Sri Kamalambika Stotram (Ashtakam) – श्री कमलाम्बिका स्तोत्रम् (अष्टकम्)

श्री कमलाम्बिका स्तोत्रम् — एक परिचय
यह स्तोत्र वस्तुतः एक 'अष्टकम्' (8 छंदों का समूह) है, जो दक्षिण भारत के प्रसिद्ध शक्तिपीठ तिरुवारूर (कमलालयम) की अधिष्ठात्री श्री कमलाम्बिका को समर्पित है। श्रीविद्या परम्परा में कमलाम्बिका को साक्षात् ललिता त्रिपुरसुन्दरी माना जाता है।
इसकी रचना श्री वेदपुरीशदास (संभवतः किसी सिद्ध भक्त या आचार्य की उपाधि) द्वारा की गई है। इस स्तोत्र की भाषा अत्यंत प्रांजल, गेय (Lyrical) और भक्ति-रस से पूर्ण है। इसमें तंत्र के गूढ़ रहस्यों (षट्चक्र, नाद-बिन्दु, श्रीविद्या) को सरल स्तुति में पिरोया गया है।
स्तोत्र की मुख्य विशेषताएं
१. ध्रुवपद (Refrain): प्रत्येक श्लोक की अंतिम पंक्ति है — "वन्देऽहं कमलाम्बिकामनुदिनं वाञ्छानुकूलां शिवाम्"। इसका अर्थ है — "मैं उन कल्याणमयी (शिवा) कमलाम्बिका की नित्य वंदना करता हूँ जो भक्तों की इच्छा (वाञ्छा) के अनुकूल फल देती हैं।" यह पंक्ति साधक के मन में आशा और विश्वास भर देती है।
२. श्रीविद्या संकेत:
- कामेश्वर पीठ: (श्लोक २) "श्रीकामेश्वरपीठमध्यनिलयां" — देवी का निवास कामेश्वर पीठ (मूलाधार या महापीठ) के मध्य है।
- षट्चक्र भेदन: (श्लोक ६) "षट्चक्रोपरि नादबिन्दुनिलयां" — देवी छह चक्रों से ऊपर सहस्रार में नाद (Sound) और बिन्दु (Source) रूप में स्थित हैं।
- षट्कोण वासिनी: (श्लोक ६) "षट्कोणसंवासिनीम्" — श्रीयंत्र के मध्य षट्कोण (Trikona/Shatkona) में उनका निवास है।
- ह्रींकार: (श्लोक ८) "ह्रीङ्कारसन्धालयाम्" — देवी का शरीर 'ह्रीं' बीज मंत्र से बना है।
फलश्रुति — पाठ का फल
अंतिम (नौवें) श्लोक में फलश्रुति दी गई है:
"पुत्रश्रीप्रदमष्टसिद्धिफलदं" — यह स्तोत्र पुत्र (संतान) और श्री (लक्ष्मी/ऐश्वर्य) प्रदान करता है। साथ ही अलिमा आदि अष्ट-सिद्धियाँ भी देता है।
"चिन्ताविनाशास्पदम्" — यह सभी प्रकार की मानसिक चिंताओं (Anxiety/Worry) को समूल नष्ट करता है।
"एति ब्रह्मपदं... दुर्लभं" — अंत में साधक को वह परम ब्रह्मपद प्राप्त होता है जो बड़े-बड़े योगियों के लिए भी दुर्लभ है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. कमलाम्बिका कौन हैं?
कमलाम्बिका (कमला + अम्बिका) तिरुवारूर (तमिलनाडु) के प्राचीन त्यागराज मंदिर परिसर में स्थित एक स्वतंत्र शक्ति पीठ की अधिष्ठात्री हैं। वे राजराजेश्वरी त्रिपुरसुन्दरी का ही सौम्य और योगस्थ स्वरूप हैं। वे तपस्या-रत मुद्रा में हैं, इसलिए उन्हें योगेश्वरी भी कहा जाता है।
2. क्या यह 'कमला' (महाविद्या) से अलग है?
तात्त्विक रूप से अभेद है, पर रूप में अंतर है। महाविद्या 'कमला' गजलक्ष्मी (पद्मासना) स्वरूप हैं। 'कमलाम्बिका' श्रीविद्या की राजराजेश्वरी हैं जो सिंहासन पर आरूढ़ हैं। यह स्तोत्र श्रीविद्या परम्परा का है, जबकि महाविद्या के स्तोत्र तांत्रिक/शाक्त परम्परा के होते हैं। हालाँकि, फल दोनों का एक ही है — भोग और मोक्ष।
3. 'षट्कालेन समर्चिता' का क्या अर्थ है? (श्लोक ६)
इसका अर्थ है कि देवी की पूजा छह कालों में होती है। प्राचीन आगम मंदिरों में दिन में 6 बार (उषा, कालसन्धि, उचीकाल, सायारक्ष, द्वितीयकाल, अर्धजाम) पूजा का विधान है। कमलाम्बिका की पूजा इसी वैदिक/आगमिक विधि से होती है।
4. 'वैणिकीं' (Vainiki) क्यों कहा गया? (श्लोक ७)
क्योंकि देवी संगीत-प्रिय हैं। वीणा वादन श्रीविद्या का अभिन्न अंग है। देवी के दरबार में श्यामला (मातंगी) वीणा बजाती हैं, और स्वयं देवी को भी वीणा-गान प्रिय है। मुथुस्वामी दीक्षितर (कर्नाटक संगीत के त्रिमूर्ति) ने कमलाम्बिका पर अपनी प्रसिद्ध 'नवावरण कृतियाँ' रची थीं।
5. इसका पाठ कब करना चाहिए?
यह नित्य पाठ (अनुदिनं) के लिए है। विशेष रूप से शुक्रवार (देवी का दिन) और नवरात्रि में इसका पाठ अत्यंत फलदायी है। संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दम्पति इसका नियमित पाठ कर सकते हैं।