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Sripada Srivallabha Stotram 1 – श्रीपाद श्रीवल्लभ स्तोत्रम् १

Sripada Srivallabha Stotram 1 – श्रीपाद श्रीवल्लभ स्तोत्रम् १
॥ श्रीपाद श्रीवल्लभ स्तोत्रम् १ ॥ ब्राह्मण्यै यो मङ्क्षु भिक्षान्नतोभू- -त्प्रीतस्तस्या यः कृपार्द्रः सुतोऽभूत् । विस्मृत्यास्मान् किं स गाढं निदद्रौ श्रीपादद्रौ वापदाहानिदद्रौ ॥ १ ॥ आश्वास्याम्बां प्रव्रजन्नग्रजान्यः कृत्वा स्वङ्गान् सञ्चचारार्यमान्यः । विस्मृत्यास्मान् किं स गाढं निदद्रौ श्रीपादद्रौ वापदाहानिदद्रौ ॥ २ ॥ सार्भा मर्तुं योद्यता स्त्रीस्तु तस्या दुःखं हर्तुं त्वं स्वयं तत्सुतः स्याः । विस्मृत्यास्मान् किं स गाढं निदद्रौ श्रीपादद्रौ वापदाहानिदद्रौ ॥ ३ ॥ राज्यं योऽदादाशु निर्णेजकाय प्रीतो नत्या यः स्वगुप्त्यै नृकायः । विस्मृत्यास्मान् किं स गाढं निदद्रौ श्रीपादद्रौ वापदाहानिदद्रौ ॥ ४ ॥ प्रेतं विप्रं जीवयित्वाऽस्तजूर्ति यश्चक्रे दिक्शालिनीं स्वीयकीर्तिम् । विस्मृत्यास्मान् किं स गाढं निदद्रौ श्रीपादद्रौ वापदाहानिदद्रौ ॥ ५ ॥ ॥ इति श्रीवासुदेवानन्दसरस्वती विरचितं श्रीपादश्रीवल्लभ स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

परिचय: श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी — कलियुग के प्रथम दत्त अवतार (Introduction)

श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी (1320-1350 ईस्वी) को हिंदू धर्म में भगवान दत्तात्रेय के कलियुग के प्रथम पूर्ण अवतार के रूप में पूजा जाता है। उनका प्राकट्य आंध्र प्रदेश के पीठापुरम् (Pithapuram) में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके अवतार का मुख्य उद्देश्य कलियुग में धर्म की पुनर्स्थापना और पीड़ित मानवता का कल्याण करना था। इस विशिष्ट स्तोत्र की रचना आधुनिक काल के महान दत्त अवतार और परम योगी श्री वासुदेवानन्द सरस्वती (टेंबे स्वामी) ने की है। टेंबे स्वामी जी ने इस ५ श्लोकों की संक्षिप्त रचना में श्रीपाद स्वामी के संपूर्ण जीवन के सबसे महत्वपूर्ण और चमत्कारी क्षणों को पिरोया है।

श्रीपाद श्रीवल्लभ का जीवन असीमित रहस्यों और अलौकिक शक्तियों से भरा था। "श्रीपाद श्रीवल्लभ चरितामृतम्" (Sripada Srivallabha Charitamrutam) के अनुसार, उन्होंने अपने बाल्यकाल में ही यह सिद्ध कर दिया था कि वे साक्षात दत्तात्रेय हैं। इस स्तोत्र का पहला श्लोक उनके जन्म की उस घटना का उल्लेख करता है जहाँ उन्होंने अपनी माता सुमति (Sumati) की भिक्षा प्रार्थना स्वीकार कर उनके पुत्र के रूप में जन्म लिया। टेंबे स्वामी जी ने अपनी यात्राओं के दौरान श्रीपाद स्वामी के लुप्त हो चुके तीर्थों, विशेषकर कुरुवपुर (Kuruvapur) का पुनरुद्धार किया, जहाँ स्वामी जी ने अपनी अंतिम लीलाएँ की थीं।

दत्त संप्रदाय के भक्तों के लिए यह स्तोत्र एक "संजीवन मंत्र" के समान है। इसमें भगवान को याद दिलाया गया है कि "क्या आप हमें भूल गए हैं?" (विस्मृत्यास्मान् किं स गाढं निदद्रौ), जो एक भक्त की विह्वलता और भगवान के प्रति अनन्य प्रेम को दर्शाता है। प्रत्येक श्लोक श्रीपाद स्वामी के एक विशिष्ट चमत्कार का वर्णन करता है, जो साधक के भीतर श्रद्धा का संचार करता है और उसे गुरु के चरणों के समीप ले जाता है।

विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व एवं श्लोक अर्थ (Significance & Verses)

इस स्तोत्र का प्रत्येक श्लोक "श्रीपाद श्रीवल्लभ चरितामृत" की एक पूरी कथा को समाहित किए हुए है। श्लोक २ में उनके संन्यास मार्ग पर निकलने की घटना है— जहाँ उन्होंने अपनी माता को आश्वासन दिया और अपने विकलांग भाइयों (अग्रज) को पूर्ण स्वस्थ (स्वङ्गान्) कर दिया। यह दर्शाता है कि गुरु की कृपा से शारीरिक और मानसिक अक्षमताएं भी दूर हो जाती हैं। श्लोक ३ उस प्रसिद्ध चमत्कार का वर्णन करता है जहाँ एक विधवा स्त्री अपने पुत्र के साथ आत्महत्या करने जा रही थी, तब भगवान श्रीपाद ने स्वयं उसके पुत्र के रूप में प्रकट होकर उनके दुखों का हरण किया।

श्लोक ४ में उस 'रजक' (धोबी) की कथा है, जिसने भगवान की अनन्य सेवा की थी। भगवान ने उसे अगले जन्म में राज्य (विजयनगर साम्राज्य) देने का वरदान दिया, जो बाद में श्री नृसिंह सरस्वती अवतार के समय पूर्ण हुआ। श्लोक ५ स्वामी जी के सबसे बड़े चमत्कार— एक मृत ब्राह्मण (Pretam Vipram) को पुनर्जीवित करने— का उल्लेख करता है। यह चमत्कार कुरुवपुर में हुआ था, जिसने सिद्ध किया कि काल (मृत्यु) भी भगवान श्रीपाद के आदेश के अधीन है। इन चमत्कारों का स्मरण ही साधक के मन से भय को निकाल देता है।

श्रीपाद श्रीवल्लभ स्तोत्र पाठ के लाभ (Benefits)

टेंबे स्वामी महाराज द्वारा रचित इस स्तोत्र के नित्य पाठ से भक्तों को निम्नलिखित अनुभव और लाभ प्राप्त होते हैं:

  • असाध्य संकटों से मुक्ति: श्लोक ३ के अनुसार, यह स्तोत्र उन लोगों के लिए रामबाण है जो घोर निराशा या आत्महत्या जैसे विचारों से घिरे हैं।
  • शारीरिक स्वास्थ्य: जैसे भगवान ने अपने भाइयों के विकलांग अंगों को ठीक किया, यह पाठ शारीरिक व्याधियों को दूर करने में सहायक है।
  • अकाल मृत्यु से सुरक्षा: श्लोक ५ में मृत ब्राह्मण को जीवित करने का प्रसंग है, जो साधक को अकाल मृत्यु और दुर्घटनाओं से सुरक्षा प्रदान करता है।
  • ऐश्वर्य और सफलता: रजक (धोबी) को राज्य देने वाली घटना (श्लोक ४) इस बात का प्रतीक है कि गुरु कृपा से साधारण व्यक्ति भी शिखर पर पहुँच सकता है।
  • मानसिक शांति और एकाग्रता: भगवान दत्त के चरणों में ध्यान लगाने से चित्त की चंचलता समाप्त होती है।
  • पितृ दोष निवारण: दत्त अवतारों की स्तुति से पूर्वजों को सद्गति मिलती है और कुल का उद्धार होता है।

सिद्ध पाठ विधि एवं विशेष विधान (Ritual Method)

भगवान श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी ने स्वयं कहा है कि वे अदृश्य रूप में आज भी कुरुवपुर और पीठापुर में उपस्थित हैं। इस स्तोत्र का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित विधि अपनाई जानी चाहिए।

साधना के नियम

  • समय: गुरुवार (Thursday) गुरु का दिन है। प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त या सायंकाल (संध्या समय) पाठ करना सर्वश्रेष्ठ है।
  • आसन: ऊनी आसन या कुश के आसन पर बैठकर पाठ करें। मुख उत्तर (North) या पूर्व (East) दिशा की ओर होना चाहिए।
  • शुद्धि: स्नान के पश्चात गोपीचंदन या विभूति का तिलक लगाएं। भगवान के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • नैवेद्य: श्रीपाद स्वामी को 'लड्डू' (बूंदी के लड्डू) अत्यंत प्रिय हैं। इसके अलावा आप शुद्ध दूध या मिश्री का भोग भी लगा सकते हैं।

विशेष अनुष्ठान

यदि आप किसी विशेष कार्य की सिद्धि चाहते हैं, तो लगातार ७ या ४१ दिनों तक प्रतिदिन ११ बार इस स्तोत्र का पाठ करें। पाठ के पूर्व भगवान के षडक्षरी मंत्र 'ॐ द्राम दत्तात्रेयाय नमः' या उनके अवतार मंत्र 'श्रीपाद श्रीवल्लभ दिगंबरा' का १०८ बार जाप अवश्य करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (10+ FAQs)

1. श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी कौन हैं?

वे कलियुग में भगवान दत्तात्रेय के प्रथम पूर्ण अवतार माने जाते हैं। उनका जन्म १३२० ईस्वी में पीठापुरम् में हुआ था।

2. इस स्तोत्र की रचना किसने की है?

इस दिव्य स्तोत्र की रचना श्री वासुदेवानन्द सरस्वती (टेंबे स्वामी महाराज) ने की है, जो स्वयं भगवान दत्त के महान अवतार माने जाते हैं।

3. क्या इसके पाठ से आर्थिक तंगी दूर होती है?

जी हाँ। श्लोक ४ में रजक (धोबी) को राज्य देने का प्रसंग है, जो यह दर्शाता है कि प्रभु अपने निर्धन से निर्धन भक्त को भी वैभव प्रदान कर सकते हैं।

4. 'कुरुवपुर' क्षेत्र का क्या महत्व है?

कुरुवपुर (कृष्णा नदी के किनारे स्थित द्वीप) भगवान श्रीपाद श्रीवल्लभ की तपस्थली और कर्मस्थली है। यहाँ उन्होंने ३० वर्षों तक अनेक अलौकिक लीलाएँ की थीं।

5. क्या यह स्तोत्र पितृ दोष में लाभ देता है?

हाँ, दत्त संप्रदाय की मान्यता के अनुसार भगवान दत्त के अवतारों की स्तुति से पितरों को शांति और सद्गति प्राप्त होती है।

6. क्या 'श्रीपाद श्रीवल्लभ' और 'नृसिंह सरस्वती' एक ही हैं?

हाँ, श्री नृसिंह सरस्वती स्वामी महाराज भगवान श्रीपाद श्रीवल्लभ के ही द्वितीय अवतार हैं। पीठापुर में जन्म लेने वाले श्रीपाद स्वामी ने ही बाद में करंजा में नृसिंह सरस्वती के रूप में अवतार लिया।

7. पाठ के लिए सबसे उत्तम माला कौन सी है?

भगवान दत्तात्रेय की साधना के लिए रुद्राक्ष की माला सर्वोत्तम मानी गई है। इसके अलावा स्फटिक की माला का भी प्रयोग किया जा सकता है।

8. 'विस्मृत्यास्मान् किं स गाढं निदद्रौ' पंक्ति का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है— "हे प्रभु, क्या आप हमें भूलकर गहरी निद्रा में सो गए हैं?" यह भक्त की आर्त पुकार है जो भगवान को जगाने का प्रयास करती है।

9. क्या स्त्रियों के लिए यह पाठ करना वर्जित है?

नहीं, दत्त अवतारों की भक्ति सभी के लिए खुली है। शुद्ध चित्त से कोई भी स्त्री इसका पाठ कर सकती है। माता सुमति के पुत्र होने के कारण स्वामी जी स्त्रियों पर विशेष कृपा रखते हैं।

10. पाठ के दौरान किस खाद्य पदार्थ का भोग लगाना चाहिए?

स्वामी जी को 'लड्डू' और 'दूध' अति प्रिय है। यदि संभव हो तो सात्विक आहार का भोग लगाएं।