Sri Tripura Bhairavi Ashtottara Shatanama Stotram – श्री त्रिपुरभैरवी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्
Sri Tripura Bhairavi Ashtottara Shatanama Stotram: 108 Names Hymn

श्री त्रिपुरभैरवी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् - परिचय (Introduction)
श्री त्रिपुरभैरवी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् दश महाविद्याओं की साधना का एक गुप्त रत्न है। यह 'पाठात्मक' (Recitation-based) स्तोत्र है, जो नामावली से अलग है। इसमें १०८ नामों को श्लोकों (Verses) में गूंथा गया है, जिससे इसका पाठ एक मधुर लय (Rhythm) में किया जा सकता है।
भगवान शिव कहते हैं - "अप्रकाश्यमिदं गोप्यं" (यह गोपनीय है)। यह साधक को न केवल भौतिक सुख देता है, बल्कि उसे 'गणनाथ' (Ganesha) की तरह बुद्धिमान और विघ्नहर्ता बना देता है।
स्तोत्र का महत्व (Significance)
सर्व सम्पत्ति प्रदायनी: श्लोक ३ में शिव जी स्पष्ट कहते हैं - "सर्वसम्पत्प्रदायकम्"। यह दरिद्रता का नाश कर घर को समृद्धि से भर देता है।
शत्रु और पाप नाश: श्लोक ५ में देवी को 'महिषासुरमर्दिनी' और 'महापातकनाशिनी' कहा गया है। यह बाहरी शत्रुओं और आंतरिक पापों (Guilt/Sins) दोनों को नष्ट करता है।
भक्त वत्सल: श्लोक १ में देवी को 'भक्तवत्सल' (पुत्रवत स्नेह करने वाली) कहा गया है। वे उग्र होते हुए भी अपने साधकों पर क्रोध नहीं करतीं।
फलश्रुति (Benefits)
श्लोक २२ में इस स्तोत्र का सर्वोच्च फल बताया गया है:
"षण्मासाभ्यन्तरे सोऽपि गणनाथसमो भवेत्"
अर्थात: जो साधक ६ महीने (Six Months) तक इसका नित्य पाठ करता है, वह भगवान गणेश (गणनाथ) के समान हो जाता है। उसे अष्ट सिद्धि और नव निधि प्राप्त होती हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. नामावली और इस स्तोत्र में क्या अंतर है?
नामावली (Namavali) में 'नमः' लगाकर एक-एक नाम से अर्चन (पूजा) की जाती है। यह स्तोत्र (Stotram) है, जिसमें नामों को श्लोक (Verse) के रूप में पिरोया गया है। इसे लयबद्ध तरीके से गाया जाता है।
2. इसके पाठ का विशेष फल क्या है?
श्लोक २२ में फलश्रुति है: 'गणनाथसमो भवेत्' (Gananaatha Samo Bhavet) - साधक भगवान गणेश के समान हो जाता है। इसका अर्थ है - सर्वोच्च बुद्धि, विघ्नों पर विजय, और सेनापति (Leader) बनने की क्षमता।
3. साधना की अवधि कितनी होनी चाहिए?
श्लोक २२ के अनुसार, पूर्ण सिद्धि के लिए '६ मास' (Six Months) तक नियमित पाठ करने का विधान है। हालांकि, सामान्य लाभ ४१ दिनों में भी दिखने लगते हैं।
4. श्लोक २१ में 'पञ्च मकारों' का क्या अर्थ है?
तंत्र में 'मकारैः पञ्चकैः' का उल्लेख है। सात्विक साधकों के लिए इसका अर्थ 'पंचामृत' (दूध, दही, घी, शहद, चीनी) या मानसिक अर्पण (Mental Offering) है। तामसिक अर्थ केवल वाममार्गी गुरु के निर्देशन में ही ग्राह्य है।
5. श्लोक १ में 'भक्तवत्सल' किसे कहा गया है?
भगवान शिव देवी को 'भक्तवत्सल' (Fond of Devotees) कहते हैं। यद्यपि भैरवी उग्र हैं, लेकिन अपने भक्तों के लिए वे माता के समान कोमल और रक्षक हैं।
6. क्या स्त्रियाँ इसका पाठ कर सकती हैं?
हाँ, बिल्कुल। यह स्तोत्र पार्वती जी को ही सुनाया गया था। स्त्रियाँ इसे सौभाग्य और सुरक्षा के लिए निसंकोच पढ़ सकती हैं।
7. पाठ के लिए कौन सा समय श्रेष्ठ है?
भैरवी की उपासना के लिए 'संध्या काल' (सूर्यास्त के बाद) या 'अर्द्धरात्रि' उत्तम है। शांत वातावरण में इसका प्रभाव अधिक होता है।
8. श्लोक ७ में 'दामोदरप्रिया' नाम क्यों है?
'दामोदर' भगवान विष्णु (कृष्ण) का नाम है। देवी उनकी शक्ति (योगमाया) हैं, इसलिए उन्हें विष्णु की प्रिय (Damodara Priya) कहा गया है।
9. क्या इसे धन प्राप्ति के लिए पढ़ा जा सकता है?
हाँ। श्लोक ४ में देवी को 'सर्वसम्पत्प्रदायिनी' (Giver of all wealth) और 'कामधेनु' (Wish fulfilling cow) कहा गया है।
10. 'अनन्य' पाठ का क्या अर्थ है?
अनन्य पाठ का अर्थ है - देवी के सिवा किसी अन्य आश्रय की कामना न करना। पूर्ण समर्पण (Surrender) से पाठ करने पर ही भैरवी प्रसन्न होती हैं।