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Panchastavi 4. Amba Stava – पञ्चस्तवि (अम्बास्तवः) | Meaning, Benefits & Recitation

Panchastavi 4. Amba Stava – पञ्चस्तवि (अम्बास्तवः) | Meaning, Benefits & Recitation
॥ पञ्चस्तवि - ४ (अम्बास्तवः) ॥ यामामनन्ति मुनयः प्रकृतिं पुराणीं विद्येति यां श्रुतिरहस्यविदो वदन्ति । तामर्धपल्लवितशङ्कररूपमुद्रां देवीमनन्यशरणः शरणं प्रपद्ये ॥ १ ॥ अम्ब स्तवेषु तव तावदकर्तृकाणि कुण्ठीभवन्ति वचसामपि गुम्भनानि । डिम्भस्य मे स्तुतिरसावसमञ्जसापि वात्सल्यनिघ्नहृदयां भवतीं धिनोतु ॥ २ ॥ व्योमेति बिन्दुरिति नाद इतीन्दुलेखा- -रूपेति वाग्भवतनूरिति मातृकेति । निःस्यन्दमानसुखबोधसुधास्वरूपा विद्योतसे मनसि भाग्यवतां जनानाम् ॥ ३ ॥ आविर्भवत्पुलकसन्ततिभिः शरीरै- -र्निःस्यन्दमानसलिलैर्नयनैश्च नित्यम् । वाग्भिश्च गद्गदपदाभिरुपासते ये पादौ तवाम्ब भुवनेषु त एव धन्याः ॥ ४ ॥ वक्त्रं यदुद्यतमभिष्टुतये भवत्या- -स्तुभ्यं नमो यदपि देवि शिरः करोति । चेतश्च यत्त्वयि परायणमम्ब तानि कस्यापि कैरपि भवन्ति तपोविशेषैः ॥ ५ ॥ मूलालवालकुहरादुदिता भवानि निर्भिद्य षट्सरसिजानि तटिल्लतेव । भूयोऽपि तत्र विशसि ध्रुवमण्डलेन्दु- -निःस्यन्दमानपरमामृततोयरूपा ॥ ६ ॥ दग्धं यदा मदनमेकमनेकधा ते मुग्धः कटाक्षविधिरङ्कुरयाञ्चकार । धत्ते तदाप्रभृति देवि ललाटनेत्रं सत्यं ह्रियैव मुकुलीकृतमिन्दुमौलेः ॥ ७ ॥ अज्ञातसम्भवमनाकलितान्ववायं भिक्षुं कपालिनमवाससमद्वितीयम् । पूर्वं करग्रहणमङ्गलतो भवत्याः शम्भुं क एव बुबुधे गिरिराजकन्ये ॥ ८ ॥ चर्माम्बरं च शवभस्मविलेपनं च भिक्षाटनं च नटनं च परेतभूमौ । वेतालसंहतिपरिग्रहता च शम्भोः शोभां बिभर्ति गिरिजे तव साहचर्यात् ॥ ९ ॥ कल्पोपसंहरणकेलिषु पण्डितानि चण्डानि खण्डपरशोरपि ताण्डवानि । आलोकनेन तव कोमलितानि मात- -र्लास्यात्मना परिणमन्ति जगद्विभूत्यै ॥ १० ॥ जन्तोर्पश्चिमतनोः सति कर्मसाम्ये निःशेषपाशपटलच्छिदुरा निमेषात् । कल्याणि देशिककटाक्षसमाश्रयेण कारुण्यतो भवति शाम्भववेददीक्षा ॥ ११ ॥ मुक्ताविभूषणवती नवविद्रुमाभा यच्चेतसि स्फुरसि तारकितेव सन्ध्या । एकः स एव भुवनत्रयसुन्दरीणां कन्दर्पतां व्रजति पञ्चशरीं विनापि ॥ १२ ॥ ये भावयन्त्यमृतवाहिभिरंशुजालै- -राप्यायमानभुवनाममृतेश्वरीं त्वाम् । ते लङ्घयन्ति ननु मातरलङ्घनीयां ब्रह्मादिभिः सुरवरैरपि कालकक्षाम् ॥ १३ ॥ यः स्फाटिकाक्षगुणपुस्तककुण्डिकाढ्यां व्याख्यासमुद्यतकरां शरदिन्दुशुभ्राम् । पद्मासनां च हृदये भवतीमुपास्ते मातः स विश्वकवितार्किकचक्रवर्ती ॥ १४ ॥ बर्हावतंसयुतबर्बरकेशपाशां गुञ्जावलीकृतघनस्तनहारशोभाम् । श्यामां प्रवालवदनां सुकुमारहस्तां त्वामेव नौमि शबरीं शबरस्य जायाम् ॥ १५ ॥ अर्धेन किं नवलताललितेन मुग्धे क्रीतं विभोः परुषमर्धमिदं त्वयेति । आलीजनस्य परिहासवचांसि मन्ये मन्दस्मितेन तव देवि जडी भवन्ति ॥ १६ ॥ ब्रह्माण्ड बुद्बुदकदम्बकसङ्कुलोऽयं मायोदधिर्विविधदुःखतरङ्गमालः । आश्चर्यमम्ब झटिति प्रलयं प्रयाति त्वद्ध्यानसन्ततिमहाबडबामुखाग्नौ ॥ १७ ॥ दाक्षायणीति कुटिलेति कुहारिणीति कात्यायनीति कमलेति कलावतीति । एका सती भगवती परमार्थतोऽपि सन्दृश्यसे बहुविधा ननु नर्तकीव ॥ १८ ॥ आनन्दलक्षणमनाहतनाम्नि देशे नादात्मना परिणतं तव रूपमीशे । प्रत्यङ्मुखेन मनसा परिचीयमानं शंसन्ति नेत्रसलिलैः पुलकैश्च धन्याः ॥ १९ ॥ त्वं चन्द्रिका शशिनि तिग्मरुचौ रुचिस्त्वं त्वं चेतनासि पुरुषे पवने बलं त्वम् । त्वं स्वादुतासि सलिले शिखिनि त्वमूष्मा निःसारमेव निखिलं त्वदृते यदि स्यात् ॥ २० ॥ ज्योतींषि यद्दिवि चरन्ति यदन्तरिक्षं सूते पयांसि यदहिर्धरणीं च धत्ते । यद्वाति वायुरनलो यदुदर्चिरास्ते तत्सर्वमम्ब तव केवलमाज्ञयैव ॥ २१ ॥ सङ्कोचमिच्छसि यदा गिरिजे तदानीं वाक्तर्कयोस्त्वमसि भूमिरनामरूपा । यद्वा विकासमुपयासि यदा तदानीं त्वन्नामरूपगणनाः सुकरा भवन्ति ॥ २२ ॥ भोगाय देवि भवतीं कृतिनः प्रणम्य भ्रूकिङ्करीकृतसरोजगृहाः सहस्रम् । चिन्तामणिप्रचयकल्पितकेलिशैले कल्पद्रुमोपवन एव चिरं रमन्ते ॥ २३ ॥ हर्तुं त्वमेव भवसि त्वदधीनमीशे संसारतापमखिलं दयया पशूनाम् । वैकर्तनी किरणसंहतिरेव शक्ता धर्मं निजं शमयितुं निजयैव वृष्ट्या ॥ २४ ॥ शक्तिः शरीरमधिदैवतमन्तरात्मा ज्ञानं क्रिया करणमासनजालमिच्छा । ऐश्वर्यमायतनमावरणानि च त्वं किं तन्न यद्भवसि देवि शशाङ्कमौलेः ॥ २५ ॥ भूमौ निवृत्तिरुदिता पयसि प्रतिष्ठा विद्याऽनले मरुति शान्तिरतीवकान्तिः । व्योम्नीति याः किल कलाः कलयन्ति विश्वं तासां हि दूरतरमम्ब पदं त्वदीयम् ॥ २६ ॥ यावत्पदं पदसरोजयुगं त्वदीयं नाङ्गीकरोति हृदयेषु जगच्छरण्ये । तावद्विकल्पजटिलाः कुटिलप्रकारा- -स्तर्कग्रहाः समयिनां प्रलयं न यान्ति ॥ २७ ॥ निर्देवयानपितृयानविहारमेके कृत्वा मनः करणमण्डलसार्वभौमम् । ध्याने निवेश्य तव कारणपञ्चकस्य पर्वाणि पार्वति नयन्ति निजासनत्वम् ॥ २८ ॥ स्थूलासु मूर्तिषु महीप्रमुखासु मूर्तेः कस्याश्चनापि तव वैभवमम्ब यस्याः । पत्या गिरामपि न शक्यत एव वक्तुं सापि स्तुता किल मयेति तितिक्षितव्यम् ॥ २९ ॥ कालाग्निकोटिरुचिमम्ब षडध्वशुद्धौ आप्लावनेषु भवतीममृतौघवृष्टिम् । श्यामां घनस्तनतटां शकलीकृताघां ध्यायन्त एव जगतां गुरवो भवन्ति ॥ ३० ॥ विद्यां परां कतिचिदम्बरमम्ब केचि- -दानन्दमेव कतिचित्कतिचिच्च मायाम् । त्वां विश्वमाहुरपरे वयमामनामः साक्षादपारकरुणां गुरुमूर्तिमेव ॥ ३१ ॥ कुवलयदलनीलं बर्बरस्निग्धकेशं पृथुतरकुचभाराक्रान्तकान्तावलग्नम् । किमिह बहुभिरुक्तैस्त्वत्स्वरूपं परं नः सकलजननि मातः सन्ततं सन्निधत्ताम् ॥ ३२ ॥ ॥ इति श्रीधर्मार्चार्य विरचित पञ्चस्तव्यां चतुर्थः अम्बास्तवः सम्पूर्णः ॥

॥ अम्बास्तवः - परिचय (Introduction) ॥

पञ्चस्तवि (Panchastavi) कश्मीरी शैव दर्शन और शाक्त परंपरा का एक अमूल्य रत्न है। यह पांच दिव्य स्तोत्रों का संग्रह है, जिनमें अम्बास्तवः (Amba Stava) चौथा सोपान है। जैसा कि नाम से ज्ञात होता है, 'अम्बा' अर्थात 'माँ'। यह स्तोत्र परम चेतना (शिव-शक्ति) को जगदम्बा के रूप में संबोधित करता है।

इसकी रचना संभवतः महान आचार्य श्रीधर्माचार्य द्वारा की गई थी। अम्बास्तव की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सरलता और वात्सल्य भाव है। यहाँ ज्ञान और योग की गूढ़ बातें - जैसे नाद, बिन्दु, कुण्डलिनी जागरण और षटचक्र भेदन - एक बालक की प्रार्थना के रूप में सहजता से प्रकट हुई हैं। साधक एक अबोध शिशु की भांति माँ के अंचल में छिप जाना चाहता है।

इस स्तोत्र में देवी त्रिपुरसुन्दरी को केवल एक पौराणिक देवी नहीं, अपितु सम्पूर्ण अस्तित्व का मूल कारण, 'चिति' (विशुद्ध चेतना) और 'आनन्द' का स्रोत माना गया है। यह अद्वैत भाव का प्रतिपादन करता है, जहाँ भक्त और भगवान का भेद मिट जाता है और केवल एक 'अम्बा' ही शेष रहती हैं।

॥ स्तोत्र भावार्थ (Meaning) ॥

श्लोक १ जिसे मुनिजन 'पुरातन प्रकृति' (मूल प्रकृति) कहते हैं, जिसे वेदों के रहस्य को जानने वाले 'विद्या' (ब्रह्मविद्या) कहते हैं, जो भगवान शंकर के अर्धनारीश्वर रूप में सुशोभित हैं; उस देवी की मैं अनन्य भाव से शरण लेता हूँ (मेरे पास कोई अन्य सहारा नहीं है)।

श्लोक २ हे माँ (अम्ब)! आपकी स्तुति करने में तो वाणी की रचनाएं (कविताओं के शब्द) भी कुंठित (असमर्थ) हो जाती हैं और अकर्तृक (चुप) रह जाती हैं। फिर भी, मुझ बालक की यह बेतुकी (असमंजस) स्तुति भी, आप जो वात्सल्य से भरे हृदय वाली हैं, को प्रसन्न करे। (जैसे माँ अपने बच्चे की तोतली बोली से खुश होती है)।

श्लोक ३ हे देवी! आप 'व्योम' (चिदाकाश), 'बिन्दु', 'नाद', 'चन्द्ररेखा', 'वाग्भव-तनु' (वाक् शक्ति) और 'मातृका' (वर्णमाला) के रूप में विराजमान हैं। आप निरंतर बहने वाले सुख और ज्ञान (बोध) के अमृत स्वरूप वाली हैं। आप केवल भाग्यवान लोगों के मन में ही प्रकाशित होती हैं।

श्लोक ४ हे माँ! तीनों लोकों में वे ही लोग धन्य हैं जो रोमांच से भरे शरीर, हमेशा प्रेम-अश्रु बहाते नेत्रों, और गदगद (रुंधे हुए) कंठ से निकली वाणी द्वारा आपके चरण-कमलों की उपासना करते हैं।

श्लोक ५ जो मुख आपकी स्तुति के लिए उद्यत (तैयार) है, जो सिर आपको नमस्कार करता है, और जो चित्त (मन) आप में ही लीन रहता है; हे अम्ब! ये (मुख, सिर और मन) किसी विरले पुण्यात्मा को ही किसी विशेष तपस्या के फल से प्राप्त होते हैं।

श्लोक ६ हे भवानी! आप मूलाधार (मूल-आलवाल) के छिद्र से बिजली की लता (तटिल्लता) की तरह चमकती हुई उठती हैं। आप (शरीर के) छह कमलों (षटचक्रों) को भेदकर, परम अमृत रूपी जल को बरसाती हुई, पुनः सहस्रार (ध्रुवमण्डल) के चन्द्रमा में प्रवेश (विश्राम) करती हैं। (यह कुण्डलिनी योग का वर्णन है)।

श्लोक ७ हे देवी! जब आपके एक सुन्दर कटाक्ष (दृष्टि) ने कामदेव को, जिसे शिवजी ने जला दिया था, पुनः अनेक रूपों में अंकुरित (जीवित) कर दिया, तब से चन्द्रमौलि (शिव) ने अपने लज्जा (हृदय) को छिपाने के लिए ही मानो (तीसरे) नेत्र को अपने मस्तक पर धारण कर लिया है।

श्लोक ८ हे हिमालय की पुत्री (गिरिराजकन्ये)! भगवान शंभु, जो भिक्षु हैं, हाथ में कपाल लिए रहते हैं, वस्त्रहीन (दिगम्बर) हैं, जिनका कोई कुल या जन्म का पता नहीं है, और जो अद्वितीय हैं; आपके पाणिग्रहण (विवाह) रूपी मंगल उत्सव से पहले उन्हें कौन जानता था? (अर्थात, आपकी शक्ति से ही शिव की पहचान है)।

श्लोक ९ हाथी की खाल का वस्त्र (चर्माम्बर), चिता की भस्म का लेप, भीख मांगना (भिक्षाटन), श्मशान (परेतभूमि) में नाचना, और भूतों-वेतालों का साथ - शंकर जी की ये सब बातें भी, हे गिरिजे! केवल आपके साथ (साहचर्य) होने के कारण शोभा (सुन्दरता) को प्राप्त होती हैं।

श्लोक १० हे माँ! प्रलय काल (कल्प के अंत) में संहार करने में कुशल और परशुराम जी (खंड-परशु) से भी अधिक भयानक शिवजी का ताण्डव नृत्य, जब आपकी दृष्टि (आलोकन) से कोमल हो जाता है, तो वह जगत के कल्याण (विभूति) के लिए 'लास्य' (प्रेममय नृत्य) में बदल जाता है।

श्लोक ११ हे कल्याणी! जब जीव का अंतिम जन्म होता है और कर्मों की समानता (कर्म-साम्य) हो जाती है, तब गुरु की कृपा-दृष्टि (देशिक-कटाक्ष) के आश्रय से, पल भर में सारे बंधनों (पाश) को काटने वाली करुणार्द्र 'शाम्भव-दीक्षा' (शक्तिपात) प्राप्त होती है।

श्लोक १२ मोतियों के आभूषण पहने हुए, नए मूंगे (प्रवाल) जैसी लाल आभा वाली, आप जिस भक्त के हृदय में तारों से भरी संध्या के समान स्फुरित (प्रकट) होती हैं; वह अकेला ही बिना कामदेव के (पाँच बाणों के बिना ही) तीनों लोकों की सुंदरियों के लिए साक्षात कामदेव बन जाता है।

श्लोक १३ हे अमृतेश्वरी! जो लोग अमृत बरसाने वाली किरणों के समूह से सम्पूर्ण विश्व को तृप्त (जीवित) करने वाली 'आप' का ध्यान करते हैं; हे माँ! वे निश्चित रूप से ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवताओं के लिए भी अलंघनीय (न पार करने योग्य) 'काल' (मृत्यु/समय) की सीमा को लांघ जाते हैं (अमर हो जाते हैं)।

श्लोक १४ हे माँ! जो साधक अपने हृदय में स्फटिक की माला, पुस्तक और कमंडल धारण की हुई, व्याख्यान मुद्रा वाली, शरद पूर्णिमा के चाँद जैसी श्वेत और पद्मासन पर बैठी हुई आपका (सरस्वती रूप में) ध्यान करता है; वह (ज्ञान और तर्कों का) सार्वभौम चक्रवर्ती सम्राट बन जाता है।

श्लोक १५ मोरपंख का मुकुट पहने हुए, घुंघराले बालों वाली, गुंजा (रत्ती) की माला से सुशोभित घने स्तनों और हार वाली, श्याम वर्ण की, कोमल (मूँगे जैसे) होंठों वाली और सुकुमार हाथों वाली, हे शबरी (किरात-वेश धारिणी)! उस शबर (शिव) की पत्नी 'आप' को ही मैं नमन करता हूँ।

श्लोक १६ हे मुग्धे! हे देवी! "क्या आपने (अपने शरीर के) कोमल नवीन लता जैसे आधे भाग के बदले में, शिवजी का यह कठोर आधा भाग (पुरूष भाग) खरीद लिया है?" - मुझे लगता है कि सखियों के ऐसे मजाक (परिहास) भरे वचन सुनकर आप मंद-मंद मुस्कुरा देती हैं और वे (शिवजी) लज्जित (जड़) हो जाते हैं।

श्लोक १७ ब्रह्माण्ड रूपी बुलबुलों के समूह से भरा हुआ, और विविध दुखों की लहरों वाला यह 'माया का समुद्र' (संसार); हे माँ! यह आश्चर्य है कि आपके ध्यान की निरंतरता रूपी महान 'बड़वानल' (समुद्र की आग) के मुख में पड़ते ही क्षण भर में सूख (प्रलय) जाता है।

श्लोक १८ आपको दाक्षायणी (सती), कुटिला, कुहारिणी, कात्यायनी, कमला और कलावती कहा जाता है। हे भगवती! वास्तव में आप 'एक' सती (सत्य स्वरूप) होते हुए भी, किसी नर्तकी की तरह अनेक रूपों (बहुविधा) में दिखाई देती हैं। (यह आपकी लीला है)।

श्लोक १९ हे ईश्वरी! 'अनाहत' (हृदय) नामक स्थान में, नाद (ध्वनि) के रूप में परिणत आपका जो 'आनन्द-लक्षण' (आनन्दमय) स्वरूप है; उसे अंतर्मुखी मन से अनुभव करने वाले धन्य लोग, आँखों में (प्रेम के) आँसू और शरीर में रोमांच भरकर उसकी प्रशंसा (कीर्तन) करते हैं।

श्लोक २० चन्द्रमा में चांदनी आप हैं, सूर्य में कांति (तेज) आप हैं, पुरुष में चेतना आप हैं, वायु में बल आप हैं। जल में स्वाद आप हैं, अग्नि में गर्मी आप हैं। यदि आपके बिना कुछ भी हो, तो वह सब 'निःसार' (व्यर्थ) ही है। (सर्वत्र आप ही व्याप्त हैं)।

श्लोक २१ आकाश में जो नक्षत्र (ज्योति) चलते हैं, अंतरिक्ष (मेघ) जो जल बरसाता है, शेषनाग जो पृथ्वी को धारण करता है; वायु जो बहती है और अग्नि जो ऊपर की ओर लपटें उठाती है; हे माँ! वह सब केवल आपकी आज्ञा से ही होता है। (आप ही नियन्ता हैं)।

श्लोक २२ हे गिरिजे! जब आप 'संकोच' (प्रलय/विश्राम) की इच्छा करती हैं, तब आप वाणी और तर्क से परे 'अनाम-अरूप' (निराकार) हो जाती हैं। और जब आप 'विकास' (सृष्टि) को प्राप्त होती हैं, तब आपके नाम और रूपों की गणना करना (हजारों नाम) अत्यंत सरल हो जाता है।

श्लोक २३ हे देवी! पुण्यवान लोग भोग (आनन्द) के लिए आपको प्रणाम करके, हजारों 'सरोज-गृह' (कमल जैसे सुंदर भवन/स्त्रियां) को अपनी भृकुटि (इशारे) का दास बना लेते हैं। वे कल्पवृक्षों के बगीचे में और चिंतामणियों से बने क्रीड़ा-पर्वत पर चिरकाल तक रमण (आनन्द) करते हैं। (यह आपकी कृपा का भौतिक वैभव है)।

श्लोक २४ हे ईश्वरी! जीवों (पशुओं) के सकल संसार-ताप (दुख) को अपनी दया से हरने में केवल आप ही समर्थ हैं, क्योंकि वे आपके अधीन हैं। (जैसे) सूर्य की किरणें ही अपनी (वर्षा रूपी) वृष्टि से अपनी ही (गर्मी रूपी) उग्रता (धर्म) को शांत करने में समर्थ होती हैं।

श्लोक २५ शक्ति, शरीर, अधिदैवत, अन्तरात्मा, ज्ञान, क्रिया, करण (इन्द्रियां), आसनों का समूह, इच्छा, ऐश्वर्य, आयतन (स्थान) और आवरण - हे देवी! वह क्या है जो आप नहीं हैं? आप ही चन्द्रशेकर (शिव) की सब कुछ हैं।

श्लोक २६ पृथ्वी में 'निवृत्ति' कला, जल में 'प्रतिष्ठा' कला, अग्नि में 'विद्या' कला, वायु में 'शान्ति' कला और आकाश में 'शान्त्यतीत' (अतीव-कान्ति) कला - ये कलाएं जो विश्व की रचना (कलन) करती हैं; हे माँ! आपका पद (स्थान) तो इन सबसे बहुत दूर (परे) है।

श्लोक २७ हे जगत की शरण्य! जब तक आपका चरण-कमल युगल लोगों के हृदयों में स्वीकार नहीं किया जाता (स्थान नहीं पाता), तब तक शास्त्रार्थ करने वालों (समयिनां) के, विकल्पों (संदेहों) से उलझे हुए और कुटिल प्रकार के 'तर्क-ग्रह' (आग्रह/हठ) नष्ट (प्रलय) नहीं होते।

श्लोक २८ हे पार्वती! कुछ (योगी) लोग देवयान और पितृयान मार्गों के विहार को छोड़कर (उनसे ऊपर उठकर), अपने मन को सभी इन्द्रियों (करण-मंडल) का राजा (नियंत्रक) बनाकर; आपके 'कारण-पञ्चक' (ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर, सदाशिव) के पर्वों (भेदों) को ध्यान में स्थित करके, अपने आसन (स्वरूप) में विलीन कर देते हैं।

श्लोक २९ हे माँ! पृथ्वी आदि स्थूल मूर्तियों में से जिस किसी भी मूर्ति में आपका जो वैभव (शक्ति) है, उसे वाणी के पति (बृहस्पति/ब्रह्मा) भी कहने में समर्थ नहीं हैं। "वह (अकथनीय शक्ति) भी मेरे द्वारा स्तुति की गई" - मेरे इस (दुस्साहस/अपराध) को आप क्षमा करें।

श्लोक ३० हे माँ! जो लोग 'कालाग्नि' (प्रलय अग्नि) की तरह करोड़ों सूर्यों की आभा वाली, छह मार्गों (षडध्व) को शुद्ध करने वाली, (फिर) अमृत की बाढ़ के समान वर्षा करने वाली, श्याम वर्ण वाली, घने स्तनों वाली और पापों को नष्ट करने वाली 'आप' का ध्यान करते हैं; वे (स्वतः) जगत्गुरु बन जाते हैं।

श्लोक ३१ कुछ लोग आपको 'परा विद्या' कहते हैं, कुछ 'अम्बर' (चिदाकाश) कहते हैं, कुछ 'आनन्द' कहते हैं और कुछ 'माया' कहते हैं। दूसरे लोग आपको 'विश्व' कहते हैं। परन्तु हम (भक्त) तो आपको साक्षात् अपार करुणा की मूर्ति 'गुरु' ही कहते हैं।

श्लोक ३२ नील कमल के दल (पंखुड़ी) के समान श्याम (नीली) आभा वाली, घुंघराले और चिकने केश वाली, अत्यंत विशाल वक्षस्थल (स्तन-भार) से झुकी हुई पतली कमर वाली; हे माँ! हे सकल जननी! यहाँ बहुत कहने से क्या लाभ? आपका यह (अद्भुत) दिव्य स्वरूप हमारे (हृदय/सामने) निरंतर विद्यमान रहे।

॥ विशिष्ट लाभ (Specific Benefits) ॥

  • कवित्व शक्ति और वाक सिद्धि: श्लोक १४ के अनुसार, जो साधक देवी का धवल (सरस्वती) रूप में ध्यान करता है, वह "विश्वकवितार्किकचक्रवर्ती" (कवियों और तार्किकों का सम्राट) बन जाता है। उसे अद्भुत वाणी और ज्ञान की प्राप्ति होती है।
  • आकर्षण और वशीकरण: श्लोक १२ बताता है कि देवी का ध्यान करने वाला पुरुष त्रैलोक्य की सुंदरियों के लिए कामदेव के समान आकर्षक हो जाता है। यह दिव्य आकर्षण (Tejas) प्रदान करता है।
  • समस्त पापों का नाश: श्लोक ३० के अनुसार, देवी का ध्यान "शकलीकृताघां" है, अर्थात यह पापों के समूह को टुकड़े-टुकड़े कर देता है।
  • गुरु और दीक्षा की प्राप्ति: श्लोक ११ में कहा गया है कि कर्मों के परिपक्व होने पर, साधक को गुरु की कृपा (देशिक-कटाक्ष) और शाम्भव-दीक्षा स्वतः प्राप्त हो जाती है।
  • मोक्ष (कैवल्य): यह स्तोत्र आवागमन के चक्र से मुक्त कर शिव-सायुज्य (मोक्ष) प्रदान करता है।

॥ पाठ विधि (Recitation Method) ॥

  1. समय: प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) या मध्य रात्रि (निशिथ काल) का समय तंत्र साधना और इस स्तोत्र के लिए उत्तम है।
  2. आसन: लाल या काले ऊनी आसन का प्रयोग करें। उत्तर दिशा की ओर मुख करें।
  3. न्यास और ध्यान: पाठ से पूर्व देवी के सौम्य रूप (श्लोक ३२ जैसा) का अपने हृदय में ध्यान करें।
  4. समर्पण: अम्बास्तव का भाव 'समर्पण' है। पाठ करते समय स्वयं को माँ की गोद में बैठा हुआ अबोध बालक अनुभव करें। अपनी विद्वता और अहंकार को त्याग दें।

॥ FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न ॥

1. अम्बास्तव (Amba Stava) क्या है और इसका क्या महत्व है?

अम्बास्तव, कश्मीरी शैव दर्शन का एक प्रमुख स्तोत्र है जो 'पञ्चस्तवि' संग्रह का चौथा भाग है। इसमें माँ त्रिपुरसुन्दरी को 'अम्बा' (माँ) के रूप में संबोधित किया गया है। इसका महत्व इसमें निहित 'वात्सल्य भाव' में है, जहाँ साधक एक अबोध बालक की तरह माँ की गोद में शरण लेता है।

2. पञ्चस्तवि (Panchastavi) के रचयिता कौन हैं?

पञ्चस्तवि के रचयिता के विषय में विद्वानों में मतभेद है, किन्तु कश्मीरी परंपरा इसे 'श्रीधर्माचार्य' की रचना मानती है। इसकी शैली और दर्शन कश्मीरी शैव मत (त्रिक दर्शन) के अत्यंत निकट है।

3. इस स्तोत्र में 'त्रिपुरसुन्दरी' की किस रूप में उपासना की गई है?

इसमें देवी को सम्पूर्ण ब्रह्मांड की जननी, पालनकर्ता और संहारकर्ता के रूप में पूजा गया है। वे ही 'नाद' (ध्वनि), 'बिन्दु' (प्रकाश) और 'कला' के रूप में सर्वत्र व्याप्त हैं।

4. क्या अम्बास्तव का पाठ बिना दीक्षा के किया जा सकता है?

हाँ, अम्बास्तव एक भक्ति-प्रधान स्तोत्र है। यद्यपि यह तंत्र ग्रंथ है, परन्तु इसे शुद्ध प्रेम और श्रद्धा भाव से कोई भी साधक पढ़ सकता है। यह गुरु-दीक्षा प्राप्ति में सहायक सिद्ध होता है।

5. इस पाठ को करने का सर्वोत्तम समय क्या है?

ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व) साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इसके अलावा, प्रदोष काल या नवरात्रि के दिनों में इसका पाठ विशेष फलदायी होता है।

6. अम्बास्तव में 'शब्द-ब्रह्म' का क्या उल्लेख है?

स्तोत्र में देवी को 'वाग्भवतनु' कहा गया है। वे ही 'पश्यन्ती', 'मध्यमा' और 'वैखरी' वाणी का स्रोत हैं। श्लोक ३ में उन्हें 'नाद', 'बिन्दु' और 'मातृका' (अक्षर) रूप में वर्णित किया गया है।

7. कुण्डलिनी योग की दृष्टि से इस स्तोत्र का क्या महत्व है?

अम्बास्तव में श्लोक ६ में स्पष्ट वर्णन है कि देवी मूलाधार से बिजली की लता की तरह उठकर छह कमलों (षटचक्रों) को भेदती हुई सहस्रार में प्रवेश करती हैं। यह कुण्डलिनी जागरण का सटीक वर्णन है।

8. क्या इस स्तोत्र से सांसारिक बाधाएं दूर होती हैं?

जी हाँ, श्लोक २४ में कहा गया है कि माँ अपने भक्तों के समस्त 'संसार-ताप' (भौतिक कष्ट, रोग, मानसिक संताप) को दयापूर्वक हर लेती हैं।

9. पञ्चस्तवि के अन्य चार स्तव कौन से हैं?

पञ्चस्तवि के पांच भाग हैं: १. लघुस्तव, २. चर्चास्तव, ३. घटस्तव, ४. अम्बास्तव (यह स्तोत्र), और ५. सकलजननीस्तव।

10. अम्बास्तव पाठ की मुख्य विधि क्या है?

स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। देवी त्रिपुरसुन्दरी का ध्यान करें ('सौम्य' या 'उग्र' रूप, जैसा भाव हो)। स्वयं को बालक मानकर वात्सल्य भाव से पाठ करें। समर्पण ही इसकी मुख्य विधि है।