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Sri Datta Prarthana Taravali – श्री दत्त प्रार्थना तारावली

Sri Datta Prarthana Taravali – श्री दत्त प्रार्थना तारावली
॥ श्री दत्त प्रार्थना तारावली ॥ दत्तात्रेय महामाय वेदगेय हतामय । अनसूयात्रितनय ममापायं निवारय ॥ १ ॥ नमो नमस्ते जगदेकनाथ नमो नमस्ते सुपवित्रगाथ । नमो नमस्ते जगतामधीश नमो नमस्तेऽस्तु परावरेश ॥ २ ॥ त्वत्तोऽखिलं जातमिदं हि विश्वं त्वमेव सर्वं परिपासि विश्वम् । त्वं शक्तितो धारयसीह विश्वं त्वमेव भो संहरसीश विश्वम् ॥ ३ ॥ त्वं जीवरूपेण हि सर्व विश्वं प्रविश्य सञ्चेष्टयसे न विश्वम् । स्वतन्त्रमत्राखिललोकबन्धो कारुण्यसिन्धो परबोधसिन्धो ॥ ४ ॥ यो ब्रह्मरूपेण सृजत्यशेषं यो विष्णुरूपेण च पात्यशेषम् । यो रुद्ररूपेण च हन्त्यशेषं दुर्गादिरूपैः शमयत्यशेषम् ॥ ५ ॥ यो देवतारूपधरोऽत्ति भागं यो वेदरूपोऽपि बिभर्ति यागम् । योऽधीशरूपेण ददाति भोगं यो मौनिरूपेण तनोति योगम् ॥ ६ ॥ गायन्ति यं नित्यमशेषवेदाः यजन्ति नित्यं मुनयोऽस्तभेदाः । ब्रह्मादिदेवा अपि यं नमन्ति सर्वेऽपि ते लब्धहिता भवन्ति ॥ ७ ॥ यो धर्मसेतून् सुदृढान् बिभर्ति नैकावतारान् समये बिभर्ति । हत्वा खलान् योऽपि सतो बिभर्ति यो भक्तकार्यं स्वयमातनोति ॥ ८ ॥ स त्वं नूनं देवदेवर्षिगेयो दत्तात्रेयो भावगम्योऽस्यमेयः । ध्येयः सर्वैर्योगिभिः सर्वमान्यः कोऽन्यस्त्राता तारकोऽधीश धन्यः ॥ ९ ॥ सजलजलदनीलो योऽनसूयात्रिबालो विनिहतनिजकालो योऽमलो दिव्यलीलः । अमलविपुलकीर्तिः सच्चिदानन्दमूर्ति- -र्हृतनिजभजकार्तिः पात्वसौ दिव्यमूर्तिः ॥ १० ॥ भक्तानां वरदः सतां च परदः पापात्मनां दण्डद- -स्त्रस्तानामभयप्रदः कृतधियां सन्न्यासिनां मोक्षदः । रुग्णानामगदः पराकृतमदः स्वर्गार्थिनां स्वर्गदः स्वच्छन्दश्च वदोवदः परमुदो दद्यात् स नो बन्धदः ॥ ११ ॥ निजकृपार्द्रकटाक्षनिरीक्षणा- -द्धरति यो निजदुःखमपि क्षणात् । स वरदो वरदोषहरो हरो जयति यो यतियोगिगतिः परा ॥ १२ ॥ अज्ञः प्राज्ञो भवति भवति न्यस्तधीश्चेत् क्षणेन प्राज्ञोऽप्यज्ञो भवति भवति व्यस्तधीश्चेत् क्षणेन । मर्त्योऽमर्त्यो भवति भवतः सत्कृपावीक्षणेन धन्यो मान्यस्त्रिजगति समः शम्भुना त्रीक्षणेन ॥ १३ ॥ ॥ ईश-शक्ति महिमा ॥ त्वत्तो भीतो देव वातोऽत्र वाति त्वत्तो भीतो भास्करोऽत्राप्युदेति । त्वत्तो भीतो वर्षतीन्द्रोदवाह- -स्त्वत्तो भीतोऽग्निस्तथा हव्यवाहः ॥ १४ ॥ भीतस्त्वत्तो धावतीशान्तकोऽत्र भीतस्त्वत्तोऽन्येऽपि तिष्ठन्ति कोऽत्र । मर्त्योऽमर्त्योऽन्येऽपि वा शासनं ते पाताले वाऽन्यत्र वाऽतिक्रमन्ते ॥ १५ ॥ अग्निरेकं तृणं दग्धुं न शशाक त्वयार्पितम् । वातोऽपि तृणमादातुं न शशाक त्वयार्पितम् ॥ १६ ॥ विना तवाज्ञां न च वृक्षपर्णं चलत्यहो कोऽपि निमेषमेकम् । कर्तुं समर्थो भुवने किमर्थं करोत्यहन्तां मनुजोऽवशस्ताम् ॥ १७ ॥ पाषाणे कृष्णवर्णे कथमपि परितश्छिद्रहीने न जाने मण्डूकं जीवयस्यप्रतिहतमहिमाचिन्त्यसच्छक्तिजाने । काष्ठाश्माद्युत्थवृक्षांस्त्र्युदरकुहरगान् जारवीतांश्च गर्भा- -न्नूनं विश्वम्भरेशावसि कृतपयसा दन्तहीनांस्त तथाऽर्भान् ॥ १८ ॥ करोति सर्वस्य भवानपेक्षा कथं भवत्तोऽस्य भवेदुपेक्षा । अथापि मूढः प्रकरोति तुच्छां सेवां तवोज्झित्य च जीवितेच्छाम् ॥ १९ ॥ द्वेष्यः प्रियो वा न च तेऽस्ति कश्चित् त्वं वर्तसे सर्वसमोऽथ दुश्चित् । त्वामन्यथा भावयति स्वदोषा- -न्निर्दोषतायां तव वेदघोषः ॥ २० ॥ गृह्णासि नो कस्यचिदीश पुण्यं गृह्णासि नो कस्यचिदप्यपुण्यम् । क्रियाफलं माऽस्य च कर्तृभावं सृजस्यविद्वेत्ति न च स्वभावम् ॥ २१ ॥ मातुः शिशोर्दुर्गुणनाशनाय न ताडने निर्दयता न दोषः । तथा नियन्तुर्गुणदोषयोस्ते न दुष्टहत्याऽदयता न दोषः ॥ २२ ॥ दुर्गादिरूपैर्महिषासुराद्यान् रामादिरूपैरपि रावणाद्यान् । अनेकहिंसादिकपापयुक्तान् क्रूरान् सदाचारकथावियुक्तान् ॥ २३ ॥ स्वपापनाशार्थमनेककल्पा- -न्यास्यन्त एतान्निरयानकल्पान् । स्वकीयमुक्तौ निजशस्त्रकृत्तान् कृत्वा भवान् द्यामनयत् सुपूतान् ॥ २४ ॥ याऽपाययत् स्तन्यमिषाद्विषं सा लेभे गतिं मात्रुचितां दयालुः । त्वत्तोपरः को निजकार्यसक्त- -स्त्वमेव नित्यं ह्यभिमानमुक्तः ॥ २५ ॥ नो कार्यं करणं च ते परगते लिङ्गं कला नापि ते विज्ञाता त्वदमेय नान्य इति ते तत्त्वं प्रसिद्धं श्रुतेः । नेशस्ते जनिताधिकः सम उतान्यः कश्चनास्ति प्रभु- -र्दत्तात्रेय गुरो निजामरतरो त्वं सत्यमेको विभुः ॥ २६ ॥ भोगार्थं सृजसीति कोऽपि वदति क्रीडार्थमित्थं परे ते केच्छास्ति समाप्तकाम महिमानं नो विदुर्हीतरे । केऽपीदं सदसद्वदन्त्वितरथा वामास्तु मेतत्कथा- -पन्था मे श्रुतिदर्शितस्तव पदप्राप्त्यै सुखोऽन्ये वृथा ॥ २७ ॥ सोऽनन्यभक्तोऽस्य तु पर्युपासको नित्याभियुक्तो यमुपैत्यभेदतः । तत्प्रीतयेऽसौ भवतात्समर्थना तारावली तत्पदभक्तिभावना ॥ २८ ॥ ॥ इति श्रीवासुदेवानन्दसरस्वती विरचितं श्री दत्त प्रार्थना तारावली सम्पूर्णम् ॥

परिचय: श्री दत्त प्रार्थना तारावली — गुरु भक्ति का दिव्य आकाश (Introduction)

श्री दत्त प्रार्थना तारावली (Sri Datta Prarthana Taravali) भगवान दत्तात्रेय की स्तुति में रचा गया एक अत्यंत गहन और भक्तवत्सल स्तोत्र है। इसकी रचना १९वीं शताब्दी के महान दत्त अवतार और परम पूज्य श्री वासुदेवानन्द सरस्वती (टेंबे स्वामी) ने की थी। 'तारावली' शब्द का अर्थ है 'तारों की पंक्ति'। जैसे आकाश में चमकते तारे अंधकार को चीरकर प्रकाश फैलाते हैं, वैसे ही इस स्तोत्र के २८ श्लोक साधक के अज्ञान को मिटाकर उसे भक्ति के प्रकाश से आलोकित करते हैं।

टेंबे स्वामी महाराज ने इस प्रार्थना में भगवान दत्तात्रेय को "जगदेकनाथ" (संसार का एकमात्र स्वामी) और "परबोधसिन्धु" (ज्ञान का समुद्र) कहकर संबोधित किया है। यह स्तोत्र केवल एक याचना नहीं है, बल्कि यह अद्वैत वेदांत के रहस्यों को भी उजागर करता है। श्लोक ५ में यह स्पष्ट किया गया है कि भगवान दत्त ही ब्रह्मा बनकर सृष्टि करते हैं, विष्णु बनकर पालन करते हैं और रुद्र बनकर संहार करते हैं। वे समस्त शक्तियों के मूल केंद्र हैं।

दत्त संप्रदाय में इस तारावली का पाठ "गुरु महाराज" की अमोघ कृपा प्राप्त करने का सबसे सरल मार्ग माना जाता है। इसमें भगवान की लीलाओं, उनके न्यायपूर्ण व्यवहार और उनकी अपार करुणा का वर्णन किया गया है। टेंबे स्वामी जी ने अपनी यात्राओं के दौरान भक्तों को इस तारावली का पाठ करने की प्रेरणा दी, क्योंकि यह मानसिक संतापों और बाहरी कष्टों (अपाय) को दूर करने में सक्षम है।

विशिष्ट महत्व: ईश्वरीय सत्ता और शरणागति (Significance)

श्री दत्त प्रार्थना तारावली का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा श्लोक १४ से १८ तक है, जहाँ प्रकृति पर ईश्वर के पूर्ण नियंत्रण (Sovereignty) का वर्णन है। यहाँ महर्षि वासुदेवानन्द सरस्वती बताते हैं कि वायु, सूर्य, इंद्र और अग्नि— ये सभी ईश्वर के भय से अपने कार्यों का निर्वहन करते हैं। यहाँ 'भय' का अर्थ आतंक नहीं, बल्कि ईश्वरीय अनुशासन है। श्लोक १७ में एक अत्यंत मार्मिक पंक्ति है— "विना तवाज्ञां न च वृक्षपर्णं चलत्यहो" अर्थात ईश्वर की आज्ञा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता।

श्लोक १८ में भगवान की सर्वव्यापकता और पालनकर्ता स्वरूप का अद्भुत चित्रण है। इसमें पूछा गया है कि काले कठोर पत्थर के भीतर छिद्रहीन स्थान में रहने वाले मेंढक को जीवन कौन देता है? या गर्भ के भीतर बालक का पोषण कौन करता है? इसका उत्तर स्वयं दत्तात्रेय हैं। यह स्तोत्र साधक को अहंकार छोड़कर उस सर्वशक्तिमान सत्ता के चरणों में पूर्ण शरणागति (Surrender) का संदेश देता है। जब हम श्लोक २५ में 'पूतना' (विष देने वाली) को भी माता की गति देने का उल्लेख पढ़ते हैं, तो भगवान की अपार दयालुता का बोध होता है।

फलश्रुति: तारावली पाठ के आध्यात्मिक एवं सांसारिक लाभ (Benefits)

श्लोक ११ और १२ में इस दिव्य प्रार्थना के लाभों का प्रत्यक्ष वर्णन है। श्रद्धापूर्वक पाठ करने से निम्नलिखित फल प्राप्त होते हैं:

  • सर्व भय निवारण: "त्रस्तानामभयप्रदः" (श्लोक ११) — जो भयभीत हैं, उन्हें भगवान अभय दान देते हैं। यह पाठ मानसिक असुरक्षा को दूर करता है।
  • रोग मुक्ति: "रुग्णानामगदः" (श्लोक ११) — भगवान दत्तात्रेय रोगों के लिए परम औषधि (अगद) के समान हैं। उनके नाम स्मरण से स्वास्थ्य लाभ होता है।
  • संकट और बाधा नाश: श्लोक १ में प्रार्थना है "ममापायं निवारय"। यह जीवन में आने वाली अचानक आपदाओं और तांत्रिक बाधाओं को नष्ट करती है।
  • ज्ञान और विवेक की जागृति: श्लोक १३ के अनुसार, भगवान की कृपा से अज्ञानी भी क्षण भर में विद्वान (प्राज्ञ) बन सकता है। यह बुद्धि को स्थिर और प्रखर करती है।
  • अहंकार का दमन: "पराकृतमदः" (श्लोक ११) — यह स्तोत्र मनुष्य के भीतर के 'मद' (अहंकार) को समाप्त कर विनम्रता लाता है।
  • मोक्ष और सद्गति: संन्यासियों के लिए यह मोक्ष प्रदायक है और मुमुक्षु साधकों को जन्म-मरण के बंधन से मुक्त करने में सहायक है।

पाठ विधि और विशेष अवसर (Ritual Method & Guidelines)

टेंबे स्वामी महाराज द्वारा रचित स्तोत्र अत्यंत सिद्ध और शक्तिशाली होते हैं। इनका पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए इसे दत्त संप्रदाय की मर्यादा के अनुरूप करना चाहिए।

पूजा विधान

  • शुभ समय: गुरुवार (Thursday) का दिन दत्तात्रेय भगवान को समर्पित है। प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त या संध्या समय पाठ करना सर्वोत्तम है।
  • आसन: कुशा या ऊनी पीले आसन का प्रयोग करें। मुख उत्तर या पूर्व की ओर होना चाहिए।
  • शुद्धि: स्नान के पश्चात गोपीचंदन या भस्म का तिलक लगाएं। भगवान के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • ध्यान: पाठ प्रारंभ करने से पहले भगवान दत्तात्रेय के 'त्रिगुण' स्वरूप का ध्यान करें, जिनके साथ चार कुत्ते (वेदों के प्रतीक) और एक गाय (पृथ्वी का प्रतीक) उपस्थित हैं।

विशेष प्रयोग (Anushthan)

यदि जीवन में कोई बड़ा संकट हो या मानसिक तनाव बहुत अधिक हो, तो लगातार २१ दिनों तक प्रतिदिन ५ या ११ बार इस तारावली का पाठ करें। पाठ के अंत में 'दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा' का जप करना न भूलें। भगवान दत्त 'स्मर्तृगामी' हैं, अर्थात मात्र पुकारने से ही वे भक्त की रक्षा के लिए दौड़ पड़ते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (10 FAQs)

1. श्री दत्त प्रार्थना तारावली के रचयिता कौन हैं?

इस दिव्य स्तोत्र की रचना श्री वासुदेवानन्द सरस्वती (टेंबे स्वामी) ने की है, जिन्हें स्वयं भगवान दत्तात्रेय का आधुनिक अवतार माना जाता है।

2. 'तारावली' शब्द का अर्थ क्या है?

'तारावली' का शाब्दिक अर्थ है 'तारों की पंक्ति'। यहाँ २८ श्लोकों को २८ नक्षत्रों या तारों के समान माना गया है जो भक्त के मार्ग को प्रकाशित करते हैं।

3. क्या इस पाठ से पितृ दोष शांत होता है?

जी हाँ। भगवान दत्तात्रेय पितरों के स्वामी हैं। तारावली का पाठ पूर्वजों को सद्गति प्रदान करता है और कुल के पितृ दोष को समाप्त करने में सहायक है।

4. 'विना तवाज्ञां न च वृक्षपर्णं' का क्या महत्व है?

यह श्लोक १७ का हिस्सा है। यह हमें यह सिखाता है कि जीवन की हर घटना ईश्वर के नियंत्रण में है, अतः हमें फल की चिंता छोड़कर केवल कर्म और भक्ति पर ध्यान देना चाहिए।

5. क्या यह स्तोत्र संकट के समय ही पढ़ना चाहिए?

नहीं, इसे नित्य उपासना के रूप में पढ़ना चाहिए ताकि संकट आने ही न पाएं। यह एक सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करता है।

6. भगवान दत्तात्रेय को 'अत्रि-तनय' क्यों कहते हैं?

क्योंकि वे महर्षि अत्रि और माता अनसूया के पुत्र के रूप में अवतरित हुए थे। श्लोक १ में उन्हें 'अनसूयात्रितनय' कहा गया है।

7. क्या इस पाठ से एकाग्रता बढ़ती है?

हाँ, श्लोक १३ के अनुसार प्रभु की दृष्टि पड़ने से बुद्धि का विकास होता है। यह विद्यार्थियों और मानसिक अस्थिरता वाले लोगों के लिए अत्यंत लाभकारी है।

8. 'पूतना' का उदाहरण यहाँ क्यों दिया गया है?

श्लोक २५ में भगवान की असीम दयालुता दिखाने के लिए पूतना का उदाहरण दिया गया है, जिसने जहर दिया था पर प्रभु ने उसे भी माता का स्थान दिया। यह बताता है कि प्रभु पापियों का भी उद्धार कर देते हैं।

9. क्या स्त्रियों के लिए यह पाठ करना वर्जित है?

नहीं, भगवान दत्त की भक्ति में कोई भेद नहीं है। शुद्ध चित्त और मर्यादा का पालन करते हुए कोई भी स्त्री इसका पाठ कर सकती है।

10. पाठ के अंत में 'समर्थना' का क्या अर्थ है?

अंतिम श्लोक (२८) में 'समर्थना' का अर्थ है अपनी भक्ति और प्रार्थना को भगवान के चरणों में समर्पित करना ताकि वे इसे स्वीकार करें।