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Sri Sarvamangala Stotram – श्री सर्वमङ्गला स्तोत्रम् (Brahma Kritam)

Sri Sarvamangala Stotram: The Hymn of Universal Auspiciousness

Sri Sarvamangala Stotram – श्री सर्वमङ्गला स्तोत्रम् (Brahma Kritam)
ब्रह्मोवाच । दुर्गे शिवेऽभये माये नारायणि सनातनि । जये मे मङ्गलं देहि नमस्ते सर्वमङ्गले ॥ १ ॥ दैत्यनाशार्थवचनो दकारः परिकीर्तितः । उकारो विघ्ननाशार्थवाचको वेदसम्मतः ॥ २ ॥ रेफो रोगघ्नवचनो गश्च पापघ्नवाचकः । भयशत्रुघ्नवचनश्चाऽऽकारः परिकीर्तितः ॥ ३ ॥ स्मृत्युक्तिस्मरणाद्यस्या एते नश्यन्ति निश्चितम् । अतो दुर्गा हरेः शक्तिर्हरिणा परिकीर्तिता ॥ ४ ॥ विपत्तिवाचको दुर्गश्चाऽऽकारो नाशवाचकः । दुर्गं नश्यति या नित्यं सा च दुर्गा प्रकीर्तिता ॥ ५ ॥ दुर्गो दैत्येन्द्रवचनोऽप्याकारो नाशवाचकः । तं ननाश पुरा तेन बुधैर्दुर्गा प्रकीर्तिता ॥ ६ ॥ शश्च कल्याणवचन इकारोत्कृष्टवाचकः । समूहवाचकश्चैव वाकारो दातृवाचकः ॥ ७ ॥ श्रेयः सङ्घोत्कृष्टदात्री शिवा तेन प्रकीर्तिता । शिवराशिर्मूर्तिमती शिवा तेन प्रकीर्तिता ॥ ८ ॥ शिवो हि मोक्षवचनश्चाऽऽकारो दातृवाचकः । स्वयं निर्वाणदात्री या सा शिवा परिकीर्तिता ॥ ९ ॥ अभयो भयनाशोक्तश्चाऽऽकारो दातृवाचकः । प्रददात्यभयं सद्यः साऽभया परिकीर्तिता ॥ १० ॥ राजश्रीवचनो माश्च याश्च प्रापणवाचकः । तां प्रापयति या नित्यं सा माया परिकीर्तिता ॥ ११ ॥ माश्च मोक्षार्थवचनो याश्च प्रापणवाचकः । तं प्रापयति या सद्यः सा माया परिकीर्तिता ॥ १२ ॥ नारायणार्धाङ्गभूता तेन तुल्या च तेजसा । सदा तस्य शरीरस्था तेन नारायणी स्मृता ॥ १३ ॥ निर्गुणस्य च नित्यस्य वाचकश्च सनातनः । सदा नित्या निर्गुणा या कीर्तिता सा सनातनी ॥ १४ ॥ जयः कल्याणवचनो ह्याकारो दातृवाचकः । जयं ददाति या नित्यं सा जया परिकीर्तिता ॥ १५ ॥ सर्वमङ्गलशब्दश्च सम्पूर्णैश्वर्यवाचकः । आकारो दातृवचनस्तद्दात्री सर्वमङ्गला ॥ १६ ॥ नामाष्टकमिदं सारं नामार्थसहसम्युतम् । नारायणेन यद्दत्तं ब्रह्मणे नाभिपङ्कजे ॥ १७ ॥ तस्मै दत्त्वा निद्रितश्च बभूव जगतां पतिः । मधुकैटभौ दुर्दान्तौ ब्रह्माणं हन्तुमुद्यतौ ॥ १८ ॥ स्तोत्रेणानेन स ब्रह्मा स्तुतिं नत्वा चकार ह । साक्षात् स्तुता तदा दुर्गा ब्रह्मणे कवचं ददौ ॥ १९ ॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे श्रीकृष्णजन्मखण्डे सप्तविंशोऽध्याये ब्रह्मकृत सर्वमङ्गला स्तोत्रम् ।

श्री सर्वमङ्गला स्तोत्रम् - परिचय (Introduction)

श्री सर्वमङ्गला स्तोत्रम् (Sri Sarvamangala Stotram) शक्ति साहित्य का एक दुर्लभ रत्न है। प्रायः लोग 'सर्वमङ्गल माङ्गल्ये' मंत्र को ही जानते हैं, जो देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती) का अंग है। परन्तु यह स्तोत्र ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्ण जन्म खण्ड, अध्याय 27) से उद्धृत है। इसकी रचना सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी ने एक अत्यंत संकटपूर्ण स्थिति में की थी।

कथा के अनुसार, जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में थे, तब उनके कानों के मैल से दो भयानक असुर—मधु और कैटभ—उत्पन्न हुए। वे ब्रह्मा जी को मारने के लिए दौड़े। अपनी रक्षा के लिए ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु को जगाने का प्रयास किया, किन्तु योगनिद्रा (देवी शक्ति) के प्रभाव के कारण वे नहीं जागे। तब ब्रह्मा जी ने उसी आद्या शक्ति, योगमाया की स्तुति की, ताकि वे विष्णु जी को निद्रा से मुक्त करें और असुरों का नाश हो सके।

यह स्तोत्र केवल एक प्रार्थना नहीं है, बल्कि यह 'नाम-रहस्य' (Science of Names) है। इसमें ब्रह्मा जी ने देवी के 8 प्रमुख नामों के प्रत्येक अक्षर का अर्थ बताया है, यह दर्शाते हुए कि कैसे हर अक्षर में एक विशिष्ट दैवीय शक्ति और मंत्र-वीर्य छिपा हुआ है।

विशिष्ट महत्व और नाम-रहस्य (Significance)

इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह देवी के नामों की 'निरुक्ति' (Etymological Meaning) प्रदान करता है। यह वैदिक और तांत्रिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है:

  • 'दुर्गा' (Durga): स्तोत्र बताता है कि 'द' दैत्यों का नाश करने वाला है, 'उ' विघ्नों को हरने वाला है, 'र' रोगों को मिटाने वाला है, 'ग' पापों का क्षय करने वाला है और 'आ' भय तथा शत्रुओं का नाश करने वाला है। अतः 'दुर्गा' नाम स्वयं में एक पूर्ण रक्षा कवच है।

  • 'शिवा' (Shivaa): यहाँ 'शिव' का अर्थ केवल भगवान शंकर नहीं, बल्कि 'मोक्ष' और 'परम कल्याण' है। देवी 'शिवा' इसलिए हैं क्योंकि वे मोक्ष दात्री और कल्याण स्वरूपिणी हैं।

  • 'अभया' (Abhaya): जो भय का नाश करती है और अभयदान देती है, वही 'अभया' है। संसार में भय ही सबसे बड़ा बंधन है, और देवी उससे मुक्ति देती हैं।

  • 'माया' (Maya): साधारण अर्थों में माया को भ्रम कहा जाता है, लेकिन यहाँ ब्रह्मा जी कहते हैं कि जो 'राजश्री' (ऐश्वर्य) और 'मोक्ष' दोनों को प्राप्त (प्रापण) कराती है, वह 'माया' है।

  • 'सनातनी' (Sanatani): जो निर्गुण (गुणों से परे) और नित्य (शाश्वत) है, जिसका कभी नाश नहीं होता, वह आदि शक्ति 'सनातनी' है।

  • 'सर्वमङ्गला' (Sarvamangala): श्लोक 16 में स्पष्ट किया गया है कि 'मंगल' शब्द का अर्थ सम्पूर्ण ऐश्वर्य है। जो सम्पूर्ण ऐश्वर्यों को देने वाली (दात्री) हैं, वे ही 'सर्वमङ्गला' हैं।

फलश्रुति लाभ (Benefits)

इस स्तोत्र का पाठ ब्रह्मा जी द्वारा रचित होने के कारण अमोघ (चूकने वाला नहीं) माना जाता है। इसके मुख्य लाभ इस प्रकार हैं:

  • शत्रु और भय नाश: जैसा कि संदर्भ से स्पष्ट है, मधु-कैटभ जैसे प्रबल शत्रुओं के नाश के लिए इसकी रचना हुई थी। अतः यह शत्रुओं पर विजय और भय से मुक्ति के लिए राम-बाण है। मुकद्मे या विवाद में यह अत्यंत लाभकारी है।

  • वास्तु और गृह शांति: 'सर्वमङ्गला' नाम की शक्ति से घर में सुख, शांति और मंगल का वातावरण बनता है। कलह और अशांति दूर होती है।

  • धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष: यह स्तोत्र चतुर्वर्ग फल प्रदाता है। यह न केवल सांसारिक भोग (राजश्री) देता है, बल्कि मोक्ष (शिवा रूप में) भी प्रदान करता है।

  • देवी कृपा और सुरक्षा: श्लोक 19 में कहा गया है कि स्तुति से प्रसन्न होकर दुर्गा ने ब्रह्मा को 'कवच' दिया। इसका नियमित पाठ साधक के चारों ओर एक सुरक्षा घेरा बना देता है।

पाठ विधि (Ritual Method)

स्तोत्र की पूर्ण ऊर्जा को जाग्रत करने के लिए विधि का पालन आवश्यक है:

दैनिक पाठ विधि:

  1. शुद्धि: स्नान कर स्वच्छ वस्त्र (लाल या पीले) धारण करें।
  2. आसन: ऊनी आसन या कुशा का आसन बिछाएं। मुख उत्तर या पूर्व दिशा की ओर रखें।
  3. दीप प्रज्वलन: घी का दीपक जलाएं। देवी को लाल पुष्प (गुड़हल या गुलाब) अर्पित करें।
  4. संकल्प: हाथ में जल और अक्षत लेकर अपनी मनोकामना (जैसे शत्रु नाश, विवाह, या मोक्ष) का संकल्प करें।
  5. पाठ: 11 या 21 बार इस स्तोत्र का पाठ करें। उच्चारण स्पष्ट रखें, विशेषकर नामों (दुर्गा, शिवा आदि) पर ध्यान दें।
  6. आरती: अंत में कपूर या घी के दीपक से देवी की आरती करें और क्षमा प्रार्थना करें।

विशेष अवसर:

नवरात्रि, गुप्त नवरात्रि, अष्टमी और चतुर्दशी तिथियों पर इसका पाठ विशेष फलदायी होता है। संकट काल में, या जब कोई रास्ता न सूझ रहा हो, तो इस स्तोत्र का अनुष्ठान (सवा लाख पाठ या 1008 पाठ) 41 दिनों में पूरा करने से चमत्कारिक परिणाम मिलते हैं।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. यह स्तोत्र किस पुराण से लिया गया है?

यह स्तोत्र 'ब्रह्मवैवर्त पुराण' के 'श्रीकृष्ण जन्म खण्ड' के 27वें अध्याय से लिया गया है। इसे स्वयं भगवान ब्रह्मा ने तब रचा था जब वे मधुकैटभ दैत्यों से भयभीत थे और भगवान विष्णु योगनिद्रा में थे।

2. क्या यह 'सर्वमङ्गल माङ्गल्ये' मंत्र ही है?

नहीं, 'सर्वमङ्गल माङ्गल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके...' मंत्र 'दुर्गा सप्तशती' (मार्कण्डेय पुराण) का है। जबकि यह 'सर्वमङ्गला स्तोत्रम्' एक अलग और विस्तृत स्तुति है जिसमें देवी के नामों की व्युत्पत्ति समझाई गई है। दोनों का उद्देश्य देवी की प्रसन्नता ही है, परन्तु रचना अलग है।

3. 'दुर्गा' नाम का अर्थ इस स्तोत्र में क्या बताया गया है?

श्लोक 2, 3, 5 और 6 के अनुसार: 'द' कार दैत्यनाशक है, 'उ' कार विघ्ननाशक है, 'रेफ' (र) रोगनाशक है, 'ग' कार पापनाशक है, और 'आ' कार भय-शत्रु नाशक है। अर्थात जो दैत्य, विघ्न, रोग, पाप और भय का नाश करती हैं, वे 'दुर्गा' हैं।

4. 'नारायणी' नाम का क्या रहस्य है?

श्लोक 13 के अनुसार, देवी भगवान नारायण की अर्धांगिनी शक्ति हैं और उन्हीं के समान तेज वाली हैं। वे सदा नारायण के शरीर में और उनकी लीला में स्थित रहती हैं, इसलिए उन्हें 'नारायणी' कहा जाता है।

5. इस स्तोत्र के पाठ का मुख्य फल क्या है?

श्लोक 19 के अनुसार, ब्रह्मा जी ने इस स्तोत्र से स्तुति की और उन्हें देवी से अभय कवच प्राप्त हुआ। अतः इसका पाठ मुख्य रूप से भय-मुक्ति, शत्रु-विजय, और विषम परिस्थितियों में सुरक्षा प्रदान करता है। साथ ही यह मोक्ष और ऐश्वर्य भी देने वाला है।

6. 'शिवा' (Shivaa) नाम में कौन सा गुण छिपा है?

श्लोक 7-9 में बताया गया है कि 'श' कार कल्याणवाचक है, 'इ' कार कृष्ट (उत्तम) वाचक है, और 'वा' कार दाता है। जो मोक्ष रूपी परम कल्याण (शिव) को देने वाली हैं, वे ही 'शिवा' हैं। यह नाम मुक्तिदात्री शक्ति का प्रतीक है।

7. क्या इसका पाठ नवरात्रि में विशेष फलदायी है?

जी हाँ, नवरात्रि शक्ति साधना का महापर्व है। इस समय ब्रह्मांड में देवी शक्ति प्रबल रहती है। नवरात्रि में इस स्तोत्र का नित्य पाठ करने से घर के वास्तु दोष, ग्रह दोष और नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है।

8. 'माया' नाम को यहां कैसे परिभाषित किया गया है?

श्लोक 11-12 में कहा गया है कि 'मा' का अर्थ है राजश्री (Royal Prosperity) और मोक्ष। 'या' का अर्थ है प्राप्त कराने वाली। जो साधक को राजयोग और मोक्ष दोनों प्रदान करती हैं, वे 'माया' हैं। सामान्यतः माया को भ्रम समझा जाता है, किन्तु यहाँ इसे सिद्धिदात्री कहा गया है।

9. क्या स्त्रियाँ और पुरुष दोनों इसका पाठ कर सकते हैं?

बिल्कुल, देवी की भक्ति में लिंग-भेद नहीं है। ब्रह्मा जी (पुरुष) ने इसकी रचना की थी। कोई भी भक्त—स्त्री, पुरुष या बच्चा—पूर्ण श्रद्धा से इसका पाठ कर सकता है।

10. सर्वश्रेष्ठ पाठ विधि क्या है?

प्रातः काल स्नान करके, लाल वस्त्र धारण कर, पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा के आसन पर बैठें। घी का दीपक जलाएं और पहले गणेश जी का ध्यान करें, फिर संकल्प लेकर इस स्तोत्र का 1, 3, 5, 7 या 11 बार पाठ करें। अंत में क्षमा प्रार्थना करें।