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Sri Chinnamastha Devi Hridayam – श्री छिन्नमस्ता देवि हृदयम्

Sri Chinnamastha Devi Hridayam – श्री छिन्नमस्ता देवि हृदयम्
॥ श्री छिन्नमस्ता देवि हृदयम् ॥ श्री पार्वत्युवाच श्रुतं पूजादिकं सम्यग्भवद्वक्त्राब्ज निस्सृतम् । हृदयं छिन्नमस्तायाः श्रोतुमिच्छामि साम्प्रतम् ॥ १ ॥ श्री महादेव उवाच नाद्यावधि मया प्रोक्तं कस्यापि प्राणवल्लभे । यत्त्वया परिपृष्टोऽहं वक्ष्ये प्रीत्यै तव प्रिये ॥ २ ॥ ॥ विनियोग ॥ ओं अस्य श्रीछिन्नमस्ताहृदयस्तोत्रमहामन्त्रस्य – भैरव ऋषिः – सम्राट् छन्दः -छिन्नमस्ता देवता – हूं बीजम् – ओं शक्तिः – ह्रीं कीलकं – शत्रुक्षयकरणार्थे जपे विनियोगः ॥ ॥ करन्यास ॥ ओं ओं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ओं हूं तर्जनीभ्यां नमः । ओं ह्रीं मध्यमाभ्यां नमः । ओं क्लीं अनामिकाभ्यां नमः । ओं ऐं कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ओं हूं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । ॥ हृदयादि न्यास ॥ ओं ओं हृदयाय नमः । ओं हूं शिरसे स्वाहा । ओं ह्रीं शिखायै वषट् । ओं क्लीं नेत्रत्रयाय वौषट् । ओं ऐं कवचाय हुम् । ओं हूं अस्त्राय फट् । भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्बन्धः । ॥ ध्यानम् ॥ रक्ताभां रक्तकेशीं करकमललसत्कर्तृकां कालकान्तिं विच्छिन्नात्मीयमुण्डासृगरुणबहुलां चक्रधारां पिबन्तीम् । विघ्नाभ्रौघप्रचण्डश्वसनसमनिभां सेवितां सिद्धसङ्घैः पद्माक्षीं छिन्नमस्तां छलकरदितिजच्छेदिनीं संस्मरामि ॥ १ ॥ वन्देऽहं छिन्नमस्तां तां छिन्नमुण्डधरां परां । छिन्नग्रीवोच्छटाच्छन्नां क्षौमवस्त्रपरिच्छदाम् ॥ २ ॥ सर्वदा सुरसङ्घेन सेविताङ्घ्रिसरोरुहां । सेवे सकलसम्पत्यै छिन्नमस्तां शुभप्रदाम् ॥ ३ ॥ यज्ञानां योगयज्ञाय या तु जाता युगे युगे । दानवान्तकरीं देवीं छिन्नमस्तां भजामि ताम् ॥ ४ ॥ वैरोचनीं वरारोहां वामदेमविवर्धितां । कोटिसूर्यप्रभां वन्दे विद्युद्वर्णाक्षिमण्डिताम् ॥ ५ ॥ निजकण्ठोच्छलद्रक्तधारया या मुहुर्मुहुः । योगिनी गणसंस्तुत्या तस्याश्चरणमाश्रये ॥ ६ ॥ हूमित्येकाक्षरं मन्त्रं यदीयं युक्तमानसः । यो जपेत्तस्य विद्वेषी भस्मतां याति तां भजे ॥ ७ ॥ हूं स्वाहेति मनुं सम्यग्यस्स्मरत्यार्तिमान्नरः । छिनत्ति छिन्नमस्ताया तस्य बाधां नमामि ताम् ॥ ८ ॥ यस्याः कटाक्षमात्रेण क्रूरभूतादयो द्रुतम् । दूरे तस्य पलायन्ते छिन्नमस्तां भजामि ताम् ॥ ९ ॥ क्षितितलपरिरक्षाक्षान्तरोषा सुदक्षा छलयुतकलकक्षाच्छेदने क्षान्तिलक्ष्या । क्षितिदितिजसुपक्षा क्षोणिपाक्षय्यशिक्षा जयतु जयतु चाक्षा छिन्नमस्तारिभक्षा ॥ १० ॥ कलिकलुषकलानां कर्तने कर्त्रिहस्ता सुरकुवलयकाशा मन्दभानुप्रकाशा । असुरकुलकलापत्रासिकाकालमूर्ति- -र्जयतु जयतु काली छिन्नमस्ता कराली ॥ ११ ॥ भुवनभरणभूरी भ्राजमानानुभावा भव भव विभवानां भारणोद्भातभूतिः । द्विजकुलकमलानां भासिनी भानुमूर्ति- -र्भवतु भवतु वाणी छिन्नमस्ता भवानी ॥ १२ ॥ मम रिपुगणमाशु च्छेत्तुमुग्रं कृपाणं सपदि जननि तीक्ष्णं छिन्नमुण्डं गृहाण । भवतु तव यशोऽलं छिन्धि शत्रून्कलान्मे मम च परिदिशेष्टं छिन्नमस्ते क्षमस्व ॥ १३ ॥ छिन्नग्रीवा छिन्नमस्ता छिन्नमुण्डधराऽक्षता । क्षोदक्षेमकरी स्वक्षा क्षोणीशाच्छादन क्षमा ॥ १४ ॥ वैरोचनी वरारोहा बलिदानप्रहर्षिता । बलियोजितपादाब्जा वासुदेव प्रपूजिता ॥ १५ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ इति द्वादशनामानि छिन्नमस्ता प्रियाणि यः । स्मरेत्प्रातस्समुत्थाय तस्य नश्यन्ति शत्रवः ॥ १६ ॥ यां स्मृत्वा सन्ति सद्यः सकलः सुरगणाः सर्वदा सम्पदाढ्याः शत्रूणां सङ्घमाहत्य विशदवदनाः स्वस्थचित्ताः श्रयन्ति । तस्याः सङ्कल्पवन्तः सरसिजचरणस्सन्ततं संश्रयन्ति साऽऽद्या श्रीशादिसेव्या सुफलतु सुतरां छिन्नमस्ता प्रशस्ता ॥ १७ ॥ हृदयमितिमज्ञात्वा हन्तुमिच्छति यो द्विषम् । कथं तस्याचिरं शत्रुर्नाशमेष्यति पार्वति ॥ १८ ॥ यदीच्छेन्नाशनं शत्रोः शीघ्रमेतत्पठेन्नरः । छिन्नमस्ता प्रसन्नापि ददाति फलमीप्सितम् ॥ १९ ॥ शत्रुप्रशमनं पुण्यं समीप्सितफलप्रदम् । आयुरारोग्यदं चैव पठतां पुण्यसाधनम् ॥ २० ॥ ॥ इति श्रीनन्द्यावर्ते महादेवपार्वतीसंवादे श्रीछिन्नमस्ताहृदयस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ इतर पश्यतु ।

श्री छिन्नमस्ता देवि हृदयम् - परिचय (Introduction)

श्री छिन्नमस्ता देवि हृदयम् एक अत्यंत प्रभावशाली और गोपनीय स्तोत्र है जो 'श्री नन्द्यावर्त' तंत्र के अंतर्गत भगवान शिव और पार्वती के संवाद में आता है। जब माता पार्वती ने भगवान शिव से देवी छिन्नमस्ता के 'हृदय' (सबसे गोपनीय रहस्य) को सुनने की इच्छा प्रकट की, तब भगवान शिव ने इस स्तोत्र का उपदेश दिया।
'हृदयम्' का तात्पर्य केवल स्तुति नहीं, बल्कि उस देवता के साथ एकाकार होना है। यह स्तोत्र देवी के उग्र रूप की वंदना करता है जो शत्रुओं और आंतरिक विकारों (काम, क्रोध, भय) का नाश करने में सक्षम है। इसमें देवी के विशिष्ट मंत्रों (जैसे 'हुं', 'ह्रीं', 'क्लीं') का विनियोग और न्यास भी शामिल है, जो इसे एक पूर्ण साधना पद्धति बनाता है।

विशिष्ट महत्व (Significance)

इस स्तोत्र में देवी के स्वरूप का जो वर्णन है, वह प्रतीकात्मक और दार्शनिक दृष्टि से अत्यंत गहरा है:
  • आत्म-बलिदान (Self-Sacrifice): देवी द्वारा अपना ही शीश काटना यह दर्शाता है कि सृष्टि के भरण-पोषण के लिए सर्वोच्च सत्य (जननी) सदैव तत्पर रहती है। यह अहंकार (Ego) के पूर्ण त्याग का प्रतीक है।
  • ऊर्जा का संतुलन (Ida, Pingala, Sushumna): देवी के गले से निकलने वाली तीन रक्त धाराएं शरीर की तीन प्रमुख नाड़ियों का प्रतीक हैं। बायीं और दायीं धाराएं (डाकिनी और वर्णिनी) इड़ा और पिंगला हैं, जबकि मध्य धारा (जो देवी स्वयं पी रही हैं) सुषुम्ना है, जो कुण्डलिनी जागरण का मार्ग है।
  • इच्छाओं पर विजय: देवी कामदेव और रति के ऊपर खड़ी हैं, जो यह दर्शाता है कि उन्होंने काम (Sexual Desire) और रति (Passion) को दबाया नहीं है, बल्कि उस ऊर्जा को ऊर्ध्वगामी (Sublimate) करके आध्यात्मिक शक्ति में बदल दिया है।

फलश्रुति - पाठ के लाभ (Benefits)

इस हृदय स्तोत्र के पाठ के लाभ स्वयं महादेव ने बताए हैं:
  • शत्रु नाश (Destruction of Enemies): श्लोक १६ में स्पष्ट कहा गया है - "तस्य नश्यन्ति शत्रवः"। जो प्रातः उठकर इसका स्मरण करता है, उसके शत्रु नष्ट हो जाते हैं।
  • बाधा निवारण: श्लोक ८ के अनुसार, जो "हूं स्वाहा" मंत्र का स्मरण करता है, देवी उसकी सभी बाधाओं को काट देती हैं (छिनत्ति बाधां)।
  • अकाल मृत्यु और भय से मुक्ति: यह स्तोत्र "आयुरारोग्यदं" है, अर्थात लंबी आयु और आरोग्य प्रदान करता है और क्रूर ग्रहों/भूतों के भय को दूर करता है।
  • मनोवांछित फल: देवी प्रसन्न होकर साधक को अभीष्ट फल ("ददाति फलमीप्सितम्") प्रदान करती हैं।

पाठ विधि (Ritual Method)

  • समय: इस स्तोत्र का पाठ रात्रिकाल (विशेषकर महानिशा या मध्यरात्रि) में सबसे अधिक फलदायी होता है। शांत कमरे में एकांत में बैठें।
  • दिशा और आसन: दक्षिण दिशा की ओर मुख करें। लाल या काले रंग का ऊनी आसन प्रयोग करें।
  • न्यास: पाठ से पूर्व स्तोत्र में दिए गए 'करन्यास' और 'हृदयादि न्यास' अवश्य करें। इससे शरीर में देवता का आवाहन होता है।
  • सावधानी: यह एक उग्र साधना है। इसे किसी योग्य गुरु के निर्देशन में करना श्रेयस्कर है। सात्विक भावना से पाठ करने पर कोई हानि नहीं होती।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. 'हृदयम' स्तोत्र का क्या अर्थ है?

'हृदयम्' का शाब्दिक अर्थ है 'हृदय' या 'दिल'। आध्यात्मिक संदर्भ में, यह किसी देवता के सबसे गोपनीय और मूल सार (Essence) को दर्शाता है। यह कवच और स्तोत्र से भिन्न, देवता के आंतरिक स्वभाव से जुड़ने का माध्यम है।

2. इसके पाठ का मुख्य फल क्या है?

स्वयं भगवान शिव ने फलश्रुति (श्लोक १६-२०) में कहा है कि इसका मुख्य फल 'शत्रु नाश' (Victory over enemies) है। जो इसका पाठ करता है, उसके शत्रु तत्काल नष्ट हो जाते हैं या शांत हो जाते हैं।

3. छिन्नमस्ता देवी का शीश कटा हुआ क्यों है?

यह 'अहंकार के विसर्जन' (Ego dissolution) का प्रतीक है। अपना शीश काटकर उन्होंने यह दर्शाया है कि जीवन और मृत्यु, भोग और त्याग एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यह पूर्ण आत्म-बलिदान और कुण्डलिनी शक्ति के उर्ध्वगमन को दर्शाता है।

4. क्या इसे राहु ग्रह की शांति के लिए पढ़ा जा सकता है?

हाँ, ज्योतिष में छिन्नमस्ता देवी का संबंध 'राहु' ग्रह से माना जाता है। राहु जनित दोषों, भ्रम और अचानक आने वाले संकटों के निवारण के लिए इनका पाठ अत्यंत लाभकारी है।

5. पाठ के लिए सर्वोत्तम समय कौन सा है?

तन्त्र साधना के लिए 'निशीथ काल' (मध्यरात्रि) सर्वश्रेष्ठ माना गया है। सामान्य पूजा के लिए सुबह या शाम की सन्ध्या वेला में पाठ किया जा सकता है।

6. क्या स्त्रियाँ इसका पाठ कर सकती हैं?

हाँ, स्त्रियाँ भी पूर्ण भक्ति और पवित्रता के साथ इसका पाठ कर सकती हैं। मासिक धर्म के दौरान पाठ वर्जित है।

7. 'डाकिनी' और 'वर्णिनी' कौन हैं?

ये देवी की दो सहचरियां हैं जो उनके दोनों ओर स्थित हैं। ये इड़ा और पिंगला नाड़ी की प्रतीक हैं, जबकि स्वयं छिन्नमस्ता सुषुम्ना नाड़ी का प्रतिनिधित्व करती हैं।

8. विनियोग और न्यास करना क्यों आवश्यक है?

विनियोग से मंत्र का उद्देश्य और ऋषि का स्मरण होता है। न्यास (अंगन्यास/करन्यास) से साधक का शरीर मंत्रमय हो जाता है और रक्षा होती है। उग्र साधनाओं में यह अनिवार्य है।

9. क्या यह धन प्राप्ति में सहायक है?

हाँ, श्लोक २० में कहा गया है कि यह 'समीप्सितफलप्रदम्' (मनोवांछित फल देने वाला) है। शत्रु बाधा हटने से धन और ऐश्वर्य का मार्ग स्वतः प्रशस्त होता है।

10. किस फूल से पूजा करनी चाहिए?

देवी को लाल रंग के पुष्प विशेष प्रिय हैं, जैसे गुडहल (Japakusum) या लाल कनेर। पलाश के फूल भी तांत्रिक प्रयोगों में प्रयुक्त होते हैं।