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Sri Anagha Devi Ashtottara Shatanama Stotram – श्री अनघादेवि अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

Sri Anagha Devi Ashtottara Shatanama Stotram – श्री अनघादेवि अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्
॥ श्री अनघादेवि अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥ ॥ स्तोत्रम् ॥ अनघायै महादेव्यै महालक्ष्म्यै नमो नमः । अनघस्वामिपत्न्यै च योगेशायै नमो नमः ॥ १ ॥ त्रिविधाघविदारिण्यै त्रिगुणायै नमो नमः । अष्टपुत्रकुटुम्बिन्यै सिद्धसेव्यपदे नमः ॥ २ ॥ आत्रेयगृहदीपायै विनीतायै नमो नमः । अनसूयाप्रीतिदायै मनोज्ञायै नमो नमः ॥ ३ ॥ योगशक्तिस्वरूपिण्यै योगातीतहृदे नमः । भर्तृशुश्रूषणोत्कायै मतिमत्यै नमो नमः ॥ ४ ॥ तापसीवेषधारिण्यै तापत्रयनुदे नमः । चित्रासनोपविष्टायै पद्मासनयुजे नमः ॥ ५ ॥ रत्नाङ्गुलीयकलसत्पदाङ्गुल्यै नमो नमः । पद्मगर्भोपमानाङ्घ्रितलायै च नमो नमः ॥ ६ ॥ हरिद्राञ्चत्प्रपादायै मञ्जीरकलजत्रवे । शुचिवल्कलधारिण्यै काञ्चीदामयुजे नमः ॥ ७ ॥ गलेमाङ्गल्यसूत्रायै ग्रैवेयालीधृते नमः । क्वणत्कङ्कणयुक्तायै पुष्पालङ्कृतये नमः ॥ ८ ॥ अभीतिमुद्राहस्तायै लीलाम्भोजधृते नमः । ताटङ्कयुगदीप्रायै नानारत्नसुदीप्तये ॥ ९ ॥ ध्यानस्थिराक्ष्यै फालाञ्चत्तिलकायै नमो नमः । मूर्धाबद्धजटाराजत्सुमदामालये नमः ॥ १० ॥ भर्त्राज्ञापालनायै च नानावेषधृते नमः । पञ्चपर्वान्विताऽविद्यारूपिकायै नमो नमः ॥ ११ ॥ सर्वावरणशीलायै स्वबलाऽऽवृतवेधसे । विष्णुपत्न्यै वेदमात्रे स्वच्छशङ्खधृते नमः ॥ १२ ॥ मन्दहासमनोज्ञायै मन्त्रतत्त्वविदे नमः । दत्तपार्श्वनिवासायै रेणुकेष्टकृते नमः ॥ १३ ॥ मुखनिःसृतशम्पाऽऽभत्रयीदीप्त्यै नमो नमः । विधातृवेदसन्धात्र्यै सृष्टिशक्त्यै नमो नमः ॥ १४ ॥ शान्तिलक्ष्मै गायिकायै ब्राह्मण्यै च नमो नमः । योगचर्यारतायै च नर्तिकायै नमो नमः ॥ १५ ॥ दत्तवामाङ्कसंस्थायै जगदिष्टकृते नमः । शूभायै चारुसर्वाङ्ग्यै चन्द्रास्यायै नमो नमः ॥ १६ ॥ दुर्मानसक्षोभकर्यै साधुहृच्छान्तये नमः । सर्वान्तःसंस्थितायै च सर्वान्तर्गतये नमः ॥ १७ ॥ पादस्थितायै पद्मायै गृहदायै नमो नमः । सक्थिस्थितायै सद्रत्नवस्त्रदायै नमो नमः ॥ १८ ॥ गुह्यस्थानस्थितायै च पत्नीदायै नमो नमः । क्रोडस्थायै पुत्रदायै वंशवृद्धिकृते नमः ॥ १९ ॥ हृद्गतायै सर्वकामपूरणायै नमो नमः । कण्ठस्थितायै हारादिभूषादात्र्यै नमो नमः ॥ २० ॥ प्रवासिबन्धुसम्योगदायिकायै नमो नमः । मिष्टान्नदायै वाक्छक्तिदायै ब्राह्म्यै नमो नमः ॥ २१ ॥ आज्ञाबलप्रदात्र्यै च सर्वैश्वर्यकृते नमः । मुखस्थितायै कविताशक्तिदायै नमो नमः ॥ २२ ॥ शिरोगतायै निर्दाहकर्यै रौद्र्यै नमो नमः । जम्भासुरविदाहिन्यै जम्भवंशहृते नमः ॥ २३ ॥ दत्ताङ्कसंस्थितायै च वैष्णव्यै च नमो नमः । इन्द्रराज्यप्रदायिन्यै देवप्रीतिकृते नमः ॥ २४ ॥ नहुषाऽऽत्मजदात्र्यै च लोकमात्रे नमो नमः । धर्मकीर्तिसुबोधिन्यै शास्त्रमात्रे नमो नमः ॥ २५ ॥ भार्गवक्षिप्रतुष्टायै कालत्रयविदे नमः । कार्तवीर्यव्रतप्रीतमतये शुचये नमः ॥ २६ ॥ कार्तवीर्यप्रसन्नायै सर्वसिद्धिकृते नमः ॥ २७ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ इत्येवमनघादेव्या दत्तपत्न्या मनोहरम् । वेदन्तप्रतिपाद्याया नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ॥ २८ ॥ ॥ इति श्री अनघादेवि अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

परिचय: माँ अनघा देवी — श्री दत्त गुरु की आह्लादिनी शक्ति (Introduction)

श्री अनघादेवि अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (Sri Anagha Devi Ashtottara Shatanama Stotram) दत्तात्रेय सम्प्रदाय का एक अत्यंत गोपनीय और तेजस्वी पाठ है। भगवान दत्तात्रेय को अक्सर एक ब्रह्मचारी अवधूत के रूप में देखा जाता है, लेकिन पुराणों और तांत्रिक ग्रंथों में उनके एक अत्यंत विशिष्ट स्वरूप का वर्णन मिलता है, जिसे 'अनघदेव' कहा जाता है। इस स्वरूप में वे अपनी आह्लादिनी शक्ति माँ अनघा के साथ विराजते हैं। "अनघा" शब्द का शाब्दिक अर्थ है— वह जो 'अघ' (पाप, कष्ट, दुख) से रहित है। माँ अनघा साक्षात महालक्ष्मी, महामहोदय और महासरस्वती का एकीकृत स्वरूप मानी जाती हैं।

भगवान दत्तात्रेय ने यह अवतार गृहस्थ धर्म की पवित्रता और योग के साथ सांसारिक कर्तव्यों के संतुलन को सिखाने के लिए लिया था। इस स्तोत्र के १०८ नाम माँ अनघा के उन गुणों का वर्णन करते हैं जो साधक को "योग" और "भोग" दोनों प्रदान करते हैं। आधुनिक काल में इस साधना को परम पूज्य श्री गणपति सच्चिदानन्द स्वामी जी (मैसूर दत्त पीठ) ने जन-जन तक पहुँचाया है। उनके अनुसार, कलयुग के मानसिक तनाव और पारिवारिक कलह का एकमात्र समाधान अनघा-दत्तात्रेय की संयुक्त उपासना है।

दत्तात्रेय पुराण के अनुसार, माँ अनघा के आठ पुत्र हैं, जो योग की आठ सिद्धियों (अणिमा, महिमा, लघिमा आदि) के प्रतीक हैं। श्लोक २ में उन्हें 'अष्टपुत्रकुटुम्बिन्यै' कहा गया है, जो यह दर्शाता है कि उनकी कृपा से साधक को न केवल भौतिक संतान सुख मिलता है, बल्कि आध्यात्मिक सिद्धियाँ भी प्राप्त होती हैं। यह स्तोत्र केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि एक दिव्य ऊर्जा चक्र है जो साधक के घर में लक्ष्मी का स्थायी वास सुनिश्चित करता है।

विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व (Significance)

अनघा देवी की साधना का सबसे बड़ा महत्व 'त्रिविधाघ निवारण' में है। मनुष्य तीन प्रकार के दुखों से पीड़ित रहता है— आध्यात्मिक (स्वयं के शरीर और मन के कष्ट), आधिभौतिक (अन्यों के द्वारा प्राप्त कष्ट), और आधिदैविक (ग्रहों और प्रकृति के कष्ट)। श्लोक २ में माँ को 'त्रिविधाघविदारिण्यै' कहा गया है, जिसका अर्थ है इन तीनों प्रकार के पापों और कष्टों को जड़ से मिटाने वाली सत्ता।

माँ अनघा को 'योगाधीशायै' और 'योगशक्तिस्वरूपिण्यै' भी कहा गया है। इसका अर्थ है कि वे भगवान दत्तात्रेय की वह शक्ति हैं जो साधक की कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत कर उसे आत्मज्ञान की ओर ले जाती हैं। वे भगवान दत्त के वाम अंग (बाएं भाग) में विराजती हैं, जो करुणा और प्रेम का प्रतीक है। जब एक साधक इस स्तोत्र का पाठ करता है, तो वह केवल लक्ष्मी की याचना नहीं करता, बल्कि उस परब्रह्म तत्व की शक्ति को पुकारता है जो उसे जन्म-मरण के बंधन से मुक्त कर सकती है। यह स्तोत्र अद्वैत वेदांत के सिद्धांतों को भक्ति के रस में डुबोकर प्रस्तुत करता है।

स्तोत्र पाठ के फलश्रुति लाभ (Benefits)

दत्त सम्प्रदाय की प्राचीन परंपरा के अनुसार, माँ अनघा के १०८ नामों का नित्य पाठ करने से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • पारिवारिक सुख और शांति: माँ को 'कुटुम्बवृद्धि' प्रदाता माना गया है। घर में हो रहे क्लेश, झगड़े और वैचारिक मतभेद इस पाठ से शांत होते हैं।
  • आर्थिक समृद्धि और लक्ष्मी कृपा: 'महालक्ष्म्यै नमो नमः' और 'महासम्पत्प्रदाय' नामों के कारण यह स्तोत्र व्यापार में लाभ और ऋण मुक्ति (Debts) के लिए अमोघ है।
  • संतान सुख: जो दंपत्ति संतान सुख से वंचित हैं, उनके लिए श्लोक १९ (पुत्रदायै वंशवृद्धिकृते) का पाठ विशेष फलदायी माना गया है।
  • मानसिक शांति और अज्ञान नाश: यह स्तोत्र अविद्या (Ignorance) का नाश करता है और साधक को आत्मिक संतोष प्रदान करता है।
  • शत्रु और भय बाधा मुक्ति: माँ के 'रौद्र्यै' और 'जम्भासुरविदाहिन्यै' स्वरूप का स्मरण शत्रुओं के कुप्रभाव को नष्ट करता है।
  • आरोग्य लाभ: 'तपयत्रयनुदे' होने के कारण यह पाठ शारीरिक रोगों और मानसिक व्याधियों को दूर करने में सहायक है।

पाठ विधि और विशेष अवसर (Ritual Method)

माँ अनघा देवी की साधना अत्यंत सौम्य और प्रेमपूर्ण है। इसका पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित विधि का पालन करना श्रेष्ठ है।

पूजा विधान

  • शुभ समय: 'अनघा अष्टमी' (मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी) इस पाठ के लिए वर्ष का सबसे पवित्र दिन है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक गुरुवार (Thursday) को पाठ करना विशेष फलदायी है।
  • शुद्धि: स्नान के पश्चात स्वच्छ पीले या लाल वस्त्र धारण करें। माँ को हल्दी (Turmeric) और कुमकुम अत्यंत प्रिय है।
  • आसन: ऊनी या कुशा के आसन पर उत्तर या पूर्व की ओर मुख करके बैठें।
  • दीप और नैवेद्य: शुद्ध घी का दीपक जलाएं। माँ को गुड़-चने का भोग या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाएं। यदि संभव हो तो 'अनघा अष्टमी' के दिन गुड़ का शरबत (Panakam) अर्पित करें।
  • ध्यान: भगवान दत्तात्रेय और माँ अनघा का चित्र सामने रखें, जिसमें वे हंस पर विराजित हों या प्रभु के वाम अंग में हों।

विशेष संकल्प साधना

यदि कोई विशेष मनोकामना (जैसे विवाह, नौकरी या आर्थिक संकट) हो, तो लगातार २१ दिनों तक प्रतिदिन ११ बार इस स्तोत्र का पाठ करें। पाठ के अंत में 'दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा' महामंत्र का १०८ बार जाप करने से फल की तीव्रता बढ़ जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. अनघा देवी कौन हैं?

माँ अनघा देवी भगवान दत्तात्रेय की 'शक्ति' या पत्नी स्वरूप हैं। वे अष्ट सिद्धियों की स्वामिनी और समस्त अघों (पापों) का नाश करने वाली महालक्ष्मी का स्वरूप हैं।

2. अनघा अष्टमी का व्रत क्यों किया जाता है?

यह व्रत मुख्य रूप से वैवाहिक सुख, संतान प्राप्ति और घर की दरिद्रता दूर करने के लिए किया जाता है। माना जाता है कि राजा कार्तवीर्यार्जुन ने इसी व्रत के प्रभाव से अपनी अजेय शक्ति प्राप्त की थी।

3. क्या गृहस्थ लोग इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं?

हाँ, यह स्तोत्र विशेष रूप से गृहस्थों के लिए ही है। भगवान दत्तात्रेय का 'अनघ' अवतार ही गृहस्थ धर्म के कल्याण के लिए हुआ था।

4. 'अनघा' शब्द का अर्थ क्या है?

'न अघ इति अनघा'— जिसमें कोई दोष, पाप या मलिनता न हो, वह अनघा है। वे पूर्णतः शुद्ध और पावन ऊर्जा का प्रतीक हैं।

5. क्या इस पाठ से पितृ दोष शांत होता है?

जी हाँ। भगवान दत्तात्रेय पितरों के अधिपति हैं और माँ अनघा की कृपा से वंश में चले आ रहे दोष समाप्त होते हैं और पूर्वजों को सद्गति मिलती है।

6. पाठ के दौरान किस रंग के वस्त्र पहनना श्रेष्ठ है?

दत्तात्रेय साधना में पीला (Yellow) और माँ की शक्ति के लिए लाल (Red) रंग अत्यंत शुभ माना जाता है।

7. क्या स्त्रियाँ रजस्वला काल में यह पाठ कर सकती हैं?

आध्यात्मिक शुद्धि के नियमों के अनुसार, रजस्वला काल में प्रत्यक्ष मूर्ति पूजा और स्तोत्र पाठ से बचना चाहिए। उस समय केवल मानसिक स्मरण करना ही उचित है।

8. 'अष्टपुत्र' कौन हैं?

माँ अनघा के आठ पुत्र अष्ट-महासिद्धियों (अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व) के प्रतीक हैं।

9. क्या इस पाठ से नौकरी में उन्नति मिल सकती है?

हाँ, माँ को 'इन्द्रराज्यप्रदायिन्यै' (राज्य प्रदान करने वाली) कहा गया है। यह करियर की बाधाओं को दूर कर सफलता के मार्ग खोलता है।

10. पाठ के लिए सबसे उत्तम माला कौन सी है?

माँ अनघा और दत्त गुरु के लिए हल्दी की माला या कमलगट्टे की माला का उपयोग करना अत्यंत फलदायी होता है।