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Sri Bhuvaneshwari Panjara Stotram (Digbandhan) – श्री भुवनेश्वरी पञ्जर स्तोत्रम्

Sri Bhuvaneshwari Panjara Stotram: The Ultimate Protective Cage

Sri Bhuvaneshwari Panjara Stotram (Digbandhan) – श्री भुवनेश्वरी पञ्जर स्तोत्रम्
॥ श्री भुवनेश्वरी पञ्जर स्तोत्रम् ॥ इदं श्री भुवनेश्वर्याः पञ्जरं भुवि दुर्लभम् । येन संरक्षितो मर्त्यो बाणैः शस्त्रैर्न बाध्यते ॥ १ ॥ ज्वर मारी पशु व्याघ्र कृत्या चौराद्युपद्रवैः । नद्यम्बु धरणी विद्युत्कृशानुभुजगारिभिः । सौभाग्यारोग्य सम्पत्ति कीर्ति कान्ति यशोऽर्थदम् ॥ २ ॥ ॥ पूर्व दिशा (East) ॥ ओं क्रों श्रीं ह्रीं ऐं सौः पूर्वेऽधिष्ठाय मां पाहि चक्रिणि भुवनेश्वरि । योगविद्ये महामाये योगिनीगणसेविते । कृष्णवर्णे महद्भूते बृहत्कर्णे भयङ्करि । देवि देवि महादेवि मम शत्रून् विनाशय । उत्तिष्ठ पुरुषे किं स्वपिषि भयं मे समुपस्थितम् । यदि शक्यमशक्यं तन्मे भगवति शमय स्वाहा । त्रैलोक्यमोहिन्यै विद्महे विश्वजनन्यै धीमहि तन्नः शक्तिः प्रचोदयात् ॥ १ ॥ ॥ आग्नेय दिशा (South-East) ॥ ओं क्रों श्रीं ह्रीं ऐं सौः ममाग्नेयां स्थिता पाहि गदिनी भुवनेश्वरि । योगविद्ये महामाये योगिनीगणसेविते । कृष्णवर्णे महद्भूते बृहत्कर्णे भयङ्करि । देवि देवि महादेवि मम शत्रुन् विनाशय । उत्तिष्ठ पुरुषे किं स्वपिषि भयं मे समुपस्थितम् । यदि शक्यमशक्यं तन्मे भगवति शमय स्वाहा । त्रैलोक्यमोहिन्यै विद्महे विश्वजनन्यै धीमहि तन्नः शक्तिः प्रचोदयात् ॥ २ ॥ ॥ दक्षिण दिशा (South) ॥ ओं क्रों श्रीं ह्रीं ऐं सौः याम्येऽधिष्ठाय मां पाहि शङ्खिनी भुवनेश्वरि । योगविद्ये महामाये योगिनीगणसेविते । कृष्णवर्णे महद्भूते बृहत्कर्णे भयङ्करि । देव देवि महादेवि मम शत्रुन् विनाशय । उत्तिष्ठ पुरुषे किं स्वपिषि भयं मे समुपस्थितम् । यदि शक्यमशक्यं तन्मे भगवति शमय स्वाहा । त्रैलोक्यमोहिन्यै विद्महे विश्वजनन्यै धीमहि तन्नः शक्तिः प्रचोदयात् ॥ ३ ॥ ॥ नैऋत्य दिशा (South-West) ॥ ओं क्रों श्रीं ह्रीं ऐं सौः नैरृत्ये मां स्थिता पाहि खड्गिनी भुवनेश्वरि । योगविद्ये महामाये योगिनीगणसेविते । कृष्णवर्णे महद्भूते बृहत्कर्णे भयङ्करि । देवि देवि महादेवि मम शत्रुन् विनाशय । उत्तिष्ठ पुरुषे किं स्वपिषि भयं मे समुपस्थितम् । यदि शक्यमशक्यं तन्मे भगवति शमय स्वाहा । त्रैलोक्यमोहिन्यै विद्महे विश्वजनन्यै धीमहि तन्नः शक्तिः प्रचोदयात् ॥ ४ ॥ ॥ पश्चिम दिशा (West) ॥ ओं क्रों श्रीं ह्रीं ऐं सौः पश्चिमे मां स्थिता पाहि पाशिनी भुवनेश्वरि । योगविद्ये महामाये योगिनीगणसेविते । कृष्णवर्णे महद्भूते बृहत्कर्णे भयङ्करि । देवि देवि महादेवि मम शत्रुन् विनाशय । उत्तिष्ठ पुरुषे किं स्वपिषि भयं मे समुपस्थितम् । यदि शक्यमशक्यं तन्मे भगवति शमय स्वाहा । त्रैलोक्यमोहिन्यै विद्महे विश्वजनन्यै धीमहि तन्नः शक्तिः प्रचोदयात् ॥ ५ ॥ ॥ वायव्य दिशा (North-West) ॥ ओं क्रों श्रीं ह्रीं ऐं सौः वायव्ये मां स्थिता पाहि सक्थिनी भुवनेश्वरि । योगविद्ये महामाये योगिनीगणसेविते । कृष्णवर्णे महद्भूते बृहत्कर्णे भयङ्करि । देवि देवि महादेवि मम शत्रुन् विनाशय । उत्तिष्ठ पुरुषे किं स्वपिषि भयं मे समुपस्थितम् । यदि शक्यमशक्यं तन्मे भगवति शमय स्वाहा । त्रैलोक्यमोहिन्यै विद्महे विश्वजनन्यै धीमहि तन्नः शक्तिः प्रचोदयात् ॥ ६ ॥ ॥ उत्तर दिशा (North) ॥ ओं क्रों श्रीं ह्रीं ऐं सौः सौम्येऽधिष्ठाय मां पाहि चापिनी भुवनेश्वरि । योगविद्ये महामाये योगिनीगणसेविते । कृष्णवर्णे महद्भूते बृहत्कर्णे भयङ्करि । देवि देवि महादेवि मम शत्रुन् विनाशय । उत्तिष्ठ पुरुषे किं स्वपिषि भयं मे समुपस्थितम् । यदि शक्यमशक्यं तन्मे भगवति शमय स्वाहा । त्रैलोक्यमोहिन्यै विद्महे विश्वजनन्यै धीमहि तन्नः शक्तिः प्रचोदयात् ॥ ७ ॥ ॥ ईशान दिशा (North-East) ॥ ओं क्रों श्रीं ह्रीं ऐं सौः ईशेऽधिष्ठाय मां पाहि शूलिनी भुवनेश्वरि । योगविद्ये महामाये योगिनीगणसेविते । कृष्णवर्णे महद्भूते बृहत्कर्णे भयङ्करि । देवि देवि महादेवि मम शत्रुन् विनाशय । उत्तिष्ठ पुरुषे किं स्वपिषि भयं मे समुपस्थितम् । यदि शक्यमशक्यं तन्मे भगवति शमय स्वाहा । त्रैलोक्यमोहिन्यै विद्महे विश्वजनन्यै धीमहि तन्नः शक्तिः प्रचोदयात् ॥ ८ ॥ ॥ ऊर्ध्व दिशा (Upwards) ॥ ओं क्रों श्रीं ह्रीं ऐं सौः ऊर्ध्वेऽधिष्ठाय मां पाहि पद्मिनी भुवनेश्वरि । योगविद्ये महामाये योगिनीगणसेविते । कृष्णवर्णे महद्भूते बृहत्कर्णे भयङ्करि । देवि देवि महादेवि मम शत्रुन् विनाशय । उत्तिष्ठ पुरुषे किं स्वपिषि भयं मे समुपस्थितम् । यदि शक्यमशक्यं तन्मे भगवति शमय स्वाहा । त्रैलोक्यमोहिन्यै विद्महे विश्वजनन्यै धीमहि तन्नः शक्तिः प्रचोदयात् ॥ ९ ॥ ॥ अधो दिशा (Downwards) ॥ ओं क्रों श्रीं ह्रीं ऐं सौः अधस्तान्मां स्थिता पाहि वाणिनी भुवनेश्वरि । योगविद्ये महामाये योगिनीगणसेविते । कृष्णवर्णे महद्भूते बृहत्कर्णे भयङ्करि । देवि देवि महादेवि मम शत्रुन् विनाशय । उत्तिष्ठ पुरुषे किं स्वपिषि भयं मे समुपस्थितम् । यदि शक्यमशक्यं तन्मे भगवति शमय स्वाहा । त्रैलोक्यमोहिन्यै विद्महे विश्वजनन्यै धीमहि तन्नः शक्तिः प्रचोदयात् ॥ १० ॥ ॥ अग्र भाग (Front) ॥ ओं क्रों श्रीं ह्रीं ऐं सौः अग्रतो मां सदा पाहि साङ्कुशे भुवनेश्वरि । योगविद्ये महामाये योगिनीगणसेविते । कृष्णवर्णे महद्भूते बृहत्कर्णे भयङ्करि । देवि देवि महादेवि मम शत्रुन् विनाशय । उत्तिष्ठ पुरुषे किं स्वपिषि भयं मे समुपस्थितम् । यदि शक्यमशक्यं तन्मे भगवति शमय स्वाहा । त्रैलोक्यमोहिन्यै विद्महे विश्वजनन्यै धीमहि तन्नः शक्तिः प्रचोदयात् ॥ ११ ॥ ॥ पृष्ठ भाग (Back) ॥ ओं क्रों श्रीं ह्रीं ऐं सौः पृष्ठतो मां स्थिता पाहि वरदे भुवनेश्वरि । योगविद्ये महामाये योगिनीगणसेविते । कृष्णवर्णे महद्भूते बृहत्कर्णे भयङ्करि । देवि देवि महादेवि मम शत्रुन् विनाशय । उत्तिष्ठ पुरुषे किं स्वपिषि भयं मे समुपस्थितम् । यदि शक्यमशक्यं तन्मे भगवति शमय स्वाहा । त्रैलोक्यमोहिन्यै विद्महे विश्वजनन्यै धीमहि तन्नः शक्तिः प्रचोदयात् ॥ १२ ॥ ॥ सर्व दिशा (All Directions) ॥ सर्वतो मां सदा पाहि सायुधे भुवनेश्वरि । योगविद्ये महामाये योगिनीगणसेविते । कृष्णवर्णे महद्भूते बृहत्कर्णे भयङ्करि । देवि देवि महादेवि मम शत्रुन् विनाशय । उत्तिष्ठ पुरुषे किं स्वपिषि भयं मे समुपस्थितम् । यदि शक्यमशक्यं तन्मे भगवति शमय स्वाहा । त्रैलोक्यमोहिन्यै विद्महे विश्वजनन्यै धीमहि तन्नः शक्तिः प्रचोदयात् ॥ १३ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ प्रोक्ता दिङ्मनवो देवि चतुर्दश शुभप्रदाः । एतत् पञ्जरमाख्यातं सर्वरक्षाकरं नृणाम् ॥ १ गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति । न भक्ताय प्रदातव्यं नाशिष्याय कदाचन ॥ २ सिद्धिकामो महादेवि गोपयेन्मातृजारवत् । भयकाले होमकाले पूजाकाले विशेषतः ॥ ३ दीपस्यारम्भकाले वै यः कुर्यात् पञ्जरं सुधीः । सर्वान् कामानवाप्नोति प्रत्यूहैर्नाभिभूयते ॥ ४ रणे राजकुले द्यूते सर्वत्र विजयी भवेत् । कृत्या रोगपिशाचाद्यैर्न कदाचित् प्रबाध्यते ॥ ५ प्रातःकाले च मध्याह्ने सन्ध्यायामर्धरात्रके । यः कुर्यात् पञ्जरं मर्त्यो देवीं ध्यात्वा समाहितः ॥ ६ कालमृत्युमपि प्राप्तं जयेदत्र न संशयः । ब्रह्मास्त्रादीनि शस्त्राणि तद्गात्रं न लगन्ति च । पुत्रवान् धनवान्लोके यशस्वी जायते नरः ॥ ७ इति श्रीभुवनेश्वरी पञ्जरस्तोत्रम् सम्पूर्णम् ।

श्री भुवनेश्वरी पञ्जर स्तोत्रम् - परिचय (Introduction)

श्री भुवनेश्वरी पञ्जर स्तोत्रम् (Sri Bhuvaneshwari Panjara Stotram) तंत्र शास्त्र का एक परम गोपनीय विधान है। 'पञ्जर' का अर्थ है 'पिंजरा' या एक ऐसा आवरण जिसे भेदा न जा सके। जिस प्रकार एक पिंजरा किसी पक्षी को बाहरी खतरों से सुरक्षित रखता है, उसी प्रकार यह स्तोत्र साधक की चेतना को देवी के सुरक्षा घेरे में सुरक्षित कर देता है।

यह केवल पाठ नहीं है, बल्कि एक दिग्बन्धन (Directional Binding) प्रक्रिया है। इसमें साधक 'पूर्वे' (पूर्व), 'आग्नेयां' (दक्षिण-पूर्व), 'याम्ये' (दक्षिण) आदि सभी दस दिशाओं और 'अग्रतः' (आगे), 'पृष्ठतः' (पीछे) से देवी की शक्तियों का आवाहन करता है।

विशिष्ट महत्व (Significance)

महाविद्या दिग्बन्धन: सामान्य रक्षा मंत्रों के विपरीत, यह 'दश महाविद्या' के उच्च स्तर की सुरक्षा प्रदान करता है। इसमें देवी भुवनेश्वरी अपने विराट रूप में प्रकट होकर दसों दिशाओं की स्वामिनी बनती हैं।

देवी के आयुध: प्रत्येक दिशा में देवी एक विशिष्ट आयुध के साथ उपस्थित होती हैं - जैसे पूर्व में 'चक्रिणि' (चक्र), दक्षिण-पूर्व में 'गदिनी' (गदा), पश्चिम में 'पाशिनी' (पाश)। यह दर्शाता है कि हर दिशा के खतरे के लिए उनके पास एक विशेष अस्त्र है।

गायत्री का प्रयोग: प्रत्येक श्लोक के अंत में "त्रैलोक्यमोहिन्यै विद्महे..." (भुवनेश्वरी गायत्री) का सम्पुटित प्रयोग इसे अत्यंत जाग्रत और प्रभावशाली बनाता है।

पाठ के लाभ (Benefits)

  • अभेद्य सुरक्षा (Absolute Protection): श्लोक ७ (फलश्रुति) में कहा गया है कि "ब्रह्मास्त्रादीनि शस्त्राणि तद्गात्रं न लगन्ति च" - अर्थात, ब्रह्मास्त्र जैसे महाविनाशक अस्त्र भी साधक के शरीर को नहीं छू सकते।

  • तंत्र बाधा निवारण: "कृत्या रोगपिशाचाद्यैर्न..." - काला जादू, कृत्या (मारण प्रयोग), और पिशाच बाधाएं इसके पाठ मात्र से नष्ट हो जाती हैं।

  • शत्रु विजय: यदि कोई "रणे राजकुले द्यूते" (युद्ध, राजदरबार या वाद-विवाद) में फंसा हो, तो यह पञ्जर उसे निश्चित विजय दिलाता है।

  • अकाल मृत्यु से रक्षा: यह स्तोत्र "कालमृत्युमपि प्राप्तं" (मृत्यु के मुख में गए हुए) व्यक्ति को भी जीवनदान देने की क्षमता रखता है।

पाठ विधि (Ritual Method)

  • मानसिक दिग्बन्धन: पाठ करते समय जैसे ही आप किसी दिशा का नाम लें (जैसे 'पूर्वे'), मन में कल्पना करें कि आपके पूर्व में देवी भुवनेश्वरी चक्र लेकर खड़ी हैं और एक लाल रंग की दीवार बन गई है।

  • समय: "दीपस्यारम्भकाले" (संध्या समय दीपक जलाते वक़्त) या "अर्धरात्रके" (मध्यरात्रि) इस पाठ के लिए सबसे शक्तिशाली समय हैं।

  • आसन: लाल ऊनी आसन या काले मृगचर्म का आसन प्रयोग करें।

  • गोपनीयता: इसे अत्यंत गुप्त रखने का निर्देश है ("गोपनीयं प्रयत्नेन")। इसका अनावश्यक प्रदर्शन न करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'पञ्जर' (Panjara) का क्या अर्थ है?

'पञ्जर' का शाब्दिक अर्थ है 'पिंजरा' (Cage)। तंत्र में, यह एक ऊर्जावान सुरक्षा कवच को दर्शाता है जो साधक को चारों ओर से घेर लेता है, जिससे कोई भी नकारात्मक शक्ति भीतर प्रवेश नहीं कर सकती।

2. कवच और पञ्जर स्तोत्र में क्या अंतर है?

कवच मुख्य रूप से शरीर के अंगों (सिर, नेत्र, हृदय आदि) की रक्षा करता है, जबकि पञ्जर स्तोत्र 'दिशाओं' (पूर्व, पश्चिम, उत्तर आदि) को बांधता है (दिग्बन्धन), जिससे बाहरी आक्रमण रुका रहता है।

3. इस स्तोत्र का मुख्य लाभ क्या है?

श्लोक १ के अनुसार, 'येन संरक्षितो मर्त्यो बाणैः शस्त्रैर्न बाध्यते' - अर्थात, इसके द्वारा सुरक्षित व्यक्ति को बाण या शस्त्र भी चोट नहीं पहुँचा सकते। यह 'सर्व रक्षा' (Absolute Protection) प्रदान करता है।

4. क्या यह काला जादू (Black Magic) काट सकता है?

हाँ। श्लोक २ में स्पष्ट लिखा है- 'कृत्या चौराद्युपद्रवैः'। 'कृत्या' वह तांत्रिक शक्ति है जो किसी को मारने के लिए भेजी जाती है। यह स्तोत्र कृत्या को वापस लौटा देता है।

5. श्लोकों में 'चक्रिणि', 'गदिनी' आदि नाम क्यों हैं?

ये देवी की विभिन्न शक्तियां हैं जो अलग-अलग आयुध (चक्र, गदा, शंख) धारण कर दिशाओं की रक्षा करती हैं। जैसे पूर्व दिशा में 'चक्रिणि' (चक्र धारण करने वाली) रक्षा करती हैं।

6. हर श्लोक के अंत में 'त्रैलोक्यमोहिन्यै...' मंत्र क्यों है?

यह भुवनेश्वरी गायत्री मंत्र है। हर दिशा के बंधन (Locking) के बाद गायत्री मंत्र का उच्चारण उस सुरक्षा दीवार को 'सिद्धि' और 'प्राण' प्रदान करता है।

7. पाठ का सबसे उपयुक्त समय क्या है?

फलश्रुति श्लोक ४ और ६ के अनुसार- 'दीपस्यारम्भकाले' (जब दीपक जलाया जाए, यानी संध्याकाल) और 'अर्धरात्रके' (मध्यरात्रि) में इसका पाठ सर्वश्रेष्ठ फल देता है।

8. क्या स्त्रियाँ और गृहस्थ इसका पाठ कर सकते हैं?

हाँ, यह एक रक्षा स्तोत्र है और इसे कोई भी कर सकता है। विशेष रूप से भय के समय (भयकाले) इसका पाठ तुरंत राहत देता है।

9. इसमें 'अग्रतः' और 'पृष्ठतः' का क्या महत्व है?

श्लोक ११ और १२ में 'अग्रतः' (आगे) और 'पृष्ठतः' (पीछे) की रक्षा मांगी गई है। यह सुनिश्चित करता है कि अनदेखा शत्रु भी पीछे से वार न कर सके।

10. 'स्वयोनिरिव पार्वति' का क्या अर्थ है?

फलश्रुति श्लोक २ में शिव जी कहते हैं कि इस विद्या को 'अपनी योनि की तरह गुप्त रखें'। इसका अर्थ है कि इसे अयोग्य, निन्दक या श्रद्धाहीन व्यक्ति को नहीं देना चाहिए।