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Sri Bhuvaneshwari Ashtottara Shatanama Stotram – श्री भुवनेश्वरी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

Sri Bhuvaneshwari Ashtottara Shatanama Stotram: 108 Names Hymn

Sri Bhuvaneshwari Ashtottara Shatanama Stotram – श्री भुवनेश्वरी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्
॥ श्री भुवनेश्वरी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (रुद्रयामल तन्त्र) ॥ कैलासशिखरे रम्ये नानारत्नोपशोभिते । नरनारीहितार्थाय शिवं पप्रच्छ पार्वती ॥ १ ॥ ॥ देव्युवाच ॥ भुवनेशी महाविद्या नाम्नामष्टोत्तरं शतम् । कथयस्व महादेव यद्यहं तव वल्लभा ॥ २ ॥ ॥ ईश्वर उवाच ॥ शृणु देवि महाभागे स्तवराजमिदं शुभम् । सहस्रनाम्नामधिकं सिद्धिदं मोक्षहेतुकम् ॥ ३ ॥ शुचिभिः प्रातरुत्थाय पठितव्यः समाहितैः । त्रिकालं श्रद्धया युक्तैः सर्वकामफलप्रदः ॥ ४ ॥ ॥ विनियोगः ॥ अस्य श्रीभुवनेश्वर्यष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रमन्त्रस्य शक्तिरृषिः गायत्री छन्दः श्रीभुवनेश्वरी देवता चतुर्विधफल पुरुषार्थ सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ॥ ॥ स्तोत्रम् ॥ ओं महामाया महाविद्या महायोगा महोत्कटा । माहेश्वरी कुमारी च ब्रह्माणी ब्रह्मरूपिणी ॥ ५ ॥ वागीश्वरी योगरूपा योगिनीकोटिसेविता । जया च विजया चैव कौमारी सर्वमङ्गला ॥ ६ ॥ हिङ्गुला च विलासी च ज्वालिनी ज्वालरूपिणी । ईश्वरी क्रूरसंहारी कुलमार्गप्रदायिनी ॥ ७ ॥ वैष्णवी सुभगाकारा सुकुल्या कुलपूजिता । वामाङ्गा वामचारा च वामदेवप्रिया तथा ॥ ८ ॥ डाकिनी योगिनीरूपा भूतेशी भूतनायिका । पद्मावती पद्मनेत्रा प्रबुद्धा च सरस्वती ॥ ९ ॥ भूचरी खेचरी माया मातङ्गी भुवनेश्वरी । कान्ता पतिव्रता साक्षी सुचक्षुः कुण्डवासिनी ॥ १० ॥ उमा कुमारी लोकेशी सुकेशी पद्मरागिणी । इन्द्राणी ब्रह्मचण्डाली चण्डिका वायुवल्लभा ॥ ११ ॥ सर्वधातुमयीमूर्तिर्जलरूपा जलोदरी । आकाशी रणगा चैव नृकपालविभूषणा ॥ १२ ॥ नर्मदा मोक्षदा चैव धर्मकामार्थदायिनी । गायत्री चाऽथ सावित्री त्रिसन्ध्या तीर्थगामिनी ॥ १३ ॥ अष्टमी नवमी चैव दशम्यैकादशी तथा । पौर्णमासी कुहूरूपा तिथिमूर्तिस्वरूपिणी ॥ १४ ॥ सुरारिनाशकारी च उग्ररूपा च वत्सला । अनला अर्धमात्रा च अरुणा पीतलोचना ॥ १५ ॥ लज्जा सरस्वती विद्या भवानी पापनाशिनी । नागपाशधरा मूर्तिरगाधा धृतकुण्डला ॥ १६ ॥ क्षत्ररूपा क्षयकरी तेजस्विनी शुचिस्मिता । अव्यक्ताव्यक्तलोका च शम्भुरूपा मनस्विनी ॥ १७ ॥ मातङ्गी मत्तमातङ्गी महादेवप्रिया सदा । दैत्यघ्नी चैव वाराही सर्वशास्त्रमयी शुभा ॥ १८ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ य इदं पठते भक्त्या शृणुयाद्वा समाहितः । अपुत्रो लभते पुत्रं निर्धनो धनवान् भवेत् ॥ १९ ॥ मूर्खोऽपि लभते शास्त्रं चोरोऽपि लभते गतिम् । वेदानां पाठको विप्रः क्षत्रियो विजयी भवेत् ॥ २० ॥ वैश्यस्तु धनवान् भूयाच्छूद्रस्तु सुखमेधते । अष्टम्यां च चतुर्दश्यां नवम्यां चैकचेतसः ॥ २१ ॥ ये पठन्ति सदा भक्त्या न ते वै दुःखभागिनः । एककालं द्विकालं वा त्रिकालं वा चतुर्थकम् ॥ २२ ॥ ये पठन्ति सदा भक्त्या स्वर्गलोके च पूजिताः । रुद्रं दृष्ट्वा यथा देवाः पन्नगा गरुडं यथा । शत्रवः प्रपलायन्ते तस्य वक्त्रविलोकनात् ॥ २३ ॥ इति श्रीरुद्रयामले देवीश्वरसंवादे श्री भुवनेश्वर्यष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ।

श्री भुवनेश्वरी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् - परिचय (Introduction)

श्री भुवनेश्वरी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (Sri Bhuvaneshwari Ashtottara Shatanama Stotram) तंत्र शास्त्र का एक अनमोल रत्न है। यह रुद्रयामल तन्त्र के 'देवी-ईश्वर संवाद' में वर्णित है। जब माता पार्वती ने शिव से पूछा कि "यदि मैं आपकी वल्लभा हूँ, तो मुझे भुवनेश्वरी के 108 नाम बताएं," तब शिव जी ने इस स्तोत्र का उपदेश दिया।

यह केवल नामों की सूची नहीं है, अपितु इसे "स्तवराज" (स्तोत्रों का राजा) कहा गया है। इसमें देवी के सौम्य और उग्र दोनों रूपों का समावेश है - वे जहाँ 'महामाया' और 'लज्जा' हैं, वहीं 'ब्रह्मचण्डाली' और 'दैत्यघ्नी' भी हैं।

साधक के लिए यह कल्पवृक्ष के समान है। यह भोग (भौतिक सुख) और मोक्ष (आध्यात्मिक मुक्ति) दोनों को एक साथ प्रदान करने में सक्षम है।

विशिष्ट महत्व (Significance)

सौम्य और उग्र का संगम: इन 108 नामों में देवी के विरोधाभासी गुण एक साथ मिलते हैं। वे 'सर्वमंगला' (सबका मंगल करने वाली) भी हैं और 'क्रूरसंहारी' (दुष्टों का संहार करने वाली) भी। यह संतुलन ही ब्रह्मांड का आधार है।

शक्तिपीठों का स्मरण: 'हिङ्गुला' (हिंगलाज), 'ज्वालिनी' (ज्वालामुखी), 'कामाख्या' (कामरूपा - यद्यपि यहाँ परोक्ष रूप में) जैसे नाम शक्तिपीठों की ऊर्जा को जाग्रत करते हैं।

वाम और दक्षिण मार्ग: श्लोक ८ में उन्हें 'वामाङ्गा' और 'वामचारा' कहा गया है, जो वाम मार्ग (Tantra) की साधना का संकेत है। साथ ही वे 'वैष्णवी' भी हैं, जो सात्विक मार्ग की परिचायक हैं।

पाठ के लाभ (Benefits)

  • संतान प्राप्ति: श्लोक १९ में शिव जी स्पष्ट वचन देते हैं - "अपुत्रो लभते पुत्रं"। जिसे संतान न हो, उसे भक्ति भाव से इसका नित्य पाठ करना चाहिए।

  • समस्त दरिद्रता नाश: "निर्धनो धनवान् भवेत्"। यह स्तोत्र दरिद्रता को जड़ से समाप्त कर साधक को धनवान बनाता है।

  • विद्या और ज्ञान: "मूर्खोऽपि लभते शास्त्रं"। मंदबुद्धि व्यक्ति भी इसके पाठ से शास्त्रों का ज्ञाता बन जाता है।

  • अजेयता: श्लोक २३ में कहा गया है कि गरुड़ को देखकर जैसे सांप भागते हैं, वैसे ही इसके साधक को देखकर शत्रु (शत्रवः) भाग खड़े होते हैं।

पाठ विधि (Ritual Method)

  • नित्य कर्म: "शुचिभिः प्रातरुत्थाय" - प्रातः काल स्नान आदि से पवित्र होकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके पाठ करें।

  • त्रिकाल संध्या: विशेष सिद्धि के लिए सुबह, दोपहर और शाम (त्रिकाल) इसका पाठ करें।

  • विशेष तिथियां: अष्टमी, नवमी और चतुर्दशी - इन तीन तिथियों को शक्ति उपासना के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इन दिनों किया गया पाठ अक्षय फल देता है।

  • विनियोग: पाठ से पूर्व हाथ में जल लेकर विनियोग मंत्र ("अस्य श्रीभुवनेश्वर्यष्टोत्तर...") बोलकर जल छोड़ें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. नामावली और नाम स्तोत्र में क्या अंतर है?

नामावली में केवल नाम होते हैं (जैसे 'ॐ भुवनेश्वर्यै नमः'), जबकि नाम स्तोत्र में नामों को श्लोकों (Verses) में पिरोया जाता है। यह स्तोत्र रूप में 108 नाम हैं।

2. इस स्तोत्र का मुख्य फल क्या है?

श्लोक १९ के अनुसार, इसका सबसे बड़ा फल 'पुत्र प्राप्ति' (अपुत्रो लभते पुत्रं) और 'धन प्राप्ति' (निर्धनो धनवान् भवेत्) है।

3. 'हिंगुला' नाम का क्या महत्व है?

श्लोक ७ में देवी को 'हिंगुला' कहा गया है। यह पाकिस्तान स्थित प्रसिद्ध 51 शक्तिपीठों में से एक 'हिंगलाज माता' का संदर्भ है, जो भुवनेश्वरी का ही उग्र रूप मानी जाती हैं।

4. क्या यह शत्रुओं का नाश करता है?

जी हाँ, श्लोक १५ में उन्हें 'सुरारिनाशकारी' (देवताओं के शत्रुओं का नाश करने वाली) और श्लोक २३ में कहा गया है कि इसके पाठ से 'शत्रवः प्रपलायन्ते' (शत्रु भाग जाते हैं)।

5. पाठ के लिए कौन सी तिथियां शुभ हैं?

श्लोक २१ में अष्टमी, नवमी और चतुर्दशी तिथियों को विशेष फलदायी बताया गया है। इन दिनों में पाठ करना अनंत गुना फल देता है।

6. 'वैष्णवी' नाम क्यों आया है?

श्लोक ८ में उन्हें 'वैष्णवी' कहा गया है। यद्यपि वे शिव की शक्ति हैं, लेकिन वे ही विष्णु की पालन शक्ति भी हैं। महाविद्याओं में भेद नहीं है।

7. इस पाठ की विधि क्या है?

श्लोक ४ के अनुसार, प्रातः काल पवित्र होकर एकाग्र मन से (समाहितैः) इसका पाठ करना चाहिए। त्रिकाल (सुबह, दोपहर, शाम) पाठ सर्वोत्तम है।

8. क्या विद्यार्थी इसका पाठ कर सकते हैं?

हाँ, श्लोक २० में कहा गया है- 'मूर्खोऽपि लभते शास्त्रं' (मूर्ख भी विद्वान हो जाता है) और 'वेदानां पाठको विप्रः'। यह विद्या प्राप्ति के लिए उत्तम है।

9. 'अर्धमात्रा' का क्या अर्थ है?

श्लोक १५ में 'अर्धमात्रा' नाम आया है। ॐ कार में अ, उ, म के बाद जो नाद बिंदु है, वह अर्धमात्रा है - वही तुरीय अवस्था और मोक्ष का प्रतीक है।

10. क्या स्त्रियाँ इसका पाठ कर सकती हैं?

बिलकुल। देवी स्वयं स्त्री रूप हैं। श्लोक १३ में उन्हें 'सावित्री' और 'गायत्री' कहा गया है। भक्ति भाव से कोई भी पाठ कर सकता है।