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Sri Tripura Bhairavi Ashtottara Shatanama Stotram – श्री त्रिपुरभैरवी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

Sri Tripura Bhairavi Ashtottara Shatanama Stotram: 108 Names Hymn

Sri Tripura Bhairavi Ashtottara Shatanama Stotram – श्री त्रिपुरभैरवी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्
॥ श्री त्रिपुरभैरवी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥ ॥ श्रीदेव्युवाच ॥ कैलासवासिन् भगवन् प्राणेश्वर कृपानिधे । भक्तवत्सल भैरव्या नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ॥ १ ॥ न श्रुतं देवदेवेश वद मां दीनवत्सल । ॥ श्रीशिव उवाच ॥ शृणु प्रिये महागोप्यं नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ॥ २ ॥ भैरव्याश्शुभदं सेव्यं सर्वसम्पत्प्रदायकम् । यस्यानुष्ठानमात्रेण किं न सिद्ध्यति भूतले ॥ ३ ॥ ॥ स्तोत्रम् ॥ ओं भैरवी भैरवाराध्या भूतिदा भूतभावना । आर्या ब्राह्मी कामधेनुस्सर्वसम्पत्प्रदायिनी ॥ ४ ॥ त्रैलोक्यवन्दिता देवी महिषासुरमर्दिनी । मोहघ्नी मालती माला महापातकनाशिनी ॥ ५ ॥ क्रोधिनी क्रोधनिलया क्रोधरक्तेक्षणा कुहूः । त्रिपुरा त्रिपुराधारा त्रिनेत्रा भीमभैरवी ॥ ६ ॥ देवकी देवमाता च देवदुष्टविनाशिनी । दामोदरप्रिया दीर्घा दुर्गा दुर्गतिनाशिनी ॥ ७ ॥ लम्बोदरी लम्बकर्णा प्रलम्बितपयोधरा । प्रत्यङ्गिरा प्रतिपदा प्रणतक्लेशनाशिनी ॥ ८ ॥ प्रभावती गुणवती गणमाता गुहेश्वरी । क्षीराब्धितनया क्षेम्या जगत्त्राणविधायिनी ॥ ९ ॥ महामारी महामोहा महाक्रोधा महानदी । महापातकसंहर्त्री महामोहप्रदायिनी ॥ १० ॥ विकराला महाकाला कालरूपा कलावती । कपालखट्वाङ्गधरा खड्गखर्परधारिणी ॥ ११ ॥ कुमारी कुङ्कुमप्रीता कुङ्कुमारुणरञ्जिता । कौमोदकी कुमुदिनी कीर्त्या कीर्तिप्रदायिनी ॥ १२ ॥ नवीना नीरदा नित्या नन्दिकेश्वरपालिनी । घर्घरा घर्घरारावा घोरा घोरस्वरूपिणी ॥ १३ ॥ कलिघ्नी कलिधर्मघ्नी कलिकौतुकनाशिनी । किशोरी केशवप्रीता क्लेशसङ्घनिवारिणी ॥ १४ ॥ महोन्मत्ता महामत्ता महाविद्या महीमयी । महायज्ञा महावाणी महामन्दरधारिणी ॥ १५ ॥ मोक्षदा मोहदा मोहा भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी । अट्टाट्टहासनिरता क्वणन्नूपुरधारिणी ॥ १६ ॥ दीर्घदम्ष्ट्रा दीर्घमुखी दीर्घघोणा च दीर्घिका । दनुजान्तकरी दुष्टा दुःखदारिद्र्यभञ्जिनी ॥ १७ ॥ दुराचारा च दोषघ्नी दमपत्नी दयापरा । मनोभवा मनुमयी मनुवंशप्रवर्धिनी ॥ १८ ॥ श्यामा श्यामतनुश्शोभा सौम्या शम्भुविलासिनी । इति ते कथितं दिव्यं नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ॥ १९ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ भैरव्या देवदेवेश्यास्तव प्रीत्यै सुरेश्वरि । अप्रकाश्यमिदं गोप्यं पठनीयं प्रयत्नतः ॥ २० ॥ देवीं ध्यात्वा सुरां पीत्वा मकारैः पञ्चकैः प्रिये । पूजयेत्सततं भक्त्या पठेत् स्तोत्रमिदं शुभम् ॥ २१ ॥ षण्मासाभ्यन्तरे सोऽपि गणनाथसमो भवेत् । किमत्र बहुनोक्तेन त्वदग्रे प्राणवल्लभे ॥ २२ ॥ सर्वं जानासि सर्वज्ञे पुनर्मां परिपृच्छसि । न देयं परशिष्येभ्यो निन्दकेभ्यो विशेषतः ॥ २३ ॥ ॥ इति श्रीत्रिपुरभैरवी अष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् ॥

श्री त्रिपुरभैरवी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् - परिचय (Introduction)

श्री त्रिपुरभैरवी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् दश महाविद्याओं की साधना का एक गुप्त रत्न है। यह 'पाठात्मक' (Recitation-based) स्तोत्र है, जो नामावली से अलग है। इसमें १०८ नामों को श्लोकों (Verses) में गूंथा गया है, जिससे इसका पाठ एक मधुर लय (Rhythm) में किया जा सकता है।

भगवान शिव कहते हैं - "अप्रकाश्यमिदं गोप्यं" (यह गोपनीय है)। यह साधक को न केवल भौतिक सुख देता है, बल्कि उसे 'गणनाथ' (Ganesha) की तरह बुद्धिमान और विघ्नहर्ता बना देता है।

स्तोत्र का महत्व (Significance)

  • सर्व सम्पत्ति प्रदायनी: श्लोक ३ में शिव जी स्पष्ट कहते हैं - "सर्वसम्पत्प्रदायकम्"। यह दरिद्रता का नाश कर घर को समृद्धि से भर देता है।

  • शत्रु और पाप नाश: श्लोक ५ में देवी को 'महिषासुरमर्दिनी' और 'महापातकनाशिनी' कहा गया है। यह बाहरी शत्रुओं और आंतरिक पापों (Guilt/Sins) दोनों को नष्ट करता है।

  • भक्त वत्सल: श्लोक १ में देवी को 'भक्तवत्सल' (पुत्रवत स्नेह करने वाली) कहा गया है। वे उग्र होते हुए भी अपने साधकों पर क्रोध नहीं करतीं।

फलश्रुति (Benefits)

श्लोक २२ में इस स्तोत्र का सर्वोच्च फल बताया गया है:

"षण्मासाभ्यन्तरे सोऽपि गणनाथसमो भवेत्"
अर्थात: जो साधक ६ महीने (Six Months) तक इसका नित्य पाठ करता है, वह भगवान गणेश (गणनाथ) के समान हो जाता है। उसे अष्ट सिद्धि और नव निधि प्राप्त होती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. नामावली और इस स्तोत्र में क्या अंतर है?

नामावली (Namavali) में 'नमः' लगाकर एक-एक नाम से अर्चन (पूजा) की जाती है। यह स्तोत्र (Stotram) है, जिसमें नामों को श्लोक (Verse) के रूप में पिरोया गया है। इसे लयबद्ध तरीके से गाया जाता है।

2. इसके पाठ का विशेष फल क्या है?

श्लोक २२ में फलश्रुति है: 'गणनाथसमो भवेत्' (Gananaatha Samo Bhavet) - साधक भगवान गणेश के समान हो जाता है। इसका अर्थ है - सर्वोच्च बुद्धि, विघ्नों पर विजय, और सेनापति (Leader) बनने की क्षमता।

3. साधना की अवधि कितनी होनी चाहिए?

श्लोक २२ के अनुसार, पूर्ण सिद्धि के लिए '६ मास' (Six Months) तक नियमित पाठ करने का विधान है। हालांकि, सामान्य लाभ ४१ दिनों में भी दिखने लगते हैं।

4. श्लोक २१ में 'पञ्च मकारों' का क्या अर्थ है?

तंत्र में 'मकारैः पञ्चकैः' का उल्लेख है। सात्विक साधकों के लिए इसका अर्थ 'पंचामृत' (दूध, दही, घी, शहद, चीनी) या मानसिक अर्पण (Mental Offering) है। तामसिक अर्थ केवल वाममार्गी गुरु के निर्देशन में ही ग्राह्य है।

5. श्लोक १ में 'भक्तवत्सल' किसे कहा गया है?

भगवान शिव देवी को 'भक्तवत्सल' (Fond of Devotees) कहते हैं। यद्यपि भैरवी उग्र हैं, लेकिन अपने भक्तों के लिए वे माता के समान कोमल और रक्षक हैं।

6. क्या स्त्रियाँ इसका पाठ कर सकती हैं?

हाँ, बिल्कुल। यह स्तोत्र पार्वती जी को ही सुनाया गया था। स्त्रियाँ इसे सौभाग्य और सुरक्षा के लिए निसंकोच पढ़ सकती हैं।

7. पाठ के लिए कौन सा समय श्रेष्ठ है?

भैरवी की उपासना के लिए 'संध्या काल' (सूर्यास्त के बाद) या 'अर्द्धरात्रि' उत्तम है। शांत वातावरण में इसका प्रभाव अधिक होता है।

8. श्लोक ७ में 'दामोदरप्रिया' नाम क्यों है?

'दामोदर' भगवान विष्णु (कृष्ण) का नाम है। देवी उनकी शक्ति (योगमाया) हैं, इसलिए उन्हें विष्णु की प्रिय (Damodara Priya) कहा गया है।

9. क्या इसे धन प्राप्ति के लिए पढ़ा जा सकता है?

हाँ। श्लोक ४ में देवी को 'सर्वसम्पत्प्रदायिनी' (Giver of all wealth) और 'कामधेनु' (Wish fulfilling cow) कहा गया है।

10. 'अनन्य' पाठ का क्या अर्थ है?

अनन्य पाठ का अर्थ है - देवी के सिवा किसी अन्य आश्रय की कामना न करना। पूर्ण समर्पण (Surrender) से पाठ करने पर ही भैरवी प्रसन्न होती हैं।