Panchastavi 4. Amba Stava – पञ्चस्तवि (अम्बास्तवः) | Meaning, Benefits & Recitation

॥ अम्बास्तवः - परिचय (Introduction) ॥
पञ्चस्तवि (Panchastavi) कश्मीरी शैव दर्शन और शाक्त परंपरा का एक अमूल्य रत्न है। यह पांच दिव्य स्तोत्रों का संग्रह है, जिनमें अम्बास्तवः (Amba Stava) चौथा सोपान है। जैसा कि नाम से ज्ञात होता है, 'अम्बा' अर्थात 'माँ'। यह स्तोत्र परम चेतना (शिव-शक्ति) को जगदम्बा के रूप में संबोधित करता है।
इसकी रचना संभवतः महान आचार्य श्रीधर्माचार्य द्वारा की गई थी। अम्बास्तव की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सरलता और वात्सल्य भाव है। यहाँ ज्ञान और योग की गूढ़ बातें - जैसे नाद, बिन्दु, कुण्डलिनी जागरण और षटचक्र भेदन - एक बालक की प्रार्थना के रूप में सहजता से प्रकट हुई हैं। साधक एक अबोध शिशु की भांति माँ के अंचल में छिप जाना चाहता है।
इस स्तोत्र में देवी त्रिपुरसुन्दरी को केवल एक पौराणिक देवी नहीं, अपितु सम्पूर्ण अस्तित्व का मूल कारण, 'चिति' (विशुद्ध चेतना) और 'आनन्द' का स्रोत माना गया है। यह अद्वैत भाव का प्रतिपादन करता है, जहाँ भक्त और भगवान का भेद मिट जाता है और केवल एक 'अम्बा' ही शेष रहती हैं।
॥ स्तोत्र भावार्थ (Meaning) ॥
श्लोक १ जिसे मुनिजन 'पुरातन प्रकृति' (मूल प्रकृति) कहते हैं, जिसे वेदों के रहस्य को जानने वाले 'विद्या' (ब्रह्मविद्या) कहते हैं, जो भगवान शंकर के अर्धनारीश्वर रूप में सुशोभित हैं; उस देवी की मैं अनन्य भाव से शरण लेता हूँ (मेरे पास कोई अन्य सहारा नहीं है)।
श्लोक २ हे माँ (अम्ब)! आपकी स्तुति करने में तो वाणी की रचनाएं (कविताओं के शब्द) भी कुंठित (असमर्थ) हो जाती हैं और अकर्तृक (चुप) रह जाती हैं। फिर भी, मुझ बालक की यह बेतुकी (असमंजस) स्तुति भी, आप जो वात्सल्य से भरे हृदय वाली हैं, को प्रसन्न करे। (जैसे माँ अपने बच्चे की तोतली बोली से खुश होती है)।
श्लोक ३ हे देवी! आप 'व्योम' (चिदाकाश), 'बिन्दु', 'नाद', 'चन्द्ररेखा', 'वाग्भव-तनु' (वाक् शक्ति) और 'मातृका' (वर्णमाला) के रूप में विराजमान हैं। आप निरंतर बहने वाले सुख और ज्ञान (बोध) के अमृत स्वरूप वाली हैं। आप केवल भाग्यवान लोगों के मन में ही प्रकाशित होती हैं।
श्लोक ४ हे माँ! तीनों लोकों में वे ही लोग धन्य हैं जो रोमांच से भरे शरीर, हमेशा प्रेम-अश्रु बहाते नेत्रों, और गदगद (रुंधे हुए) कंठ से निकली वाणी द्वारा आपके चरण-कमलों की उपासना करते हैं।
श्लोक ५ जो मुख आपकी स्तुति के लिए उद्यत (तैयार) है, जो सिर आपको नमस्कार करता है, और जो चित्त (मन) आप में ही लीन रहता है; हे अम्ब! ये (मुख, सिर और मन) किसी विरले पुण्यात्मा को ही किसी विशेष तपस्या के फल से प्राप्त होते हैं।
श्लोक ६ हे भवानी! आप मूलाधार (मूल-आलवाल) के छिद्र से बिजली की लता (तटिल्लता) की तरह चमकती हुई उठती हैं। आप (शरीर के) छह कमलों (षटचक्रों) को भेदकर, परम अमृत रूपी जल को बरसाती हुई, पुनः सहस्रार (ध्रुवमण्डल) के चन्द्रमा में प्रवेश (विश्राम) करती हैं। (यह कुण्डलिनी योग का वर्णन है)।
श्लोक ७ हे देवी! जब आपके एक सुन्दर कटाक्ष (दृष्टि) ने कामदेव को, जिसे शिवजी ने जला दिया था, पुनः अनेक रूपों में अंकुरित (जीवित) कर दिया, तब से चन्द्रमौलि (शिव) ने अपने लज्जा (हृदय) को छिपाने के लिए ही मानो (तीसरे) नेत्र को अपने मस्तक पर धारण कर लिया है।
श्लोक ८ हे हिमालय की पुत्री (गिरिराजकन्ये)! भगवान शंभु, जो भिक्षु हैं, हाथ में कपाल लिए रहते हैं, वस्त्रहीन (दिगम्बर) हैं, जिनका कोई कुल या जन्म का पता नहीं है, और जो अद्वितीय हैं; आपके पाणिग्रहण (विवाह) रूपी मंगल उत्सव से पहले उन्हें कौन जानता था? (अर्थात, आपकी शक्ति से ही शिव की पहचान है)।
श्लोक ९ हाथी की खाल का वस्त्र (चर्माम्बर), चिता की भस्म का लेप, भीख मांगना (भिक्षाटन), श्मशान (परेतभूमि) में नाचना, और भूतों-वेतालों का साथ - शंकर जी की ये सब बातें भी, हे गिरिजे! केवल आपके साथ (साहचर्य) होने के कारण शोभा (सुन्दरता) को प्राप्त होती हैं।
श्लोक १० हे माँ! प्रलय काल (कल्प के अंत) में संहार करने में कुशल और परशुराम जी (खंड-परशु) से भी अधिक भयानक शिवजी का ताण्डव नृत्य, जब आपकी दृष्टि (आलोकन) से कोमल हो जाता है, तो वह जगत के कल्याण (विभूति) के लिए 'लास्य' (प्रेममय नृत्य) में बदल जाता है।
श्लोक ११ हे कल्याणी! जब जीव का अंतिम जन्म होता है और कर्मों की समानता (कर्म-साम्य) हो जाती है, तब गुरु की कृपा-दृष्टि (देशिक-कटाक्ष) के आश्रय से, पल भर में सारे बंधनों (पाश) को काटने वाली करुणार्द्र 'शाम्भव-दीक्षा' (शक्तिपात) प्राप्त होती है।
श्लोक १२ मोतियों के आभूषण पहने हुए, नए मूंगे (प्रवाल) जैसी लाल आभा वाली, आप जिस भक्त के हृदय में तारों से भरी संध्या के समान स्फुरित (प्रकट) होती हैं; वह अकेला ही बिना कामदेव के (पाँच बाणों के बिना ही) तीनों लोकों की सुंदरियों के लिए साक्षात कामदेव बन जाता है।
श्लोक १३ हे अमृतेश्वरी! जो लोग अमृत बरसाने वाली किरणों के समूह से सम्पूर्ण विश्व को तृप्त (जीवित) करने वाली 'आप' का ध्यान करते हैं; हे माँ! वे निश्चित रूप से ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवताओं के लिए भी अलंघनीय (न पार करने योग्य) 'काल' (मृत्यु/समय) की सीमा को लांघ जाते हैं (अमर हो जाते हैं)।
श्लोक १४ हे माँ! जो साधक अपने हृदय में स्फटिक की माला, पुस्तक और कमंडल धारण की हुई, व्याख्यान मुद्रा वाली, शरद पूर्णिमा के चाँद जैसी श्वेत और पद्मासन पर बैठी हुई आपका (सरस्वती रूप में) ध्यान करता है; वह (ज्ञान और तर्कों का) सार्वभौम चक्रवर्ती सम्राट बन जाता है।
श्लोक १५ मोरपंख का मुकुट पहने हुए, घुंघराले बालों वाली, गुंजा (रत्ती) की माला से सुशोभित घने स्तनों और हार वाली, श्याम वर्ण की, कोमल (मूँगे जैसे) होंठों वाली और सुकुमार हाथों वाली, हे शबरी (किरात-वेश धारिणी)! उस शबर (शिव) की पत्नी 'आप' को ही मैं नमन करता हूँ।
श्लोक १६ हे मुग्धे! हे देवी! "क्या आपने (अपने शरीर के) कोमल नवीन लता जैसे आधे भाग के बदले में, शिवजी का यह कठोर आधा भाग (पुरूष भाग) खरीद लिया है?" - मुझे लगता है कि सखियों के ऐसे मजाक (परिहास) भरे वचन सुनकर आप मंद-मंद मुस्कुरा देती हैं और वे (शिवजी) लज्जित (जड़) हो जाते हैं।
श्लोक १७ ब्रह्माण्ड रूपी बुलबुलों के समूह से भरा हुआ, और विविध दुखों की लहरों वाला यह 'माया का समुद्र' (संसार); हे माँ! यह आश्चर्य है कि आपके ध्यान की निरंतरता रूपी महान 'बड़वानल' (समुद्र की आग) के मुख में पड़ते ही क्षण भर में सूख (प्रलय) जाता है।
श्लोक १८ आपको दाक्षायणी (सती), कुटिला, कुहारिणी, कात्यायनी, कमला और कलावती कहा जाता है। हे भगवती! वास्तव में आप 'एक' सती (सत्य स्वरूप) होते हुए भी, किसी नर्तकी की तरह अनेक रूपों (बहुविधा) में दिखाई देती हैं। (यह आपकी लीला है)।
श्लोक १९ हे ईश्वरी! 'अनाहत' (हृदय) नामक स्थान में, नाद (ध्वनि) के रूप में परिणत आपका जो 'आनन्द-लक्षण' (आनन्दमय) स्वरूप है; उसे अंतर्मुखी मन से अनुभव करने वाले धन्य लोग, आँखों में (प्रेम के) आँसू और शरीर में रोमांच भरकर उसकी प्रशंसा (कीर्तन) करते हैं।
श्लोक २० चन्द्रमा में चांदनी आप हैं, सूर्य में कांति (तेज) आप हैं, पुरुष में चेतना आप हैं, वायु में बल आप हैं। जल में स्वाद आप हैं, अग्नि में गर्मी आप हैं। यदि आपके बिना कुछ भी हो, तो वह सब 'निःसार' (व्यर्थ) ही है। (सर्वत्र आप ही व्याप्त हैं)।
श्लोक २१ आकाश में जो नक्षत्र (ज्योति) चलते हैं, अंतरिक्ष (मेघ) जो जल बरसाता है, शेषनाग जो पृथ्वी को धारण करता है; वायु जो बहती है और अग्नि जो ऊपर की ओर लपटें उठाती है; हे माँ! वह सब केवल आपकी आज्ञा से ही होता है। (आप ही नियन्ता हैं)।
श्लोक २२ हे गिरिजे! जब आप 'संकोच' (प्रलय/विश्राम) की इच्छा करती हैं, तब आप वाणी और तर्क से परे 'अनाम-अरूप' (निराकार) हो जाती हैं। और जब आप 'विकास' (सृष्टि) को प्राप्त होती हैं, तब आपके नाम और रूपों की गणना करना (हजारों नाम) अत्यंत सरल हो जाता है।
श्लोक २३ हे देवी! पुण्यवान लोग भोग (आनन्द) के लिए आपको प्रणाम करके, हजारों 'सरोज-गृह' (कमल जैसे सुंदर भवन/स्त्रियां) को अपनी भृकुटि (इशारे) का दास बना लेते हैं। वे कल्पवृक्षों के बगीचे में और चिंतामणियों से बने क्रीड़ा-पर्वत पर चिरकाल तक रमण (आनन्द) करते हैं। (यह आपकी कृपा का भौतिक वैभव है)।
श्लोक २४ हे ईश्वरी! जीवों (पशुओं) के सकल संसार-ताप (दुख) को अपनी दया से हरने में केवल आप ही समर्थ हैं, क्योंकि वे आपके अधीन हैं। (जैसे) सूर्य की किरणें ही अपनी (वर्षा रूपी) वृष्टि से अपनी ही (गर्मी रूपी) उग्रता (धर्म) को शांत करने में समर्थ होती हैं।
श्लोक २५ शक्ति, शरीर, अधिदैवत, अन्तरात्मा, ज्ञान, क्रिया, करण (इन्द्रियां), आसनों का समूह, इच्छा, ऐश्वर्य, आयतन (स्थान) और आवरण - हे देवी! वह क्या है जो आप नहीं हैं? आप ही चन्द्रशेकर (शिव) की सब कुछ हैं।
श्लोक २६ पृथ्वी में 'निवृत्ति' कला, जल में 'प्रतिष्ठा' कला, अग्नि में 'विद्या' कला, वायु में 'शान्ति' कला और आकाश में 'शान्त्यतीत' (अतीव-कान्ति) कला - ये कलाएं जो विश्व की रचना (कलन) करती हैं; हे माँ! आपका पद (स्थान) तो इन सबसे बहुत दूर (परे) है।
श्लोक २७ हे जगत की शरण्य! जब तक आपका चरण-कमल युगल लोगों के हृदयों में स्वीकार नहीं किया जाता (स्थान नहीं पाता), तब तक शास्त्रार्थ करने वालों (समयिनां) के, विकल्पों (संदेहों) से उलझे हुए और कुटिल प्रकार के 'तर्क-ग्रह' (आग्रह/हठ) नष्ट (प्रलय) नहीं होते।
श्लोक २८ हे पार्वती! कुछ (योगी) लोग देवयान और पितृयान मार्गों के विहार को छोड़कर (उनसे ऊपर उठकर), अपने मन को सभी इन्द्रियों (करण-मंडल) का राजा (नियंत्रक) बनाकर; आपके 'कारण-पञ्चक' (ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर, सदाशिव) के पर्वों (भेदों) को ध्यान में स्थित करके, अपने आसन (स्वरूप) में विलीन कर देते हैं।
श्लोक २९ हे माँ! पृथ्वी आदि स्थूल मूर्तियों में से जिस किसी भी मूर्ति में आपका जो वैभव (शक्ति) है, उसे वाणी के पति (बृहस्पति/ब्रह्मा) भी कहने में समर्थ नहीं हैं। "वह (अकथनीय शक्ति) भी मेरे द्वारा स्तुति की गई" - मेरे इस (दुस्साहस/अपराध) को आप क्षमा करें।
श्लोक ३० हे माँ! जो लोग 'कालाग्नि' (प्रलय अग्नि) की तरह करोड़ों सूर्यों की आभा वाली, छह मार्गों (षडध्व) को शुद्ध करने वाली, (फिर) अमृत की बाढ़ के समान वर्षा करने वाली, श्याम वर्ण वाली, घने स्तनों वाली और पापों को नष्ट करने वाली 'आप' का ध्यान करते हैं; वे (स्वतः) जगत्गुरु बन जाते हैं।
श्लोक ३१ कुछ लोग आपको 'परा विद्या' कहते हैं, कुछ 'अम्बर' (चिदाकाश) कहते हैं, कुछ 'आनन्द' कहते हैं और कुछ 'माया' कहते हैं। दूसरे लोग आपको 'विश्व' कहते हैं। परन्तु हम (भक्त) तो आपको साक्षात् अपार करुणा की मूर्ति 'गुरु' ही कहते हैं।
श्लोक ३२ नील कमल के दल (पंखुड़ी) के समान श्याम (नीली) आभा वाली, घुंघराले और चिकने केश वाली, अत्यंत विशाल वक्षस्थल (स्तन-भार) से झुकी हुई पतली कमर वाली; हे माँ! हे सकल जननी! यहाँ बहुत कहने से क्या लाभ? आपका यह (अद्भुत) दिव्य स्वरूप हमारे (हृदय/सामने) निरंतर विद्यमान रहे।
॥ विशिष्ट लाभ (Specific Benefits) ॥
- कवित्व शक्ति और वाक सिद्धि: श्लोक १४ के अनुसार, जो साधक देवी का धवल (सरस्वती) रूप में ध्यान करता है, वह "विश्वकवितार्किकचक्रवर्ती" (कवियों और तार्किकों का सम्राट) बन जाता है। उसे अद्भुत वाणी और ज्ञान की प्राप्ति होती है।
- आकर्षण और वशीकरण: श्लोक १२ बताता है कि देवी का ध्यान करने वाला पुरुष त्रैलोक्य की सुंदरियों के लिए कामदेव के समान आकर्षक हो जाता है। यह दिव्य आकर्षण (Tejas) प्रदान करता है।
- समस्त पापों का नाश: श्लोक ३० के अनुसार, देवी का ध्यान "शकलीकृताघां" है, अर्थात यह पापों के समूह को टुकड़े-टुकड़े कर देता है।
- गुरु और दीक्षा की प्राप्ति: श्लोक ११ में कहा गया है कि कर्मों के परिपक्व होने पर, साधक को गुरु की कृपा (देशिक-कटाक्ष) और शाम्भव-दीक्षा स्वतः प्राप्त हो जाती है।
- मोक्ष (कैवल्य): यह स्तोत्र आवागमन के चक्र से मुक्त कर शिव-सायुज्य (मोक्ष) प्रदान करता है।
॥ पाठ विधि (Recitation Method) ॥
- समय: प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) या मध्य रात्रि (निशिथ काल) का समय तंत्र साधना और इस स्तोत्र के लिए उत्तम है।
- आसन: लाल या काले ऊनी आसन का प्रयोग करें। उत्तर दिशा की ओर मुख करें।
- न्यास और ध्यान: पाठ से पूर्व देवी के सौम्य रूप (श्लोक ३२ जैसा) का अपने हृदय में ध्यान करें।
- समर्पण: अम्बास्तव का भाव 'समर्पण' है। पाठ करते समय स्वयं को माँ की गोद में बैठा हुआ अबोध बालक अनुभव करें। अपनी विद्वता और अहंकार को त्याग दें।