Sri Chinnamastha Devi Stotram – श्री छिन्नमस्ता देवि स्तोत्रम्

॥ श्री छिन्नमस्ता देवि स्तोत्रम् ॥
श्रीईश्वर उवाच
स्तवराजमहं वन्दे वै रोचन्याश्शुभप्रदं ।
नाभौ शुभ्रारविन्दं तदुपरि विलसन्मण्डलं चण्डरश्मेः
संसारस्यैकसारां त्रिभुवनजननीं धर्मकामार्थदात्रीं ।
तस्मिन्नध्ये त्रिभागे त्रितयतनुधरां छिन्नमस्तां प्रशस्तां
तां वन्दे छिन्नमस्तां शमनभयहरां योगिनीं योगमुद्राम् ॥ १ ॥
नाभौ शुद्धसरोजवक्त्रविलसद्बन्धूकपुष्पारुणं
भास्वद्भास्करमण्डलं तदुदरे तद्योनिचक्रं महत् ।
तन्मध्ये विपरीतमैथुनरत प्रद्युम्नसत्कामिनी
पृष्ठंस्यात्तरुणार्य कोटिविलसत्तेजस्स्वरूपां भजे ॥ २ ॥
वामे छिन्नशिरोधरां तदितरे पाणौ महत्कर्तृकां
प्रत्यालीढपदां दिगन्तवसनामुन्मुक्त केशव्रजां ।
छिन्नात्मीय शिरस्समच्चल दमृद्धारां पिबन्तीं परां
बालादित्य समप्रकाश विलसन्नेत्रत्रयोद्भासिनीम् ॥ ३ ॥
वामादन्यत्र नालं बहुगहनगलद्रक्तधाराभिरुच्चै-
र्गायन्तीमस्थिभूषां करकमललसत्कर्तृकामुग्ररूपां ।
रक्तामारक्तकेशीमवगतवसनावर्णनीमात्मशक्तिं
प्रत्यालीढोरुपादामरुणि तनयनां योगिनीं योगनिद्राम् ॥ ४ ॥
दिग्वस्त्रां मुक्तकेशीं प्रलयघनघटा घोररूपां
प्रचण्डां दम्ष्ट्रादुःप्रेक्ष्यवक्त्रोदरविवरलसल्लोलजिह्वाग्रभासां ।
विद्युल्लोलाक्षियुग्मां हृदयतटलसद्भोगिनीं भीममूर्तिं
सद्यः छिन्नात्मकण्ठप्रगलितरुधिरैर्डाकिनी वर्धयन्तीम् ॥ ५ ॥
ब्रह्मेशानाच्युताद्यैश्शिरसि विनिहिता मन्दपादारविन्दै
राज्ञैर्योगीन्द्रमुख्यैः प्रतिपदमनिशं चिन्तितां चिन्त्यरूपां ।
संसारे सारभूतां त्रिभुवनजननीं छिन्नमस्तां प्रशस्तां
इष्टां तामिष्टदात्रीं कलिकलुषहरां चेतसा चिन्तयामि ॥ ६ ॥
उत्पत्ति स्थितिसंहृतीर्घटयितुं धत्ते त्रिरूपां तनुं
त्रैगुण्याज्जगतोयदीयविकृति ब्रह्माच्युतश्शूलभृत् ।
तामाद्यां प्रकृतिं स्मरामि मनसा सर्वार्थसंसिद्धये
यस्मात्म्सेरपदारविन्दयुगले लाभं भजन्ते नराः ॥ ७ ॥
अभिलषित परस्त्री योगपूजापरोऽहं
बहुविधजन भावारम्भसम्भावितोऽहं ।
पशुजनविरतोऽहं भैरवी संस्थितोऽहं
गुरुचरणपरोऽहं भैरवोहं शिवोऽहम् ॥ ८ ॥
इदं स्तोत्रं महापुण्यं ब्रह्मणा भाषितं पुरा ।
सर्वसिद्धिप्रदं साक्षान्महापातकनाशनम् ॥ ९ ॥
यःपठेत्प्रातरुत्थाय देव्यास्सन्निहितोपि वा ।
तस्य सिद्धिर्भवेद्देवी वाञ्छितार्थ प्रदायिनी ॥ १० ॥
धनं धान्यं सुतं जायां हयं हस्तिनमेव च ।
वसुन्धरां महाविद्यामष्टसिद्धिं लभेद्धृवम् ॥ ११ ॥
वैयाघ्राजिनरञ्जितस्वजघनेऽरण्ये प्रलम्बोदरे
खर्वे निर्वचनीयपर्वसुभगे मुण्डावलीमण्डिते ।
कर्तीं कुन्दरुचिं विचित्रवनितां ज्ञाने दधाने पदे
मातर्भक्तजनानुकम्पिनि महामायेस्तु तुभ्यं नमः ॥ १२ ॥
॥ इति श्री छिन्नमस्तादेवी स्तोत्रम् ॥
इतर पश्यतु ।
संलिखित ग्रंथ (Related Texts)
श्री छिन्नमस्ता देवि स्तोत्रम् - परिचय (Introduction)
श्री छिन्नमस्ता देवि स्तोत्रम् सनातन धर्म की तंत्र परम्परा में एक अत्यंत गोपनीय और शक्तिशाली स्तुति है। दश महाविद्याओं में छठे स्थान पर विराजमान माँ छिन्नमस्ता की यह स्तुति स्वयं ईश्वर (भगवान शिव) के श्रीमुख से कही गई है, इसीलिए इसे "ईश्वर उवाच" के रूप में प्रारम्भ किया गया है। शास्त्रों में इसे स्तवराज अर्थात् 'स्तोत्रों का राजा' कहा गया है, जो इसकी असाधारण शक्ति और महत्व को दर्शाता है।
देवी का नाम और अर्थ: 'छिन्नमस्ता' शब्द दो भागों से बना है — 'छिन्न' अर्थात् कटा हुआ, और 'मस्ता' अर्थात् मस्तक (शीश)। जिस देवी ने स्वयं अपना मस्तक काट दिया हो, वही छिन्नमस्ता हैं। इन्हें अनेक नामों से जाना जाता है — प्रचंड चंडिका (उग्र रूप के कारण), चिन्तपूर्णी (सब चिन्ताओं को दूर करने वाली), और छिन्नमस्तिका। हिमाचल प्रदेश में चिन्तपूर्णी शक्तिपीठ इन्हीं देवी को समर्पित है, जहाँ लाखों श्रद्धालु प्रतिवर्ष दर्शन करने आते हैं।
उत्पत्ति कथा: पुराणों और कालीतंत्र में वर्णित सबसे प्रसिद्ध कथा के अनुसार, एक बार देवी पार्वती अपनी दो सहचरियों — जया और विजया (जिन्हें डाकिनी और वर्णिनी भी कहते हैं) — के साथ मंदाकिनी नदी में स्नान करने गईं। स्नान के पश्चात् दोनों सहचरियों को असहनीय भूख लगी और उन्होंने देवी से भोजन की याचना की। देवी ने कुछ समय प्रतीक्षा करने को कहा, किन्तु जब सहचरियों की व्याकुलता बढ़ती गई, तब करुणामयी माता ने अपने ही खड्ग से अपना शीश काट दिया। कटे हुए गले से रक्त की तीन धाराएँ प्रवाहित हुईं — एक धारा का पान देवी का कटा शीश स्वयं करने लगा, शेष दो धाराओं से डाकिनी और वर्णिनी ने अपनी क्षुधा शांत कि। यह कथा मातृत्व के चरम बलिदान और निःस्वार्थ दान का प्रतीक है।
दश महाविद्या में स्थान: काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी के पश्चात् छठे क्रम पर छिन्नमस्ता विराजमान हैं। ये महाकाली का ही एक रहस्यमय और शक्तिशाली स्वरूप मानी जाती हैं। जहाँ अन्य महाविद्याएँ शक्ति के विभिन्न पक्षों का प्रतिनिधित्व करती हैं, वहीं छिन्नमस्ता विरोधाभासों की देवी हैं — वे एक साथ जीवन देने वाली और जीवन लेने वाली दोनों हैं। वे सृष्टि, स्थिति और संहार — तीनों का एकत्र प्रतिनिधित्व करती हैं। स्तोत्र के सातवें श्लोक में भी यही कहा गया है — "उत्पत्ति स्थिति संहृतीर्घटयितुं धत्ते त्रिरूपां तनुं" — अर्थात् उत्पत्ति, स्थिति और संहार के लिए वे तीन रूप धारण करती हैं।
कुण्डलिनी जागरण से सम्बन्ध: योग और तंत्र शास्त्र में छिन्नमस्ता का स्वरूप कुण्डलिनी शक्ति के जागरण का जीवंत प्रतीक माना जाता है। उनके कटे गले से निकलने वाली तीन रक्तधाराएँ इडा, पिंगला और सुषुम्ना — तीन प्रमुख नाड़ियों का संकेत हैं। मध्य धारा (सुषुम्ना) जो देवी स्वयं पान करती हैं, वह ब्रह्मरन्ध्र तक पहुँचने वाली प्राण शक्ति का प्रतीक है। विद्वानों के अनुसार, इनकी साधना से साधक की प्राण ऊर्जा ऊर्ध्वगामी होकर सहस्रार चक्र तक पहुँचती है, जो मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है।
बौद्ध परम्परा में: उल्लेखनीय है कि छिन्नमस्ता की उपासना केवल हिन्दू परम्परा तक सीमित नहीं है। बौद्ध वज्रयान तंत्र में इन्हें 'छिन्नमुण्डा वज्रवराही' या 'वज्रयोगिनी' के नाम से जाना जाता है। कुछ विद्वान, जैसे डेविड किन्सले (David Kinsley), इस बौद्ध रूप को हिन्दू स्वरूप से भी प्राचीन मानते हैं। यह इस देवी की व्यापक और सार्वभौमिक स्वीकृति को प्रमाणित करता है। महाभागवत पुराण (लगभग दसवीं शताब्दी) में दश महाविद्याओं का प्रथम उल्लेख मिलता है, जिसमें छिन्नमस्ता भी सम्मिलित हैं।
विशिष्ट महत्व (Significance)
आत्म-बलिदान का परम प्रतीक: छिन्नमस्ता का स्वरूप संसार में आत्म-बलिदान और निःस्वार्थ त्याग का सबसे उदात्त प्रतीक है। माता ने दूसरों के पोषण के लिए अपना शरीर ही अर्पित कर दिया — यह शिक्षा देता है कि सच्ची शक्ति तो त्याग में निहित है, संग्रह में नहीं। यही कारण है कि तांत्रिक साधना में इनकी उपासना अहंकार के विसर्जन और आत्म-ज्ञान के लिए की जाती है।
काम-रति पर विजय: देवी की प्रतिमा में वे कामदेव और रति के ऊपर खड़ी दिखाई जाती हैं, जो रतिक्रिया में संलग्न हैं। यह गहन तांत्रिक प्रतीकवाद है — इसका अर्थ है कि देवी काम-वासना और भौतिक इच्छाओं पर पूर्ण विजय प्राप्त करने वाली शक्ति हैं। साधक को सांसारिक बन्धनों से ऊपर उठकर आध्यात्मिक मुक्ति पाने की प्रेरणा यही स्वरूप देता है।
तांत्रिक महत्व: तंत्र शास्त्र में छिन्नमस्ता की साधना को सर्वाधिक गोपनीय और शक्तिशाली साधनाओं में गिना जाता है। यह साधना "भोग से योग" और "योग से मोक्ष" का मार्ग प्रशस्त करती है। गुप्त नवरात्रि में तंत्र-मंत्र सीखने वाले साधकों के लिए इनकी पूजा का विशेष विधान है। जो साधक इस मार्ग पर चलते हैं, उन्हें द्वैत से अद्वैत की अनुभूति होती है — जहाँ सृष्टि और संहार, जीवन और मृत्यु, एक ही शक्ति के दो पहलू प्रतीत होते हैं।
दिगम्बर स्वरूप: देवी का नग्न स्वरूप (दिगम्बरा) परम सत्य, शुद्धता और माया से मुक्ति का प्रतीक है। जैसे सत्य को किसी आवरण की आवश्यकता नहीं, वैसे ही देवी निरावरण हैं। उनके मुक्त, बिखरे केश आदिम स्त्री शक्ति (Primal Feminine Force) की अदम्य और अनियंत्रित प्रकृति का संकेत हैं।
फलश्रुति - पाठ के लाभ (Benefits from Phala Shruti)
इस स्तोत्र के अन्तिम श्लोकों (९-११) में स्वयं भगवान शिव ने फलश्रुति का वर्णन किया है। उन्होंने कहा है — "इदं स्तोत्रं महापुण्यं ब्रह्मणा भाषितं पुरा" — यह स्तोत्र अत्यंत पुण्यकारी है जो पूर्वकाल में ब्रह्मा जी द्वारा कहा गया था। इसके पाठ से प्राप्त होने वाले लाभ:
- सर्वसिद्धि प्राप्ति: स्तोत्र में स्पष्ट कहा गया है — "सर्वसिद्धिप्रदं साक्षात्" — यह साक्षात् सभी सिद्धियाँ प्रदान करता है। अणिमा, महिमा, गरिमा आदि अष्टसिद्धियाँ साधक को प्राप्त होती हैं।
- महापातक नाश: "महापातकनाशनम्" — बड़े से बड़े पाप भी इस स्तोत्र के पाठ से नष्ट हो जाते हैं। यह आत्मा की शुद्धि करने वाला है।
- वाञ्छित फल प्राप्ति: "वाञ्छितार्थ प्रदायिनी" — जो भी मनोवांछित कामना हो, देवी की कृपा से वह पूर्ण होती है।
- धन-धान्य-सन्तान: श्लोक ११ में स्पष्ट वर्णन है — "धनं धान्यं सुतं जायां" — धन, अन्न, पुत्र, पत्नी, अश्व, गज (हाथी), और भूमि सब कुछ प्राप्त होता है।
- कुण्डलिनी जागरण: नियमित साधना से इडा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियों का संधान होकर कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत होती है।
- शत्रु भय मुक्ति: "शमनभयहरां" — मृत्यु और शत्रुओं का भय समूल नष्ट होता है। साधक निर्भय हो जाता है।
- कलियुग के दोष नाश: "कलिकलुषहरां" — कलियुग के समस्त पापों और दोषों को हरने वाली हैं माँ छिन्नमस्ता।
- ग्रह बाधा निवारण: शनि, राहु और केतु जैसे क्रूर ग्रहों के दुष्प्रभाव को शांत करने में इनकी उपासना अत्यंत प्रभावी मानी जाती है।
पाठ विधि और विशेष अवसर (Ritual Method & Auspicious Occasions)
सावधानी: छिन्नमस्ता एक उग्र महाविद्या हैं। उनकी तांत्रिक साधना (मंत्र जप, यंत्र पूजा) गुरु दीक्षा और मार्गदर्शन में करना आवश्यक है। परन्तु इस स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ कोई भी श्रद्धालु कर सकता है।
- शुभ तिथियाँ: शनिवार का प्रदोषकाल (सन्ध्याकाल), अमावस्या, अष्टमी, चतुर्दशी तिथि — ये सर्वश्रेष्ठ हैं। इसके अतिरिक्त गुप्त नवरात्रि (माघ और आषाढ़ माह) में पाठ का विशेष महत्व है।
- छिन्नमस्ता जयंती: वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को देवी छिन्नमस्ता की जयंती मनाई जाती है। इस दिन किया गया पाठ और पूजा अत्यंत फलदायी होती है।
- आसन और दिशा: नीले रंग का आसन बिछाएँ और दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर मुख करके बैठें। कुछ शास्त्रों में उत्तर या पूर्व मुख का भी विधान है।
- पूजा सामग्री: नीले फूल (मंदाकिनी, सदाबहार), सरसों के तेल में नील मिलाकर दीपक जलाएँ, सुरमे का तिलक करें। उड़द से बने मिष्ठान्न का भोग लगाएँ। नैवेद्य में खीर और मेवा भी अर्पित करें।
- मूल मंत्र: "श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीयै हूं हूं फट् स्वाहा" — इस मंत्र का जप अष्टमुखी रुद्राक्ष माला या काले हकीक (Agate) की माला से करना चाहिए।
- ध्यान मंत्र: "प्रचण्ड चण्डिकां वक्ष्ये सर्वकाम फलप्रदाम्। यस्या: स्मरण मात्रेण सदाशिवो भवेन्नर:।।" — पाठ से पूर्व इस ध्यान मंत्र का स्मरण करें।
- पाठ संख्या: स्तोत्र का पाठ न्यूनतम ३ बार करें। विशेष कामना पूर्ति हेतु ११ या २१ दिन तक नियमित पाठ करें।
- विसर्जन: जप के पश्चात् काले नमक की डली बरगद वृक्ष के नीचे गाड़ दें और शेष सामग्री को बहते जल में प्रवाहित करें। अन्त में क्षमा प्रार्थना अवश्य करें।
FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. छिन्नमस्ता देवी कौन हैं?
छिन्नमस्ता दश महाविद्याओं में छठी देवी हैं। इन्होंने अपनी सहचरियों डाकिनी और वर्णिनी की भूख शांत करने के लिए स्वयं अपना मस्तक काटा था। कटे गले से तीन रक्तधाराएँ प्रवाहित हुईं — दो से सहचरियों ने पान किया और एक से देवी ने स्वयं। इन्हें 'प्रचंड चंडिका' और 'चिन्तपूर्णी' भी कहा जाता है।
2. छिन्नमस्ता स्तोत्र का पाठ करने का सबसे उचित समय कौन सा है?
शनिवार का प्रदोषकाल (सन्ध्या समय) सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसके अतिरिक्त अमावस्या, अष्टमी, चतुर्दशी तिथि, गुप्त नवरात्रि (माघ और आषाढ़ शुक्ल), और विशेष रूप से वैशाख शुक्ल चतुर्दशी (छिन्नमस्ता जयंती) पर पाठ अत्यंत फलदायी होता है।
3. क्या बिना गुरु दीक्षा के छिन्नमस्ता स्तोत्र पढ़ सकते हैं?
स्तोत्र पाठ और तांत्रिक मंत्र साधना में अंतर है। इस स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ कोई भी श्रद्धालु कर सकता है — इसके लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य नहीं। हाँ, उग्र तांत्रिक साधना जैसे मंत्र सिद्धि, यंत्र पूजा इत्यादि के लिए योग्य गुरु का मार्गदर्शन आवश्यक है।
4. छिन्नमस्ता का मूल मंत्र क्या है और कैसे जपें?
"श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीयै हूं हूं फट् स्वाहा" — यह मूल मंत्र है। इसका जप अष्टमुखी रुद्राक्ष, काले हकीक या लाजवर्त (Lapis Lazuli) की माला से करना चाहिए। जप से पूर्व ध्यान मंत्र का पाठ करें और नीले आसन पर दक्षिण-पश्चिम मुख करके बैठें।
5. छिन्नमस्ता की तीन रक्तधाराओं का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?
योग शास्त्र के अनुसार तीन रक्तधाराएँ इडा, पिंगला और सुषुम्ना — तीन प्रमुख नाड़ियों का प्रतीक हैं। मध्य धारा (सुषुम्ना) जो देवी स्वयं पान करती हैं, वह कुण्डलिनी शक्ति के ऊर्ध्वगमन का संकेत है। इसे सत्व, रजस और तमस — तीन गुणों का प्रतीक भी माना जाता है।
6. दश महाविद्याओं में छिन्नमस्ता का क्रम और विशेषता क्या है?
काली, तारा, षोडशी (त्रिपुरसुन्दरी), भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला — इस क्रम में छिन्नमस्ता छठे स्थान पर हैं। इनकी विशेषता यह है कि ये विरोधाभासों की देवी हैं — जीवनदात्री भी और संहारकर्ता भी।
7. बौद्ध धर्म में छिन्नमस्ता को किस नाम से जाना जाता है?
बौद्ध वज्रयान तंत्र परम्परा में इन्हें 'छिन्नमुण्डा वज्रवराही' या 'वज्रयोगिनी' के नाम से पूजा जाता है। विद्वान डेविड किन्सले और एलिज़ाबेथ ऐन बेनार्ड इस बौद्ध रूप को हिन्दू रूप से भी प्राचीन मानते हैं, जो इस देवी की सार्वभौमिक स्वीकृति को दर्शाता है।
8. छिन्नमस्ता और चिन्तपूर्णी में क्या सम्बन्ध है?
छिन्नमस्ता को ही 'चिन्तपूर्णी' कहा जाता है क्योंकि वे भक्तों की सकल चिन्ताओं का अन्त करके मनोकामनाएँ पूर्ण करती हैं। हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में स्थित माता चिन्तपूर्णी शक्तिपीठ इन्हीं देवी को समर्पित है, जो ५२ शक्तिपीठों में से एक माना जाता है।
9. छिन्नमस्ता पूजा में कौन सी विशेष सामग्री चढ़ानी चाहिए?
देवी को नीले फूल (मंदाकिनी, नील सदाबहार) विशेष प्रिय हैं। सरसों के तेल में नील मिलाकर दीपक जलाएँ, सुरमे का तिलक करें, उड़द से बने मिष्ठान्न और खीर-मेवा का भोग लगाएँ। प्लास्टिक की सामग्री का उपयोग पूजा में कदापि न करें।
10. छिन्नमस्ता साधना से कुण्डलिनी जागरण कैसे सम्भव है?
देवी का सम्पूर्ण स्वरूप ही कुण्डलिनी योग की प्रतीकात्मक व्याख्या है। उनके चरणों में काम-रति (मूलाधार चक्र), कटा हुआ शीश (सहस्रार चक्र), और तीन रक्तधाराएँ (तीन नाड़ियाँ) — यह पूरा चित्र मूलाधार से सहस्रार तक प्राण शक्ति के ऊर्ध्वगमन का मार्ग दर्शाता है। इनकी साधना से प्राण वायु सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करती है, जो कुण्डलिनी जागरण का आधार है।
11. क्या गर्भवती महिलाएँ यह स्तोत्र पढ़ सकती हैं?
उग्र देवताओं की साधना गर्भावस्था में वर्जित मानी जाती है। गर्भवती महिलाओं को सौम्य देवियों, जैसे माँ अन्नपूर्णा, माँ पार्वती, या माँ लक्ष्मी की स्तुति करनी चाहिए। छिन्नमस्ता स्तोत्र का पाठ प्रसव के पश्चात् और शरीर के स्वस्थ होने पर पुनः आरम्भ कर सकती हैं।