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Sri Bala Shanti Stotram – श्री बाला शान्ति स्तोत्रम् (चिन्तामणितन्त्रोक्तम्)

Sri Bala Shanti Stotram – श्री बाला शान्ति स्तोत्रम् (चिन्तामणितन्त्रोक्तम्)
॥ श्री बाला शान्ति स्तोत्रम् ॥ (चिन्तामणितन्त्रोक्तम्) श्रीभैरव उवाच । जय देवि जगद्धात्रि जय पापौघहारिणि । जय दुःखप्रशमनि शान्तिर्भव ममार्चने ॥ १ ॥ श्रीबाले परमेशानि जय कल्पान्तकारिणि । जय सर्वविपत्तिघ्ने शान्तिर्भव ममार्चने ॥ २ ॥ जय बिन्दुनादरूपे जय कल्याणकारिणि । जय घोरे च शत्रुघ्ने शान्तिर्भव ममार्चने ॥ ३ ॥ मुण्डमाले विशालाक्षि स्वर्णवर्णे चतुर्भुजे । महापद्मवनान्तस्थे शान्तिर्भव ममार्चने ॥ ४ ॥ जगद्योनि महायोनि निर्णयातीतरूपिणि । पराप्रासादगृहिणि शान्तिर्भव ममार्चने ॥ ५ ॥ इन्दुचूडयुते चाक्षहस्ते श्रीपरमेश्वरि । रुद्रसंस्थे महामाये शान्तिर्भव ममार्चने ॥ ६ ॥ सूक्ष्मे स्थूले विश्वरूपे जय सङ्कटतारिणि । यज्ञरूपे जाप्यरूपे शान्तिर्भव ममार्चने ॥ ७ ॥ दूतीप्रिये द्रव्यप्रिये शिवे पञ्चाङ्कुशप्रिये । भक्तिभावप्रिये भद्रे शान्तिर्भव ममार्चने ॥ ८ ॥ भावप्रिये लासप्रिये कारणानन्दविग्रहे । श्मशानस्य देवमूले शान्तिर्भव ममार्चने ॥ ९ ॥ ज्ञानाज्ञानात्मिके चाद्ये भीतिनिर्मूलनक्षमे । वीरवन्द्ये सिद्धिदात्रि शान्तिर्भव ममार्चने ॥ १० ॥ स्मरचन्दनसुप्रीते शोणितार्णवसंस्थिते । सर्वसौख्यप्रदे शुद्धे शान्तिर्भव ममार्चने ॥ ११ ॥ कापालिकि कलाधारे कोमलाङ्गि कुलेश्वरि । कुलमार्गरते सिद्धे शान्तिर्भव ममार्चने ॥ १२ ॥ ॥ फलश्रुतिः ॥ शान्तिस्तोत्रं सुखकरं बल्यन्ते पठते शिवे । देव्याः शान्तिर्भवेत्तस्य न्यूनाधिक्यादिकर्मणि ॥ १३ ॥ मन्त्रसिद्धिकामनया दशावृत्त्या पठेद्यदि । मन्त्रसिद्धिर्भवेत्तस्य नात्र कार्या विचारणा ॥ १४ ॥ चन्द्रसूर्योपरागे च यः पठेत् स्तोत्रमुत्तमम् । बाला सद्मनि सौख्येन बहुकालं वसेत्ततः ॥ १५ ॥ सर्वभद्रमवाप्नोति सर्वत्र विजयी भवेत् । तीर्थकोटिगुणं चैव दानकोटिफलं तथा । लभते नात्र सन्देहः सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥ १६ ॥ ॥ इति चिन्तामणितन्त्रे श्री बाला शान्ति स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री बाला शान्ति स्तोत्रम् का परिचय (Introduction)

श्री बाला शान्ति स्तोत्रम् (Sri Bala Shanti Stotram) चिन्तामणि तंत्र से उद्धृत एक अत्यंत शांतिदायक और शक्तिशाली स्तोत्र है। इसे स्वयं श्री भैरव ने कहा है (श्रीभैरव उवाच) जो इसके महत्व को दर्शाता है।

इस स्तोत्र में 16 श्लोक हैं और प्रत्येक स्तुति श्लोक का समापन 'शान्तिर्भव ममार्चने' (मेरी पूजा में शांति स्वरूप हो जाओ) से होता है। यह सुंदर और मधुर पंक्ति 12 बार आती है, जो इस स्तोत्र का अनूठा वैशिष्ट्य है।

"जय देवि जगद्धात्रि जय पापौघहारिणि। जय दुःखप्रशमनि शान्तिर्भव ममार्चने॥"


भावार्थ: हे जगत को धारण करने वाली! पापों के समूह को हरने वाली! दुःख को शांत करने वाली! जय हो! मेरी पूजा में शांति स्वरूप हो जाओ!

इस स्तोत्र की विशेष फलश्रुति है — 10 बार पाठ से मंत्र सिद्धि और चंद्र-सूर्य ग्रहण में पाठ से तीर्थ कोटि और दान कोटि फल

प्रमुख विशेषण (Key Attributes)

इस स्तोत्र में देवी के अनेक दिव्य विशेषण वर्णित हैं:
जगद्धात्री
जगत को धारण करने वाली
पापौघहारिणी
पापों के समूह को हरने वाली
दुःखप्रशमनी
दुःखों को शांत करने वाली
कल्पान्तकारिणी
कल्प के अंत करने वाली
सर्वविपत्तिघ्नी
सभी विपत्तियों का नाश करने वाली
बिन्दुनादरूपा
बिंदु और नाद स्वरूपा
शत्रुघ्नी
शत्रुओं का नाश करने वाली
जगद्योनि
जगत की योनि (उत्पत्ति स्थान)
सिद्धिदात्री
सिद्धियाँ प्रदान करने वाली

देवी का तांत्रिक स्वरूप (Tantric Form)

मुण्डमाला (श्लोक 4): देवी मुंडों (खोपड़ियों) की माला धारण करती हैं। वे विशालाक्षी (बड़ी आँखों वाली), स्वर्णवर्णा, और चतुर्भुजा हैं।

कापालिकी (श्लोक 12): कपाल धारण करने वाली, कला की आधार, कोमलांगी, कुलेश्वरी (कुल की स्वामिनी), और कुल मार्ग में रत सिद्धा।

श्मशान देवमूल (श्लोक 9): देवी श्मशान के देवता (शिव) के मूल में विराजमान हैं। वे भाव और लास (नृत्य) प्रिय हैं और कारणानंद विग्रह (आनंद के कारण) स्वरूपा हैं।

रुद्रसंस्थे (श्लोक 6): रुद्र (शिव) में स्थित, इंदु (चंद्रमा) की चूड़ा (शिखा) से युक्त, अक्षमाला हाथ में धारण करने वाली।

शोणितार्णव (श्लोक 11): रक्त के समुद्र में स्थित, स्मर (कामदेव) के चंदन से प्रसन्न होने वाली।

फलश्रुति — अद्भुत लाभ (Phala Shruti)

श्लोक 13-16 में विस्तृत फलश्रुति दी गई है:

🕉️ सामान्य पाठ
'शान्तिस्तोत्रं सुखकरं' — यह शांति स्तोत्र सुख प्रदान करता है। पाठ से न्यून-अधिक (कम-ज्यादा) के कर्म दोषों में देवी की शांति प्राप्त होती है।
✨ मंत्र सिद्धि (10 पाठ)
'दशावृत्त्या पठेद्यदि मन्त्रसिद्धिर्भवेत्तस्य' — मंत्र सिद्धि की इच्छा से 10 बार पाठ करने पर मंत्र सिद्धि निश्चित होती है।
🌑 ग्रहण में पाठ
'चन्द्रसूर्योपरागे च' — चंद्र या सूर्य ग्रहण में पाठ से तीर्थ कोटि (करोड़ों तीर्थों) और दान कोटि (करोड़ों दानों) का फल मिलता है।
🏆 सर्व विजय
'सर्वभद्रमवाप्नोति सर्वत्र विजयी भवेत्' — सर्व भद्र (मंगल) प्राप्त होता है और सर्वत्र विजय होती है।

भैरव वचन: "लभते नात्र सन्देहः सत्यं सत्यं मयोदितम्" — इसमें कोई संदेह नहीं, यह सत्य है, सत्य है, मैंने कहा है।

पाठ के अद्भुत लाभ (Benefits)

इस शांति स्तोत्र के नियमित पाठ से साधक को निम्नलिखित दिव्य लाभ प्राप्त होते हैं:

  • शांति प्राप्ति: 'शान्तिर्भव ममार्चने' — जीवन में शांति और स्थिरता।
  • पाप नाश: 'पापौघहारिणी' — पापों के समूह का नाश।
  • दुःख शमन: 'दुःखप्रशमनी' — सभी दुःखों का शमन।
  • विपत्ति नाश: 'सर्वविपत्तिघ्नी' — सभी विपत्तियों का नाश।
  • शत्रु नाश: 'घोरे च शत्रुघ्ने' — घोर शत्रुओं का नाश।
  • सिद्धि प्राप्ति: 'सिद्धिदात्री' — अष्ट सिद्धियों की प्राप्ति।
  • मंत्र सिद्धि: 10 पाठ से बाला मंत्र की सिद्धि।
  • तीर्थ कोटि फल: ग्रहण में पाठ से करोड़ों तीर्थों का फल।
  • सर्व भद्र: सभी प्रकार का मंगल।
  • सर्वत्र विजय: हर क्षेत्र में विजय।

साधना और पाठ विधि (Recitation Method)

इस शांति स्तोत्र की सिद्धि के लिए निम्न विधि से पाठ करें:
1. नियमित पाठ
प्रातःकाल या संध्या में पाठ करें। 16 श्लोक होने से 5-7 मिनट में पाठ पूर्ण होता है।
2. मंत्र सिद्धि हेतु
बाला मंत्र की सिद्धि के लिए इस स्तोत्र का 10 बार (दशावृत्ति) पाठ करें।
3. ग्रहण काल में
चंद्र या सूर्य ग्रहण के समय पाठ करने से तीर्थ कोटि और दान कोटि फल प्राप्त होता है।
4. शांति हेतु
मानसिक अशांति या कठिन परिस्थिति में इस स्तोत्र का पाठ शांति प्रदान करता है।

विशेष: यह चिन्तामणि तंत्र का स्तोत्र है और भैरव द्वारा कथित है। भैरव-भैरवी संवाद परंपरा के अनुसार यह अत्यंत प्रामाणिक और फलदायी है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. यह स्तोत्र किस ग्रंथ से है?

यह स्तोत्र 'चिन्तामणि तंत्र' से लिया गया है। कोलोफोन में 'इति चिन्तामणितन्त्रे श्री बाला शान्ति स्तोत्रम्' लिखा है। इसे स्वयं भगवान भैरव ने कहा है (श्रीभैरव उवाच)।

2. 'शान्तिर्भव ममार्चने' का क्या अर्थ है?

'शान्तिः भव मम अर्चने' = मेरी पूजा/आराधना में शांति स्वरूप हो जाओ। यह प्रत्येक श्लोक का समापन वाक्य है। इस स्तोत्र में 12 बार यह पंक्ति आती है।

3. मंत्र सिद्धि के लिए कितने पाठ आवश्यक हैं?

श्लोक 14 में स्पष्ट कहा गया है: 'मन्त्रसिद्धिकामनया दशावृत्त्या पठेद्यदि। मन्त्रसिद्धिर्भवेत्तस्य नात्र कार्या विचारणा॥' अर्थात मंत्र सिद्धि की इच्छा से 10 बार पाठ करने पर मंत्र सिद्धि निश्चित होती है।

4. ग्रहण में पाठ का क्या फल है?

श्लोक 15-16 में फलश्रुति है: चंद्र या सूर्य ग्रहण में पाठ से साधक बाला के सद्मन (निवास) में सुखपूर्वक रहता है, तीर्थ कोटि (करोड़ों तीर्थों) और दान कोटि (करोड़ों दानों) का फल मिलता है।

5. 'बिन्दुनादरूपे' का क्या अर्थ है?

'बिन्दु' = श्री चक्र का केंद्रीय बिंदु (परम चैतन्य)। 'नाद' = प्रणव की ध्वनि (ॐ)। देवी बिंदु और नाद स्वरूप हैं, जो श्री विद्या की मूल तत्त्व हैं।

6. 'मुण्डमाले' और 'कापालिकी' का क्या अर्थ है?

'मुण्डमाला' = मुंडों (खोपड़ियों) की माला धारण करने वाली। 'कापालिकी' = कपाल (खोपड़ी) धारण करने वाली। यह देवी के उग्र तांत्रिक स्वरूप का वर्णन है।

7. 'कुलमार्गरते' का क्या अर्थ है?

'कुल मार्ग' = तांत्रिक उपासना का एक प्रमुख मार्ग (कौलाचार)। देवी कुल मार्ग में रत हैं और कुलेश्वरी (कुल की स्वामिनी) हैं। यह श्री विद्या कौल परंपरा का संदर्भ है।

8. 'श्मशानस्य देवमूले' का क्या अर्थ है?

'श्मशान' = शमशान भूमि। 'देवमूल' = देवता का मूल/आधार। देवी श्मशान के देवता (शिव) के मूल में विराजमान हैं। यह तांत्रिक साधना स्थल का संकेत है।

9. इस स्तोत्र के प्रमुख विशेषण क्या हैं?

प्रमुख विशेषण: जगद्धात्री, पापौघहारिणी, कल्पान्तकारिणी, सर्वविपत्तिघ्नी, बिन्दुनादरूपा, कल्याणकारिणी, शत्रुघ्नी, जगद्योनि, महायोनि, सिद्धिदात्री, कुलेश्वरी।

10. इस स्तोत्र के मुख्य लाभ क्या हैं?

इस स्तोत्र के पाठ से: (1) शांति, (2) पापों का नाश, (3) दुःख शमन, (4) विपत्ति नाश, (5) शत्रु नाश, (6) सिद्धि प्राप्ति, (7) मंत्र सिद्धि (10 पाठ), (8) तीर्थ कोटि फल (ग्रहण में), (9) सर्व भद्र, (10) सर्वत्र विजय।