Sri Chinnamasta Ashtottara Shatanamavali – श्री छिन्नमस्ता अष्टोत्तरशतनामावली

॥ श्री छिन्नमस्ता अष्टोत्तरशतनामावली ॥
॥ नामावली ॥
ॐ छिन्नमस्तायै नमः ।
ॐ महाविद्यायै नमः ।
ॐ महाभीमायै नमः ।
ॐ महोदर्यै नमः ।
ॐ चण्डेश्वर्यै नमः ।
ॐ चण्डमात्रे नमः ।
ॐ चण्डमुण्डप्रभञ्जिन्यै नमः ।
ॐ महाचण्डायै नमः ।
ॐ चण्डरूपायै नमः ।
ॐ चण्डिकायै नमः ।
ॐ चण्डखण्डिन्यै नमः ।
ॐ क्रोधिन्यै नमः ।
ॐ क्रोधजनन्यै नमः ।
ॐ क्रोधरूपायै नमः ।
ॐ कुह्वे नमः ।
ॐ कलायै नमः ।
ॐ कोपातुरायै नमः ।
ॐ कोपयुतायै नमः ।
ॐ कोपसंहारकारिण्यै नमः ।
ॐ वज्रवैरोचन्यै नमः ।
ॐ वज्रायै नमः ।
ॐ वज्रकल्पायै नमः ।
ॐ डाकिन्यै नमः ।
ॐ डाकिनीकर्मनिरतायै नमः ।
ॐ डाकिनीकर्मपूजितायै नमः ।
ॐ डाकिनीसङ्गनिरतायै नमः ।
ॐ डाकिनीप्रेमपूरितायै नमः ।
ॐ खट्वाङ्गधारिण्यै नमः ।
ॐ खर्वायै नमः ।
ॐ खड्गखर्परधारिण्यै नमः ।
ॐ प्रेतासनायै नमः ।
ॐ प्रेतयुतायै नमः ।
ॐ प्रेतसङ्गविहारिण्यै नमः ।
ॐ छिन्नमुण्डधरायै नमः ।
ॐ छिन्नचण्डविद्यायै नमः ।
ॐ चित्रिण्यै नमः ।
ॐ घोररूपायै नमः ।
ॐ घोरदृष्ट्यै नमः ।
ॐ घोररावायै नमः ।
ॐ घनोदर्यै नमः ।
ॐ योगिन्यै नमः ।
ॐ योगनिरतायै नमः ।
ॐ जपयज्ञपरायणायै नमः ।
ॐ योनिचक्रमय्यै नमः ।
ॐ योनये नमः ।
ॐ योनिचक्रप्रवर्तिन्यै नमः ।
ॐ योनिमुद्रायै नमः ।
ॐ योनिगम्यायै नमः ।
ॐ योनियन्त्रनिवासिन्यै नमः ।
ॐ यन्त्ररूपायै नमः ।
ॐ यन्त्रमय्यै नमः ।
ॐ यन्त्रेश्यै नमः ।
ॐ यन्त्रपूजितायै नमः ।
ॐ कीर्त्यायै नमः ।
ॐ कपर्दिन्यै नमः ।
ॐ काल्यै नमः ।
ॐ कङ्काल्यै नमः ।
ॐ कलकारिण्यै नमः ।
ॐ आरक्तायै नमः ।
ॐ रक्तनयनायै नमः ।
ॐ रक्तपानपरायणायै नमः ।
ॐ भवान्यै नमः ।
ॐ भूतिदायै नमः ।
ॐ भूत्यै नमः ।
ॐ भूतिदात्र्यै नमः ।
ॐ भैरव्यै नमः ।
ॐ भैरवाचारनिरतायै नमः ।
ॐ भूतभैरवसेवितायै नमः ।
ॐ भीमायै नमः ।
ॐ भीमेश्वर्यै नमः ।
ॐ देव्यै नमः ।
ॐ भीमनादपरायणायै नमः ।
ॐ भवाराध्यायै नमः ।
ॐ भवनुतायै नमः ।
ॐ भवसागरतारिण्यै नमः ।
ॐ भद्रकाल्यै नमः ।
ॐ भद्रतनवे नमः ।
ॐ भद्ररूपायै नमः ।
ॐ भद्रिकायै नमः ।
ॐ भद्ररूपायै नमः ।
ॐ महाभद्रायै नमः ।
ॐ सुभद्रायै नमः ।
ॐ भद्रपालिन्यै नमः ।
ॐ सुभव्यायै नमः ।
ॐ भव्यवदनायै नमः ।
ॐ सुमुख्यै नमः ।
ॐ सिद्धसेवितायै नमः ।
ॐ सिद्धिदायै नमः ।
ॐ सिद्धिनिवहायै नमः ।
ॐ सिद्धायै नमः ।
ॐ सिद्धनिषेवितायै नमः ।
ॐ शुभदायै नमः ।
ॐ शुभगायै नमः ।
ॐ शुद्धायै नमः ।
ॐ शुद्धसत्त्वायै नमः ।
ॐ शुभावहायै नमः ।
ॐ श्रेष्ठायै नमः ।
ॐ दृष्टिमयीदेव्यै नमः ।
ॐ दृष्टिसंहारकारिण्यै नमः ।
ॐ शर्वाण्यै नमः ।
ॐ सर्वगायै नमः ।
ॐ सर्वायै नमः ।
ॐ सर्वमङ्गलकारिण्यै नमः ।
ॐ शिवायै नमः ।
ॐ शान्तायै नमः ।
ॐ शान्तिरूपायै नमः ।
ॐ मृडान्यै नमः ।
ॐ मदनातुरायै नमः ।
॥ इति श्री छिन्नमस्ता अष्टोत्तरशतनामावली सम्पूर्णम् ॥
श्री छिन्नमस्ता अष्टोत्तरशतनामावली — गहन आध्यात्मिक परिचय (Introduction)
श्री छिन्नमस्ता अष्टोत्तरशतनामावली (Sri Chinnamasta Ashtottara Shatanamavali) सनातन धर्म के तांत्रिक वांग्मय का एक अत्यंत गोपनीय और शक्तिशाली पाठ है। माँ छिन्नमस्ता, जिन्हें "प्रचण्ड चण्डिका" और "वज्रवैरोचनी" के नाम से भी जाना जाता है, दस महाविद्याओं में छठी महाविद्या हैं। इनका स्वरूप जितना भयंकर है, उतना ही गहरा इनका दार्शनिक अर्थ है। नामावली के ये १०८ नाम देवी के उन अनंत आयामों को प्रकट करते हैं, जो सृष्टि के सृजन, संहार और विशेष रूप से "स्व-बलिदान" (अहंकार के नाश) का प्रतीक हैं।
माँ छिन्नमस्ता का प्रादुर्भाव कथाओं के अनुसार, एक बार माँ भवानी अपनी सखियों 'जया' और 'विजया' (डाकिनी और वर्णिनी) के साथ मन्दाकिनी नदी में स्नान करने गईं। स्नान के पश्चात सखियों को तीव्र भूख लगी, उनकी व्याकुलता देख माँ ने स्वयं अपना शीश काट दिया। उनके धड़ से रक्त की तीन धाराएं निकलीं—दो धाराओं से उन्होंने अपनी सखियों की क्षुधा शांत की और तीसरी धारा का पान स्वयं अपने कटे हुए शीश द्वारा किया। यह दृश्य "अहंकार के छेदन" और "स्वयं को ब्रह्मांडीय शक्ति में विसर्जित" करने का सर्वोच्च प्रतीक है। नामावली के नाम जैसे "छिन्नमुण्डधरायै" और "डाकिनीप्रेमपूरितायै" इसी परम सत्य की ओर संकेत करते हैं।
दार्शनिक रूप से, माँ छिन्नमस्ता "कुण्डलिनी शक्ति" की जाग्रत अवस्था का प्रतिनिधित्व करती हैं। उनके धड़ से निकलने वाली तीन रक्त धाराएं शरीर की तीन मुख्य नाड़ियों—इड़ा, पिंगला और सुषुम्णा का प्रतीक हैं। जब साधक इन १०८ नामों का अर्चन करता है, तो वह अपनी आंतरिक चेतना को 'मूलाधार' से ऊपर उठाकर 'सहस्रार' की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करता है। नामावली में प्रयुक्त "वज्रवैरोचन्यै" नाम यह स्पष्ट करता है कि वे वज्र के समान अमोघ और सूर्य (वैरोचन) के समान देदीप्यमान हैं। ये १०८ नाम वास्तव में १०८ मंत्र हैं जो साधक के सूक्ष्म शरीर के अवरोधों को नष्ट करते हैं।
वर्तमान कलयुग के इस अशांत समय में, जहाँ मनुष्य मानसिक क्लेश, शत्रु बाधा और आंतरिक द्वंद्व से जूझ रहा है, माँ छिन्नमस्ता की नामावली का पाठ एक "अभेद तांत्रिक कवच" की तरह कार्य करता है। जब हम प्रत्येक नाम के आरंभ में ॐ और अंत में "नमः" जोड़ते हैं, तो उत्पन्न होने वाली ध्वनि तरंगें वातावरण की नकारात्मकता को जला देती हैं। यह पाठ न केवल शत्रुओं पर विजय दिलाता है, बल्कि जातक को वह "प्रज्ञा" प्रदान करता है जिससे वह जन्म-मृत्यु के चक्र को समझ सके। माँ का विग्रह कामदेव और रति के ऊपर स्थित है, जो इस बात का संकेत है कि वे काम वासनाओं पर पूर्ण नियंत्रण रखने वाली योग-शक्ति हैं। यह नामावली वास्तव में अध्यात्म के उस शिखर की स्तुति है, जहाँ साधक स्वयं को ईश्वर में विलीन कर देता है।
विशिष्ट तांत्रिक महत्व एवं रहस्य (Significance)
छिन्नमस्ता नामावली का महत्व इसलिए सर्वोपरि है क्योंकि यह "अर्चन" (पुष्प चढ़ाना) के लिए प्रयुक्त होती है। तंत्र शास्त्र में माना गया है कि केवल स्तोत्र पढ़ने से ज्ञान मिलता है, पर नामावली से अर्चन करने से "शक्ति" प्राप्त होती है। इसमें देवी को "यन्त्ररूपायै" और "योनिचक्रमय्यै" कहा गया है, जो उन्हें समस्त यंत्रों और मंत्रों का केंद्र सिद्ध करता है।
विशेष रूप से उन साधकों के लिए जो कुण्डलिनी जागरण का अभ्यास कर रहे हैं, यह नामावली मार्गदर्शक के रूप में कार्य करती है। यह पाठ जातक के भीतर की "अग्नि" (वैश्वानर) को जाग्रत करता है, जिससे रोगों और दरिद्रता का नाश होता है। यह नामावली शत्रुओं के "स्तम्भन" और "उच्चाटन" की शक्ति को सात्विक रूप से नियंत्रित करने में सक्षम है।
फलश्रुति: नामावली पाठ के अभूतपूर्व लाभ (Benefits)
विद्वानों और तांत्रिक ग्रंथों के अनुसार, श्री छिन्नमस्ता नामावली के नित्य पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
- शत्रु और ऋण मुक्ति: "चण्डमुण्डप्रभञ्जिन्यै" — माँ की कृपा से जातक के दृश्य और अदृश्य शत्रुओं का विनाश होता है और वह कर्ज के बोझ से मुक्त होता है।
- वाक्-सिद्धि और मेधा: इस नामावली का जप करने से साधक की वाणी प्रभावशाली होती है और उसकी तार्किक क्षमता (Intellect) कई गुना बढ़ जाती है।
- कुण्डलिनी शक्ति का जागरण: जो साधक योग मार्ग पर हैं, उन्हें सुषुम्णा नाड़ी के भेदन में माँ छिन्नमस्ता के नामों से असीम सहायता मिलती है।
- अकाल मृत्यु से रक्षा: "मृत्युनाशनाय नमः" — माँ छिन्नमस्ता काल को भी वश में करने वाली हैं, अतः इनका पाठ साधक को सुरक्षा प्रदान करता है।
- मनोकामनाओं की सिद्धि: देवी "सिद्धिदायै" हैं, उनके नामों का अर्चन करने से समस्त धर्मसंगत इच्छाएं शीघ्र पूर्ण होती हैं।
पाठ विधि एवं अर्चना विधान (Ritual Method)
माँ छिन्नमस्ता की साधना उग्र मानी जाती है, अतः इसे पूर्ण शुद्धि और शांत चित्त से करना चाहिए:
साधना के नियम:
- समय: प्रातःकाल 'ब्रह्म मुहूर्त' या मध्य रात्रि (निशीथ काल) पाठ के लिए सर्वोत्तम है। मंगलवार और अमावस्या विशेष शुभ तिथियां हैं।
- शुद्धि: स्नान के पश्चात नीले (Blue) या लाल वस्त्र धारण करना माँ को प्रिय है। मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखें।
- अर्चन सामग्री: १०८ नामों के साथ लाल पुष्प (जवाकुसुम/गुड़हल श्रेष्ठ है), अक्षत या 'अबीर' (Abir) माँ के चरणों में अर्पित करें।
- हवन विधि: यदि हवन कर रहे हैं, तो प्रत्येक नाम के अंत में 'नमः' के स्थान पर 'स्वाहा' (जैसे — ॐ महाविद्यायै स्वाहा) कहकर घी या काले तिल की आहुति दें।
- नैवेद्य: माँ को शहद, पंचामृत या लाल फलों का भोग लगाएँ।
विशेष प्रयोग:
- संकट निवारण के लिए: लगातार २१ दिनों तक नित्य १०८ नामों के साथ सिंदूर अर्चन करने से जीवन की कठिन बाधाएं दूर होती हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. छिन्नमस्ता नामावली और स्तोत्र में क्या अंतर है?
स्तोत्र छंदबद्ध स्तुति है जिसे निरंतर पढ़ा जाता है, जबकि नामावली में नाम अलग-अलग मंत्र रूप में होते हैं जिनका उपयोग मुख्य रूप से 'अर्चन' (पुष्प चढ़ाने) के लिए किया जाता है।
2. 'वज्रवैरोचनी' नाम का क्या अर्थ है?
वज्र का अर्थ है अविनाशी शक्ति और वैरोचन का अर्थ है सूर्य जैसा प्रकाश। यह नाम माँ की उस असीम ऊर्जा को दर्शाता है जो अंधकार का नाश करती है।
3. क्या इस नामावली का पाठ बिना गुरु दीक्षा के किया जा सकता है?
सामान्य भक्ति भाव से अर्चन के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं है, परन्तु तांत्रिक प्रयोगों या कुण्डलिनी साधना के लिए गुरु मार्गदर्शन आवश्यक है।
4. माँ छिन्नमस्ता को कौन सा फूल चढ़ाना सबसे अच्छा है?
माँ को लाल रंग के पुष्प अत्यंत प्रिय हैं। जवाकुसुम (गुड़हल), लाल कनेर या पलाश के पुष्पों से अर्चन करना श्रेष्ठ फलदायी होता है।
5. क्या १०८ नामों के जप से शत्रु बाधा शांत होती है?
जी हाँ, माँ छिन्नमस्ता शत्रुओं के दर्प को चूर करने वाली देवी हैं। उनके नाम जप से विरोधियों का प्रभाव समाप्त होता है।
6. 'छिन्नमुण्डधरा' स्वरूप का आध्यात्मिक संदेश क्या है?
यह स्वरूप संदेश देता है कि मोक्ष की प्राप्ति के लिए साधक को अपने सूक्ष्म शरीर के अहंकार (सिर) का त्याग करना अनिवार्य है।
7. क्या इस पाठ को रात में करना अनिवार्य है?
अनिवार्य नहीं है, परन्तु महाविद्या साधना में रात्रि (निशीथ काल) का महत्व अधिक होता है। सामान्य भक्त इसे सुबह या शाम की पूजा में कर सकते हैं।
8. पाठ के दौरान ॐ और नमः का क्या महत्व है?
ॐ ब्रह्मांड की मूल ध्वनि है जो मंत्र को शक्ति देती है, और नमः पूर्ण शरणागति का प्रतीक है, जिससे अहंकार विसर्जित होता है।
9. क्या स्त्रियाँ माँ छिन्नमस्ता की नामावली पढ़ सकती हैं?
हाँ, भगवती जगत की जननी हैं। स्त्रियाँ भी पूर्ण पवित्रता और श्रद्धा के साथ माँ के नामों का जप और अर्चन कर सकती हैं।
10. क्या इस नामावली से हवन किया जा सकता है?
निश्चित रूप से। प्रत्येक नाम के अंत में 'स्वाहा' जोड़कर घी, काले तिल या हवन सामग्री से आहुति देने पर विशेष फल प्राप्त होता है।