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Sri Dhumavathi Stotram – श्री धूमावती स्तोत्रम्

Sri Dhumavathi Stotram – श्री धूमावती स्तोत्रम्
॥ श्री धूमावती स्तोत्रम् ॥ प्रातर्या स्यात्कुमारी कुसुमकलिकया जापमालां जपन्ती मध्याह्ने प्रौढरूपा विकसितवदना चारुनेत्रा निशायां । सन्ध्यायां वृद्धरूपा गलितकुचयुगा मुण्डमालां वहन्ती सा देवी देवदेवी त्रिभुवनजननी कालिका पातु युष्मान् ॥ १ ॥ बध्वा खट्वाङ्गखेटौ कपिलवरजटामण्डलं पद्मयोनेः कृत्वा दैत्योत्तमाङ्गैः स्रजमुरसि शिरश्शेखरं तार्क्ष्यपक्षैः । पूर्णं रक्तैः सुराणां यममहिषमहाशृङ्गमादाय पाणौ पायाद्वो वन्द्यमान प्रलय मुदितया भैरवः कालरात्र्याम् ॥ २ ॥ चर्वन्तीमस्तिखण्डं प्रकटकटकटा शब्दसङ्घात मुग्रं कुर्वाणा प्रेतमध्ये कहह कहकहा हास्यमुग्रं कृशाङ्गी । नित्यं नित्यप्रसक्ता डमरुडमडिमान् स्फारयन्ती मुखाब्जं पायान्नश्चण्डिकेयं झझमझमझमा जल्पमाना भ्रमन्ती ॥ ३ ॥ टण्टण्टण्टण्टटण्टाप्रकर टमटमानादघण्टा वहन्ती स्फेंस्फेंस्फेंस्फार काराटकटकितहसा नादसङ्घट्टभीमा । लोला मुण्डाग्रमाला लल हलहलहा लोललोलाग्र वाचं चर्वन्ती चण्डमुण्डं मटमटमटिते चर्वयन्तीपुनातु ॥ ४ ॥ वामेकर्णे मृगाङ्कप्रलयपरिगतं दक्षिणे सूर्यबिम्बं कण्ठेनक्षत्रहारं वरविकटजटाजूटकेमुण्डमालां । स्कन्धे कृत्वोरगेन्द्र ध्वजनिकरयुतं ब्रह्मकङ्कालभारं संहारे धारयन्ती मम हरतु भयं भद्रदा भद्रकाली ॥ ५ ॥ तैलाभ्यक्तैकवेणीत्रपुमयविलसत्कर्णिकाक्रान्तकर्णा लोहेनै केन कृत्वा चरणनलिनका मात्मनः पादशोभां । दिग्वासारासभेन ग्रसति जगदिदं या यवाकर्णपूरा वर्षिण्यातिप्रबद्धा ध्वजविततभुजा भासि देवि त्वमेव ॥ ६ ॥ सङ्ग्रामे हेतिकृत्यैः सरुधिरदशनैर्यद्भटानां शिरोभिः मालामाबद्ध्यमूर्ध्नि ध्वजविततभुजा त्वं श्मशाने प्रविष्टा । दृष्टा भूतप्रभूतैःपृथुतरजघना बद्धनागेन्द्रकाञ्ची शूलाग्रव्यग्रहस्ता मधुरुधिरवसा ताम्रनेत्रा निशायाम् ॥ ७ ॥ दम्ष्ट्रारौद्रे मुखेऽस्मिं स्तव विशति जगद्देवि सर्वं क्षणार्धात् संसारस्यान्तकाले नररुधिरवसासम्प्लवे धूमधूम्रे । कालि कापालिकी सा शवशयनरता योगिनी योगमुद्रा रक्तारूक्षा सभास्था मरणभयहरा त्वं शिवा चण्डघण्टा ॥ ८ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ धूमावत्यष्टकं पुण्यं सर्वापद्विनिवारणं । यःपठेत्साधको भक्त्या सिद्धिं विन्दति वाञ्छिताम् ॥ ९ ॥ महापदि महाघोरे महारोगे महारणे । शत्रूच्चाटे मारणादौ जन्तूनां मोहने तथा ॥ १० ॥ पठेत् स्तोत्रमिदं देवि सर्वतः सिद्धिभाग्भवेत् । देवदानवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः ॥ ११ ॥ सिंहव्याघ्रादिकास्सर्वे स्तोत्रस्मरणमात्रतः । दूराद्दूरातरं यान्ति किम्पुनर्मानुषादयः ॥ १२ ॥ स्तोत्रेणानेन देवेशि किन्न सिद्ध्यति भूतले । सर्वशान्तिर्भवेद्देवि अन्ते निर्वाणतां व्रजेत् ॥ १३ ॥ ॥ इति ऊर्ध्वाम्नाये श्री धूमवतीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ इतर पश्यतु ।

श्री धूमावती स्तोत्रम् - परिचय (Introduction)

श्री धूमावती स्तोत्रम् दश महाविद्याओं की उस शक्ति की आराधना है जो प्रलय के पश्चात शेष रह जाती है। उनका स्वरूप वृद्धा, विधवा, रूखे केश और कौवे के ध्वज वाले रथ पर सवार बताया गया है। यह स्वरूप डरावना लग सकता है, लेकिन यह जीवन की नश्वरता (Impermanence) का परम सत्य है।
वे अतृप्ति और भूख की देवी है, लेकिन जो साधक उनकी शरण में जाता है, उसे वे समस्त सांसारिक बंधनों से मुक्त कर देती हैं। उनका हाथ में सूप (Winnowing Basket) यह दर्शाता है कि वे सार (ब्रह्म) को ग्रहण करती हैं और असार (माया) को उड़ा देती हैं।

विशिष्ट महत्व (Significance)

  • अलक्ष्मी vs धूमावती: लोग अक्सर उन्हें 'अलक्ष्मी' (दरिद्रता) समझकर डरते हैं। अलक्ष्मी केवल दुर्भाग्य लाती हैं, जबकि धूमावती दुर्भाग्य का नाश कर ज्ञान का प्रकाश देती हैं। वे 'ज्येष्ठा' (बड़ी बहन) भी हैं, जिनका सम्मान लक्ष्मी से पहले किया जाता है।
  • सिद्ध विद्या: तंत्र में इन्हें 'अभाव' और 'दुःख' के माध्यम से ईश्वर प्राप्ति का मार्ग बताया गया है। जब मनुष्य सब कुछ खो देता है, तभी वह सत्य की खोज करता है - यही धूमावती का दर्शन है।
  • ऊर्ध्वाम्नाय: यह स्तोत्र 'ऊर्ध्वाम्नाय' (उच्च कोटि के तंत्र) से संबंधित है, जो इसे अत्यंत शीघ्र फलदायी बनाता है।

फलश्रुति - पाठ के लाभ (Benefits)

  • सर्व संकट निवारण: फलश्रुति (श्लोक १०) के अनुसार, यह स्तोत्र 'महापदि महाघोरे' (घोर संकटों) में रक्षा करता है।
  • शत्रु विजय: यदि कोई प्रबल शत्रु या तांत्रिक बाधा परेशान कर रही हो, तो इस पाठ से शत्रु 'दूराद्दूरातरं' (बहुत दूर) भाग जाते हैं।
  • रोग मुक्ति: 'महारोगे' - असाध्य रोगों में भी यह कवच के समान कार्य करता है।
  • मोक्ष प्राप्ति: अंततः यह साधक को 'निर्वाण' (श्लोक १३) प्रदान करता है, जो महाविद्या साधना का मुख्य उद्देश्य है।

पाठ विधि (Ritual Method)

  • समय: रात्रि (विशेषकर शनि की होरा या मध्यरात्रि) उपयुक्त है। शुक्ल पक्ष की बजाय कृष्ण पक्ष (विशेषकर अष्टमी/चतुर्दशी) श्रेष्ठ है।
  • वस्त्र/आसन: काले या मटमैले (धूम्र) रंग के वस्त्र और आसन का प्रयोग करें।
  • दिशा: दक्षिण दिशा (यम की दिशा) की ओर मुख करके पाठ करें।
  • सावधानी: यह उग्र साधना है। पूर्ण पवित्रता और गुरु के निर्देश के बिना केवल पाठ करें, विशिष्ट अनुष्ठान न करें।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. माँ धूमावती को 'विधवा' क्यों कहा जाता है?

पौराणिक कथाओं के अनुसार, उन्होंने भूख लगने पर भगवान शिव (अपने पति) को निगल लिया था, जिससे वे विधवा स्वरूप में हो गईं। यह प्रतीक है कि प्रलय काल में जब पुरुष (शिव) विलीन हो जाते हैं, तब केवल शक्ति (धूमावती) शेष रहती है।

2. क्या धूमावती और अलक्ष्मी एक ही हैं?

नहीं। यद्यपि दोनों का स्वरूप मिलता-जुलता है (काक ध्वज, सूप धारण करना), अलक्ष्मी केवल दरिद्रता लाती हैं, जबकि धूमावती 'महाविद्या' हैं। वे दरिद्रता को नष्ट करती हैं और साधक को ब्रह्मज्ञान देती हैं।

3. इस स्तोत्र के पाठ का सर्वोत्तम समय क्या है?

धूमावती साधना के लिए 'रात्रि' का समय (विशेषकर शनिवार की रात या अष्टमी/चतुर्दशी) सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। निर्जन स्थान या श्मशान साधना के लिए उपयुक्त है (केवल गुरु मार्गदर्शन में)।

4. क्या गृहस्थ लोग इनकी साधना कर सकते हैं?

गृहस्थों के लिए धूमावती की उग्र साधना वर्जित मानी जाती है क्योंकि वे वैराग्य (Detachment) की देवी हैं। गृहस्थ केवल सौम्य स्तोत्र पाठ कर सकते हैं, वह भी गुरु की आज्ञा से।

5. कौवे (Crow) का इनके साथ क्या संबंध है?

माँ के ध्वज पर कौवे का चित्र है और उनका वाहन भी कौवा है। कौवा 'अतृप्ति' और 'मृत्यु' का प्रतीक है, जिस पर देवी का नियंत्रण है।

6. सूप (Winnowing Basket) क्या दर्शाता है?

सूप अनाज को भूसे से अलग करता है। वैसे ही माँ धूमावती माया (भूसा) को हटाकर सत्य (अनाज/ब्रह्म) को प्रकट करती हैं। वे विवेक ज्ञान की देवी हैं।

7. शत्रु नाश के लिए यह स्तोत्र कैसे उपयोगी है?

फलश्रुति (श्लोक १०) में कहा गया है : 'शत्रूच्चाटे मारणादौ'। यह स्तोत्र शत्रुओं में भ्रम पैदा करता है और उनकी शक्ति को क्षीण कर देता है।

8. क्या स्त्रियाँ यह पाठ कर सकती हैं?

हाँ, स्त्रियाँ भी पाठ कर सकती हैं। वे सुहागिन रूप में नहीं पूजी जातीं, इसलिए सुहाग सामग्री नहीं चढ़ाई जाती, लेकिन भक्तिभाव से पाठ में कोई दोष नहीं है।

9. भोग में क्या चढ़ाना चाहिए?

उन्हें नमकीन, कचौड़ी, या धुएं वाली चीजें (जैसे धूनी) प्रिय हैं। मीठा भोग प्रायः नहीं लगाया जाता।

10. सिद्धि मिलने के बाद साधक कैसा हो जाता है?

साधक निडर हो जाता है। उसे सामाजिक मान-अपमान का भय नहीं रहता और वह जीवन-मृत्यु के रहस्य को समझ लेता है।