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Panchastavi 1. Laghu Stava – पञ्चस्तवि (लघुस्तवः) | Meaning & Significance

Panchastavi 1. Laghu Stava – पञ्चस्तवि (लघुस्तवः) | Meaning & Significance
॥ पञ्चस्तवि - १ (लघुस्तवः) ॥ ऐन्द्रस्येव शरासनस्य दधती मध्येललाटं प्रभां शौक्लीं कान्तिमनुष्णगोरिव शिरस्यातन्वती सर्वतः । एषासौ त्रिपुरा हृदि द्युतिरिवोष्णांशोः सदाहः स्थिता छिन्द्यान्नः सहसा पदैस्त्रिभिरघं ज्योतिर्मयी वाङ्मयी ॥ १ ॥ या मात्रा त्रपुसीलतातनुलसत्तन्तूत्थितिस्पर्धिनी वाग्बीजे प्रथमे स्थिता तव सदा तां मन्महे ते वयम् । शक्तिः कुण्डलिनीति विश्वजननव्यापारबद्धोद्यमाः ज्ञात्वेत्थं न पुनः स्पृशन्ति जननीगर्भेऽर्भकत्वं नराः ॥ २ ॥ दृष्ट्वा सम्भ्रमकारि वस्तु सहसा ऐ ऐ इति व्याहृतं येनाकूतवशादपीह वरदे बिन्दुं विनाप्यक्षरम् । तस्यापि ध्रुवमेव देवि तरसा जाते तवानुग्रहे वाचःसूक्तिसुधारसद्रवमुचो निर्यान्ति वक्त्राम्बुजात् ॥ ३ ॥ यन्नित्ये तव कामराजमपरं मन्त्राक्षरं निष्कलं तत्सारस्वतमित्यवैति विरलः कश्चिद्बुधश्चेद्भुवि । आख्यानं प्रतिपर्व सत्यतपसो यत्कीर्तयन्तो द्विजाः प्रारम्भे प्रणवास्पदप्रणयितां नीत्वोच्चरन्ति स्फुटम् ॥ ४ ॥ यत्सद्यो वचसां प्रवृत्तिकरणे दृष्टप्रभावं बुधैः तार्तीयं तदहं नमामि मनसा त्वद्बीजमिन्दुप्रभम् । अस्त्यौर्वोऽपि सरस्वतीमनुगतो जाड्याम्बुविच्छित्तये गोशब्दो गिरि वर्तते सनियतं योगं विना सिद्धिदः ॥ ५ ॥ एकैकं तव देवि बीजमनघं सव्यञ्जनाव्यञ्जनं कूटस्थं यदि वा पृथक् क्रमगतं यद्वा स्थितं व्युत्क्रमात् । यं यं काममपेक्ष्य येन विधिना केनापि वा चिन्तितं जप्तं वा सफलीकरोति सततं तं तं समस्तं नृणाम् ॥ ६ ॥ वामे पुस्तकधारिणीमभयदां साक्षस्रजं दक्षिणे भक्तेभ्यो वरदानपेशलकरां कर्पूरकुन्दोज्ज्वलाम् । उज्जृम्भाम्बुजपत्रकान्तिनयनस्निग्धप्रभालोकिनीं ये त्वामम्ब न शीलयन्ति मनसा तेषां कवित्वं कुतः ॥ ७ ॥ ये त्वां पाण्डुरपुण्डरीकपटलस्पष्टाभिरामप्रभां सिञ्चन्तीममृतद्रवैरिव शिरो ध्यायन्ति मूर्ध्नि स्थिताम् । अश्रान्ता विकटस्फुटाक्षरपदा निर्याति वक्त्राम्बुजात् तेषां भारति भारती सुरसरित्कल्लोललोलोर्मिवत् ॥ ८ ॥ ये सिन्दूरपरागपिञ्जपिहितां त्वत्तेजसाद्यामिमां उर्वीं चापि विलीनयावकरसप्रस्तारमग्नामिव । पश्यन्ति क्षणमप्यनन्यमनसस्तेषामनङ्गज्वर- -क्लान्तस्रस्तकुरङ्गशाबकदृशो वश्या भवन्ति स्फुटम् ॥ ९ ॥ चञ्चत्काञ्चनकुण्डलाङ्गदधरामाबद्धकाञ्चीस्रजं ये त्वां चेतसि तद्गते क्षणमपि ध्यायन्ति कृत्वा स्थिराम् । तेषां वेश्मसु विभ्रमादहरहः स्फारीभवन्त्यश्चिरं माद्यत्कुञ्जरकर्णतालतरलाः स्थैर्यं भजन्ते श्रियः ॥ १० ॥ आर्भट्या शशिखण्डमण्डितजटाजूटां नृमुण्डस्रजं बन्धूकप्रसवारुणाम्बरधरां प्रेतासनाध्यासिनीम् । त्वां ध्यायन्ति चतुर्भुजां त्रिनयनामापीनतुङ्गस्तनीं मध्ये निम्नवलित्रयाङ्किततनुं त्वद्रूपसंवित्तये ॥ ११ ॥ जातोऽप्यल्पपरिच्छदे क्षितिभुजां सामान्यमात्रे कुले निःशेषावनिचक्रवर्तिपदवीं लब्ध्वा प्रतापोन्नतः । यद्विद्याधर बृन्दवन्दितपदः श्रीवत्सराजोऽभवत् देवि त्वच्चरणाम्बुज प्रणतिजः सोऽयं प्रसादोदयः ॥ १२ ॥ चण्डि त्वच्चरणाम्बुजार्चनकृते बिल्वादिलोल्लुण्ठन- -त्रुट्यत्कण्टककोटिभिः परिचयं येषां न जग्मुः कराः । ते दण्डाङ्कुशचक्रचापकुलिशश्रीवत्समत्स्याङ्कितैः जायन्ते पृथिवीभुजः कथमिवाम्भोजप्रभैः पाणिभिः ॥ १३ ॥ विप्राः क्षोणिभुजो विशस्तदितरे क्षीराज्यमध्वासवैः । त्वां देवि त्रिपुरे परापरमयीं सन्तर्प्य पूजाविधौ । यां यां प्रार्थयते मनः स्थिरधियां तेषां त एव ध्रुवं तां तां सिद्धिमवाप्नुवन्ति तरसा विघ्नैरविघ्नीकृताः ॥ १४ ॥ शब्दानां जननी त्वमत्र भुवने वाग्वादिनीत्युच्यसे त्वत्तः केशववासव प्रभृतयोऽप्याविर्भवन्ति स्फुटम् । लीयन्ते खलु यत्र कल्पविरमे ब्रह्मादयस्तेऽप्यमी सा त्वं काचिदचिन्त्यरूपमहिमा शक्तिः परा गीयसे ॥ १५ ॥ देवानां त्रितयं त्रयी हुतभुजां शक्तित्रयं त्रिः स्वराः त्रैलोक्यं त्रिपदी त्रिपुष्करमथो त्रिब्रह्म वर्णास्त्रयः । यत्किञ्चिज्जगति त्रिधा नियमितं वस्तु त्रिवर्गादिकं तत्सर्वं त्रिपुरेति नाम भगवत्यन्वेति ते तत्त्वतः ॥ १६ ॥ लक्ष्मीं राजकुले जयां रणभुवि क्षेमङ्करीमध्वनि क्रव्यादद्विपसर्पभाजि शबरीं कान्तारदुर्गे गिरौ । भूतप्रेतपिशाचजम्बुकभये स्मृत्वा महाभैरवीं व्यामोहे त्रिपुरां तरन्ति विपदस्तारां च तोयप्लवे ॥ १७ ॥ माया कुण्डलिनी क्रिया मधुमती काली कलामालिनी मातङ्गी विजया जया भगवती देवी शिवा शाम्भवी । शक्तिः शङ्करवल्लभा त्रिनयना वाग्वादिनी भैरवी ह्रीङ्कारी त्रिपुरा परापरमयी माता कुमारीत्यसि ॥ १८ ॥ आईपल्लवितैः परस्परयुतैर्द्वित्रिक्रमाद्यक्षरै काद्यैः क्षान्तगतैः स्वरादिभिरथ क्षान्तैश्च तैः सस्वरैः । नामानि त्रिपुरे भवन्ति खलु यान्यत्यन्तगुह्यानि ते तेभ्यो भैरवपत्नि विंशतिसहस्रेभ्यः परेभ्यो नमः ॥ १९ ॥ बोद्धव्या निपुणं बुधैः स्तुतिरियं कृत्वा मनस्तद्गतं भारत्यास्त्रिपुरेत्यनन्यमनसा यत्राद्यवृत्ते स्फुटम् । एकद्वित्रिपदक्रमेण कथितस्तत्पादसङ्ख्याक्षरैः मन्त्रोद्धार विधिर्विशेषसहितः सत्सम्प्रदायान्वितः ॥ २० ॥ सावद्यं निरवद्यमस्तु यदि वा किं वानया चिन्तया नूनं स्तोत्रमिदं पठिष्यति जनो यस्यास्ति भक्तिस्त्वयि । सञ्चिन्त्यापि लघुत्वमात्मनि दृढं सञ्जायमानं हठात् त्वद्भक्त्या मुखरीकृतेन रचितं यस्मान्मयापि धृवम् ॥ २१ ॥ ॥ इति श्रीधर्मार्चार्य विरचित पञ्चस्तव्यां प्रथमः लघुस्तवः सम्पूर्णः ॥

॥ पञ्चस्तवि - १ (लघुस्तवः) - परिचय (Introduction) ॥

पञ्चस्तवि (Panchastavi) कश्मीरी शैव दर्शन (Kashmir Shaivism) और शाक्त परंपरा का एक अमूल्य रत्न है। यह पांच दिव्य स्तोत्रों का एक दुर्लभ संग्रह है जो साधक को भक्ति और ज्ञान के चरम शिखर तक ले जाने में सक्षम है। लघुस्तवः (Laghu Stava) इस संग्रह का प्रथम सोपान है।

'लघु' शब्द का अर्थ है 'छोटा' या 'हल्का'। यह स्तोत्र मात्र २१ श्लोकों का है, इसलिए इसे लघुस्तव कहा जाता है। परन्तु, ऋषियों ने कहा है कि यह 'लघु' होकर भी अपने प्रभाव में 'गुरु' (अत्यंत भारी/महान) है। यह गागर में सागर भरने के समान है। इसमें माँ त्रिपुरसुन्दरी (ललिता/राजराजेश्वरी) की महिमा का गुणगान है, जिन्हें कश्मीरी शैव मत में परब्रह्म की शक्ति 'विमर्श' के रूप में पूजा जाता है।

इसकी रचना संभवतः महान आचार्य श्रीधर्माचार्य द्वारा की गई थी, जो एक सिद्ध योगी थे। उनकी वाणी में वह ओज और रस है जो केवल आत्मानुभूति से ही संभव है। लघुस्तव की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल स्तुति नहीं, बल्कि एक साधना-ग्रंथ है। इसमें कुण्डलिनी योग, नाद-ब्रह्म और अद्वैत वेदांत के गहरे रहस्य छिपे हैं, जिन्हें एक भक्त अपनी सरल प्रार्थना के माध्यम से व्यक्त करता है।

यहाँ देवी को केवल एक मूर्ति नहीं, बल्कि चित्-शक्ति (Consciousness) के रूप में देखा गया है। वे ही सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और लय का कारण हैं। वे ही वाणी के रूप में हमारे कंठ में विराजती हैं और वे ही मोक्ष प्रदान करने वाली विद्या हैं।

॥ विशिष्ट महत्व (Significance) ॥

  • कुण्डलिनी जागरण का विज्ञान: लघुस्तव के श्लोक २ में 'शक्तिः कुण्डलिनी' का स्पष्ट उल्लेख है। यह स्तोत्र मूलाधार चक्र में सोई हुई शक्ति को जगाकर सहस्रार तक ले जाने का मार्ग प्रशस्त करता है।
  • मंत्र-शास्त्र का रहस्य: इस स्तोत्र के कई श्लोकों (जैसे ३, ४, ५) में देवी के गुप्त बीज मंत्रों (ऐं, क्लीं, सौः) का कूट संकेत है। यह श्रीविद्या उपासकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  • भक्ति और ज्ञान का समन्वय: कश्मीरी शैव मत 'ज्ञान' प्रधान है, किन्तु पञ्चस्तवि में 'भक्ति' (Devotion) की प्रधानता है। यह सिद्ध करता है कि ज्ञान और प्रेम (भक्ति) अंततः एक ही सत्य के दो पहलू हैं।

॥ फलश्रुति एवं लाभ (Benefits) ॥

  • वाक-सिद्धि (Power of Speech): श्लोक ३ और ८ में वर्णन है कि देवी की कृपा से साधक की वाणी अमृतमयी हो जाती है। उसके मुख से निकली हर बात सत्य और प्रभावकारी होती है। यह कवियों, वक्ताओं और विद्यार्थियों के लिए वरदान है।
  • पाप नाश (Removal of Sins): प्रथम श्लोक में ही प्रार्थना की गई है - "छिन्द्यान्नः सहसा पदैस्त्रिभिरघं" - अर्थात माँ अपने तीन चरणों से हमारे पापों को तत्काल नष्ट करें। यह स्तोत्र चित्त शुद्धि के लिए अमोघ है।
  • ऐश्वर्य और राज-सम्मान: श्लोक १० और १२ बताते हैं कि देवी का ध्यानी राजाओं के समान ऐश्वर्य और सम्मान प्राप्त करता है। उसे भौतिक सुखों की कोई कमी नहीं रहती।
  • आकर्षण और वशीकरण: श्लोक ९ के अनुसार, देवी का ध्यान करने वाला साधक त्रैलोक्य को मोहित करने की क्षमता प्राप्त कर लेता है। उसका व्यक्तित्व अत्यंत चुंबकीय हो जाता है।
  • मोक्ष (Liberation): अंततः, यह स्तोत्र जीव को अज्ञान के बंधन से मुक्त कर शिव-सायुज्य (मोक्ष) प्रदान करता है। वह जन्म-मृत्यु के चक्र से छूट जाता है।

॥ पाठ विधि (Recitation Method) ॥

  1. समय: ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व) या निशिथ काल (मध्य रात्रि) साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ है। शुक्रवार का दिन देवी उपासना के लिए विशेष है।
  2. शुद्धि: स्नान कर पवित्र धारण करें। लाल या श्वेत वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है।
  3. आसन: ऊनी आसन (लाल रंग) का प्रयोग करें। उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करें।
  4. ध्यान: पाठ से पूर्व देवी त्रिपुरसुन्दरी का ध्यान करें (जैसा श्लोक १ या ८ में वर्णित है - ललाट पर चंद्रकला, श्वेत या अरुण वर्ण)।
  5. समर्पण: अंत में पाठ का फल देवी के चरणों में समर्पित करें और क्षमा प्रार्थना करें।

॥ FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न ॥

1. पञ्चस्तवि (Panchastavi) क्या है और इसमें 'लघुस्तव' का क्या स्थान है?

पञ्चस्तवि कश्मीर शैव दर्शन का एक अद्भुत ग्रंथ है जो ५ स्तोत्रों का संग्रह है। 'लघुस्तव' इसका प्रथम स्तोत्र है। 'लघु' का अर्थ है छोटा (२१ श्लोक), किन्तु प्रभाव में यह अत्यंत तीव्र और गूढ़ है। यह इस संग्रह का प्रवेश द्वार है।

2. लघुस्तव के रचयिता कौन माने जाते हैं?

पारंपरिक रूप से और अधिकांश कश्मीरी विद्वानों के मतानुसार, पञ्चस्तवि के रचयिता महान आचार्य 'श्रीधर्माचार्य' हैं। उनकी शैली कालिदास और शंकराचार्य के समान ही ओजस्वी और रसमय है।

3. क्या कश्मीरी शैव दर्शन में 'शक्ति' का विशेष महत्व है?

जी हाँ, कश्मीरी शैव मत अद्वैतवादी है। यहाँ 'शिव' (प्रकाश) और 'शक्ति' (विमर्श) को अभिन्न माना गया है, जैसे अग्नि और उसकी दाहिका शक्ति। इसलिए यहाँ देवी की उपासना परब्रह्म (Supreme Consciousness) के रूप में की जाती है।

4. लघुस्तव के पाठ का मुख्य लाभ क्या है?

इसके पाठ से 'वाक-सिद्धि' (वाणी की शक्ति), कवित्व, आकर्षण (वशीकरण), पाप-नाश और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह साधक की सोई हुई चेतना (कुण्डलिनी) को जगाने में सहायक है।

5. क्या इस स्तोत्र में 'बीज मंत्रों' का प्रयोग है?

हाँ, लघुस्तव के श्लोकों में 'ऐं' (वाग्भव), 'क्लीं' (कामराज), 'सौः' (शक्ति) आदि बीज मंत्रों को कूट रूप में पिरोया गया है। यह श्रीविद्या उपासकों के लिए एक गुप्त खजाना है।

6. श्लोक १ में 'त्रिपुरसुन्दरी' का क्या अर्थ है?

'त्रिपुर' का अर्थ है तीन पुर (लोक/अवस्थाएं - जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति)। जो इन तीनों से परे चौथी अवस्था (तुरीय) में स्थित होकर भी इन तीनों का संचालन करती हैं और अत्यंत सुंदर हैं, वे 'त्रिपुरसुन्दरी' हैं।

7. क्या बिना गुरु दीक्षा के इसका पाठ कर सकते हैं?

यह एक भक्ति-प्रधान स्तोत्र है, अतः श्रद्धा भाव से इसका पाठ कोई भी कर सकता है। परन्तु, इसमें निहित बीज मंत्रों के विशेष अनुष्ठान के लिए गुरु दीक्षा आवश्यक मानी जाती है।

8. पाठ करने का सर्वोत्तम समय (Time) क्या है?

ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व) साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ है। इसके अलावा, मध्य रात्रि (निशिथ काल), प्रदोष काल और नवरात्रि के दिन भी इसके पाठ के लिए सिद्ध माने गए हैं।

9. पञ्चस्तवि के अन्य ४ स्तोत्र कौन से हैं?

पञ्चस्तवि में क्रम से ये ५ स्तोत्र हैं: १. लघुस्तव (यह स्तोत्र), २. चर्चास्तव, ३. घटस्तव, ४. अम्बास्तव, और ५. सकलजननीस्तव।

10. क्या विद्यार्थी (Students) इसका पाठ कर सकते हैं?

अवश्य। चूँकि यह सरस्वती और वाक-सिद्धि प्रदान करने वाला स्तोत्र है, इसलिए विद्यार्थियों के लिए यह स्मरण शक्ति और वाणी को प्रखर बनाने में अत्यंत लाभकारी है।