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Sri Anagha Deva Ashtottara Shatanamavali – श्री अनघदेवाष्टोत्तरशतनामावली

Sri Anagha Deva Ashtottara Shatanamavali – श्री अनघदेवाष्टोत्तरशतनामावली
॥ श्री अनघदेवाष्टोत्तरशतनामावली ॥ ओं दत्तात्रेयाय नमः । ओं अनघाय नमः । ओं त्रिविधाघविदारिणे नमः । ओं लक्ष्मीरूपानघेशाय नमः । ओं योगाधीशाय नमः । ओं द्राम्बीजध्यानगम्याय नमः । ओं विज्ञेयाय नमः । ओं गर्भादितारणाय नमः । ओं दत्तात्रेयाय नमः । ९ ओं बीजस्थवटतुल्याय नमः । ओं एकार्णमनुगामिने नमः । ओं षडर्णमनुपालाय नमः । ओं योगसम्पत्कराय नमः । ओं अष्टार्णमनुगम्याय नमः । ओं पूर्णानन्दवपुष्मते नमः । ओं द्वादशाक्षरमन्त्रस्थाय नमः । ओं आत्मसायुज्यदायिने नमः । ओं षोडशार्णमनुस्थाय नमः । १८ ओं सच्चिदानन्दशालिने नमः । ओं दत्तात्रेयाय नमः । ओं हरये नमः । ओं कृष्णाय नमः । ओं उन्मत्ताय नमः । ओं आनन्ददायकाय नमः । ओं दिगम्बराय नमः । ओं मुनये नमः । ओं बालाय नमः । २७ ओं पिशाचाय नमः । ओं ज्ञानसागराय नमः । ओं आब्रह्मजन्मदोषौघप्रणाशाय नमः । ओं सर्वोपकारिणे नमः । ओं मोक्षदायिने नमः । ओं ओंरूपिणे नमः । ओं भगवते नमः । ओं दत्तात्रेयाय नमः । ओं स्मृतिमात्रसुतुष्टाय नमः । ३६ ओं महाभयनिवारिणे नमः । ओं महाज्ञानप्रदाय नमः । ओं चिदानन्दात्मने नमः । ओं बालोन्मत्तपिशाचादिवेषाय नमः । ओं महायोगिने नमः । ओं अवधूताय नमः । ओं अनसूयानन्ददाय नमः । ओं अत्रिपुत्राय नमः । ओं सर्वकामफलानीकप्रदात्रे नमः । ४५ ओं प्रणवाक्षरवेद्याय नमः । ओं भवबन्धविमोचिने नमः । ओं ह्रीम्बीजाक्षरपाराय नमः । ओं सर्वैश्वर्यप्रदायिने नमः । ओं क्रोम्बीजजपतुष्टाय नमः । ओं साध्याकर्षणदायिने नमः । ओं सौर्बीजप्रीतमनसे नमः । ओं मनःसङ्क्षोभहारिणे नमः । ओं ऐम्बीजपरितुष्टाय नमः । ५४ ओं वाक्प्रदाय नमः । ओं क्लीम्बीजसमुपास्याय नमः । ओं त्रिजगद्वश्यकारिणे नमः । ओं श्रीमुपासनतुष्टाय नमः । ओं महासम्पत्प्रदाय नमः । ओं ग्लौमक्षरसुवेद्याय नमः । ओं भूसाम्राज्यप्रदायिने नमः । ओं द्राम्बीजाक्षरवासाय नमः । ओं महते नमः । ६३ ओं चिरजीविने नमः । ओं नानाबीजाक्षरोपास्य नानाशक्तियुजे नमः । ओं समस्तगुणसम्पन्नाय नमः । ओं अन्तःशत्रुविदाहिने नमः । ओं भूतग्रहोच्चाटनाय नमः । ओं सर्वव्याधिहराय नमः । ओं पराभिचारशमनाय नमः । ओं आधिव्याधिनिवारिणे नमः । ओं दुःखत्रयहराय नमः । ७२ ओं दारिद्र्यद्राविणे नमः । ओं देहदार्ढ्याभिपोषाय नमः । ओं चित्तसन्तोषकारिणे नमः । ओं सर्वमन्त्रस्वरूपाय नमः । ओं सर्वयन्त्रस्वरूपिणे नमः । ओं सर्वतन्त्रात्मकाय नमः । ओं सर्वपल्लवरूपिणे नमः । ओं शिवाय नमः । ओं उपनिषदवेद्याय नमः । ८१ ओं दत्ताय नमः । ओं भगवते नमः । ओं दत्तात्रेयाय नमः । ओं महागम्भीररूपाय नमः । ओं वैकुण्ठवासिने नमः । ओं शङ्खचक्रगदाशूलधारिणे नमः । ओं वेणुनादिने नमः । ओं दुष्टसंहारकाय नमः । ओं शिष्टसम्पालकाय नमः । ९० ओं नारायणाय नमः । ओं अस्त्रधराय नमः । ओं चिद्रूपिणे नमः । ओं प्रज्ञारूपाय नमः । ओं आनन्दरूपिणे नमः । ओं ब्रह्मरूपिणे नमः । ओं महावाक्यप्रबोधाय नमः । ओं तत्त्वाय नमः । ओं सकलकर्मौघनिर्मिताय नमः । ९९ ओं सच्चिदानन्दरूपाय नमः । ओं सकललोकौघसञ्चाराय नमः । ओं सकलदेवौघवशीकृतिकराय नमः । ओं कुटुम्बवृद्धिदाय नमः । ओं गुडपानकतोषिणे नमः । ओं पञ्चकर्जाय सुप्रीताय नमः । ओं कन्दफलादिने नमः । ओं सद्गुरवे नमः । ओं श्रीमद्दत्तात्रेयाय नमः । १०८ ॥ इति श्री अनघदेवाष्टोत्तरशतनामावली सम्पूर्णा ॥

परिचय: भगवान अनघदेव — दत्तात्रेय का परम तेजस्वी स्वरूप (Introduction)

श्री अनघदेवाष्टोत्तरशतनामावली (Sri Anagha Deva Ashtottara Shatanamavali) भगवान दत्तात्रेय की उपासना का वह गुप्त पक्ष है जो साधक को "अघ" (पाप और दुख) से मुक्त कर "अनघ" (निर्मल) बना देता है। संस्कृत में 'अघ' का अर्थ है पाप, कष्ट या अज्ञान, और 'अनघ' का अर्थ है वह जो इन सब से सर्वथा मुक्त है। भगवान दत्तात्रेय, जिन्हें त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) का सम्मिलित अवतार माना जाता है, जब अपनी शक्ति माँ अनघा लक्ष्मी के साथ विराजते हैं, तब वे "अनघदेव" कहलाते हैं। यह स्वरूप न केवल विरक्त सन्यासियों के लिए, बल्कि गृहस्थों के कल्याण के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इस नामावली की विशेषता यह है कि इसमें केवल प्रभु के नाम नहीं हैं, बल्कि तांत्रिक बीज मंत्रों (जैसे द्राम, ह्रीं, क्लीं) का अद्भुत संगम है। ऐतिहासिक रूप से, दत्तात्रेय सम्प्रदाय में "अनघ" उपासना को परम पूज्य श्री गणपथि सच्चिदानन्द स्वामी जी (मैसूर दत्त पीठ) ने पुनर्जीवित किया। उनके अनुसार, कलयुग के मानसिक तनाव और पारिवारिक क्लेशों का एकमात्र समाधान "अनघ-अनघा" की संयुक्त पूजा और नाम स्मरण है। यह नामावली साधक के भीतर सोई हुई चेतना को जाग्रत करती है और उसे संसार के त्रिविध तापों (दैहिक, दैविक और भौतिक कष्ट) से बाहर निकालती है।
भगवान अनघदेव को 'योगीश्वर' होने के साथ-साथ एक पूर्ण गृहस्थ के रूप में भी देखा गया है। माँ अनघा के साथ उनके आठ पुत्र हैं, जो योग की आठ सिद्धियों (अणिमा, महिमा आदि) के प्रतीक हैं। अतः, इस नामावली का पाठ करने से साधक को न केवल भौतिक समृद्धि मिलती है, बल्कि उसे आध्यात्मिक सिद्धियाँ भी सहज प्राप्त होती हैं। यह पाठ अज्ञान के अंधकार को मिटाकर हृदय में गुरु-तत्व का प्रकाश फैलाता है।

विशिष्ट आध्यात्मिक एवं तांत्रिक महत्व (Significance)

अनघदेव नामावली का महत्व इसके 'बीज मंत्रों' (Seed Mantras) में निहित है। नामावली में प्रयुक्त विभिन्न अक्षरों का अपना तांत्रिक प्रभाव है। उदाहरण के लिए, "ओं ह्रीम्बीजाक्षरपाराय नमः" (नाम ४८) माया बीज 'ह्रीं' की शक्ति को जाग्रत करता है, जो सर्वैश्वर्य प्रदाता है। इसी प्रकार 'ऐं' बीज वाक्-शक्ति और बुद्धि देता है, तथा 'क्लीं' बीज आकर्षण और एकाग्रता प्रदान करता है। यह नामावली केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि एक ध्वनि विज्ञान (Sound Science) है जो शरीर के चक्रों को शुद्ध करती है।
दार्शनिक रूप से, 'अनघ' स्वरूप यह सिखाता है कि संसार में रहते हुए भी कैसे निर्लिप्त रहा जाए। भगवान को 'बालोन्मत्तपिशाच' (नाम ४०) कहा गया है। यह दत्तात्रेय की तीन अवस्थाओं का वर्णन है— बालक (निर्दोषता), उन्मत्त (परमानंद में मग्न), और पिशाच (लोक-मर्यादा से परे)। यह नामावली हमें अज्ञान के "त्रिविध अघ" से मुक्त करती है। जो साधक अपने जीवन में शनि दोष, राहु पीड़ा या अन्य ग्रह बाधाओं से परेशान हैं, उनके लिए इन १०८ नामों का स्मरण एक सुरक्षा कवच की भांति कार्य करता है।

अष्टोत्तरशतनामावली पाठ के चमत्कारी लाभ (Benefits)

दत्त सम्प्रदाय की प्राचीन परंपरा के अनुसार, अनघदेव के इन १०८ नामों के नित्य पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
  • ऋण और दारिद्र्य मुक्ति: "ओं दारिद्र्यद्राविणे नमः" (नाम ७३) — यह नामावली आर्थिक तंगी को जड़ से मिटाने और स्थिर लक्ष्मी प्रदान करने वाली है।
  • पारिवारिक सुख एवं शांति: नामावली में प्रभु को 'कुटुम्बवृद्धिदाय' (नाम १०३) कहा गया है। यह घर में हो रहे कलह को समाप्त कर प्रेम और सामंजस्य बढ़ाता है।
  • नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा: "ओं भूतग्रहोच्चाटनाय नमः" (नाम ६९) — यह ऊपरी बाधाओं, बुरी नजर और तंत्र-बाधाओं (अभिचार) को नष्ट करता है।
  • आरोग्य और देह-दृढ़ता: "ओं देहदार्ढ्याभिपोषाय नमः" (नाम ७४) — यह शरीर को बलवान और रोगों से मुक्त (सर्वव्याधिहराय) रखता है।
  • मानसिक शांति: 'चित्तसन्तोषकारिणे' स्वरूप का स्मरण अवसाद और तनाव को दूर कर परम संतोष प्रदान करता है।
  • पितृ दोष शांति: भगवान दत्तात्रेय पितरों के अधिपति हैं। अनघदेव के रूप में उनकी आराधना से पूर्वजों को सद्गति मिलती है और कुल का उद्धार होता है।

पाठ विधि एवं विशेष अनुष्ठान (Ritual Method)

अनघदेव की साधना में सरलता और मिठास का विशेष महत्व है। इस नामावली का पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित विधि अनुशंसित है:

साधना के मुख्य नियम

  • शुभ समय: गुरुवार (Thursday) गुरु का दिन है, इसलिए इस दिन पाठ करना विशेष फलदायी है। मार्गशीर्ष मास की 'अनघ अष्टमी' वर्ष का सबसे पवित्र दिन है।
  • विशेष नैवेद्य: नामावली में उल्लेख है कि प्रभु 'गुडपानक' (Jaggery Water) और 'पञ्चकर्ज' (पाँच प्रकार के सूखे मेवे) से प्रसन्न होते हैं। गुड़ का शरबत उन्हें अवश्य अर्पित करें।
  • दिशा और आसन: पूर्व (East) दिशा की ओर मुख करें। पीले या केसरिया रंग के ऊनी आसन पर बैठें।
  • शुद्धि: स्नान के पश्चात स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें। भस्म या गोपीचंदन का तिलक लगाना दत्त साधना में अनिवार्य माना जाता है।
  • ध्यान: भगवान अनघदेव और माता अनघा लक्ष्मी का ध्यान करें, जो कमल के पुष्प पर विराजित हैं।

विशेष संकल्प साधना

यदि जीवन में कोई बड़ा संकट हो, तो लगातार २१ दिनों तक प्रतिदिन १०८ नामों का जाप करें। पाठ के अंत में 'दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा' मंत्र का जाप करना फल की तीव्रता को कई गुना बढ़ा देता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (10+ FAQs)

1. अनघदेव और दत्तात्रेय में क्या अंतर है?

तात्विक रूप से दोनों एक ही हैं। दत्तात्रेय जब अपनी शक्ति 'अनघा लक्ष्मी' के साथ गृहस्थ और करुणा के रूप में प्रकट होते हैं, तो उन्हें 'अनघदेव' कहा जाता है। यह उनका भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करने वाला स्वरूप है।

2. 'अनघा' शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है?

'न अघ इति अनघा' — जिसमें कोई दोष या पाप न हो, वह अनघा है। यह स्वरूप आत्मा की उस परम शुद्धि को दर्शाता है जहाँ पहुँचने के बाद मनुष्य को कोई दुख नहीं व्यापता।

3. क्या इस नामावली का पाठ कर्ज मुक्ति के लिए किया जा सकता है?

जी हाँ, नाम ७३ में उन्हें 'दारिद्र्यद्राविणे' (दरिद्रता को भगाने वाला) कहा गया है। श्रद्धापूर्वक नियमित पाठ ऋण से मुक्ति दिलाने में सहायक होता है।

4. 'गुडपानक' का क्या महत्व है?

अनघदेव को गुड़ का जल (शरबत) अत्यंत प्रिय है (नाम १०५ - गुडपानकतोषिणे)। यह शीतलता और मिठास का प्रतीक है, जो जीवन की कड़वाहट को दूर करता है।

5. क्या स्त्रियाँ अनघदेव की साधना कर सकती हैं?

बिल्कुल। माता अनघा स्वयं शक्ति का स्वरूप हैं, इसलिए स्त्रियों के लिए यह साधना सौभाग्य, संतान सुख और अखंड सौभाग्य प्रदान करने वाली मानी गई है।

6. अनघ अष्टमी व्रत कब आता है?

यह व्रत मुख्य रूप से मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को किया जाता है। इस दिन अनघदेव और अनघा लक्ष्मी की पूजा का अनंत गुना फल मिलता है।

7. क्या इस पाठ के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?

सामान्य भक्ति भाव से पाठ करने के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं है, लेकिन यदि आप इसमें आए 'बीज मंत्रों' का विशेष अनुष्ठान करना चाहते हैं, तो दत्त सम्प्रदाय के किसी गुरु का मार्गदर्शन लेना श्रेयस्कर है।

8. 'त्रिविधाघ' (नाम ३) क्या हैं?

त्रिविध अघ का अर्थ है— आध्यात्मिक (स्वयं के शरीर-मन के दुख), आधिभौतिक (अन्यों या परिस्थितियों से प्राप्त दुख), और आधिदैविक (प्रकृति या ग्रहों द्वारा प्राप्त दुख)। अनघदेव इन तीनों को नष्ट करते हैं।

9. पाठ के लिए सबसे उत्तम माला कौन सी है?

भगवान दत्तात्रेय की साधना के लिए रुद्राक्ष की माला सर्वोत्तम मानी गई है। यदि माला न हो, तो भी श्रद्धापूर्वक पाठ स्वीकार्य है।

10. क्या यह पाठ घर की कलह दूर कर सकता है?

हाँ, अनघदेव का स्वरूप ही 'चित्तसन्तोष' और 'कुटुम्बवृद्धि' का है। जिस घर में अनघ-अनघा का स्मरण होता है, वहाँ कलह समाप्त होकर प्रेम और सामंजस्य बढ़ता है।