (रुजां) का हरण करने वाला है। जो लोग मानसिक अवसाद, दिशाहीनता या जीवन में बड़ी असफलताओं से घिरे हैं, उनके लिए यह स्तोत्र एक 'ब्रह्मास्त्र' की भांति कार्य करता है, क्योंकि यह सीधे चित्त की शुद्धि करता है।

फलश्रुति: स्तोत्र पाठ के चमत्कारी लाभ (Benefits)

कार्तवीर्यार्जुन कृत इस दत्त स्तोत्र के नित्य पाठ से साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं, जैसा कि दत्त पुराण और गुरु-शिष्य परंपरा में वर्णित है:

  • अज्ञान और मोह का नाश: यह स्तोत्र बुद्धि को कुंद करने वाले मोह को नष्ट कर विवेक जाग्रत करता है।
  • खोई हुई वस्तु और शक्ति की प्राप्ति: कार्तवीर्यार्जुन को खोया हुआ राज्य और असीम शक्ति इसी साधना से मिली थी। अतः यह चोरी हुई वस्तु या खोई हुई प्रतिष्ठा वापस पाने हेतु अमोघ है।
  • मानसिक और शारीरिक क्लेश मुक्ति: श्लोक ३ के अनुसार, गुरु चरणों के स्मरण से गंभीर रोगों और मानसिक तनाव (क्लेश) का निवारण होता है।
  • आत्मविश्वास और साहस: 'सहस्रार्जुन' की भांति साधक के भीतर अपार साहस और आत्मविश्वास का संचार होता है।
  • ऋण मुक्ति और ऐश्वर्य: भगवान दत्त 'स्वार्थदम' (परम पुरुषार्थ देने वाले) हैं। यह पाठ दरिद्रता दूर कर आर्थिक संपन्नता लाता है।
  • पितृ दोष शांति: भगवान दत्तात्रेय पितरों के अधिपति हैं, अतः इस पाठ से पूर्वजों को सद्गति मिलती है और कुल की रक्षा होती है।

सिद्ध पाठ विधि और विशेष अनुष्ठान (Ritual Method)

यद्यपि भगवान दत्त केवल शुद्ध भाव से ही प्रसन्न हो जाते हैं, किंतु कार्तवीर्यार्जुन की भांति सिद्धियां प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित विधि का पालन करना श्रेष्ठ माना गया है।

साधना के नियम

  • शुभ दिन: गुरुवार (Thursday) या पूर्णिमा के दिन से पाठ प्रारंभ करें। मार्गशीर्ष पूर्णिमा (दत्त जयंती) सर्वोत्तम है।
  • आसन और वस्त्र: पीले (Yellow) वस्त्र पहनें और कुश या ऊनी आसन पर उत्तर या पूर्व की ओर मुख करके बैठें।
  • दीप प्रज्वलन: शुद्ध घी का दीपक जलाएं और उसमें थोड़ी सी हल्दी या केसर डालें।
  • ध्यान: भगवान दत्तात्रेय के 'अवधूत' स्वरूप का ध्यान करें और साथ ही राजा कार्तवीर्यार्जुन की गुरु-भक्ति का स्मरण करें।
  • नैवेद्य: प्रभु को चने की दाल और गुड़, या बेसन के लड्डू का भोग लगाएं।

विशेष मनोकामना हेतु (Special Application)

यदि आपकी कोई वस्तु खो गई है या आप किसी कानूनी विवाद (Legal Dispute) में फंसे हैं, तो लगातार २१ दिनों तक प्रतिदिन १०८ बार इस स्तोत्र की ९वीं पंक्ति "सर्वोऽपूर्वो हर्ता कर्ताऽभिन्नस्त्वं नः पाता माता" का विशेष संपुट लगाकर पाठ करें। दत्त संप्रदाय में यह प्रयोग अत्यंत सफल माना जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (10+ FAQs)

1. कार्तवीर्यार्जुन कौन थे और उनका दत्तात्रेय से क्या संबंध है?

कार्तवीर्यार्जुन हैहय वंश के राजा थे। वे भगवान दत्तात्रेय के अनन्य शिष्य थे। प्रभु की कृपा से ही उन्हें सहस्र (१०००) भुजाएं और चक्रवर्ती सम्राट बनने का वरदान प्राप्त हुआ था।

2. यह स्तोत्र किस ग्रंथ से लिया गया है?

यह स्तोत्र 'श्री दत्त पुराण' (चतुर्थ अष्टक, तृतीय अध्याय) से उद्धृत है। यह भगवान और कार्तवीर्यार्जुन के संवाद का हिस्सा है।

3. क्या इस स्तोत्र के पाठ से चोरी हुई वस्तु वापस मिल सकती है?

हाँ, शास्त्रों में ऐसी मान्यता है कि कार्तवीर्यार्जुन का नाम और उनके द्वारा रचित दत्त स्तुति का पाठ करने से खोया हुआ धन या वस्तु पुनः प्राप्त होने के योग बनते हैं।

4. 'मोहतमो' का अर्थ क्या है?

'मोह' का अर्थ है अज्ञान या आसक्ति, और 'तमः' का अर्थ है अंधकार। 'मोहतमो' का अर्थ है वह गहरा अंधकार जो हमें सत्य को देखने से रोकता है।

5. क्या इसे पढ़ते समय कार्तवीर्यार्जुन का भी ध्यान करना चाहिए?

एक आदर्श शिष्य के रूप में उनका स्मरण करना लाभदायक है, क्योंकि इससे साधक के भीतर भी वैसी ही प्रगाढ़ गुरु-भक्ति जागृत होती है।

6. क्या स्त्रियों के लिए यह पाठ करना वर्जित है?

बिल्कुल नहीं। भगवान दत्तात्रेय की साधना सभी के लिए खुली है। कोई भी श्रद्धालु शुद्ध चित्त से इसका पाठ कर सकता है।

7. 'दत्त पुराण' के रचयिता कौन हैं?

मूलतः यह पौराणिक कथाओं पर आधारित है, लेकिन आधुनिक काल में इसे क्रमबद्ध और लिपिबद्ध करने का श्रेय परम पूज्य श्री वासुदेवानन्द सरस्वती (टेंबे स्वामी) को जाता है।

8. पाठ के लिए सबसे उत्तम समय क्या है?

प्रातः काल सूर्योदय के समय या सायं काल के समय पाठ करना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

9. 'परमात्मनि तुष्टम्' का क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है कि गुरुदेव साक्षात परमात्मा में ही स्थित हैं और वे स्वयं पूर्ण रूप से संतुष्ट (तुष्ट) हैं, अतः वे ही दूसरों को पूर्णता प्रदान कर सकते हैं।

10. क्या इसके पाठ के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?

नित्य पाठ के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं है, किंतु श्रद्धा और शुद्धि का पालन अत्यंत आवश्यक है। गुरु-परंपरा का सम्मान करते हुए पाठ करें।