Panchastavi 5. Sakalajanani Stava – पञ्चस्तवि – ५. सकलजननीस्तवः

सकलजननीस्तवः - परिचय एवं महत्व
सकलजननीस्तवः (Sakalajanani Stava) महान तांत्रिक ग्रंथ 'पञ्चस्तवी' (Panchastavi) का पाँचवाँ और अंतिम भाग है। 'सकलजननी' का अर्थ है - 'समस्त चराचर जगत की माता'। इस स्तोत्र में माँ भगवती के उस विराट स्वरूप का वर्णन है जो समस्त ब्रह्मांड को अपने गर्भ में धारण करती है।
यह स्तोत्र कश्मीरी शैव दर्शन (Kashmir Shaivism) का एक अनुपम रत्न है। कश्मीरी शैव मत में शक्ति को शिव से अभिन्न माना जाता है। यहाँ 'माया' (Illusion) को मिथ्या नहीं, बल्कि शिव की 'स्वातंत्र्य शक्ति' (Freedom/Play) माना गया है। सकलजननीस्तवः इसी दार्शनिक भाव को भक्ति रस में डुबोकर प्रस्तुत करता है।
इसमें कुल 38 श्लोक हैं, जो अत्यंत गंभीर और रहस्यमय हैं। जहाँ 'लघुस्तव' में शब्द-जाल की चतुरता थी और 'चर्चास्तव' में दार्शनिक विमर्श था, वहीं 'सकलजननीस्तव' में पूर्ण समर्पण (Total Surrender) और अद्वैत अनुभूति की प्रधानता है। कवि यह स्वीकार करता है कि "हे माँ! तुम ही सब कुछ हो - विद्या भी, अविद्या भी; बंधन भी और मोक्ष भी।"
प्रमुख विषय (Key Themes)
सर्वव्यापकता (Omnipresence)
कवि कहते हैं कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश से लेकर एक क्षुद्र कीट तक - सब में जो चेतना है, वह आप ही हैं। जैन, बौद्ध, नैैयायिक आदि जिस भी 'परम सत्य' की खोज कर रहे हैं, वह अंततः आप (शक्ति) ही हैं, केवल नाम भिन्न हैं (श्लोक 33)।
माया और मोक्ष दोनों की दात्री
साधारणतः माया को बंधन माना जाता है, किन्तु यहाँ कहा गया है कि आप ही अपनी लीला से जीवों को बांधती हैं और अपनी कृपा से मुक्त करती हैं। यह (Prapatti) शरणागति का भाव जगाता है (श्लोक 1)।
कुण्डलिनी योग
अंतिम श्लोकों में (विशेषकर 37-38) मूलाधार से लेकर सहस्रार तक कुण्डलिनी के जागरण और षट-चक्रों के भेदन का सुंदर संकेत है।
पाठ के लाभ (Benefits)
- आत्म-ज्ञान की प्राप्ति: यह स्तोत्र अज्ञान के आवरण को हटाकर साधक को 'शिवोऽहम्' (मैं ही शिव हूँ) की अनुभूति कराता है।
- भय मुक्ति: जीवन-मृत्यु का भय समाप्त होता है क्योंकि साधक जान लेता है कि हर अवस्था में माँ साथ हैं।
- वाक-सिद्धि: पञ्चस्तवी के अन्य भागों की तरह, यह भी वाणी और कवित्व शक्ति को जागृत करता है।
- सर्वत्र समभाव: इसके नित्य पाठ से व्यक्ति में द्वेष, ईर्ष्या और भेद-भाव समाप्त हो जाता है।