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Sri Bala Stavaraja – श्री बाला स्तवराजः (Indra Krit)

Sri Bala Stavaraja – श्री बाला स्तवराजः (Indra Krit)
॥ विनियोगः ॥ अस्य श्रीबालास्तवराजस्तोत्रस्य श्रीमृत्युञ्जय ऋषिः, ककुप्छन्दः, श्रीबाला देवता, क्लीं बीजं, सौः शक्तिः, ऐं कीलकं, भोगमोक्षार्थे जपे विनियोगः । ॥ करन्यासः ॥ ऐं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । क्लीं तर्जनीभ्यां नमः । सौः मध्यमाभ्यां नमः । ऐं अनामिकाभ्यां नमः । क्लीं कनिष्ठिकाभ्यां नमः । सौः करतल करपृष्ठाभ्यां नमः । ॥ हृदयादिन्यासः ॥ ऐं हृदयाय नमः । क्लीं शिरसे स्वाहा । सौः शिखायै वषट् । ऐं कवचाय हुम् । क्लीं नेत्रत्रयाय वौषट् । सौः अस्त्राय फट् । भूर्भुवस्सुवरों ॥ इति दिग्बन्धः ॥ ॥ ध्यानम् ॥ अक्षपुस्तधरां रक्तां वराभयकराम्बुजाम् । चन्द्रमुण्डां त्रिनेत्रां च ध्यायेद्बालां फलप्रदाम् ॥ १ ॥ ऐं त्रैलोक्यविजयायै हुं फट् । क्लीं त्रिगुणरहितायै हुं फट् । सौः सर्वैश्वर्यदायिन्यै हुं फट् ॥ २ ॥ नातः परतरा सिद्धिर्नातः परतरा गतिः । नातः परतरो मन्त्रः सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥ ३ ॥ रक्तां रक्तच्छदां तीक्ष्णां रक्तपां रक्तवाससीम् । स्वरूपां रत्नभूषां च ललज्जिह्वां परां भजे ॥ ४ ॥ त्रैलोक्यजननीं सिद्धां त्रिकोणस्थां त्रिलोचनाम् । त्रिवर्गफलदां शान्तां वन्दे बीजत्रयात्मिकाम् ॥ ५ ॥ श्रीबालां वारुणीप्रीतां बालार्ककोटिद्योतिनीम् । वरदां बुद्धिदां श्रेष्ठां वामाचारप्रियां भजे ॥ ५ ॥ चतुर्भुजां चारुनेत्रां चन्द्रमौलिं कपालिनीम् । चतुःषष्टियोगिनीशां वीरवन्द्यां भजाम्यहम् ॥ ७ ॥ कौलिकां कलतत्त्वस्थां कौलावाराङ्कवाहनाम् । कौसुम्भवर्णां कौमारीं कवर्मधारिणीं भजे ॥ ८ ॥ द्वादशस्वररूपायै नमस्तेऽस्तु नमो नमः । नमो नमस्ते बालायै कारुण्यायै नमो नमः ॥ ९ ॥ विद्याविद्याद्यविद्यायै नमस्तेऽस्तु नमो नमः । विद्याराज्ञ्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः ॥ १० ॥ ऐं बालायै विद्महे क्लीं त्रिभुवनेश्वर्यै धीमहि । सौः तन्नो देवी प्रचोदयात् । ऐं बालायै स्वाहा ॥ ११ ॥ द्वादशान्तालयां श्रेष्ठां षोडशाधारगां शिवाम् । पञ्चेन्द्रियस्वरूपाख्यां भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥ १२ ॥ ब्रह्मविद्यां ब्रह्मरूपां ब्रह्मज्ञानप्रदायिनीम् । वसुप्रदां वेदरूपां वन्दे बालां शुभाननाम् ॥ १३ ॥ अघोरां भीषणामाद्यामनन्तोपरिसंस्थिताम् । देवदेवेश्वरीं भद्रां श्रीबालां प्रणमाम्यहम् ॥ १४ ॥ भवप्रियां भवाधारां भगरूपां भगप्रियाम् । भयानकां भूतधात्रीं भूदेवपूजितां भजे ॥ १५ ॥ अकारादिक्षकारान्तां क्लीबाक्षरात्मिकां पराम् । वन्दे वन्दे महामायां भवभव्यभयापहाम् ॥ १६ ॥ नाडीरूप्यै नमस्तेऽस्तु धातुरूप्यै नमो नमः । जीवरूप्यै नमस्यामि ब्रह्मरूप्यै नमो नमः ॥ १७ ॥ नमस्ते मन्त्ररूपायै पीठगायै नमो नमः । सिंहासनेश्वरि तुभ्यं सिद्धिरूप्यै नमो नमः ॥ १८ ॥ नमस्ते मातृरूपिण्यै नमस्ते भैरवप्रिये । नमस्ते चोपपीठायै बालायै सततं नमः ॥ १९ ॥ योगेश्वर्यै नमस्तेऽस्तु योगदायै नमो नमः । योगनिद्रास्वरूपिण्यै बालादेव्यै नमो नमः ॥ २० ॥ सुपुण्यायै नमस्तेऽस्तु सुशुद्धायै नमो नमः । सुगुह्यायै नमस्तेऽस्तु बालादेव्यै नमो नमः ॥ २१ ॥ इतीदं स्तवराजाख्यं सर्वस्तोत्रोत्तमोत्तमम् । ये पठन्ति महेशानि पुनर्जन्म न विद्यते ॥ २२ ॥ सर्वपापहरं पुण्यं सर्वस्फोटविनाशकम् । सर्वसिद्धिप्रदं श्रेष्ठं भोगैश्वर्यप्रदायकम् ॥ २३ ॥ भूर्भुवस्सुवरों ॥ इति दिग्विमोकः ॥ ॥ इति श्री बाला स्तवराजः सम्पूर्णम् ॥ इतर पश्यतु ।

श्री बाला स्तवराजः का परिचय (Introduction)

श्री बाला स्तवराजः (Sri Bala Stavaraja), श्री विद्या कुल की आराध्य देवी, माँ बाला त्रिपुरसुन्दरी की स्तुति में रचा गया सर्वश्रेष्ठ स्तोत्र है। इसे "स्तवराज" इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह सभी स्तुतियों का राजा है। तंत्र शास्त्रों के अनुसार, इस पवित्र स्तोत्र की रचना देवराज इन्द्र ने की थी जब वे अपनी शक्तियाँ खो बैठे थे और दैत्यों द्वारा पराजित हो गए थे। माँ बाला की कृपा से उन्हें पुनः अपना सिंहासन और वैभव प्राप्त हुआ।

बाला त्रिपुरसुन्दरी साक्षात् माँ ललिता (महात्रिपुरसुन्दरी) की ही 9 वर्षीय कन्या स्वरूप हैं। वे सदा 16 साल की रहने वाली देवी षोडशी से पूर्व की अवस्था हैं। उनका मंत्र 'ऐं क्लीं सौः' (Aim Kleem Sauh) अत्यंत शक्तिशाली बीजाक्षरों का समूह है, जो क्रमशः वाग्भव (ज्ञान), कामराज (इच्छापूर्ति), और शक्ति (क्रिया) का प्रतीक है।

"नातः परतरा सिद्धिर्नातः परतरा गतिः। नातः परतरो मन्त्रः सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥"


भावार्थ: इस स्तोत्र से बढ़कर न कोई सिद्धि है, न कोई गति (मोक्ष का मार्ग), और न ही कोई मंत्र है। यह मैं (शिव/इन्द्र) सत्य कहता हूँ, सत्य कहता हूँ।

स्तोत्र पाठ के चमत्कारी लाभ (Miraculous Benefits)

इस स्तोत्र की फलश्रुति में कहा गया है कि इसका पाठ "सर्वसिद्धप्रदं" है, अर्थात यह सभी प्रकार की सिद्धियाँ देने वाला है। इसके नियमित पाठ से साधक को निम्नलिखित विशेष लाभ प्राप्त होते हैं:

  • अद्भुत वाक सिद्धि (Eloquence): देवी बाला ज्ञान और वाणी की देवी सरस्वती का ही, तांत्रिक रूप हैं। इस स्तोत्र के पाठ से साधक की वाणी में ओज आता है। वह जो कहता है, सत्य होने लगता है। कवि, लेखक, वकील, और वक्ताओं के लिए यह वरदान समान है।
  • शत्रु और बाधा विनाश: यह स्तोत्र "सर्वस्फोटविनाशकम्" है। यह जीवन में आने वाली अचानक विपत्तियों, गुप्त शत्रुओं के षड्यंत्रों, और कानूनी बाधाओं को जड़ से नष्ट कर देता है।
  • अखंड धन और ऐश्वर्य: इन्द्र ने इसके द्वारा अपना खोया हुआ राज्य पाया था। श्रद्धापूर्वक पाठ करने वाले साधक को कभी दरिद्रता का मुख नहीं देखना पड़ता। यह अष्टलक्ष्मी प्रदान करने वाला है।
  • मोक्ष और पुनर्जन्म से मुक्ति: श्लोक 22 में स्पष्ट कहा गया है - "ये पठन्ति महेशानि पुनर्जन्म न विद्यते"। अर्थात, इसका पाठ करने वाले को मोक्ष प्राप्त होता है और वह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है।
  • विद्या और स्मरण शक्ति: विद्यार्थियों के लिए यह सर्वोत्तम है। यह स्मरण शक्ति (Memory) को तीक्ष्ण करता है और कठिन विषयों को समझने की बुद्धि प्रदान करता है।
  • सम्मोहन और आकर्षण: "क्लीं" बीज के प्रभाव से साधक के व्यक्तित्व में एक दिव्य आकर्षण पैदा होता है, जिससे लोग उसकी ओर स्वतः खिंचे चले आते हैं।

साधना और पाठ विधि (Recitation Method)

इस स्तोत्र का पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए सही विधि का पालन आवश्यक है:
1. उत्तम समय (Time)
प्रातः काल (ब्रह्म मुहूर्त) या संध्या वंदन का समय सर्वोत्तम है। तांत्रिक लाभ के लिए मध्य रात्रि (निशीथ काल) में पाठ करें।
2. आसन और दिशा
लाल रंग के ऊनी आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। लाल वस्त्र धारण करना अति शुभ है।
3. न्यास (Nyasa)
पाठ शुरू करने से पहले विनियोग और करन्यास (हाथों के अंगों का स्पर्श) अवश्य करें। यह शरीर को देवमय बनाता है और रक्षा करता है।
4. भोग (Offerings)
माँ बाला को दूध, मिश्री, खीर या शहद का भोग प्रिय है। गुड़हल (Hibiscus) का फूल चढ़ाने से वे अति शीघ्र प्रसन्न होती हैं।

तर्पण विधि: पाठ के अंत में जल से "श्री बाला त्रिपुरसुन्दरी तर्पयामि नमः" कहते हुए तर्पण करने से स्तोत्र सिद्ध होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री बाला स्तवराज का पाठ किसे करना चाहिए?

जो साधक वाक सिद्धि, विद्या, तर्क शक्ति, और जीवन में ऐश्वर्य चाहते हैं, उन्हें इसका पाठ अवश्य करना चाहिए। विशेष रूप से विद्यार्थियों और वक्ताओं के लिए यह रामबाण है।

2. बाला त्रिपुरसुन्दरी कौन हैं?

बाला त्रिपुरसुन्दरी, महात्रिपुरसुन्दरी (ललिता) की ही 9 वर्षीय कन्या रूप हैं। वे श्री विद्या कुल की प्रथम देवी हैं और अपार शक्ति व तेज की पुंज हैं।

3. इस स्तोत्र के रचयिता कौन हैं?

इस परम शक्तिशाली स्तोत्र की रचना स्वयं देवराज इन्द्र ने की थी। उन्होंने इसी स्तोत्र के प्रभाव से अपनी खोई हुई सत्ता और वैभव पुनः प्राप्त किया था।

4. क्या इसका पाठ रात्रि में किया जा सकता है?

हाँ, बाला देवी वामाचार (तांत्रिक) और दक्षिणाचार (वैदिक) दोनों माघ्यमों से पूजी जाती हैं। रात्रि में, विशेषकर शुक्रवार या पूर्णिमा की रात्रि में इसका पाठ विशेष फलदायी होता है।

5. क्या बिना दीक्षा के यह पाठ कर सकते हैं?

स्तोत्र पाठ के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य नहीं है, लेकिन यदि आपने श्री विद्या या बाला मंत्र की दीक्षा ली है, तो इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।

6. बाला स्तवराज का पाठ कितनी बार करना चाहिए?

नियमित एक बार पाठ पर्याप्त है। विशेष कामना पूर्ति के लिए 11 या 21 दिनों तक प्रतिदिन 3 बार पाठ करने का संकल्प लिया जा सकता है।

7. इस पाठ से कौन सी सिद्धियाँ मिलती हैं?

इस पाठ से मुख्य रूप से 'वाक सिद्धि' (जो बोलें वह सत्य हो), 'स्तंभन' (शत्रु की गति रोकना), और 'आकर्षण' (सम्मोहन) की शक्ति प्राप्त होती है।

8. नैवेद्य में क्या चढ़ाना चाहिए?

माँ बाला को दूध, खीर, मिश्री, या शहद का भोग अत्यंत प्रिय है। लाल फूल (गुड़हल) चढ़ाना भी बहुत शुभ माना जाता है।

9. क्या शत्रु बाधा में यह लाभकारी है?

जी हाँ, स्तोत्र में स्पष्ट वर्णन है कि यह 'सर्वस्फोटविनाशकम्' और 'सर्वसिद्धिप्रदं' है। यह गुप्त और प्रत्यक्ष दोनों प्रकार के शत्रुओं का दमन करता है।

10. इस स्तोत्र का मूल बीज मंत्र क्या है?

बाला त्रिपुरसुन्दरी का मूल मंत्र 'ऐं क्लीं सौः' (Aim Kleem Sauh) है। यह तीनों बीज (वाग्भव, कामराज, और शक्ति) इस स्तोत्र की शक्ति का आधार हैं।