Sri Renuka Stotram (Parashurama Kritam) – श्री रेणुका स्तोत्रम्

॥ श्री परशुराम उवाच ॥
ओं नमः परमानन्दे सर्वदेवमयी शुभे ।
अकारादिक्षकारान्तं मातृकामन्त्रमालिनी ॥ १ ॥
एकवीरे एकरूपे महारूपे अरूपिणी ।
अव्यक्ते व्यक्तिमापन्ने गुणातीते गुणात्मिके ॥ २ ॥
कमले कमलाभासे हृत्सत्प्रक्तर्णिकालये ।
नाभिचक्रस्थिते देवि कुण्डली तन्तुरूपिणी ॥ ३ ॥
वीरमाता वीरवन्द्या योगिनी समरप्रिये ।
वेदमाता वेदगर्भे विश्वगर्भे नमोऽस्तु ते ॥ ४ ॥
राममातर्नमस्तुभ्यं नमस्त्रैलोक्यरूपिणी ।
मह्यादिके पञ्चभूता जमदग्निप्रिये शुभे ॥ ५ ॥
यैस्तु भक्त्या स्तुता ध्यात्वा अर्चयित्वा पिते शिवे ।
भोगमोक्षप्रदे देवि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥ ६ ॥
नमोऽस्तु ते निरालम्बे परमानन्दविग्रहे ।
पञ्चभूतात्मिके देवि भूतभावविवर्जिते ॥ ७ ॥
महारौद्रे महाकाये सृष्टिसंहारकारिणी ।
ब्रह्माण्डगोलकाकारे विश्वरूपे नमोऽस्तु ते ॥ ८ ॥
चतुर्भुजे खड्गहस्ते महाडमरुधारिणी ।
शिरःपात्रधरे देवि एकवीरे नमोऽस्तु ते ॥ ९ ॥
नीलाम्बरे नीलवर्णे मयूरपिच्छधारिणी ।
वनभिल्लधनुर्वामे दक्षिणे बाणधारिणी ॥ १० ॥
रौद्रकाये महाकाये सहस्रार्जुनभञ्जनी ।
एकं शिरः पुरा स्थित्वा रक्तपात्रे च पूरितम् ॥ ११ ॥
मृतधारापिबं देवि रुधिरं दैत्यदेहजम् ।
रक्तवर्णे रक्तदन्ते खड्गलाङ्गलधारिणी ॥ १२ ॥
वामहस्ते च खट्वाङ्गं डमरुं चैव दक्षिणे ।
प्रेतवाहनके देवि ऋषिपत्नी च देवते ॥ १३ ॥
एकवीरे महारौद्रे मालिनी विश्वभैरवी ।
योगिनी योगयुक्ता च महादेवी महेश्वरी ॥ १४ ॥
कामाक्षी भद्रकाली च हुङ्कारी त्रिपुरेश्वरी ।
रक्तवक्त्रे रक्तनेत्रे महात्रिपुरसुन्दरी ॥ १५ ॥
रेणुकासूनुयोगी च भक्तानामभयङ्करी ।
भोगलक्ष्मीर्योगलक्ष्मीर्दिव्यलक्ष्मीश्च सर्वदा ॥ १६ ॥
कालरात्रि महारात्रि मद्यमांसशिवप्रिये ।
भक्तानां श्रीपदे देवि लोकत्रयविमोहिनी ॥ १७ ॥
क्लीङ्कारी कामपीठे च ह्रीङ्कारी च प्रबोध्यता ।
श्रीङ्कारी च श्रिया देवि सिद्धलक्ष्मीश्च सुप्रभा ॥ १८ ॥
महालक्ष्मीश्च कौमारी कौबेरी सिंहवाहिनी ।
सिंहप्रेतासने देवि रौद्री क्रूरावतारिणी ॥ १९ ॥
दैत्यमारी कुमारी च रौद्रदैत्यनिपातिनी ।
त्रिनेत्रा श्वेतरूपा च सूर्यकोटिसमप्रभा ॥ २० ॥
खड्गिनी बाणहस्ता चारूढा महिषवाहिनी ।
महाकुण्डलिनी साक्षात् कङ्काली भुवनेश्वरी ॥ २१ ॥
कृत्तिवासा विष्णुरूपा हृदया देवतामया ।
देवमारुतमाता च भक्तमाता च शङ्करी ॥ २२ ॥
चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रे स्वस्तिपद्मासनस्थिते ।
पञ्चवक्त्रा महागङ्गा गौरी शङ्करवल्लभा ॥ २३ ॥
कपालिनी देवमाता कामधेनुस्त्रयोगुणी ।
विद्या एकमहाविद्या श्मशानप्रेतवासिनी ॥ २४ ॥
देवत्रिगुणत्रैलोक्या जगत्त्रयविलोकिनी ।
रौद्रा वैतालि कङ्काली भवानी भववल्लभा ॥ २५ ॥
काली कपालिनी क्रोधा मातङ्गी वेणुधारिणी ।
रुद्रस्य न पराभूता रुद्रदेहार्धधारिणी ॥ २६ ॥
जया च विजया चैव अजया चापराजिता ।
रेणुकायै नमस्तेऽस्तु सिद्धदेव्यै नमो नमः ॥ २७ ॥
श्रियै देव्यै नमस्तेऽस्तु दीननाथे नमो नमः ।
जय त्वं देवदेवेशि सर्वदेवि नमोऽस्तु ते ॥ २८ ॥
देवदेवस्य जननि पञ्चप्राणप्रपूरिते ।
त्वत्प्रसादाय देवेशि देवाः क्रन्दन्ति विष्णवे ॥ २९ ॥
महाबले महारौद्रे सर्वदैत्यनिपातिनी ।
आधारा बुद्धिदा शक्तिः कुण्डली तन्तुरूपिणी ॥ ३० ॥
षट्चक्रमणे देवि योगिनि दिव्यरूपिणी ।
कामिका कामरक्ता च लोकत्रयविलोकिनी ॥ ३१ ॥
महानिद्रा मद्यनिद्रा मधुकैटभभञ्जिनी ।
भद्रकाली त्रिसन्ध्या च महाकाली कपालिनी ॥ ३२ ॥
रक्षिता सर्वभूतानां दैत्यानां च क्षयङ्करी ।
शरण्यं सर्वसत्त्वानां रक्ष त्वं परमेश्वरी ॥ ३३ ॥
त्वामाराधयते लोके तेषां राज्यं च भूतले ।
आषाढे कार्तिके चैव पूर्णे पूर्णचतुर्दशी ॥ ३४ ॥
आश्विने पौषमासे च कृत्वा पूजां प्रयत्नतः ।
गन्धपुष्पैश्च नैवेद्यैस्तोषितां पञ्चभिः सह ॥ ३५ ॥
यं यं प्रार्थयते नित्यं तं तं प्राप्नोति निश्चितम् ।
तत्त्वं मे वरदे देवि रक्ष मां परमेश्वरी ॥ ३६ ॥
तव वामाङ्कितं देवि रक्ष मे सकलेश्वरी ।
सर्वभूतोदये देवि प्रसाद वरदे शिवे ॥ ३७ ॥
॥ श्री देव्युवाच ॥
वरं ब्रूहि महाभाग राज्यं कुरु महीतले ।
मामाराध्यते लोके भयं क्वापि न विद्यते ॥ ३८ ॥
मम मार्गे च आयान्ती भीर्देवी मम सन्निधौ ।
अभार्यो लभते भार्यां निर्धनो लभते धनम् ॥ ३९ ॥
विद्यां पुत्रमवाप्नोति शत्रुनाशं च विन्दति ।
अपुत्रो लभते पुत्रान् बद्धो मुच्येत बन्धनात् ॥ ४० ॥
कामार्थी लभते कामं रोगी आरोग्यमाप्नुयात् ।
मम आराधनं नित्यं राज्यं प्राप्नोति भूतले ॥ ४१ ॥
सर्वकार्याणि सिद्ध्यन्ति प्रसादान्मे न संशयः ।
सर्वकार्याण्यवाप्नोति दीर्घायुश्च लभेत्सुखी ॥ ४२ ॥
॥ श्री परशुराम उवाच ॥
अत्र स्थानेषु भवतां अभयं कुरु सर्वदा ।
यं यं प्रार्थयते नित्यं तं तं प्राप्नोति निश्चितम् ॥ ४३ ॥
प्रयागे पुष्करे चैव गङ्गासागरसङ्गमे ।
स्नानं च लभते नित्यं नित्यं च चरणोदकम् ॥ ४४ ॥
इदं स्तोत्रम् पठेन्नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः ।
सर्वान् कामानवाप्नोति प्राप्यते परमं पदम् ॥ ४५ ॥
॥ इति श्रीवायुपुराणे परशुरामकृत श्रीरेणुकास्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥
श्री रेणुका स्तोत्रम् - परिचय
श्री रेणुका स्तोत्रम् भगवान परशुराम द्वारा अपनी माता रेणुका (यल्लम्मा) की स्तुति में रचा गया एक अत्यंत दुर्लभ और शक्तिशाली स्तोत्र है। इसका वर्णन वायु पुराण में मिलता है। दक्षिण भारत में देवी रेणुका को 'यल्लम्मा' (जगदम्बा) के रूप में पूजा जाता है, जो आरोग्य और शक्ति की अधिष्ठात्री देवी हैं।
यह स्तोत्र एक पुत्र (परशुराम) का अपनी माता (रेणुका) के प्रति सर्वोच्च प्रेम और भक्ति का प्रतीक है। इसमें देवी को 'एकवीरा' (अद्वितीय वीरांगना), 'महारौद्रा' (शत्रुओं के लिए भयानक), और 'जगत्त्रयविलोकिनी' (तीनों लोकों को देखने वाली) कहा गया है। देवी रेणुका ही मूल प्रकृति, कुण्डलिनी शक्ति और समस्त सिद्धियों की दात्री हैं।
मान्यता है कि भगवान परशुराम ने इसी स्तोत्र के द्वारा अपनी माता को प्रसन्न किया था और उनसे अभयदान प्राप्त किया था। यह स्तोत्र विशेष रूप से उन लोगों के लिए वरदान है जो असाध्य रोगों, विवाह बाधाओं या दरिद्रता से जूझ रहे हैं।
स्तोत्र में वर्णित लाभ (Benefits)
इस स्तोत्र के पाठ से निम्नलिखित चमत्कारी लाभ प्राप्त होते हैं, जैसा कि स्वयं देवी और परशुराम जी ने बताया है:
- विवाह योग: 'अभार्यो लभते भार्यां' - जिन पुरुषों या कन्याओं का विवाह नहीं हो रहा है, उन्हें सुयोग्य जीवनसाथी की प्राप्ति होती है।
- धन और ऐश्वर्य: 'निर्धनो लभते धनम्' - यह स्तोत्र दरिद्रता का नाश कर भक्त को धनवान बनाता है।
- संतान सुख: 'अपुत्रो लभते पुत्रान्' - निसंतान दंपत्तियों को वंश वृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।
- रोग मुक्ति: 'रोगी आरोग्यमाप्नुयात्' - यह स्तोत्र चर्म रोग, चेचक और अन्य गंभीर बीमारियों से मुक्ति दिलाने में सिद्ध माना जाता है।
- शत्रु नाश और अभय: 'शत्रुनाशं च विन्दति' और 'भयं क्वापि न विद्यते' - साधक को शत्रुओं पर विजय मिलती है और वह सर्वत्र निर्भय हो जाता है।
- सर्व कार्य सिद्धि: 'सर्वकार्याणि सिद्ध्यन्ति' - जीवन के सभी अटके हुए कार्य सिद्ध होते हैं और अंत में मोक्ष (परम पद) की प्राप्ति होती है।
पाठ विधि (Recitation Method)
इस स्तोत्र की पूर्ण सिद्धि और मनोकामना पूर्ति के लिए निम्नलिखित विधि का पालन करें:
- विशिष्ट तिथियां: आषाढ़ और कार्तिक मास की पूर्णिमा ('पूर्शे पूर्णचतुर्दशी') इस पाठ के लिए सर्वोत्तम है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक मंगलवार और शुक्रवार देवी पूजा के लिए शुभ दिन हैं।
- समय: त्रिसंध्या (प्रातः, मध्याह्न और संध्या) में पाठ करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है ('इदं स्तोत्रम् पठेन्नित्यं त्रिसन्ध्यं')।
- पूजन सामग्री: देवी को गंध (चंदन/कुमकुम), पुष्प, और नैवेद्य (खीर या मीठा भोग) अर्पित करें ('गन्धपुष्पैश्च नैवेद्यैस्तोषितां पञ्चभिः सह')।
- आसन और दिशा: पूर्व दिशा की ओर मुख करके शुद्ध ऊनी आसन पर बैठकर पाठ करें।
- विशेष प्रयोग: विवाह बाधा दूर करने के लिए लगातार 21 शुक्रवार तक 11 बार पाठ करें और देवी को हल्दी-कुमकुम चढ़ाएं।
FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. श्री रेणुका देवी कौन हैं?
श्री रेणुका देवी 21 बार पृथ्वी को क्षत्रिय-विहीन करने वाले भगवान परशुराम की जननी हैं। ऋषि जमदग्नि की पत्नी होने के नाते वे 'ऋषिपत्नी' भी हैं। दक्षिण भारत में उन्हें 'यल्लम्मा' के नाम से पूजा जाता है और वे शक्ति का उग्र और सौम्य दोनों रूप हैं।
2. इस स्तोत्र की रचना का उद्देश्य क्या था?
भगवान परशुराम ने अपनी माता को प्रसन्न करने के लिए यह स्तोत्र रचा था। इसमें उन्होंने माता के विराट स्वरूप (विश्वरूप, कालरात्रि, महाकाली) का वर्णन किया है और उनसे अभयदान मांगा है।
3. क्या यह विवाह में आने वाली बाधाओं को दूर करता है?
जी हाँ, यह विवाह के लिए बहुत शक्तिशाली प्रयोग है। श्लोक 39 में देवी स्वयं कहती हैं - 'अभार्यो लभते भार्यां' - अर्थात कुंवारों को योग्य जीवनसाथी प्राप्त होता है।
4. क्या असाध्य रोगों में इसका लाभ होता है?
श्लोक 41 के अनुसार 'रोगी आरोग्यमाप्नुयात्'। विशेषकर त्वचा रोग (जैसे कोढ़, सफेद दाग) और माता (चेचक/Chickenpox) निकलने पर देवी की स्तुति से तुरंत लाभ होता है। 'यल्लम्मा' को आरोग्य की देवी भी माना जाता है।
5. देवी को 'एकवीरा' क्यों कहा जाता है?
'एकवीरा' का अर्थ है एकमात्र वीरांगना या अद्वितीय शक्ति। देवी रेणुका अपने तेज और तपस्या से सम्पूर्ण विश्व में अद्वितीय हैं, और उन्होंने परशुराम जैसे महावीर को जन्म दिया।
6. रेणुका और यल्लम्मा एक ही हैं या अलग?
वे एक ही शक्ति के दो नाम हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, जब परशुराम ने माता का सिर जोड़ा, तो शरीर बदलने की घटना से 'यल्लम्मा' स्वरूप की उत्पत्ति मानी जाती है। दोनों मूलतः आदिशक्ति रेणुका ही हैं।
7. क्या इससे आर्थिक संकट दूर होता है?
हाँ। श्लोक 39 में कहा गया है - 'निर्धनो लभते धनम्'। जो भी दरिद्रता से ग्रस्त है, वह यदि श्रद्धा से इसका पाठ करे, तो उसे धन-धान्य और 'भोगलक्ष्मी' की प्राप्ति होती है।
8. पाठ करने की विधि क्या होनी चाहिए?
मंगलवार या शुक्रवार को स्नान करके लाल वस्त्र धारण करें। पूर्व दिशा की ओर मुख करें। देवी को हल्दी-कुमकुम और नीम के पत्ते अर्पित करें (विशेषकर दक्षिण भारतीय परंपरा में)। फिर स्तोत्र का पाठ करें।
9. क्या शत्रु भय और कोर्ट-कचहरी के मामलों में यह उपयोगी है?
बिल्कुल। श्लोक 40 में 'शत्रुनाशं च विन्दति' का स्पष्ट उल्लेख है। इसके पाठ से शत्रु परास्त होते हैं और साधक को 'अभय' (निडरता) प्राप्त होती है।
10. 'मातृकामन्त्रमालिनी' का क्या अर्थ है?
पहले श्लोक में देवी को 'अकारादिक्षकारान्तं मातृकामन्त्रमालिनी' कहा गया है। इसका अर्थ है कि 'अ' से 'क्ष' तक सभी 51 अक्षर (मातृकाएं) देवी के ही स्वरूप हैं। वे ही समस्त मंत्रों और ज्ञान की जननी हैं।
11. संतान प्राप्ति के लिए क्या प्रावधान है?
श्लोक 40 में 'अपुत्रो लभते पुत्रान्' का वरदान है। जो निसंतान दंपत्ति सच्चे मन से देवी की आराधना करते हैं, उनकी गोद अवश्य भरती है।
12. परशुराम जी ने किन तीर्थों का महत्व बताया है?
श्लोक 44 में 'प्रयागे पुष्करे चैव गङ्गासागरसङ्गमे' का वर्णन है। अर्थात इस स्तोत्र का पाठ करने वाले को प्रयाग, पुष्कर और गंगासागर में स्नान करने जितना पुण्य नित्य घर बैठे ही मिल जाता है।