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Sri Bhuvaneshwari Hrudayam (Neela Saraswati Tantra) – श्री भुवनेश्वरी हृदयम्

Sri Bhuvaneshwari Hrudayam: The Secret Heart of the Goddess

Sri Bhuvaneshwari Hrudayam (Neela Saraswati Tantra) – श्री भुवनेश्वरी हृदयम्
॥ श्री भुवनेश्वरी हृदयम् ॥ ॥ श्रीदेव्युवाच ॥ भगवन् ब्रूहि तत् स्तोत्रं सर्वकामप्रसाधनं । यस्य श्रवणमात्रेण नान्यच्छ्रोतव्यमिष्यते ॥ १ ॥ यदि मेऽनुग्रहः कार्यः प्रीतिश्चापि ममोपरि । तदिदं कथय ब्रह्मन् विमलं यन्महीतले ॥ २ ॥ ॥ ईश्वर उवाच ॥ शृणु देवि प्रवक्ष्यामि सर्वकामप्रसाधनं । हृदयं भुवनेश्वर्याः स्तोत्रमस्ति यशोदयम् ॥ ३ ॥ ॥ विनियोगः ॥ ओं अस्य श्रीभुवनेश्ववरीहृदयस्तोत्रमन्त्रस्य शक्तिः ऋषिः – गायत्री छन्दः – श्रीभुवनेश्वरी देवता – हकारो बीजं – ईकारश्शक्तिः – रेफः कीलकं – सकल मनोवाञ्छितसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ॥ ॥ करन्यासः ॥ ओं ह्रीं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ओं श्रीं तर्जनीभ्यां नमः । ओं ऐं मध्यमाभ्यां नमः । ओं ह्रीं अनामिकाभ्यां नमः । ओं श्रीं कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ओं ऐं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । ॥ अङ्गन्यासः ॥ ओं ह्रीं हृदयाय नमः । ओं श्रीं शिरसे स्वाहा । ओं ऐं शिखायै वषट् । ओं ह्रीं कवचाय हुं । ओं श्रीं नेत्रत्रयाय वौषट् । ओं ऐं अस्त्राय फट् । ॥ ध्यानम् ॥ ध्यायेद्ब्रह्मादिकानां कृतजनिजननीं योगिनीं योगयोनिं देवानां जीवनायोज्ज्वलितजयपरज्योतिरुग्राङ्गधात्रीं । शङ्खं चक्रं च बाणं धनुरपि दधतीं दोश्चतुष्काम्बुजातौ मायामाद्यां विशिष्टां भव भव भुवनां भूभवा भारभूमिम् ॥ ४ ॥ ॥ स्तोत्रम् ॥ यदाज्ञया यो जगदाद्यशेषं सृजत्यजः श्रीपतिरौरसं वा । बिभर्ति संहन्ति भवस्तदन्ते भजामहे श्रीभुवनेश्वरीं ताम् ॥ ५ ॥ जगज्जनानन्दकरीं जयाख्यां यशस्विनीं यन्त्रसुयज्ञयोनिम् । जितामितामित्रकृतप्रपञ्चां भजामहे श्रीभुवनेश्वरीं ताम् ॥ ६ ॥ हरौ प्रसुप्ते भुवनत्रयान्ते- प्यनारतन्नाभिजपद्मजन्मा । विधिस्ततोऽन्धे विदधार यत्पदं भजामहे श्रीभुवनेश्वरीं ताम् ॥ ७ ॥ न विद्यते क्वापि तु जन्म यस्या न वा स्थितिः सान्ततिकीह यस्याः । न वा निरोधेऽखिलकर्म यस्या भजामहे श्रीभुवनेश्वरीं ताम् ॥ ८ ॥ कटाक्षमोक्षाचरणोग्रवित्ता निवेशितार्णा करुणार्द्रचित्ता । सुभक्तयेराति समीप्सितं या भजामहे श्रीभुवनेश्वरीं ताम् ॥ ९ ॥ यतो जगज्जन्म बभूव योने- स्तदेव मध्ये प्रतिपाति यां वा । तदत्ति यान्तेऽखिलमुग्रकालि भजामहे श्रीभुवनेश्वरीं ताम् ॥ १० ॥ सुषुप्तिकाले जनमध्ययन्त्या यया जनः स्वप्नमवैति किञ्चित् । प्रबुध्यते जाग्रति जीव एष भजामहे श्रीभुवनेश्वरीं ताम् ॥ ११ ॥ दयास्फुरत्कोरकटाक्षलाभा- न्नकेत्र यस्याः प्रभवन्ति सिद्धाः । कवित्वमीशित्वमपि स्वतन्त्रा भजामहे श्रीभुवनेश्वरीं ताम् ॥ १२ ॥ लसन्मुखाम्भोरुहमुत्स्फुरन्तं हृदि प्रणिध्याय दिशि स्फुरन्तः । यस्याः कृपार्द्रं प्रविकासयन्ति भजामहे श्रीभुवनेश्वरीं ताम् ॥ १३ ॥ यदानुरागानुगतालिचित्रा- श्चिरन्तनप्रेमपरिप्लुताङ्गाः । सुनिर्भयास्सन्ति प्रमुद्य यस्याः भजामहे श्रीभुवनेश्वरीं ताम् ॥ १४ ॥ हरिर्विरञ्चिर्हर ईशितारः पुरोऽवतिष्ठन्ति परंनताङ्गाः । यस्यास्समिच्छन्ति सदानुकूल्यं भजामहे श्रीभुवनेश्वरीं ताम् ॥ १५ ॥ मनुं यदीयं हरमग्निसंस्थं ततश्च वामश्रुतिचन्द्रसक्तम् । जपन्ति ये स्युस्सुरवन्दितास्ते भजामहे श्रीभुवनेश्वरीं ताम् ॥ १६ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ प्रसीदतु प्रेमरसार्द्रचित्ता सदा हि सा श्रीभुवनेश्वरी मे । कृपाकटाक्षेण कुबेरकल्पा भवन्ति यस्याः पदभक्तिभाजः ॥ १७ ॥ मुदा सुपाठ्यं भुवनेश्वरीयं सदा सतां स्तोत्रमिदं सुसेव्यम् । सुखप्रदं स्यात्कलिकल्मषघ्नं सुशृण्वतां सम्पठतां प्रशस्यम् ॥ १८ ॥ एतत्तु हृदयं स्तोत्रं पठेद्यस्तु समाहितः । भवेत्तस्येष्टदा देवी प्रसन्ना भुवनेश्वरी ॥ १९ ॥ ददाति धनमायुष्यं पुण्यं पुण्यमतिं तथा । नैष्ठिकीं देवभक्तिं च गुरुभक्तिं विशेषतः ॥ २० ॥ पूर्णिमायां चतुर्दश्यां कुजवारे विशेषतः । पठनीयमिदं स्तोत्रं देवसद्मनि यत्नतः ॥ २१ ॥ यत्रकुत्रापि पाठेन स्तोत्रस्यास्य फलं भवेत् । सर्वस्थानेषु देवेश्याः पूतदेहः सदा पठेत् ॥ २२ ॥ इति नीलसरस्वतीतन्त्रे श्री भुवनेश्वरीपटले श्रीदेवीश्वरसंवादे श्रीभुवनेश्वरी हृदयस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

श्री भुवनेश्वरी हृदयम् - परिचय (Introduction)

श्री भुवनेश्वरी हृदयम्, नील सरस्वती तंत्र के अंतर्गत भगवान शिव और देवी पार्वती के संवाद में वर्णित है। जब देवी पार्वती ने अपनी प्रसन्नता और अनुग्रह प्राप्त करने के लिए "विमल" (पवित्र) स्तोत्र के बारे में पूछा, तब भगवान शिव ने अपने हृदय में स्थित इस गोपनीय विद्या को प्रकट किया।

'हृदय' का अर्थ है किसी देवता का सर-सर्वस्व या प्राण-तत्व। जैसे शरीर में हृदय सबसे महत्वपूर्ण है, वैसे ही भुवनेश्वरी साधना में यह स्तोत्र सर्वोच्च स्थान रखता है। यह साधक को केवल बाहरी सुख ही नहीं, बल्कि देवी के साथ आंतरिक एकाकार (Sayujya) भी प्रदान करता है।

विशिष्ट महत्व (Significance)

दार्शनिक गहराई: श्लोक ८ में देवी को 'न विद्यते क्वापि तु जन्म यस्या' (जिसका कहीं जन्म नहीं है) कहकर उन्हें अजन्मा, स्थिति और प्रलय से परे 'परब्रह्म' शक्ति के रूप में स्थापित किया गया है।

गुप्त बीज मंत्र: श्लोक १६ ('मनुं यदीयं हरमग्निसंस्थं...') में बहुत ही गुह्य तरीके से भुवनेश्वरी बीज मंत्र 'ह्रीं' (Hreem) का संकेत दिया गया है। 'हर' (ह), 'अग्नि' (र), 'वामश्रुति' (ई) और 'चन्द्र' (बिन्दु) का मिलन ही 'ह्रीं' है। यह श्लोक अत्यंत सिद्ध माना जाता है।

कवित्व और ईशित्व: श्लोक १२ स्पष्ट करता है कि इसके पाठ से साधक में उच्च कोटि की कविता करने की शक्ति (कवित्व) और नेतृत्व/प्रभुत्व (ईशित्व) स्वतः जाग्रत हो जाते हैं।

पाठ के लाभ (Benefits)

  • अपार धन (Kubera Kalpa): श्लोक १७ के अनुसार, देवी की कृपा दृष्टि से भक्त 'कुबेर कल्पा' (कुबेर के समान धनवान) हो जाता है।

  • सर्व काम सिद्धि: श्लोक १ में इसे 'सर्वकामप्रसाधनं' कहा गया है, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - चारों पुरुषार्थों को सिद्ध करता है।

  • शत्रु और कलि दोष नाश: यह कलयुग के पापों (कलिकल्मषघ्नं) का नाश करता है और शत्रुओं को परास्त करता है।

  • गुरु और देव भक्ति: यह साधक के मन में अडिग देव भक्ति और गुरु भक्ति (श्लोक २०) स्थापित करता है, जो तंत्र साधना की नींव है।

पाठ विधि (Ritual Method)

  • विशेष मुहूर्त: श्लोक २१ के अनुसार, पूर्णिमा (Full Moon), चतुर्दशी और मंगलवार (Kujavaare) को इसका पाठ विशेष फलदायी होता है।

  • स्थान: 'देवसद्मनि' (देवालय/मंदिर) या अपने पूजा कक्ष में पवित्र होकर पाठ करें।

  • न्यास: पाठ से पूर्व दिए गए करन्यास और अंगन्यास अवश्य करें। यह शरीर को मंत्रमय बनाने के लिए आवश्यक है।

  • ध्यान: श्लोक ४ में वर्णित देवी के चतुर्भुज स्वरूप (शंख, चक्र, धनुष, बाण) का मानसिक ध्यान करते हुए पाठ आरम्भ करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. यह स्तोत्र किस तंत्र ग्रंथ से लिया गया है?

यह स्तोत्र 'नील सरस्वती तंत्र' (Neela Saraswati Tantra) के 'श्री भुवनेश्वरी पटल' (Sri Bhuvaneshwari Patala) से लिया गया है। यह देवी और ईश्वर (शिव) के संवाद के रूप में है।

2. 'हृदयम्' (Hrudayam) स्तोत्र का क्या अर्थ है?

'हृदयम्' का अर्थ है 'दिल' या 'सार'। तंत्र में, हृदय स्तोत्र देवता के सबसे गोपनीय और आंतरिक स्वरूप को प्रकट करते हैं। यह कवच (बाहरी सुरक्षा) से अधिक गहरा और आत्मिक होता है।

3. इस पाठ का विशेष फल क्या बताया गया है?

श्लोक १२ और १७ के अनुसार, साधक को 'कवित्व' (कविता करने की शक्ति), 'ईशित्व' (स्वामित्व/प्रभुत्व) और 'कुबेर कल्प' (कुबेर के समान अपार धन) की प्राप्ति होती है।

4. श्लोक ४ में देवी के किस स्वरूप का ध्यान है?

श्लोक ४ में देवी को 'शंख, चक्र, बाण और धनुष' (Shankha, Chakra, Bana, Dhanu) धारण किए हुए चतुर्भुज रूप में ध्याया गया है। यह वारुणी और वैष्णवी शक्तियों का समन्वय है।

5. क्या इसके लिए कोई विशेष दिन निर्धारित है?

हाँ। श्लोक २१ में स्पष्ट निर्देश है कि 'पूर्णिमा' (Full Moon), 'चतुर्दशी' और विशेष रूप से 'कुजवारे' (मंगलवार/Tuesday) को इसका पाठ सिद्ध माना जाता है।

6. श्लोक १६ में 'वामश्रुतिचन्द्रसक्तम्' का क्या रहस्य है?

यह एक कूट श्लोक है जो बीजाक्षर का संकेत देता है। 'हर' (हकार), 'अग्नि' (रकार), 'वामश्रुति' (ईकार) और 'चन्द्र' (बिन्दु) मिलकर 'ह्रीं' (Hreem) बीज का निर्माण करते हैं, जो भुवनेश्वरी का प्राण है।

7. 'अकाल मृत्यु भय' से मुक्ति कैसे मिलती है?

यद्यपि यह मुख्य रूप से ऐश्वर्य प्रदा है, परन्तु महाविद्या का 'हृदय' होने के कारण यह साधक के प्राणों की रक्षा करता है और अकाल मृत्यु (Accidental Death) के भय को दूर करता है।

8. क्या न्यास (Nyasa) करना अनिवार्य है?

तंत्र में न्यास का बहुत महत्व है। यह शरीर को देवतामय बनाता है। यदि संभव हो तो विनियोग और करन्यास/अंगन्यास के बाद ही मुख्य स्तोत्र का पाठ करना चाहिए।

9. 'सर्वकामप्रसाधनं' का क्या अर्थ है?

श्लोक १ में देवी स्वयं इसे 'सर्वकामप्रसाधनं' कहती हैं, जिसका अर्थ है 'सभी प्रकार की कामनाओं (भौतिक और आध्यात्मिक) को सिद्ध करने वाला' साधन।

10. क्या इसे बिना दीक्षा के पढ़ा जा सकता है?

स्तोत्र पाठ भक्ति भाव से किया जा सकता है। परन्तु, चूंकि यह 'हृदय' विद्या है और इसमें बीजाक्षरों का संकेत है, गुरु दीक्षा के बाद इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।