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Sri Parvati Panchakam – श्री पार्वती पञ्चकम् (2) | Meaning & Benefits

Sri Parvati Panchakam – श्री पार्वती पञ्चकम् (2) | Meaning & Benefits
॥ श्री पार्वती पञ्चकम् (द्वितीयम्) ॥ ॥ १ ॥ विनोदमोदमोदिता दयोदयोज्ज्वलान्तरा निशुम्भशुम्भदम्भदारणे सुदारुणाऽरुणा । अखण्डगण्डदण्डमुण्डमण्डलीविमण्डिता प्रचण्डचण्डरश्मिरश्मिराशिशोभिता शिवा ॥ १ ॥
भावार्थ: जो (भक्तों के) विनोद और आनंद से प्रसन्न होती हैं, जिनका हृदय दया के उदय से उज्ज्वल है, जो शुम्भ और निशुम्भ (दैत्यों) के दम्भ (अहंकार) का विदीर्ण करने में अत्यंत भयानक (दारुण) और लाल वर्ण वाली हैं। जो (शत्रुओं के) अखण्ड गालों और मुण्डों (सिरों) की माला से सुशोभित हैं, और जो प्रचण्ड सूर्य (चण्डरश्मि) की किरणों के समान तेज से देदीप्यमान हैं, वे कल्याणकारी देवी (शिवा) मेरी रक्षा करें।
--- ॥ २ ॥ अमन्दनन्दिनन्दिनी धराधरेन्द्रनन्दिनी प्रतीर्णशीर्णतारिणी सदार्यकार्यकारिणी । तदन्धकान्तकान्तकप्रियेशकान्तकान्तका मुरारिकामचारिकाममारिधारिणी शिवा ॥ २ ॥
भावार्थ: जो अत्यधिक आनंद प्रदान करने वाली (अमन्दनन्दिनी) हैं, जो पर्वतराज हिमालय की पुत्री (धरा धरेन्द्र नन्दिनी) हैं। जो विपत्तियों से पार लगाने वाली (तारिणी) हैं और सदा श्रेष्ठ जनों (आर्य) के कार्यों को सिद्ध करने वाली हैं। जो अंधकासुर के संहारक (शिव) की प्रिय हैं और कामदेव (मुरारि-काम) के शत्रु (शिव) के वाम भाग को धारण करने वाली हैं, वे कल्याणकारी देवी (शिवा) मेरी रक्षा करें।
--- ॥ ३ ॥ अशेषवेषशून्यदेशभर्तृकेशशोभिता गणेशदेवतेशशेषनिर्निमेषवीक्षिता । जितस्वशिञ्जिताऽलिकुञ्जपुञ्जमञ्जुगुञ्जिता समस्तमस्तकस्थिता निरस्तकामकस्तवा ॥ ३ ॥
भावार्थ: जो भगवान शिव (शून्यदेशभर्तृ - श्मशान वासी) के केशों में गंगा रूप में या अर्धांगिनी रूप में सुशोभित हैं। जिन्हें गणेश, देवता और शेषनाग अपलक नेत्रों (निर्निमेष) से निहारते रहते हैं। जिनके नूपुरों की ध्वनि (शिञ्जित) भ्रमरों (अलिकुञ्ज) की मधुर गुंजन को भी जीत लेती है। जो समस्त लोकों के मस्तक (सर्वोपरि) पर विराजमान हैं और जो कामवासना का नाश करने वाली हैं, वे कल्याणकारी देवी (शिवा) मेरी रक्षा करें।
--- ॥ ४ ॥ ससम्भ्रमं भ्रमं भ्रमं भ्रमन्ति मूढमानवा मुदा बुधाः सुधां विहाय धावमानमानसाः । अधीनदीनहीनवारिहीनमीनजीवना ददातु शम्प्रदाऽनिशं वशंवदार्थमाशिषम् ॥ ४ ॥
भावार्थ: मूर्ख मनुष्य (मूढमानवा) भ्रम में पड़कर व्यर्थ ही इधर-उधर भटकते रहते हैं, जिस प्रकार वे बुद्धिमान होकर भी भक्ति रूपी अमृत (सुधा) को छोड़कर क्षणिक सुखों के पीछे भागते हैं। उनकी स्थिति जल के बिना तड़पती हुई मछली (वारिहीन-मीन) जैसी अधीन और दीन है। ऐसी स्थिति में, सुख प्रदान करने वाली (शम्प्रदा) देवी मुझे निरंतर अपने वश में रखने वाला (भक्ति पूर्ण) आशीर्वाद प्रदान करें।
--- ॥ ५ ॥ विलोललोचनाञ्चितोचितैश्चिता सदा गुणै- -रपास्यदास्यमेवमास्यहास्यलास्यकारिणी । निराश्रयाऽऽश्रयाश्रयेश्वरी सदा वरीयसी ददातु शं शिवाऽनिशं हि शङ्कराङ्कशोभिनी ॥ ५ ॥
भावार्थ: जिनके चंचल नेत्र (विलोल लोचन) अत्यंत सुंदर हैं, जो सदा उचित गुणों से परिपूर्ण हैं। जो दास्य भाव (सांसारिक बंधन) को दूर करके मुख पर हास्य और लास्य (नृत्य/आनंद) प्रदान करती हैं। जो निराश्रितों का एकमात्र आश्रय हैं, जो सबकी ईश्वरी और सर्वश्रेष्ठ (वरीयसी) हैं। भगवान शंकर की गोद (अंक) में सुशोभित होने वाली वह कल्याणकारी देवी (शिवा) मुझे निरंतर कल्याण (शं) प्रदान करें।
--- ॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं श्रीपार्वतीपञ्चकं (द्वितीयम्) सम्पूर्णम् ॥

श्री पार्वती पञ्चकम् – परिचय एवं महत्व

श्री पार्वती पञ्चकम् (Sri Parvati Panchakam) आदि गुरु शंकराचार्य (Adi Shankaracharya) की एक अद्वितीय रचना है। शंकराचार्य, जो अद्वैत वेदांत के प्रवर्तक थे, उन्होंने सगुण उपासना के लिए भी कई अद्भुत स्तोत्र रचे हैं। यह पञ्चक (पाँच श्लोकों का समूह) माँ आदिशक्ति पार्वती के प्रति उनकी अनन्य भक्ति और समर्पण का प्रतीक है।

इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता इसकी ध्वन्यात्मकता (Phonetics) और अनुप्रास अलंकार (Alliteration) है। जैसे "विनोद-मोद-मोदिता" या "निशुम्भ-शुम्भ-दम्भ-दारणे" - इन शब्दों का उच्चारण ही एक तीव्र ऊर्जा (Vibration) उत्पन्न करता है जो साधक के मन से तमस और जड़ता को तत्काल दूर कर देता है।

इसमें माँ के उग्र (Fierce) और सौम्य (Gentle) दोनों रूपों का अद्भुत समन्वय है। जहाँ एक ओर वे शुम्भ-निशुम्भ का संहार करने वाली 'रणचंडी' हैं, वहीं दूसरी ओर वे विनोद और मोद (आनंद) प्रदान करने वाली करुणामयी 'माँ' भी हैं। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि शक्ति केवल विनाश के लिए नहीं, बल्कि सृजन और आनंद के लिए भी है।

विशिष्ट महत्व (Significance)

1. शब्द-शक्ति (Power of Sound)

शंकराचार्य जी ने शब्दों का चयन ऐसे किया है कि वे 'बीज मंत्रों' (Beeja Mantras) की तरह कार्य करते हैं। 'दम्भ-दारणे' (अहंकार को तोड़ने वाली) जैसे शब्दों का बार-बार उच्चारण हमारे भीतर छुपे अहंकार की ग्रंथियों को तोड़ता है।

2. भोग और मोक्ष का समन्वय

साधारणतः स्तोत्र या तो सांसारिक सुख (भोग) देते हैं या मुक्ति (मोक्ष)। किन्तु पार्वती पञ्चकम् एक दुर्लभ स्तुति है जो "अपास्य दास्यं" (दासता से मुक्ति) भी देती है और "हास्य-लास्य" (जीवन का आनंद) भी प्रदान करती है।

3. शंकर-पार्वती ऐक्य

अंतिम श्लोक में "शंकराङ्कशोभिनी" (शंकर की गोद में विराजमान) कहकर आचार्य ने शिव और शक्ति की अभिन्नता (Oneness) को दर्शाया है। बिना शक्ति के शिव 'शव' हैं, और बिना शिव के शक्ति निरर्थक हैं।

फलश्रुति: पाठ के लाभ (Benefits)

  • भय और शत्रुओं का नाश: इसके उग्र अक्षरों के उच्चारण से शत्रुओं का भय समाप्त होता है और आत्मविश्वास बढ़ता है।
  • पारिवारिक कलह से मुक्ति: जिस घर में नित्य इसका पाठ होता है, वहां दांपत्य जीवन में मधुरता आती है और कलह (Discord) का नाश होता है।
  • मानसिक शांति: चौथे श्लोक में वर्णित "भ्रम" (Delusion) का नाश होता है और मन को स्थिरता प्राप्त होती है।
  • वाक-सिद्धि: इसकी कठिन शब्दावली का शुद्ध उच्चारण करने से वाणी स्पष्ट और प्रभावी होती है।
  • दैवीय कृपा: माँ पार्वती साधक को अपनी संतान समझकर उसकी हर विपत्ति से रक्षा करती हैं (निराश्रयाश्रयेश्वरी)।

पाठ विधि और विशेष अवसर (Ritual Method)

इस स्तोत्र का पूर्ण लाभ उठाने के लिए निम्नलिखित विधि का पालन करें:

  • समय: ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व) या संध्या काल (सूर्यास्त के समय)।
  • आसन: लाल रंग के ऊनी आसन पर पूर्व या उत्तर मुख होकर बैठें।
  • न्यास: पाठ से पूर्व माथे पर कुमकुम या भस्म का तिलक लगाएं।
  • उच्चारण: श्लोकों को जोर से (Aloud) बोलकर पढ़ें, ताकि ध्वनि की तरंगें घर के वातावरण को शुद्ध कर सकें।
  • विशेष प्रयोग: किसी विशेष कामना पूर्ति के लिए 21 दिनों तक लगातार 11 बार पाठ करें और अंतिम दिन खीर का भोग लगाएं।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. श्री पार्वती पञ्चकम् (Sri Parvati Panchakam) क्या है?

यह आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा रचित 5 श्लोकों का एक अत्यंत लयबद्ध और शक्तिशाली स्तोत्र है। इसमें माँ पार्वती के सौम्य और उग्र दोनों स्वरूपों की स्तुति की गई है।

2. इस स्तोत्र की रचना किसने की?

इसकी रचना आदि शंकराचार्य (Adi Shankaracharya) ने की थी। उनकी वाणी में माँ भगवती के प्रति अगाध प्रेम और भक्तिलकित भाव स्पष्ट झलकता है।

3. इस स्तोत्र के पाठ का मुख्य लाभ क्या है?

इसके पाठ से मानसिक शांति, पारिवारिक सुख, और शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। यह साधक को भोग (भौतिक सुख) और मोक्ष (आध्यात्मिक मुक्ति) दोनों प्रदान करने में सक्षम है।

4. क्या इसे बिना संस्कृत जाने पढ़ा जा सकता है?

जी हाँ। यदि आप संस्कृत का अर्थ नहीं भी जानते, तो भी इसके अक्षरों का विन्यास (Sound Vibration) ही इतना शक्तिशाली है कि यह आपके अंतःकरण को शुद्ध कर देता है।

5. श्लोक १ में 'निशुम्भशुम्भदम्भदारणे' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है - शुम्भ और निशुम्भ नामक दैत्यों के दम्भ (अहंकार) को विदीर्ण करने वाली। यह माँ के उस शक्ति स्वरूप को दर्शाता है जो बुराई का नाश करती है।

6. 'शिवा' शब्द का यहाँ क्या तात्पर्य है?

'शिवा' का अर्थ है 'कल्याणकारी'। माँ पार्वती भगवान शिव की शक्ति हैं और स्वयं भी जगत का कल्याण करने वाली हैं, इसलिए उन्हें 'शिवा' कहा जाता है।

7. इस स्तोत्र में किस छंद का प्रयोग हुआ है?

यह स्तोत्र एक विशेष संगीतमय छंद में रचित है जो 'जगती' या 'भुजंगप्रयात' के समान लय रखता है। इसकी गेयता (singability) इसे अत्यंत मधुर बनाती है।

8. क्या नवरात्रि में इसका पाठ विशेष फलदायी है?

अवश्य। नवरात्रि के नौ दिनों में, विशेषकर संधि पूजा के समय या अष्टमी/नवमी को इसका पाठ करने से देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

9. चौथे श्लोक में 'मूढमानवा' किसे कहा गया है?

शंकराचार्य जी 'मूढमानवा' (मूर्ख मनुष्य) उन्हें कहते हैं जो 'सुधा' (माँ भक्ति रूपी अमृत) को छोड़कर व्यर्थ के सांसारिक सुखों के पीछे मृगतृष्णा की तरह भाग रहे हैं।

10. घर में सुख-शांति के लिए इसका प्रयोग कैसे करें?

प्रतिदिन प्रातः स्नान के बाद, पूजा स्थान में घी का दीपक जलाकर सपरिवार इस स्तोत्र का सामूहिक पाठ करें। इससे कलह दूर होती है और प्रेम बढ़ता है।